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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 251, कुल 530 में से

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पृष्ठ 251

प्रथमोऽंशः १४९
इति वचने शक्तिवद्बिन्दुद्वयं तिर्यग्रूपं मा भूदित्यतः संप्रदायमनुसरन्नाह—ऊर्ध्वाध इति ।
संयुता अग्रमूलभागयोः संश्लिष्टा, न त्वस्पृशन्ती स्थिता । इयं च ब्रह्मरन्ध्रसंस्थाना ।
इयमेव च मनोन्मनीत्यपि व्यवह्रियते । मनसो यथास्थितरूपस्यैवाभ्यासविशेषेणै-
तावत्पर्यन्तवृत्त्युद्गमः सुसाध इत्यतः समनेत्युच्यते । एतदुपरि तु रूपान्तरं प्राप्तस्यैव
मनसो धृतिविषयतेत्यत उत्क्रान्तमनस्कत्वादुन्मना । प्रकृतानुपयुक्तमप्युन्मनोपरिस्थानं
चक्रराजस्य त्रिविधभावनान्तर्गतनिष्कलभावनायामुपयुक्तत्वेन प्रसङ्गादाह—तदूर्ध्वं महा-
बिन्दुरिति ॥ शक्त्यादीनामिति । समनान्तानां तिसृणामिति संप्रदायः । 'शक्त्यादीनां
तिसृणां द्वादशरवितुल्य कान्तयस्तनवः' इति पाठो युक्तः । बिन्दादिस्वरूपाङ्गविस्तरः
स्वच्छन्दसंग्रहे द्रष्टव्यः ॥ २२-२६ ॥
स्थानं कण्ठाद्युत्पत्तिस्थानं मूलाधारादि स्थितिस्थानं च । यत्नादान्तरबाह्ययत्न-
पूर्वकम् । इदं च मानसजपातिरिक्तविषयम् । तत्र तत्तत्स्थानयत्नविभावनमात्रस्योपयोग
इति द्रष्टव्यम् । नादो बिन्दादिनवकम् । पूर्वपूर्वकूटस्थनादस्योत्तरोत्तरकूटोच्चारणे-
नैवोच्चरितप्रायत्वान्न तत्र पार्थक्येन यत्नः कालविलम्बो वा कार्य इत्यर्थः । तृतीयकूटे
तूत्तरकूटाभावात्तदुभयमपेक्षितमित्याह—बिन्दादिकेति ॥ २७-३० ॥

  • सरोजिनी *
    'बिन्दु'—क्रियाशक्ति का दूसरा नाम ही 'बिन्दु' है । ज्योतिस्वरूप बिन्दु ही
    ईश्वर तत्त्व की अधिष्ठान भूमि है । बिन्दु ही शुद्धाशुद्ध अध्वा का उपादान है ।
    बिन्दु से समना तक मात्रांश को जोड़ दिया जाय तो मात्र एक मात्रा होती
    है । उसी से 'बिन्दु' अर्धमात्रा एवं 'नाद' १।१६ मात्रा है । प्रणव के अवयवों की
    दृष्टि से यदि विचार किया जाय तो अ-उ-म-बिन्दु-अर्धचन्द्र-निरोधिनी-नाद-नादान्त-
    शक्ति-व्यापिनी-समना-उन्मना—ये प्रणव के अवयव हैं जिनमें 'बिन्दु' एवं 'नाद'
    दोनों हैं । इनकी मात्रायें निम्न हैं—बिन्दु १।२ मात्रा, अर्धचन्द्र—१।४ मात्रा,
    निरोधिनी—१।८ मात्रा, नाद—१।१६ मात्रा, नादान्त—१।३२ मात्रा, शक्ति १।६४
    मात्रा, व्यापिनी १।१२८ मात्रा, समना—१।१२८ मात्रा । सबका योग = १ मात्रा ।
    'बिन्दु' का स्वरूप—'बिन्दु' वह अवस्था है जिसमें एक मात्रा का अर्धांश
    है । बिन्दु रूप ज्योति में समग्र विश्व अभिन्न रूप से भासमान होता है । यह प्रणव
    का चतुर्थावयव है । समस्त आगमों का प्रधान लक्ष्य 'बिन्दु' ही है । यह समस्त
    जगत् का आधार भी है । भ्रूमध्य के किंचित् ऊर्ध्वदेश में 'बिन्दु' अवस्थित है ।
    'Introduction To Tantraśāstra' में जान बुडरफ कहते हैं कि 'बिन्दु' शिव के
    नाद की प्रकृति एवं शक्ति का बीज है अतः इसे 'नाद' एवं 'बीज' का या
    शिव-शक्ति के अन्तर्संबंध का द्योतक कहा गया है—'Bindu is the nature of
    Nāda of Śiva and Bīja of Śakti and has been said to be the relation of
    these to be those who are viewed in all the Āagmas.'
    आचार्य भास्कर 'सौभाग्यभास्कर' (ललिता स०भाष्य) में कहते हैं कि जगद्गुरु
    ही कन्दरूप होने के कारण 'बिन्दु' कहलाता है—"प्रलये सृज्यमान प्राणिकर्मणाम्