वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
पृष्ठ 252, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ें१५० वरिवस्यारहस्ये
परिपाकद्शायाम् तादृशकर्माभिन्न मायावच्छिन्नं ब्रह्म घनीभूतमित्युच्यते । स एव
जगदंकुरु कन्दरूपत्वाद्बिन्दुपदेन व्यवहियते ॥''
आचार्य शङ्कर प्रपञ्चसार में कहते हैं कि सिसृक्षु एवं विचिकीर्षु परमात्मा की
घनीभूता चितशक्ति ही 'बिन्दु' बन जाती है—
'विचिकीर्षुर्घनीभूता सा चिदभ्येति बिन्दुताम् ।'
सृष्टि का प्रथम चरण तो बिन्दु है किन्तु द्वितीय चरण का आरंभ करने हेतु
शक्ति 'बिन्दु' से पृथक होकर नाद को जन्म देती है । यह 'बिन्दु' की शब्दात्मिका
वृत्ति है जिसके 'परा', 'पश्यन्ती', 'मध्यमा' एवं वैखरी, चार रूप हैं । दूसरी दृष्टि
से विचार करने से प्रथम 'नाद' आता है और उसके बाद 'बिन्दु'—'आसीच्छक्ति-
स्ततो नादः, नादाद्बिन्दु समुद्भवः ॥'१ चक्र की दृष्टि से विचार करें तो श्रीचक्र
का नवमावरण ही 'बिन्दुचक्र' है । इसी का नाम है—'सर्वानन्दमय चक्र' बिन्दु ही
सर्वातिशायी है । निर्गुण, निराकार, निरञ्जन ब्रह्म जो परमशिव या परा श्रीसुन्दरी हैं
उनका जगन्निर्माण की दिशा में उठाया गया प्रथम कदम 'बिन्दु' ही है । परम तत्त्व
में 'एकोऽहं बहुस्याम' रूप सिसृक्षा के उदय होते ही 'बिन्दु' का प्रादुर्भाव हो जाता
है । 'बिन्दु' ही है कामेश्वर एवं कामेश्वरी के स्वारसिक सामरस्य का स्वरूप । यही
सर्वोच्च सत्ता है और इसी के अन्तर में समस्त विश्व बीजात्मना अन्तर्गर्भित है ।
यह विश्वोत्तीर्ण है । यह अनुत्तर शक्तिसम्पन्न एवं समस्त रचना-शक्तियों का स्वगृह
है । इसी घनीभूत तेज के पुञ्ज को ही 'चिद्घन' या 'परासंवित्' भी कहते हैं ।
इसी की द्वितीया आख्या है—
'अनुस्वार' जो कि समस्त वाङ्मय को जन्म देता है । महामन्त्र रूप मातृका
का जप भी बिन्दु से युक्त करते ही किया जाता है । 'अहं' के 'अकार' (शिव)
एवं 'हकार' (शक्ति) की एकात्मता का सम्पादक भी यही 'बिन्दु' है ।
तन्त्र-दर्शन में 'बिन्दु' की वही स्थिति है जो वेदान्त में ईश्वर की है ।२ जिस
प्रकार 'नाद' शक्ति का एक रूप है उसी प्रकार 'बिन्दु' भी शक्ति का ही एक रूप
है ।३ शक्ति के इन दोनों स्वरूपों (नाद एवं बिन्दु) में क्रिया-शक्ति निहित है । जो
कि सृष्टि-विकास में सहायक हैं ।४ राघवभट्ट ने 'शारदातिलक' की टीका में कहा है
कि 'नाद' एवं 'बिन्दु' शक्ति की वे अवस्थायें हैं जो सृष्टि को जन्म देने के लिए
समुत्सुक रहती हैं । 'बिन्दु' घनावस्था है । 'प्रपञ्चसार' में कहा गया है कि जब
शक्ति में सिसृक्षा उत्पन्न होती है तब शक्ति घनीभूत हो जाती है और उससे सृष्टि
का विकास उसी प्रकार होता है यथा दूध के घनीभूत होने पर दही, मक्खन, मट्ठा
आदि का जन्म होता है ।
———————————————————————
१. वाक्यपदीय (भर्तृहरि)
२. आर्थर ऍवेलान—दि गारलैण्ड ऑफ लेटर्स, पृ० १११, ११६, १२२
३-४. तत्रैव (पृ० १२४, १२५)