वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
प्रथमोऽंशः १३५
उच्चारण-काल का विवरण
(१) 'कामकला' (ई) एवं त्रिकोण (ए) की मात्राएँ : २ मात्राएँ ।
(२) बिन्दु-शून्य ह्रीङ्कार की मात्राएँ : ३ मात्राएँ ।
(३) अन्य वर्णों की मात्राएँ : १(१/२) मात्राएँ ।
(४) बिन्दु की मात्रा : १/२ मात्रा ॥
(५) नाद की मात्रा : १ लव कम १ मात्रा
२५६ लव = १ मात्रा: 'षट्पञ्चाशदुत्तर शतद्वय लवैरेका मात्रा ।' १२८ =
लव = 'बिन्दु' । ६४ लव = 'अर्धचन्द्र' । ३२ लव = 'रोधिनी' । १६ लव =
'नाद' । ८ लव = 'नादान्त' । लव = 'शक्ति' । २ लव = 'व्यापिका' । १ लव
= 'समना' । 'उन्मना' में काल है ही नहीं अतः वहाँ लव कल्पना ही व्यर्थ है ।१
'योगिनीहृदय' के 'चक्रसङ्केत' में दिया गया विवरण निम्नानुसार है—(१)
अर्धचन्द्र = १/२ मात्रा, इसके बाद 'शक्ति' पर्यन्त (२) अर्धचन्द्रादिक सभी आगे
के नादों की मात्रा उत्तरोत्तर पूर्ववर्ती नादों की तुलना में १/४; १/८; १/१६;—
इस प्रकार द्वैगुण्यकाल—'पूर्वपूर्वद्विगुणांश कालवत्वं सामान्येनोक्तं 'चतुःषष्टिस्तदूर्ध्वं तु
द्विगुणं द्विगुणं ततः ॥' इसके अनुसार तो—५१२ वाँ भाग 'उन्मनाकाल' होगा
'द्वादशोत्तर पञ्चशततमो भाग उन्मना कालः । मात्रास्वरूपं च द्वादशोत्तरपञ्चशत
लवात्मक त्वमेव प्रतीयते ॥' अर्थात् इस दृष्टि से उन्मना की माया ५१२ होगी ।
'देश-कालानवच्छिन्न तदूर्ध्वं, परमं महत्' कहकर उन्मना को कालानवच्छेद से परे,
कालातीत माना गया है । किन्तु 'चतुःषष्टि' इस श्लोक में 'शक्ति' ६४ वाँ भाग
('शक्तेस्तुः षष्टितमो मात्राभागः') उसके ऊपर 'व्यापिका' द्विगुणित (अष्टाविंशत्युत्तर-
शततमो भागः) १२८ वाँ भाग, उसके ऊपर द्विगुण । कहा गया है—'शक्त्यादीनां
च मात्रांशो मनोन्मन्यास्तथोन्मनी' यहाँ 'मनोन्मनी' पद समना का पर्याय मान लिया
गया है । एक मात्रो भवेद ह्रस्वो द्विमात्रो दीर्घ उच्यते ॥ किमात्रस्तु प्लुतोज्ञेयो
व्यञ्जनं त्वर्धमात्रकम् ॥''
'कालपरमाणुर्लवः' ॥ 'लव' कालगणना की सूक्ष्मतम इकाई है जो स्वरूपतः
निम्नानुसार है—'नलिनीपत्रसंहत्याः सूक्ष्म सूच्यभिवेदने । दले-दले तु यः कालः स
कालो लवसंज्ञितः । अतः सूक्ष्मतमः कालो नोपलब्धो भृगूद्वह ॥'
कमल को सुई से आर-पार वेधने के समय (अर्थात् यदि किसी कमल को
एक ओर से दूसरी ओर वेधने हेतु उसमें कोई सुई डाल कर उसे कमल के
आर-पार कर दी जाय तो उसमें लगने वाले समय) प्रत्येक दल को बेधने में जो
समय लगता है वही (प्रत्येक दल-बेधन का) वेधन-काल ही 'लव' है ।
षट्पञ्चाशतदुत्तरशतद्वयलवों की एक 'मात्रा' होती है ।
१. आचार्य भास्कर : 'वरिवस्यारहस्यम्' 'प्रकाश'
१३६ वरिवस्यारहस्ये
लव = 'बिन्दोरष्टाविंशत्युत्तरशतं लवाः ।।' 'अर्धचन्द्र' = ६४; 'रोधिनी' =
३२; 'नाद' = १६; 'नादान्त' = ८; 'शक्ति' = ४; 'व्यापिका' = २ लव;
'समना' = १ लव; 'उन्मना' = 'उन्मनादास्तु नास्त्येव कालः ।।' 'उन्मना' में काल
रहता ही नहीं अतः 'लव' (कालमात्रा) होना संभव ही नहीं है ।
'योगिनीहृदय' के चक्रसङ्केत में बताया गया है कि-दीपाकार 'बिन्दु' अर्धमात्रा
वाला है । अर्धचन्द्रादिक से शक्तिपर्यन्त चतुरांश-षोडशांश आदि उच्चारण काल है ।
यो०हृ० में कहा गया है-
“दीपाकारोऽर्ध मात्रश्च ललाटे वृत्त इष्यते ॥ २८ ॥
अर्धचन्द्रस्तथाकारः पादमात्रस्तदूर्ध्वके ।
ज्योत्स्नाकारा तदष्टांशा रोधिनी त्र्यस्रविग्रहा ॥२९ ॥”
'अर्धमात्रा' = 'ह्रस्वस्य उच्चारणकालो मात्रेत्युच्यते' 'मात्राया अर्धमुच्चारण
कालो यस्य सोऽर्धमात्रः ॥ दीपाकारोऽर्धमात्रोच्चारणकालो वृत्तसन्निवेशो बिन्दु-
रित्यर्थः ।।१ अर्धचन्द्रो बिन्दोरर्धभागः' तथाकारो दीपाकार एव । 'पादमात्रो' मात्रा-
कालस्य चतुर्थभागोच्चारण काल इत्यर्थः ।।२ 'तदूर्ध्वके'-बिन्दु के ऊर्ध्वभाग में
चतुर्थभागोच्चारण काल ॥
'रोधिनी' में मात्राष्टांशोच्चारण काल ('तदष्टांशा') है । उपर्युक्त विवरण के
अनुसार तो 'उन्मना' का भी उच्चारण काल सिद्ध होता है जो कि निम्न है-
'मात्रास्वरूपञ्च द्वादशोत्तर पञ्चशतलात्मक त्वमेव प्रतीयते ॥'३
अर्थात् अर्धमात्रा बिन्दु का वेग है । उसके बाद प्रत्येक परवर्ती की गति
अर्ध-अर्ध मात्रा के हिसाब से कम होती जाती है यथा (१) बिन्दु में अर्धमात्रा (२)
उसके बाद १।४ मात्रा (३) उसके बाद १।८ मात्रा ।
सूक्ष्मतम मात्रा = १।२५६ है या १।५१२ है ।४ यह सूक्ष्मता की चरम
मात्रा है । काल की सूक्ष्मता के अनुसार ही मन भी उतना ही सूक्ष्म होता जाता
है । शक्ति की मात्रा १।६४ कही गई है । व्यापिनी की मात्रा १।१२८ समना की
१।२५६; नाद की १।१६, नादान्त की १।३२, निरोधिका की १।८ अर्धचन्द्र की
१।४, बिन्दु की १/२ मात्रा है ।
काल की इकाइयाँ निम्न हैं-त्रुटि, लव, निमेष, काष्ठा, कला, मुहूर्त
अहोरात्र, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, वत्सर, युग, मन्वन्तर, कल्प, मुद्राकल्प ॥
कुछ आचार्यों के मतानुसार उन्मना में मात्रा एवं काल है नहीं किन्तु कुछ आचार्यों
के मतानुसार उसकी मात्रा है ।
१. योगिनी हृदय (च०सं०), अमृतानन्द : 'दीपिका'
२. योगिनी हृदय : 'दीपिका' ३. भास्कर-प्रकाश (श्लो० १५-१६)
४. समना की मात्रा - १।२५६, उन्मना की १।५१२ मात्रा है ।
प्रथमोऽंशः १३७
एकादश वाक्कूटे सार्धा एकादशोदिता मध्ये ॥ १७
सार्धा अष्टौ शाक्तावेकैकलवोनिता मात्राः ।
संहत्यैकत्रिंशन्मात्रा मन्त्रे लवत्रयन्यूनाः ॥ १८ ॥
(नाद, वाग्भवकूट, कामराजकूट एवं शक्तिकूट का मात्रा-काल)
इस प्रकार गणना करने पर (यह ज्ञात होता है कि) इस नाद का काल कुल
मिलाकर मात्रा काल होता है जिसमें एक लव न्यून रह जाता है । (इस प्रकार)
वाक्कूट में ग्यारह, मध्य वाले (कामराज कूट) में साढ़े ग्यारह ॥ १७ ॥
(एवं) शक्तिकूट में साढ़े आठ मात्राएँ होती हैं जिनमें एक लव की न्यूनता
