वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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'सूक्ष्मरूप मन' रहता है । पद्म की कर्णिका में स्थित 'योनि' में 'इतर' नामक शिव
निवास करते हैं । वे विद्युन्मालावत दीप्तिमान हैं ।१ वेदों का प्रथम या आदि बीज
(ब्रह्मसूत्रों को अपने प्रकाश से प्रकट करने वाली शक्ति का निलय) भी यहाँ है ।
इस चक्र में स्थित त्रिकोण में ओङ्कार है । यही प्रदीपाभज्योति शुद्धबुद्धान्तरात्मा है।
इसके ऊपर अर्धचन्द्र है और इसके ऊपर 'बिन्दु' के रूप में प्रकाशित 'मकार'
है ।२ इसके ऊपर चन्द्रकिरणों को फैलाने वाला श्वेतवर्ण 'नाद' है । (प्रणव प्रकाश
किरणों से घिरा है । इसके ऊपर दीपवत आत्मा स्थित है ।) यह चक्र दीप्तिमान
प्रातः के दीप्त सूर्य के समान है । यही परमात्मा अपनी पूर्ण शक्तियों के साथ व्यक्त
होता है । यह अतुल्य एवं परमामोदपूर्ण विष्णु-धाम है । ध्यानफल—परशरीर में
प्रवेश, सर्वज्ञता, सर्वदर्शिता, सर्वशास्त्रज्ञान, ब्रह्मात्मैक्य प्राप्ति आदि३ ॥ २०-२१ ॥
अथावशिष्टस्य बिन्द्वादिनवकस्य स्थितिस्थानरूपाकारा नाह—
आधारोत्थित नादो गुण इव परिभाति वर्णमध्यगतः ।
मध्येफालं बिन्दुदीप इवाभाति वर्तुलाकारः ॥ २२ ॥
तदुपरि गतोऽर्धचन्द्रोऽन्वर्थः कान्त्याकृत्या ।
अथ रोधिनी तदूर्ध्वं त्रिकोणरूपा च चन्द्रिकाकान्तिः ॥ २३ ॥
नादस्तु पद्मरागवदण्डद्वयमध्यवर्तिनीव सिरा ।
नादान्तस्तडिदाभ सव्यस्थितबिन्दुयुक्तलाङ्गलवत् ॥ २४ ॥
निर्याबिन्दुद्वितये वामोद्गच्छत्सिराकृतिः शक्ति ।
बिन्दूद्गच्छत्त्यश्राकारधरा व्यापिका ४प्रोक्ता ॥ २५ ॥
ऊर्ध्वाधोबिन्दुद्वयसंयुतरेखाकृतिः समना ।
सैवोर्ध्वबिन्दु हीनोन्मना तदूर्ध्वं महाबिन्दुः ॥ २६ ॥
शक्त्यादीनां तु वपुर्द्वादश रवि कान्ति पुञ्जाभम् ।
इत्येवं वर्णानां स्थानं ज्ञात्वोच्चरेद्यत्नात् ॥ २७ ॥
नादः प्राथमिकस्तु द्वितीय कूटेन साकमुच्चार्यः ।
द्वितीयीकं नादं तार्तीयेनोच्चरेन्न पृथक् ॥ २८ ॥
बिन्द्वादिनवकयोस्तु प्राक्त न कूटस्थ योर नयोः ।
संमेलनेन शबलं तार्तीयीकं विभावयेत् कूटम् ॥ २९ ॥
बिन्द्वादि कसमनान्तं क्रमेण तार्तीयमुच्चरेन्नादम् ।
उन्मन्यन्तर्लीनं विभावयेदेतदुच्चरणम् ॥ ३० ॥
१-३. षट्चक्रनिरूपण ४. कथिता