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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 249, कुल 530 में से

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पृष्ठ 249

प्रथमोऽंशः १४७
(नाद एवं बिन्दु का स्वरूप)
मूलाधार-चक्र से ऊर्ध्वोत्थित 'नाद' वर्णों के मध्य सञ्चरण करता हुआ ऐसा
प्रतीत होता है मानों (किसी पुष्प-माला के मध्य सञ्चरण करता हुआ कोई) सूत
हो। मस्तक के मध्य स्थित 'बिन्दु' ऐसा प्रतीत होता है मानों कोई वृत्ताकार
दीपक हो ॥ २२ ॥
(अर्द्धचन्द्र एवं रोधिनी का स्वरूप)
उसके (बिन्दु के) ऊर्ध्व में स्थित 'अर्द्धचन्द्र' अपनी प्रभा एवं आकार में
अन्वर्थक (आकार एवं दीप्ति दोनों दृष्टियों से समतुल्य) है। उसके उपरान्त स्थित
त्रिभुज की आकृति वाली 'रोधिनी' ज्योत्स्नावत दीप्तिमान है ॥ २३ ॥
(नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना एवं उन्मना का स्वरूप)
'नाद' पद्मराग मणि की दीप्ति वाला, अण्डद्वितय के मध्य वर्तमान नाडिका
के समान है। 'नादान्त' विद्युत के समान उद्दीप्त है और वामभागवर्ती बिन्दु से
युक्त हल की भाँति आकृति वाला है ॥ २४ ॥
'शक्ति' दो बिन्दुओं के वाम भाग से उदित होने वाली सिरा के आकार वाली
है। 'व्यापिका' बिन्दु एवं उसके ऊपर आरूढ़ त्रिकोण के समतुल्य आकार वाली
कही गई है ॥ २५ ॥
'समना' का आकार रेखा के ऊर्ध्व एवं अधोभाग में स्थित बिन्दु द्वय (के
आकार के समान) है। ऊर्ध्ववर्ती बिन्दु द्वय से रहित वही ('समना') 'उन्मना' है।
उसके ऊर्ध्व भाग में 'महाबिन्दु' स्थित है ॥ २६ ॥
'शक्ति' आदि (शक्ति, व्यापिका, समना एवं उन्मना) का शरीर (स्वस्वरूप)
बारह सूर्यों के प्रकाश-समूह के समान देदीप्यमान है। इस प्रकार वर्णों के स्थान
का ज्ञान प्राप्त करके उनका यत्न (आभ्यन्तर एवं बाह्य) के अनुसार उच्चारण
करना चाहिए ॥ २७ ॥
(नादोच्चारण की प्रक्रिया)
प्राथमिक कूट के नाद का उच्चारण द्वितीय कूट के साथ करना चाहिए।
द्वितीय कूट के नाद का उच्चारण तृतीय कूट के साथ करना चाहिए, अलग
नहीं ॥ २८ ॥
तृतीय कूट को पूर्ववर्ती कूटद्वय के बिन्द्वादि नवों के गण के संमेलन द्वारा
शबल रूप में कल्पित करना चाहिए ॥ २९ ॥
'बिन्दु' से आरंभ करके क्रमानुसार 'समना' में पर्यवसित होने वाले तृतीय
कूट के नाद का उच्चारण करना चाहिए एवं इसे 'उन्मनी' में अन्तर्लीन कल्पित
करना चाहिए ॥ ३० ॥