सभी में होती है । (इस प्रकार) मन्त्र में सब मिलाकर तीन लव कम इकतीस
मात्रायें होती हैं ॥ १८ ॥
* प्रकाश *
शाक्तौ तृतीयकूटे ॥ १७-१८॥
* सरोजिनी *
'नाद' का उच्चारण-काल मात्र 'मात्रा' है जिसमें कि एक लव न्यून रह जाता
है । 'मात्रा' क्या है? 'मात्रा लध्वक्षरस्य कालः ॥' लघु अक्षर के उच्चारण में
जितना समय लगता है उस समय को 'मात्रा' कहते हैं । 'गुरु' अक्षर में द्विगुणित
मात्रायें होती हैं ।
(१) 'वाक्कूट' — ११
(२) 'कामराजकूट' — साढ़े ग्यारह मात्रा
(३) 'शक्तिकूट' — साढ़े आठ मात्रायें (एक लव शून्य साढ़े आठ मात्रायें)—
मात्रा नाम ह्रस्वस्योच्चारण कालः स च षट्पञ्चाशदुत्तर शतद्वयलवैर्भवति । लवो
नामकाल परमाणुः । मात्रा एवं लव की परिभाषा यही है ।¹
'नादस्य' — नाद का जिस विमर्श शक्ति में प्रपञ्च विलीन रहता है उसके
संसर्ग से प्रकाश बिन्दु का रूप धारण करता है । यह संसर्ग क्या है? विमर्श
शक्ति में प्रकाशानुप्रवेश । यह बिन्दु ही प्रकाश बिन्दु (जो विमर्श के गर्भ में स्थित
रहता है ।) फिर प्रकाशबिन्दु में विमर्शशक्ति का प्रवेश होता है उससे तेजोमय
बीजस्वरूप 'नाद' निर्गत होता है । इस 'नाद' में समस्त तत्त्व बीजात्मना स्थित
रहते हैं । 'नाद' निर्गत होकर त्रिकोण का रूप धारण करता है । यही है । 'अहं'
नामक बिन्दुनादात्मक प्रकाश विमर्श का शरीर । इसमें प्रकाश है—श्वेत बिन्दु एवं
विमर्श है—लोहित बिन्दु । दोनों का पारस्परिक अनुप्रवेशात्मक साम्य है—
१. सेतुबन्ध
१३८ वरिवस्यारहस्ये
'मिश्रबिन्दु' । इसी साम्य का नाम है—परमात्मा । यही 'रवि' या 'काम' । अग्नि
एवं सोम इसी काम की कलायें हैं । अतः 'कामकला' का अर्थ है—त्रिबिन्दु । इन
तीन बिन्दुओं का समष्टिभूत महात्रिकोण ही आधा शक्ति का स्वस्वरूप ।। इसके
मध्य में रवि बिन्दु देवी के मुख के रूप में; अग्नि एवं सोम बिन्दु स्तनद्वय के
रूप में, हकार की हार्धकला या अर्धकला के योनिरूप से कल्पित है । शिवशक्ति
के मिलन से उत्पन्न पीयूषधारा प्रवाहित होने पर जिस लीला तरङ्ग की उत्पत्ति होती
है । वही है—'हार्धकला' । 'सच्चिदानन्द विभवात् सकलात् परमेश्वरात् ।
आसीच्छक्तिः स्ततो नादो नादाद्बिन्दु समुद्भूत कहकर—सकल परमेश्वर से शक्ति,
शक्ति से नाद, नाद से बिन्दु का उद्भव भी बताया गया है ।
कण्ठे च कण्ठतालुनि तालुनि दन्तेषु मूर्ध्नि नासायाम् ।
स्पृष्टविवाराद्यान्तर बाह्यैर्ह्लास्तदक्षरोत्पत्तिः ॥ १९ ॥
(मन्त्राक्षरों के उच्चारण-स्थान)
(मन्त्र के उपर्युक्त) वर्णों की उत्पत्ति कण्ठ, कण्ठतालु, तालु, दाँत, मूर्धा एवं
नासा आदि उच्चारण-स्थानों में स्पृष्ट आदि आभ्यन्तर एवं विवारादिक बाह्य प्रयत्नों
द्वारा होती है ॥ १९ ॥
- प्रकाश *
ककारत्रयमकारदशकं हकारपञ्चकं च कण्ठे । द्वितीयमक्षरं कण्ठतालुनि ।
प्राणयङ्गत्वादेकवद्भावः ईकारचतुष्टयं तालुनि । लाकरत्रयं सकारद्वयं च दन्तेषु ।
रेफत्रयं तु मूर्ध्नि । बिन्दादिनवकत्रयं नासायाम् । स्पृष्टेति । ककाराः स्पृष्टयत्नाः ।
अकाराः संवृताः । ईकारा एकारश्च विवृताः । रेफा लकाराश्चेषत्स्पृष्टाः । हकाराः
सकारौ चेषद्विवृताः । बिन्दादयः संवृततमाः । इत्याभ्यन्तरो यत्नः । ककारा विवार-
श्वासाघोषवन्तोऽल्पप्राणवन्तश्च । सकारौ महाप्राणवन्तौ विवारादिमन्तौ च । स्वराः
सर्वेऽप्युदात्ताः । रेफा लकाराश्च संवारनादघोषाल्यप्राणवन्तः । हकारास्तु संवारादि-
त्रयवन्तो महाप्राणवन्तश्च । बिन्दादयस्त्वात्यन्तिकसंवारादिचतुष्कवन्तः । इति बाह्यः
प्रयत्नः ॥ १९ ॥ - सरोजिनी *
पाणिनीय व्याकरण के अनुसार-प्रयत्न एवं उच्चारण का स्वरूप—प्रयत्न—
(१) 'बाह्य प्रयत्न' (२) 'आभ्यन्तर प्रयत्न' ।
(१) 'बाह्य प्रयत्न'—(१) विवार (२) संवार (३) श्वास (४) नाद (५) घोष
(६) अघोष (७) अल्पप्राण (८) महाप्राण (९) उदान्त (१०) अनुदान्त (११)
स्वरित ।। (१) वर्गों के प्रथम, द्वितीय वर्ण एवं श, ष, स (खर) = 'विवार',
श्वास, अघोष शेष 'हश' का संवार, नाद एवं घोष । स्वरों का प्रयत्न =
उदात्त-अनुदात्त स्वरित । 'सवर्ण' = एक ही उच्चारण स्थान वाले वर्ण । 'असवर्ण'
= भिन्न स्थानों से उच्चारण किए हुए वर्ण ।। 'तुल्यास्य प्रयत्नं सवर्णम्'
प्रथमोऽंशः १३९
(२) आभ्यन्तर प्रयत्न—वर्गाणां प्रथमतृतीय पञ्चमाः यणाश्चाल्प प्राणाः ।
वर्गाणां द्वितीयचतुर्थौशलश्च महाप्राणः ।।' स्पृष्टःविवृत, संवृत आदि ।
प्रयत्न एवं वर्ण—(१) स्पर्श वर्णों का प्रयत्न 'स्पृष्ट' (२) अन्तस्थ वर्णों का
प्रयत्न = ईषत्स्पृष्ट । ऊष्म वर्णों का प्रयत्न = ईषद् विवृत । स्वरों का प्रयत्न =
विवृत । ह्रस्व अ का प्रयत्न = संवृत । (सिद्ध प्रयोग रूप में) अन्यथा अन्य स्वरों
की भाँति उसका भी प्रयत्न = 'विवृत' ।।
(३) उच्चारण-स्थान:—
(i) अकुह विसर्जनीयानां कण्ठः । (अ,आ,विसर्ग,क,ख,ग,घ,ङ,ह) = कण्ठ ।
(ii) इचुयशानां तालु । (इ,ई,य,च,छ,ज,झ,ञ,श) = तालु ।
(iii) ऋटुरषाणां मूर्द्धा । (ऋ,ॠ,र,ट,ठ,ड,ढ,ण,ष) = मूर्द्धा ।
(iv) ऌतुलसानां दन्ताः । (ऌ,ल,त,थ,द,ध,न,स,) = दन्त ।
(v) उपध्मानीयानाम् ओष्ठौ । (उ,ऊ,उपध्मानीय,प,फ,ब,भ,म) = ओष्ठ ।
(vi) ञमङणनानां नासिका च । (मुखनासिकावचनोऽनुनासिकः) = नासिका ।
(vii) एदैतौः कण्ठतालु ।। (ए,ऐ) = कण्ठ और तालुः
(viii) ओदौतौः कण्ठोष्ठम् । (ओ और औ) = कण्ठ और ओष्ठा
(ix) वकारस्य दन्तोष्ठम् । (व) = दाँत और ओष्ठ ।
(x) जिह्वामूलीयस्य जिह्वामूलम् । (जिह्वा की जड़ से ध्वनित) ।।
(xi) नासिकानुस्वारस्य ।। (अनुस्वार) = नासिका
वर्णोच्चारण में द्विविध प्रयत्न—(१) वर्णों के स्फुट उच्चारित होने के पूर्व
(२) उनके स्फुट उच्चरित होने के बाद ।
प्रथमोच्चारण की प्रयत्न = 'आभ्यन्तर प्रयत्न ।'
द्वितीयोच्चारण की प्रयत्न = 'बाह्य प्रयत्न ।'
आभ्यन्तर प्रयत्न—१. स्पृष्ट २. ईषतस्पृष्ट ३. ईषदविवृत ४. विवृत ५.
