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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 253, कुल 530 में से

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पृष्ठ 253

प्रथमोंऽशः १५१
'तोडल तन्त्र' में कहा गया है कि बिन्दु में शून्यता एवं गुण दोनों की एक
साथ प्रतिष्ठा पाई जाती है ।१ तन्त्र में बिन्दु की स्थिति वही है जिस प्रकार पुराणों
के मत में महाविष्णु की है ।२ तन्त्र मत में बिन्दु सत्यलोक की विभूति है और
मानव पिण्ड में यह सहस्रार में स्थित है । इसमें शिव एवं शक्ति अपनी मायाशक्ति
से उसी प्रकार आवृत्त रहते हैं यथा चने के छिलके में उसके दोनों दल आवृत्त
रहते हैं ।३
तांत्रिक मतानुसार 'परबिन्दु' सृष्टि-विकास का मूल कारण है । सृष्टि इसी का
परिणाम है ।४ 'परबिन्दु' के दो भाग हैं—(१) दक्षिण भाग = पुरुषरूप = 'ह'
(२) वामभाग = नारीरूप = 'सा'—दोनों मिलकर 'हंस' बन गए । हंस = पुरुष
एवं प्रकृति संयोगावस्था है ।५ अन्य तन्त्रों के अनुसार 'परबिन्दु' काल के द्वारा
तीन भागों में विभाजित कर दिया जाता है जो निम्न हैं—(१) 'बिन्दु' (२) 'नाद'
(३) 'बीज' । 'शारदा तिलक' के मतानुसार 'हंस' एक प्रकार का वह सम्बंध है
जिसे 'नाद' कहा जाता है । 'बीज' में बिन्दु एवं नाद दोनों रहते हैं । इस प्रकार
एक ही 'परा बिन्दु' (क) नाद एवं (ख) बीज—में विभाजित हो जाता है ।६
'शारदातिलक' में इसी बात को इस प्रकार व्यक्त किया गया है—
'बिन्दुःशिवात्मको बीजशक्तिर्नादः तयोर्मिथः ।
सर्वागम विशारदैः समवायः समाख्यातः ॥'७
अर्थात् आगमिक बिन्दु को शिव एवं बीज को शक्ति एवं नाद को उन दोनों
का समवाय स्वीकार करते हैं । 'परबिन्दु' में बीज एवं बिन्दु (शक्ति एवं शिव)
समवाय सम्बंध से रहते हैं । यह समवाय सम्बन्ध ही 'नाद' है । इसीलिए बहुत से
आचार्य नादाविर्भाव मानते हैं । बीज बिन्दु एवं नाद की समन्वितावस्था ही 'त्रिबिन्दु'
है । इसे ही अन्य तांत्रिकों ने 'कामकला' का अभिधान दिया है । 'कामकला'—
मातृकाओं का उदय—स्थूल वर्ण—वर्णों से मन्त्र । इस प्रकार नाद से मन्त्रों का
अविनाभाव सम्बंध है । 'त्रिबिन्दु' = सूर्य-चन्द्र-अग्नि । इच्छा-ज्ञान-क्रिया । सत्-रज-
तम—इन त्रिकों की समष्टि ही त्रिबिन्दु है । परबिन्दु—त्रिबिन्दु । त्रिबिन्दु (१) श्वेत
बिन्दु (२) रक्त बिन्दु (३) मिश्र बिन्दु ॥ आर्थर एवेलॉन कहते हैं कि—'परबिन्दु'
शिव एवं शक्ति की अविभाजितावस्था है । विस्फोट होने पर इसके तीन भाग हो
जाते हैं—(१) 'बिन्दु' (२) 'बीज' (३) 'नाद' । 'नाद', 'बिन्दु' एवं 'बीज' तीनों
क्षोभावस्था के परिणाम हैं । क्षोभ-प्रक्रिया में बिन्दु एवं बीज में से एक क्षोभक एवं
एक क्षोभ्य है ।
१. कालीचरण : षट्चक्र निरूपण की टीका
२. तत्रैव
३. दि गारलैण्ड ऑफ लेटर्स, पृ० १२६
४. तत्रैव (१२८) ५. प्रपञ्चसार तन्त्र
६. गा० आ० ले० (पृ० १२९) ७. शारदातिलक