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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 247, कुल 530 में से

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पृष्ठ 247

प्रथमोऽंशः १४५
की भाँति ‘बाणलिङ्ग’ ।१ पीठ = भगवान् शर्व का पीठ । अलङ्कारक उपादान२—
दीपकलिकावत दीप्तिमान हंस से सुशोभित ॥ यह हंस ही जीवात्मा है । ध्यान का
फल—वाणी का ईश्वर हो जाता है, ईश्वरवत रक्षा एवं विनाश कर सकता है ।३
कर्णिका का आन्तर भाग—कर्णिका में त्रिकोण सूर्यमण्डल है ।४ लिङ्ग का आन्तर
भाग—लिङ्ग में जीवात्मा निवास करती है । जीव—जीव दीपकलिकावत है ।
अन्तःकरण के ऊपर ५४ दल कमल हैं ।५ ध्यान का फल—अणिमादि आठ
सिद्धियों की प्राप्ति एवं कविराजत्व ।६
(ग) ‘आज्ञा चक्र’—‘आज्ञाचक्र’ छठवाँ चक्र है । चक्राक्षर ह + क्ष । दल—
दो । स्थान—भ्रुवद्वय का मध्यभाग । शक्ति—शुभ्रवर्णा हाकिनी । कर्णिका—
अमृतस्रावि ‘ल’ से युक्त कर्णिका ॥ मन—प्रदीप्तकलिकाकृति वाला मन यहाँ रहता
है । लिङ्ग—कर्णिका में स्थित, त्रिकोण में लिङ्ग स्थित है । आत्मा—(उसमें ही)
प्रदीपवत आत्मा भी स्थित है । दल—इस चक्र के ऊपर ६४ दलों का ध्यान
करणीय । ६४ दलों में शिवशक्ति स्थित हैं । उत्पत्ति क्रम-परा—इच्छाशक्ति—
ज्ञानशक्ति—भूतक्रिया । कुण्डली—मातृका ॥ शंभु की रश्मियाँ—३६० ॥७ लिङ्ग—
‘शुक्ल’ नामक महाकाल ही यहाँ शिवलिङ्ग हैं । स्वरूप—परमतेज स्वरूप ।
देशगत स्थान—इड़ा (वरणा नदी) असी (असी नदी), आज्ञाचक्र—वरणा + असी
का सङ्गम = ‘वाराणसी’ । ‘वरणा’ = इड़ा नाड़ी । ‘असी’ = पिङ्गला नाड़ी ।
‘गङ्गा’ = इड़ा । ‘यमुना’ = पिङ्गला । ‘इड़ा’ = अमृत नाड़ी ।८ ‘त्रिवेणी’ =
आज्ञा पद्म । त्रिवेणी = (१) ‘युक्तत्रिवेणी’ (२) ‘मुक्तत्रिवेणी’ पुरुषाङ्ग के नीचे है—
‘युक्तत्रिवेणी’ । भ्रूमध्य में स्थित है—‘मुक्तत्रिवेणी’ ॥ भ्रूमध्य तक आकर वहाँ इड़ा,
पिङ्गला एवं सुषुम्णा त्रिवेणी रूप ग्रन्थिभाव प्राप्त करके नासारंध्र तक पहुँचती हैं ।
आज्ञा पद्म के भीतर शरद ऋतु के चन्द्रमा के समान चन्द्रबीज ‘ठं’ स्थित है ।९
मूलाधार के चतुर्दल पद्म की योनि में ‘सूर्य’ रहता है । सूर्यमण्डल से सतत्
विषजल बहता है । यह विष पिङ्गला में बहता है । आज्ञाचक्र के वामभाग से यह
‘असी’ या ‘पिङ्गला’ नाड़ी प्रस्थान करती है ।१० ‘द्विदल आज्ञापद्म’ के ऊपरी भाग
में तीन पीठ हैं—(१) बिन्दु (२) नाद (३) शक्ति ॥ ये तीनों आज्ञाचक्र में स्थित
हैं ।११ ध्यान-फल—पूर्व जन्मों के कर्मों का क्षय । यक्ष, राक्षस, गंधर्व, अप्सरा एवं
किन्नर आदि का वशीभूत होना । जिह्वा को उलटकर एवं तालुमूल में लगाकर
आज्ञा कमल आधा क्षण भी चित्तस्थैर्य से पापपहाड़ का विनाश ।१२ आज्ञापद्म का
ज्ञान—समस्त पद्द्मों के फल की प्राप्ति । ध्यान—वासना क्षय ॥ परमानन्दाप्ति ।
मृत्यु के समय इस चक्र का ध्यान—परमात्मा में लय ॥ इस पद्म का अहर्निश
ध्यान—समस्त पापों से मुक्ति ॥ समस्त बंधनों से मुक्ति ॥१३
आज्ञाचक्र हिमकर (चन्द्रमा) के समान है । ‘ध्यानधाम प्रकाश’ है । इस चक्र
के भीतर स्थित ‘हाकिनी’ के छः मुख चन्द्रमा के समान है । इस पद्म के भीतर
१-३. षट्चक्रनिरूपण ४-७. चक्र कौमुदी
८-१३. शिवसंहिता
१० वरि.