संवृत ।
(१) ककार त्रयमकार दशकं हकार पञ्चकं च कण्ठे । (२) द्वितीयमक्षरं
कण्ठतालुनि । (३) प्राण्यङ्गत्वादेकवद्भावः । ईकार चतुष्टयं तालुनि ।। (४) लकार
त्रयं सकारद्वयं च दन्तेषु । (५) रेकत्रयं तु मूर्ध्नि । (६) बिन्द्रादि नवक त्रयं
नासायाम् ।—स्पृष्टेति । (७) ककाराः स्पृष्टयत्नाः । (८) अकाराः संवृताः । (९)
ईकारा एकारश्च विवृताः । (१०) रेका लकाराश्चेषत्स्पृष्टाः । (११) हकाराः सकारौ
चेषद्विवृताः । (१२) बिन्द्रादयः संवृततमाः । (१३) इत्याभ्यन्तरो यत्नः । (१४)
ककारा विवार श्वासाघोषवन्तोऽल्पप्राणवन्तश्च । (१५) सकारौ महाप्राणवन्तौ विवारादि-
१४० वरिवस्यारहस्ये
मन्तौ च ॥ (१६) स्वराः सर्व्वेऽप्युदात्ताः । (१७) रेका लकाराश्च संवार नाद घोषाल्य
प्राणवन्तः । (१८) हकारास्तु संवारादित्रयवन्तो महाप्राणावन्तश्च । (१९) बिन्द्वादय-
स्त्वात्यन्तिक संवारादिचतुष्कवन्तः । इति बाह्यप्रयत्नः ॥ १
प्रलयाग्निनिभं प्रथमं मूलाधारादनाहतं स्पृशति ।
तस्मादाज्ञाचक्रं द्वितीय कूटं तु कोटि सूर्य्यम् ॥ २० ॥
तस्माल्ललाटमध्यं तार्तीयं कोटिचन्द्राभम् ।
मालामणिवद्वर्णाः क्रमेण भाव्या उपर्युपरि ॥ २१ ॥
प्रथम कूट एवं द्वितीय का स्वरूप
प्रलयाग्नि के सदृश दृष्टिगत होने वाला 'प्रथम कूट' मूलाधार से आरंभ करके
अनाहत चक्र को स्पर्श करता है । उससे (अर्थात् उस अनाहत चक्र से) आरंभ
करके यह कोटिसूर्य के समान आभा वाला द्वितीय कूट आज्ञा चक्र को स्पर्श
करता है ॥ २०
प्रथमोऽंशः १४१
'मूलाधारात्' = मूलाधार चक्र से । यहाँ पञ्चमी विभक्ति का प्रयोग "ल्यब्लोपे
कर्मण्यधिकरणे च' इस वार्तिक के नियमानुसार हुआ है जिसका अर्थ यह है कि
जब ल्यप् या क्त्वा प्रत्ययान्त क्रिया वाक्य में प्रकट नहीं की जाती, किन्तु छिपी
रहती है तो उस क्रिया के कर्म एवं आधार पञ्चमी में होते हैं यथा—
'श्वसुराज्जिह्वेति'—श्वसुर से लज्जा करती है । अर्थात् श्वसुर को देखकर लज्जा
करती है । यहाँ 'श्वसुरं वीक्ष्य जिह्वेति' के स्थान पर 'श्वसुराज्जिह्वेति' कहा गया है
अतः यहाँ पञ्चमी का प्रयोग 'ल्यब्लोपे०' सूत्रानुसार कहा जाएगा । 'अनाहतं'
'आज्ञाचक्रं' का अर्थ = अनाहत से आरंभ करके एवं आज्ञा चक्र से आरंभ करके ।
('ल्यब्लोपे०' वार्तिक के प्रयोग से निकले अर्थ को यहाँ द्योतित किया गया है ।)
'मूलाधार' 'अनाहत' एवं 'आज्ञाचक्र' के स्थानत्रय बिन्दु आदि रहित कूटत्रय के
स्थान हैं ।
'स्वच्छन्द तन्त्र' के अनुसार सुषुम्णा नामक नाड़ी के मूलाग्र भाग में दो
सहस्रदल कमल हैं; मध्य में अष्टदलपद्म आदि कमल स्थित हैं—और सब मिलाकर
तीस कमल स्थित हैं । गुदा के ऊपर दो अंगुल ऊपर, लिङ्ग देश में, नाभिदेश में,
हृदय प्रदेश में, कण्ठ में एवं भ्रूमध्य में—'मूलाधार', 'स्वाधिष्ठान', 'मणिपूर',
'अनाहत', 'विशुद्ध', 'आज्ञा' नामक कमल हैं जिनमें चार, छः, दश, द्वादश,
षोडश, दो दल हैं । यद्यपि दो दो ग्रन्थियाँ मध्य भाग में संदृष्ट हैं और वे चक्र भी
कहलाती हैं तथापि 'षडपद्म' (६ कमल) का ही कथन प्रायः होता है ।
'मूलाधार' 'अनाहत' एवं 'आज्ञा' चक्र—
(क) 'मूलाधार चक्र'—गुदा एवं लिङ्ग के मध्य चार दलों से युक्त एक
कमल है । उसके दलों में स्वर्ण सदृश दमक है । इस पर ही ऋतु (६ कोणों
वाला) पीली कान्ति युक्त पृथ्वी मण्डल है । चारों कोणों में वज्र आदि स्थित हैं ।
वहीं लं बीज है । यहीं पृथ्वी के रूप में ऐरावत हाथी पर स्थित, स्वर्णिम कान्ति
वाले वेदपाणि ब्रह्मा स्थित हैं । वे अक्षसूत्र, कमल एवं कमण्डल धारण किए हुए
हैं । उनके बाएँ भाग में सूर्यवत डाकिनी है । स्थित है । मूलचक्र के ऊपर
चतुर्भुजी, अक्षसूत्र एवं जलपात्र धारण किये हुए, अम्बिका देवी का ध्यान करने पर
वे योग-विद्या का प्रदर्शन करती है । चतुर्दल की कर्णिका में ऊर्ध्वकोण त्रिकोण है,
उसके ऊर्ध्व कोण में सुषुम्णा एवं बायीं-दायीं ओर क्रमशः इड़ा एवं पिङ्गला नाड़ियाँ
स्थित हैं । इड़ा चन्द्रनाड़ी एवं पिङ्गला सूर्यनाड़ी है । सुषुम्णा सूर्य, चन्द्र एवं अग्नि
के स्वरूप का है । सुषुम्णा के भीतर ही ब्रह्म नाड़ी है । उसमें ही ब्रह्मरंध्र है ।
इसी ब्रह्मरंध में कुण्डली के गमन का स्थान है । मूलचक्र से साढ़े तीन करोड़
नाड़ियाँ निकली हैं । त्रिकोण के ऊर्ध्वकोण में अनार के फूल के समान स्वयंभूलिङ्ग
है । यह लिङ्ग दस इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि एवं पञ्च प्राणों से युक्त है । १ यह
अपञ्चीकृत भूतों से निर्मित है तथा 'लिङ्गदेह' कहा जाता है । यह लिङ्ग शरीर में
वासनाओं से युक्त होकर जीव की मृत्यु के बाद देहान्तर प्राप्त करता है । जीवों
१. चक्र कौमुदी
१४२ वरिवस्यारहस्ये
की वासनाओं के नष्ट होने पर इस लिङ्ग का भी नाश हो जाता है । १ इस लिङ्ग
के आश्रयीभूत साढ़े तीन वलयों से युक्त, सर्पाकृतिवाली नित्या एवं प्रकृतिरूपा
कुण्डली स्थित है । २ यह प्रकृतिरूपा कुण्डली जब सत्व, रज एवं तम गुणों के
साम्य से युक्त हो जाती है तब इसे 'चित्कला' कहते हैं । इसके अर्द्धांश में ब्रह्म
का संश्लेष होने पर यह मूल प्रकृति 'ईश्वरी' कही जाती है । इसके वलय त्रय
सतोगुण रजोगुण एवं तमोगुण हैं । इस वलय का ऊपर उठा हुआ अंश ही
'ब्रह्मपुच्छ' एवं 'ब्रह्मांश' कहलाता है । ३ कुण्डली द्वारा ही जीव को धारण किया
जाता है । पञ्चाशद्वर्णात्मिका, मूलाधारोत्थिता, यह विद्या, जो समस्त प्राणियों का
चैतन्य है शब्दब्रह्म है । कुण्डली समस्त प्राणियों के मूलचक्र में 'शब्दब्रह्म' को
प्राप्त करके वर्णों के रूप में प्रकट होती है । गद्य-पद्य उसी के भेद हैं । ये
गद्य-पद्य हंस रूप आत्मा में आश्रित होकर प्रकट होते हैं । यह आत्मारूप हंस
प्राण के एवं प्राण नाड़ी-पथ के आश्रित हैं । बिन्दु एवं सर्ग ही पुरुष-प्रकृति है ।
पुरुष-प्रकृति रूप हंसों में 'हं' पुरुष एवं 'सः' प्रकृति है अतः 'हंस पद'
पुरुष-प्रकृति का वाचक है । ४ जीव जिसे प्राप्त करता है वह है हंस रूप अजपा
जप । ५ 'हं' के साथ प्राण को बाहर निकालते हुए 'सः' के साथ प्राण को प्रवेश
कराते हुए प्राणी को नित्य हंस पद का जप करना चाहिए । जब 'प्रकृति'
पुरुषाश्रय प्राप्त करके पुरुष रूप बन जाती है उस समय 'सोऽहं' स्थिति निर्मित
होती है । 'सोऽहं' पद में सकार एवं हकार का लोप करने पर यह 'ओं' बन
जाता है यह ओङ्कार ही एकाक्षर शब्द ब्रह्म है । ६ साधक को चाहिए कि वह प्रातः
उठकर मूलाधारचक्रस्थ शक्ति-गणेश को ६००, स्वाधिष्ठानचक्रस्थसावित्री-ब्रह्मा को
६००, मणिपरस्थ लक्ष्मीनारायण को ६००, अनाहतचक्रस्थ उमा-महेश्वर को ६००,
प्राण-शक्ति युक्त जीवात्मा को १०००, आज्ञाचक्रस्थ पराशक्ति युक्त 'विशुद्ध' संज्ञा
वाले परमात्मा को १००० एवं सहस्रारचक्रस्थ गुरु को १००० अजपा मन्त्रों का
समर्पण करें । ७
'मूलाधार चक्र' चार अंगुल चौड़ा है तथा यह गुदा से दो अंगुल ऊपर एवं
लिङ्ग से दो अंगुल नीचे स्थित है । ८ इसी पद्म में कलियों (कर्णिकाओं) के मध्य
परमरमणीय त्रिकोणात्मक 'योनिमण्डल' स्थित है । ९ वहीं 'विद्युल्लताकारा, सार्ध-
१-७. चक्र कौमुदी
८. 'मूलाधार पद्म' लिङ्ग स्थान से दो अंगुल नीचे है या कि एक ?- यह
विवादास्पद है ।
'शिवसंहिता' में दो स्थलों पर दो बातें कहीं गई हैं- १. गुदा से दो अंगुल
ऊपर एवं लिंग से दो अंगुल नीचे २. गुदा से दो अंगुल ऊपर एवं लिङ्ग से
एक अंगुल नीचे- 'मूलाधार पद्म' है ।
'गुदान्तु द्वयंगुलादूर्ध्वं मेढैकांगुलतस्त्वधः ।' (शिवसंहिता २।२१)
'गुदाद् द्वयंगुलतश्चोर्ध्वं मेढैकांगुलतस्त्वधः ।' (शिवसंहिता ५।५६)
९. शिवसंहिता
त्रिकारा, कुटिला, सुषुम्ना मार्गसंस्थिता पर देवता कुण्डली'—स्थित है । यह
कुण्डली जगत् संसृष्टिरूपा, निर्वाणसततोद्यता, वाच्यामवाच्या, देवनमस्कृता वाग्देवी
है।१ इडा-पिङ्गला के मध्य जो सुषुम्णा है उसके छः शक्तियाँ विद्यमान हैं जिन्हें
'षट्पद्म' कहते हैं ।२ मूलाधार से साढ़े तीन लाख नाड़ियाँ निकली हुई हैं ।३
गुदा-लिङ्ग के मध्य स्थित 'योनिमण्डल' ही 'कन्द' है जो कि पश्चिमाभिमुखी है ।
इसी के मूल में 'कुण्डली' स्थित है । यह नाड़ी-समूह से घिरी हुई, अपनी पूँछ
को मुख में डालकर सुषुम्णा छिद्र को घेरे हुए साढ़े तीन वलयों में स्थित है ।४
यह 'नागोपमा, सुप्ता, स्फुरन्ती, अहिवत संधिसंस्थाना, वाग्देवी एवं बीजसंज्ञका'
है ।५ यह 'स्वर्णभास्वरा, गुणत्रय प्रसूति का विष्णु शक्ति कुण्डली, 'कामबीज'
समन्वित इस योनिमण्डल में अधिष्ठित है । योनिमण्डल में स्थित यह 'कामबीज'
स्वच्छ स्वर्ण के समान है तथा इस बीज से सुषुम्ना भी जुड़ी है । यह 'कामबीज'
शरद ऋतु के चन्द्रमा के समान तेजवान, सूर्यकोटि प्रतीकाश एवं चन्द्रकोटि
सुशीतल है ।६ तेज, सूर्य एवं चन्द्र तीनों मिलकर यह 'कामबीज' 'त्रिपुरभैरवी' की
संज्ञा प्राप्त किए हैं । 'एतत्तत्रयंमिलित्वैव देवी त्रिपुरभैरवी ॥'७ यह 'कामबीज'
अग्निशिखावत है, सूक्ष्म है, क्रिया शक्ति एवं विज्ञानशक्ति के साथ यह 'काम बीज'
देह में ऊर्ध्व दिशा में एवं कभी नीचे, सदा घूमता रहता है (कभी लिङ्ग सलिल में
प्रविष्ट हो जाता है ।) इसी को 'आधार पद्म' कहते हैं एवं इसी के मूल में
'योनि' स्थित है—'आधारपद्ममेतद्वियोनिर्यस्यास्ति कंदतः ।' तेज (अग्नि) सूर्य एवं
चन्द्रमा लं, खं एवं ठं—ये तीनों एकत्रित होकर 'त्रिपुरभैरवी' देवी 'कामबीज' नाम
प्राप्त करके मूलाधार में स्थित हो गई हैं ।
'आधारपद्म' कुल संज्ञक है काञ्चनवर्ण है, स्वयंभूलिङ्ग से अधिष्ठित है । इस
पद्म में 'द्विरण्ड' नामक सिद्धलिङ्ग एवं डाकिनी देवी भी स्थित हैं । इसी पद्म की
भीतर की कली (कर्णिका) में 'योनिमण्डल' है जिसमें कि कुण्डलिनी स्थित है एवं
जिसके ऊर्ध्वदेश में दीप्तिमान एवं तेजःस्वरूप 'कामबीज' दमक रहा है—'तस्या
ऊर्ध्वं स्फुरतेजः कामबीजं भ्रमन्मतम् ॥'८
इडा (चन्द्रमा)—पिङ्गला (सूर्य) के मध्य सुषुम्णा (अग्नि) स्थित है । इन
तीनों के मध्य चित्रानाड़ी है । इसके मध्य में ही सूक्ष्मातिसूक्ष्मब्रह्मरंध्र है । यह
'सुषुम्ना मध्यचारिणी, पञ्चवर्णोज्ज्वला, विशुद्धा, अमृतानन्ददायिनी एवं दिव्यमार्ग-
स्वरूपा 'चित्रा' नाड़ी ध्यान मात्र से पापराशि नष्ट कर देती है तथा इसी के मध्य
में ब्रह्मरंध्र है जिसमें कुण्डली यात्रा करती है ।९
मेरूदण्ड के बाहर वामभाग में इड़ा (शशि) एवं दक्षिण भाग में पिङ्गला
(सूर्य) स्थित है किन्तु मेरूदण्ड के मध्य में 'त्रितयगुणमयी चन्द्रसूर्याग्निरूपा'
सुषुम्णा स्थित है और सुषुम्णा के मध्य 'वज्रा', 'वज्रा' के मध्य 'चित्रीणी' और
उसके मध्य में 'ब्रह्मनाड़ी' स्थित है ।१० इसके मुख में ही 'ब्रह्मद्वार' है । (इसी
१-९. शिवसंहिता
१०. षट्चक्रनिरूपण
१४४ वरिवस्यारहस्ये
ब्रह्मद्वार को ढके हुए कुण्डलिनी स्थित है ।) 'कन्द' (गुदा से ऊपर एवं लिंग से
नीचे जो कन्द है) वहीं सुषुम्णा भी स्थित है । उसी सुषुम्णा में अधोमुख, चतुर्दल
युक्त, लाल, व, श, ष, स वर्णों से अंकित कमल-दलों वाला मूलाधार पद्म है ।
मूलाधार चतुष्कोण चक्र है ।१ इस पद्म की कर्णिका में चतुष्कोण पृथ्वीमण्डल है ।
पृथ्वीमण्डल की आठों दिशाओं में सुदीप्त अष्टशूल हैं । पृथ्वीमण्डल एवं इस
मण्डल का बीज दोनों पीले हैं । बीज के मध्य स्थित इन्द्र भी पीले हैं । ये
वज्रपाणि हैं । यहाँ स्थित ऐरावत पर प्रातःकालीन सूर्यवत् ब्रह्मा स्थित हैं जो कि
चारों वेद, दण्ड, कमण्डल, अक्षसूत्र एवं अभयमुद्रा हाँथों में धारण किए हैं ।
'वज्रा' के मुख में स्थित कर्णिका में स्थित 'त्रिकोण' ('कामरूप') एवं 'त्रैपुर' जो
विद्युतवद है । यहाँ सर्वत्र 'कन्दर्पवायु' (अपानवायु का एक रूप) है जो कि
बंधुजीव की भाँति लाल, कोटिसूर्य प्रतीकाश एवं जीवेश है । 'त्रिकोण' के मध्य में
'स्वयंभूलिङ्ग' स्थित है जो कि पिघले सोने की भाँति सुन्दर है और निम्नाभिमुखी
है । यह ज्ञान एवं ध्यान से प्रकट होता है और नई पत्ती के रङ्ग-रूप का है । यह
विद्युत की शीतल किरणों एवं पूर्णचन्द्र के समान सुन्दर है ।२ (यह
कामबीज-परिचालित है ।) 'शाक्तानन्द तरङ्गिणी' के अनुसार यह श्यामवर्ण का है ।
उसके ऊपर बिसतन्तुसूक्ष्मा, जगन्मोहिनी, ब्रह्मद्वार के मुख को स्वमुख से ढककर
उस पर सोने वाली, नवीन चपलाकारा, शङ्खावर्तनिभा, सर्पसमा, शिवोपरिस्थिता,
मतवाले भ्रमरों के समान कूजन करने वाली, कोमलकाव्य का सृजन करने वाली,
श्वासोच्छ्वास द्वारा समस्त प्राणियों का पालन करने वाली, प्रोद्दाम दीप्तावलि के
समान दीप्तिमती वह कुण्डली मूलाम्बुज गह्वर में स्थित है । (कुण्डलिनी में
'परावाक्' स्थित है ।)३ कुण्डलिनी के ऊपर एक सीधे सूत्र के समान 'पराशक्ति'
विद्यमान है । वह नित्य प्रबोधोदया, सूक्ष्मातिसूक्ष्मा, नित्यानन्दपरम्परातिविगलत्पीयूष
धाराधरा श्रीपरमेश्वरी रूप 'पराशक्ति' परमा कला है ।४
(ख) 'अनाहत चक्र'५—स्थान—हृदय । भूषण—दिव्यलिङ्ग से भूषित ।
वर्ण—क से ठ पर्यन्त द्वादश वर्ण । वायु—इस पद्म में अनादिकर्म-संसृष्ट,
अहङ्कारोपेत, अनेक वासना-पंकिल 'प्राणवायु' स्थित है । दल = १२ । इस पद्म
का नामान्तर६ प्रसादस्थान (प्रसाद का स्थान = प्रसन्न लो) बीज = वायु बीज 'यं' ।
लिङ्ग = परम तेजःस्वरूप 'बाणलिङ्ग' । पिनाकी सिद्धलिङ्गा देवी = काकिनी ।७
ध्यान-फल—कामिनी वशीकरण, दूरदर्शन, दूरश्रवण, आकाश में स्वेच्छा सञ्चरण,
देवों-योगिनियों के दर्शन, खेचरी-सिद्धि, भूचरी-सिद्धि ।।८ रङ्ग = बंधूककान्त्युज्ज्वल ।
वायु = धूम्रवर्ण का ।। कोण = छः । (मध्य में जो वायुमण्डल है उसमें
बीज-स्थिति है । मण्डल का रङ्ग = धूम्रावली धूसर ।।९) देवी = काकिनी जो
त्रिनेत्रा हैं, सर्वालङ्कारभूषिता, नवतडितवतपीता है और कङ्कालमालाधरा हैं । त्रिकोण
= पद्म-कर्णिका में कोटि विद्युतप्रभान्वित त्रिकोण । लिङ्ग—त्रिकोण में चमकते सोने
१-४. षट्चक्रनिरूपण ५-८. शिवसंहिता
९. षट्चक्रनिरूपण
प्रथमोऽंशः १४५
की भाँति ‘बाणलिङ्ग’ ।१ पीठ = भगवान् शर्व का पीठ । अलङ्कारक उपादान२—
दीपकलिकावत दीप्तिमान हंस से सुशोभित ॥ यह हंस ही जीवात्मा है । ध्यान का
फल—वाणी का ईश्वर हो जाता है, ईश्वरवत रक्षा एवं विनाश कर सकता है ।३
कर्णिका का आन्तर भाग—कर्णिका में त्रिकोण सूर्यमण्डल है ।४ लिङ्ग का आन्तर
भाग—लिङ्ग में जीवात्मा निवास करती है । जीव—जीव दीपकलिकावत है ।
अन्तःकरण के ऊपर ५४ दल कमल हैं ।५ ध्यान का फल—अणिमादि आठ
सिद्धियों की प्राप्ति एवं कविराजत्व ।६
(ग) ‘आज्ञा चक्र’—‘आज्ञाचक्र’ छठवाँ चक्र है । चक्राक्षर ह + क्ष । दल—
दो । स्थान—भ्रुवद्वय का मध्यभाग । शक्ति—शुभ्रवर्णा हाकिनी । कर्णिका—
अमृतस्रावि ‘ल’ से युक्त कर्णिका ॥ मन—प्रदीप्तकलिकाकृति वाला मन यहाँ रहता
है । लिङ्ग—कर्णिका में स्थित, त्रिकोण में लिङ्ग स्थित है । आत्मा—(उसमें ही)
प्रदीपवत आत्मा भी स्थित है । दल—इस चक्र के ऊपर ६४ दलों का ध्यान
करणीय । ६४ दलों में शिवशक्ति स्थित हैं । उत्पत्ति क्रम-परा—इच्छाशक्ति—
ज्ञानशक्ति—भूतक्रिया । कुण्डली—मातृका ॥ शंभु की रश्मियाँ—३६० ॥७ लिङ्ग—
‘शुक्ल’ नामक महाकाल ही यहाँ शिवलिङ्ग हैं । स्वरूप—परमतेज स्वरूप ।
देशगत स्थान—इड़ा (वरणा नदी) असी (असी नदी), आज्ञाचक्र—वरणा + असी
का सङ्गम = ‘वाराणसी’ । ‘वरणा’ = इड़ा नाड़ी । ‘असी’ = पिङ्गला नाड़ी ।
‘गङ्गा’ = इड़ा । ‘यमुना’ = पिङ्गला । ‘इड़ा’ = अमृत नाड़ी ।८ ‘त्रिवेणी’ =
आज्ञा पद्म । त्रिवेणी = (१) ‘युक्तत्रिवेणी’ (२) ‘मुक्तत्रिवेणी’ पुरुषाङ्ग के नीचे है—
‘युक्तत्रिवेणी’ । भ्रूमध्य में स्थित है—‘मुक्तत्रिवेणी’ ॥ भ्रूमध्य तक आकर वहाँ इड़ा,
पिङ्गला एवं सुषुम्णा त्रिवेणी रूप ग्रन्थिभाव प्राप्त करके नासारंध्र तक पहुँचती हैं ।
आज्ञा पद्म के भीतर शरद ऋतु के चन्द्रमा के समान चन्द्रबीज ‘ठं’ स्थित है ।९
मूलाधार के चतुर्दल पद्म की योनि में ‘सूर्य’ रहता है । सूर्यमण्डल से सतत्
विषजल बहता है । यह विष पिङ्गला में बहता है । आज्ञाचक्र के वामभाग से यह
‘असी’ या ‘पिङ्गला’ नाड़ी प्रस्थान करती है ।१० ‘द्विदल आज्ञापद्म’ के ऊपरी भाग
में तीन पीठ हैं—(१) बिन्दु (२) नाद (३) शक्ति ॥ ये तीनों आज्ञाचक्र में स्थित
हैं ।११ ध्यान-फल—पूर्व जन्मों के कर्मों का क्षय । यक्ष, राक्षस, गंधर्व, अप्सरा एवं
किन्नर आदि का वशीभूत होना । जिह्वा को उलटकर एवं तालुमूल में लगाकर
आज्ञा कमल आधा क्षण भी चित्तस्थैर्य से पापपहाड़ का विनाश ।१२ आज्ञापद्म का
ज्ञान—समस्त पद्द्मों के फल की प्राप्ति । ध्यान—वासना क्षय ॥ परमानन्दाप्ति ।
मृत्यु के समय इस चक्र का ध्यान—परमात्मा में लय ॥ इस पद्म का अहर्निश
ध्यान—समस्त पापों से मुक्ति ॥ समस्त बंधनों से मुक्ति ॥१३
आज्ञाचक्र हिमकर (चन्द्रमा) के समान है । ‘ध्यानधाम प्रकाश’ है । इस चक्र
के भीतर स्थित ‘हाकिनी’ के छः मुख चन्द्रमा के समान है । इस पद्म के भीतर
१-३. षट्चक्रनिरूपण ४-७. चक्र कौमुदी
८-१३. शिवसंहिता
१० वरि.
१४६ वरिवस्यारहस्ये
'सूक्ष्मरूप मन' रहता है । पद्म की कर्णिका में स्थित 'योनि' में 'इतर' नामक शिव
निवास करते हैं । वे विद्युन्मालावत दीप्तिमान हैं ।१ वेदों का प्रथम या आदि बीज
(ब्रह्मसूत्रों को अपने प्रकाश से प्रकट करने वाली शक्ति का निलय) भी यहाँ है ।
इस चक्र में स्थित त्रिकोण में ओङ्कार है । यही प्रदीपाभज्योति शुद्धबुद्धान्तरात्मा है।
इसके ऊपर अर्धचन्द्र है और इसके ऊपर 'बिन्दु' के रूप में प्रकाशित 'मकार'
है ।२ इसके ऊपर चन्द्रकिरणों को फैलाने वाला श्वेतवर्ण 'नाद' है । (प्रणव प्रकाश
किरणों से घिरा है । इसके ऊपर दीपवत आत्मा स्थित है ।) यह चक्र दीप्तिमान
प्रातः के दीप्त सूर्य के समान है । यही परमात्मा अपनी पूर्ण शक्तियों के साथ व्यक्त
होता है । यह अतुल्य एवं परमामोदपूर्ण विष्णु-धाम है । ध्यानफल—परशरीर में
प्रवेश, सर्वज्ञता, सर्वदर्शिता, सर्वशास्त्रज्ञान, ब्रह्मात्मैक्य प्राप्ति आदि३ ॥ २०-२१ ॥
अथावशिष्टस्य बिन्द्वादिनवकस्य स्थितिस्थानरूपाकारा नाह—
आधारोत्थित नादो गुण इव परिभाति वर्णमध्यगतः ।
मध्येफालं बिन्दुदीप इवाभाति वर्तुलाकारः ॥ २२ ॥
तदुपरि गतोऽर्धचन्द्रोऽन्वर्थः कान्त्याकृत्या ।
अथ रोधिनी तदूर्ध्वं त्रिकोणरूपा च चन्द्रिकाकान्तिः ॥ २३ ॥
नादस्तु पद्मरागवदण्डद्वयमध्यवर्तिनीव सिरा ।
नादान्तस्तडिदाभ सव्यस्थितबिन्दुयुक्तलाङ्गलवत् ॥ २४ ॥
निर्याबिन्दुद्वितये वामोद्गच्छत्सिराकृतिः शक्ति ।
बिन्दूद्गच्छत्त्यश्राकारधरा व्यापिका ४प्रोक्ता ॥ २५ ॥
ऊर्ध्वाधोबिन्दुद्वयसंयुतरेखाकृतिः समना ।
सैवोर्ध्वबिन्दु हीनोन्मना तदूर्ध्वं महाबिन्दुः ॥ २६ ॥
शक्त्यादीनां तु वपुर्द्वादश रवि कान्ति पुञ्जाभम् ।
इत्येवं वर्णानां स्थानं ज्ञात्वोच्चरेद्यत्नात् ॥ २७ ॥
नादः प्राथमिकस्तु द्वितीय कूटेन साकमुच्चार्यः ।
द्वितीयीकं नादं तार्तीयेनोच्चरेन्न पृथक् ॥ २८ ॥
बिन्द्वादिनवकयोस्तु प्राक्त न कूटस्थ योर नयोः ।
संमेलनेन शबलं तार्तीयीकं विभावयेत् कूटम् ॥ २९ ॥
बिन्द्वादि कसमनान्तं क्रमेण तार्तीयमुच्चरेन्नादम् ।
उन्मन्यन्तर्लीनं विभावयेदेतदुच्चरणम् ॥ ३० ॥
१-३. षट्चक्रनिरूपण ४. कथिता
प्रथमोऽंशः १४७
(नाद एवं बिन्दु का स्वरूप)
मूलाधार-चक्र से ऊर्ध्वोत्थित 'नाद' वर्णों के मध्य सञ्चरण करता हुआ ऐसा
प्रतीत होता है मानों (किसी पुष्प-माला के मध्य सञ्चरण करता हुआ कोई) सूत
हो। मस्तक के मध्य स्थित 'बिन्दु' ऐसा प्रतीत होता है मानों कोई वृत्ताकार
दीपक हो ॥ २२ ॥
(अर्द्धचन्द्र एवं रोधिनी का स्वरूप)
उसके (बिन्दु के) ऊर्ध्व में स्थित 'अर्द्धचन्द्र' अपनी प्रभा एवं आकार में
अन्वर्थक (आकार एवं दीप्ति दोनों दृष्टियों से समतुल्य) है। उसके उपरान्त स्थित
त्रिभुज की आकृति वाली 'रोधिनी' ज्योत्स्नावत दीप्तिमान है ॥ २३ ॥
(नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना एवं उन्मना का स्वरूप)
'नाद' पद्मराग मणि की दीप्ति वाला, अण्डद्वितय के मध्य वर्तमान नाडिका
के समान है। 'नादान्त' विद्युत के समान उद्दीप्त है और वामभागवर्ती बिन्दु से
युक्त हल की भाँति आकृति वाला है ॥ २४ ॥
'शक्ति' दो बिन्दुओं के वाम भाग से उदित होने वाली सिरा के आकार वाली
है। 'व्यापिका' बिन्दु एवं उसके ऊपर आरूढ़ त्रिकोण के समतुल्य आकार वाली
कही गई है ॥ २५ ॥
'समना' का आकार रेखा के ऊर्ध्व एवं अधोभाग में स्थित बिन्दु द्वय (के
आकार के समान) है। ऊर्ध्ववर्ती बिन्दु द्वय से रहित वही ('समना') 'उन्मना' है।
उसके ऊर्ध्व भाग में 'महाबिन्दु' स्थित है ॥ २६ ॥
'शक्ति' आदि (शक्ति, व्यापिका, समना एवं उन्मना) का शरीर (स्वस्वरूप)
बारह सूर्यों के प्रकाश-समूह के समान देदीप्यमान है। इस प्रकार वर्णों के स्थान
का ज्ञान प्राप्त करके उनका यत्न (आभ्यन्तर एवं बाह्य) के अनुसार उच्चारण
करना चाहिए ॥ २७ ॥
(नादोच्चारण की प्रक्रिया)
प्राथमिक कूट के नाद का उच्चारण द्वितीय कूट के साथ करना चाहिए।
द्वितीय कूट के नाद का उच्चारण तृतीय कूट के साथ करना चाहिए, अलग
नहीं ॥ २८ ॥
तृतीय कूट को पूर्ववर्ती कूटद्वय के बिन्द्वादि नवों के गण के संमेलन द्वारा
शबल रूप में कल्पित करना चाहिए ॥ २९ ॥
'बिन्दु' से आरंभ करके क्रमानुसार 'समना' में पर्यवसित होने वाले तृतीय
कूट के नाद का उच्चारण करना चाहिए एवं इसे 'उन्मनी' में अन्तर्लीन कल्पित
करना चाहिए ॥ ३० ॥
अत्रेयं शब्दसृष्टिप्रक्रिया—वटबीजान्तर्गतवटवृक्षीयसूक्ष्मरूपतुल्यशब्दसृष्टिसूक्ष्म-
रूपशालिनी पूर्वोक्तरूपा त्रिपुरसुन्दर्यैव तादृशसूक्ष्मरूपवत्त्वप्रवृत्तिनिमित्तकपरापदवाच्या।
सैव च माति तरति कायतीति च व्युत्पत्त्या मातृकेत्युच्यते । तस्यां च निर्विकाराया-
मप्यनादिसिद्धप्राण्यदृष्टवशात् स्वान्तः-संहतविश्वसिसृक्षोत्पद्यते । ततः स्रष्टव्यपदार्थना-
लोचयति, 'तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेय' इति श्रुतेः । तादृशमीक्षणमेव प्रवृत्तिनिमित्तीकृत्य
तस्यां पश्यन्तीति पदं प्रवर्तते । सैव च पश्यन्त्याख्या मातृका करणसरणित
उत्तीर्णात्वादुत्तीर्णेत्युच्यते । तदवयवाश्च वामादयोऽष्टौ शक्तयोऽन्यत्र प्रपञ्चिताः । अतः सैव
व्यष्टिसमष्टिवेषेण नवविधा । ततो नव नादा अविकृतशून्यादयो जाताः । तत्समष्टिश्च
नादध्वन्यादिपदवाच्या नातिसूक्ष्मा परावन्नातिस्थूला वैखरीवदतो मध्यमाख्या मातृका
मध्यमावयवरूपमविकृत-शून्यस्पर्शनादध्वनिबिन्दुशक्तिबीजाक्षराख्यं नादनवकं मूला-
धारादिषट्के नादे नादान्ते ब्रह्मरन्ध्रे च स्थितम् । नवभिर्नादैरकचटतपयशळाख्यवर्ग-
नवकवती वैखर्याख्या मातृका जाता, वै निश्चयेन स्पष्टतरत्वात् खं कर्णविवरवर्तिन-
भोरूपश्रोत्रेन्द्रियं राति गच्छति, तज्जन्यज्ञानविषयो भवतीति व्युत्पत्तेरित्याद्यन्यतो
विस्तरः । एवं च ककारादौ कत्वादिधर्मणां षड्जत्वादिध्वनिधर्माणां चानुभूयमान-
त्वात् परिणामे परिणामिनो ऽनुस्यूतताया मृद्धटे दर्शनाच्च वर्णेषु नादोऽनुस्यूतः । तन्तु-
विशेषजन्यः पटविशेषो वर्णकपद्वाच्यः । तत्र कप्रत्यय-परित्यागेन प्रयोगस्त्वक्षर-
वाचकवर्णपदेन श्लेषार्थः । गुण इव वर्णकाख्यपटविशेषोपादानभूततन्तुविशेषवन्माला-
मण्याधारसूत्रवच्चेत्यर्थः । वर्णमध्यगत इत्यस्य द्वयोर्वर्णयोर्मध्यभागे वर्णशरीरान्तर्भागे च
स्थित इत्यर्थः । अयं भावः—द्वयोर्वर्णयोर्मध्यभागे मणिद्वयमध्यभागस्थशुद्धसूत्रवच्छुद्ध-
नादस्य भानम्, वर्ण-शरीरान्तर्भागे तु पटाभेदेन संवलिततन्तुवद्धटान्तर्मृद्वच्च तत्तद्वर्णा-
भेदेनैव नादस्य भानम्, न पुनस्तत्र मण्यन्तर्गतसूत्रदृष्टान्तः, तस्य मणितोऽत्यन्तभिन्न-
त्वादिति ॥ २१- ॥
मध्येफालं फालस्य मध्ये । 'पारे मध्ये षष्ठ्या वा' इति समासः । कान्त्या,
आकृत्या चान्वर्थः; अर्धचन्द्रवत्कान्तिराकारश्चेत्यर्थः । अण्डस्थानीयौ द्वौ बिन्दू सिरा-
स्थानीया मध्यरेखा चेति त्रयं संहृत्य नादस्याकारः, 'बिन्दुद्वयान्तरे दण्डः शेवरूपो
मणिप्रभः' इति चक्रसङ्केतोक्तेः । शेवो मुष्कद्वयमध्यवर्तिनी नाडी, मणिः पद्मराग इति तु
सांप्रदायिकी व्याख्या । दण्डस्य शेवरूपत्वविशेषणं घनतादार्ढ्योर्निरासाय, केशतुल्य-
पिष्टविकारेषु पायसोपयुक्तेषु शेवपदप्रयोगादित्यपि व्याख्या नातीव विरुद्धा । ऊर्ध्वगं
दक्षिणारं लाङ्गलम्, वामभागे बिन्दुरेक इति नादान्ताकारः । विसर्जनीयवदूर्ध्वाधो
बिन्दुद्वयमिति भ्रमनिरासायाह—तिर्यगिति । वामाद्वामभागस्थबिन्दुमारभ्योर्ध्वं गच्छन्ती
निःसरन्ती या सिरा रेखा तदाकारेत्यर्थः । 'शक्तिर्वामस्थबिन्दूत्थसिराकारा' इति चक्र-
सङ्केते । आर्षत्वात् समस्तस्यापि बिन्दुपदस्य पूर्वपदेन सह बहुव्रीह्यवयवत्वेन, उत्तरपदेन
सह पञ्चमीतत्पुरुषावयवत्वेनापि काकाक्ष्यन्यायेनान्वय इति सांप्रदायिकैर्व्याख्यानात् ।
उद्यत्पदस्य सामान्यवाचकस्यापि बिन्दुद्वयादिति विशेषे लक्षणायां वामस्थादिबिन्दोरुद्यत्याः
सिराया आकारो यस्या इत्येव विगृह्य बिन्दोर्वामस्थत्वविशेषणबलादेव दक्षिणदिग्भागे
निःसिराक एको बिन्दुरस्तीति गम्यत इति व्याख्यायां वा न कोऽपि क्लेशः । बिन्दु-
संस्पृष्टाग्रकत्रिकोणाकारा व्यापिका । 'बिन्दुद्वयान्तरालस्थऋजुरेखामयी पुनः । समना'
प्रथमोऽंशः १४९
इति वचने शक्तिवद्बिन्दुद्वयं तिर्यग्रूपं मा भूदित्यतः संप्रदायमनुसरन्नाह—ऊर्ध्वाध इति ।
संयुता अग्रमूलभागयोः संश्लिष्टा, न त्वस्पृशन्ती स्थिता । इयं च ब्रह्मरन्ध्रसंस्थाना ।
इयमेव च मनोन्मनीत्यपि व्यवह्रियते । मनसो यथास्थितरूपस्यैवाभ्यासविशेषेणै-
तावत्पर्यन्तवृत्त्युद्गमः सुसाध इत्यतः समनेत्युच्यते । एतदुपरि तु रूपान्तरं प्राप्तस्यैव
मनसो धृतिविषयतेत्यत उत्क्रान्तमनस्कत्वादुन्मना । प्रकृतानुपयुक्तमप्युन्मनोपरिस्थानं
चक्रराजस्य त्रिविधभावनान्तर्गतनिष्कलभावनायामुपयुक्तत्वेन प्रसङ्गादाह—तदूर्ध्वं महा-
बिन्दुरिति ॥ शक्त्यादीनामिति । समनान्तानां तिसृणामिति संप्रदायः । 'शक्त्यादीनां
तिसृणां द्वादशरवितुल्य कान्तयस्तनवः' इति पाठो युक्तः । बिन्दादिस्वरूपाङ्गविस्तरः
स्वच्छन्दसंग्रहे द्रष्टव्यः ॥ २२-२६ ॥
स्थानं कण्ठाद्युत्पत्तिस्थानं मूलाधारादि स्थितिस्थानं च । यत्नादान्तरबाह्ययत्न-
पूर्वकम् । इदं च मानसजपातिरिक्तविषयम् । तत्र तत्तत्स्थानयत्नविभावनमात्रस्योपयोग
इति द्रष्टव्यम् । नादो बिन्दादिनवकम् । पूर्वपूर्वकूटस्थनादस्योत्तरोत्तरकूटोच्चारणे-
नैवोच्चरितप्रायत्वान्न तत्र पार्थक्येन यत्नः कालविलम्बो वा कार्य इत्यर्थः । तृतीयकूटे
तूत्तरकूटाभावात्तदुभयमपेक्षितमित्याह—बिन्दादिकेति ॥ २७-३० ॥
- सरोजिनी *
'बिन्दु'—क्रियाशक्ति का दूसरा नाम ही 'बिन्दु' है । ज्योतिस्वरूप बिन्दु ही
ईश्वर तत्त्व की अधिष्ठान भूमि है । बिन्दु ही शुद्धाशुद्ध अध्वा का उपादान है ।
बिन्दु से समना तक मात्रांश को जोड़ दिया जाय तो मात्र एक मात्रा होती
है । उसी से 'बिन्दु' अर्धमात्रा एवं 'नाद' १।१६ मात्रा है । प्रणव के अवयवों की
दृष्टि से यदि विचार किया जाय तो अ-उ-म-बिन्दु-अर्धचन्द्र-निरोधिनी-नाद-नादान्त-
शक्ति-व्यापिनी-समना-उन्मना—ये प्रणव के अवयव हैं जिनमें 'बिन्दु' एवं 'नाद'
दोनों हैं । इनकी मात्रायें निम्न हैं—बिन्दु १।२ मात्रा, अर्धचन्द्र—१।४ मात्रा,
निरोधिनी—१।८ मात्रा, नाद—१।१६ मात्रा, नादान्त—१।३२ मात्रा, शक्ति १।६४
मात्रा, व्यापिनी १।१२८ मात्रा, समना—१।१२८ मात्रा । सबका योग = १ मात्रा ।
'बिन्दु' का स्वरूप—'बिन्दु' वह अवस्था है जिसमें एक मात्रा का अर्धांश
है । बिन्दु रूप ज्योति में समग्र विश्व अभिन्न रूप से भासमान होता है । यह प्रणव
का चतुर्थावयव है । समस्त आगमों का प्रधान लक्ष्य 'बिन्दु' ही है । यह समस्त
जगत् का आधार भी है । भ्रूमध्य के किंचित् ऊर्ध्वदेश में 'बिन्दु' अवस्थित है ।
'Introduction To Tantraśāstra' में जान बुडरफ कहते हैं कि 'बिन्दु' शिव के
नाद की प्रकृति एवं शक्ति का बीज है अतः इसे 'नाद' एवं 'बीज' का या
शिव-शक्ति के अन्तर्संबंध का द्योतक कहा गया है—'Bindu is the nature of
Nāda of Śiva and Bīja of Śakti and has been said to be the relation of
these to be those who are viewed in all the Āagmas.'
आचार्य भास्कर 'सौभाग्यभास्कर' (ललिता स०भाष्य) में कहते हैं कि जगद्गुरु
ही कन्दरूप होने के कारण 'बिन्दु' कहलाता है—"प्रलये सृज्यमान प्राणिकर्मणाम्
१५० वरिवस्यारहस्ये
परिपाकद्शायाम् तादृशकर्माभिन्न मायावच्छिन्नं ब्रह्म घनीभूतमित्युच्यते । स एव
जगदंकुरु कन्दरूपत्वाद्बिन्दुपदेन व्यवहियते ॥''
आचार्य शङ्कर प्रपञ्चसार में कहते हैं कि सिसृक्षु एवं विचिकीर्षु परमात्मा की
घनीभूता चितशक्ति ही 'बिन्दु' बन जाती है—
'विचिकीर्षुर्घनीभूता सा चिदभ्येति बिन्दुताम् ।'
सृष्टि का प्रथम चरण तो बिन्दु है किन्तु द्वितीय चरण का आरंभ करने हेतु
शक्ति 'बिन्दु' से पृथक होकर नाद को जन्म देती है । यह 'बिन्दु' की शब्दात्मिका
वृत्ति है जिसके 'परा', 'पश्यन्ती', 'मध्यमा' एवं वैखरी, चार रूप हैं । दूसरी दृष्टि
से विचार करने से प्रथम 'नाद' आता है और उसके बाद 'बिन्दु'—'आसीच्छक्ति-
स्ततो नादः, नादाद्बिन्दु समुद्भवः ॥'१ चक्र की दृष्टि से विचार करें तो श्रीचक्र
का नवमावरण ही 'बिन्दुचक्र' है । इसी का नाम है—'सर्वानन्दमय चक्र' बिन्दु ही
सर्वातिशायी है । निर्गुण, निराकार, निरञ्जन ब्रह्म जो परमशिव या परा श्रीसुन्दरी हैं
उनका जगन्निर्माण की दिशा में उठाया गया प्रथम कदम 'बिन्दु' ही है । परम तत्त्व
में 'एकोऽहं बहुस्याम' रूप सिसृक्षा के उदय होते ही 'बिन्दु' का प्रादुर्भाव हो जाता
है । 'बिन्दु' ही है कामेश्वर एवं कामेश्वरी के स्वारसिक सामरस्य का स्वरूप । यही
सर्वोच्च सत्ता है और इसी के अन्तर में समस्त विश्व बीजात्मना अन्तर्गर्भित है ।
यह विश्वोत्तीर्ण है । यह अनुत्तर शक्तिसम्पन्न एवं समस्त रचना-शक्तियों का स्वगृह
है । इसी घनीभूत तेज के पुञ्ज को ही 'चिद्घन' या 'परासंवित्' भी कहते हैं ।
इसी की द्वितीया आख्या है—
'अनुस्वार' जो कि समस्त वाङ्मय को जन्म देता है । महामन्त्र रूप मातृका
का जप भी बिन्दु से युक्त करते ही किया जाता है । 'अहं' के 'अकार' (शिव)
एवं 'हकार' (शक्ति) की एकात्मता का सम्पादक भी यही 'बिन्दु' है ।
तन्त्र-दर्शन में 'बिन्दु' की वही स्थिति है जो वेदान्त में ईश्वर की है ।२ जिस
प्रकार 'नाद' शक्ति का एक रूप है उसी प्रकार 'बिन्दु' भी शक्ति का ही एक रूप
है ।३ शक्ति के इन दोनों स्वरूपों (नाद एवं बिन्दु) में क्रिया-शक्ति निहित है । जो
कि सृष्टि-विकास में सहायक हैं ।४ राघवभट्ट ने 'शारदातिलक' की टीका में कहा है
कि 'नाद' एवं 'बिन्दु' शक्ति की वे अवस्थायें हैं जो सृष्टि को जन्म देने के लिए
समुत्सुक रहती हैं । 'बिन्दु' घनावस्था है । 'प्रपञ्चसार' में कहा गया है कि जब
शक्ति में सिसृक्षा उत्पन्न होती है तब शक्ति घनीभूत हो जाती है और उससे सृष्टि
का विकास उसी प्रकार होता है यथा दूध के घनीभूत होने पर दही, मक्खन, मट्ठा
आदि का जन्म होता है ।
———————————————————————
१. वाक्यपदीय (भर्तृहरि)
२. आर्थर ऍवेलान—दि गारलैण्ड ऑफ लेटर्स, पृ० १११, ११६, १२२
३-४. तत्रैव (पृ० १२४, १२५)
प्रथमोंऽशः १५१
'तोडल तन्त्र' में कहा गया है कि बिन्दु में शून्यता एवं गुण दोनों की एक
साथ प्रतिष्ठा पाई जाती है ।१ तन्त्र में बिन्दु की स्थिति वही है जिस प्रकार पुराणों
के मत में महाविष्णु की है ।२ तन्त्र मत में बिन्दु सत्यलोक की विभूति है और
मानव पिण्ड में यह सहस्रार में स्थित है । इसमें शिव एवं शक्ति अपनी मायाशक्ति
से उसी प्रकार आवृत्त रहते हैं यथा चने के छिलके में उसके दोनों दल आवृत्त
रहते हैं ।३
तांत्रिक मतानुसार 'परबिन्दु' सृष्टि-विकास का मूल कारण है । सृष्टि इसी का
परिणाम है ।४ 'परबिन्दु' के दो भाग हैं—(१) दक्षिण भाग = पुरुषरूप = 'ह'
(२) वामभाग = नारीरूप = 'सा'—दोनों मिलकर 'हंस' बन गए । हंस = पुरुष
एवं प्रकृति संयोगावस्था है ।५ अन्य तन्त्रों के अनुसार 'परबिन्दु' काल के द्वारा
तीन भागों में विभाजित कर दिया जाता है जो निम्न हैं—(१) 'बिन्दु' (२) 'नाद'
(३) 'बीज' । 'शारदा तिलक' के मतानुसार 'हंस' एक प्रकार का वह सम्बंध है
जिसे 'नाद' कहा जाता है । 'बीज' में बिन्दु एवं नाद दोनों रहते हैं । इस प्रकार
एक ही 'परा बिन्दु' (क) नाद एवं (ख) बीज—में विभाजित हो जाता है ।६
'शारदातिलक' में इसी बात को इस प्रकार व्यक्त किया गया है—
'बिन्दुःशिवात्मको बीजशक्तिर्नादः तयोर्मिथः ।
सर्वागम विशारदैः समवायः समाख्यातः ॥'७
अर्थात् आगमिक बिन्दु को शिव एवं बीज को शक्ति एवं नाद को उन दोनों
का समवाय स्वीकार करते हैं । 'परबिन्दु' में बीज एवं बिन्दु (शक्ति एवं शिव)
समवाय सम्बंध से रहते हैं । यह समवाय सम्बन्ध ही 'नाद' है । इसीलिए बहुत से
आचार्य नादाविर्भाव मानते हैं । बीज बिन्दु एवं नाद की समन्वितावस्था ही 'त्रिबिन्दु'
है । इसे ही अन्य तांत्रिकों ने 'कामकला' का अभिधान दिया है । 'कामकला'—
मातृकाओं का उदय—स्थूल वर्ण—वर्णों से मन्त्र । इस प्रकार नाद से मन्त्रों का
अविनाभाव सम्बंध है । 'त्रिबिन्दु' = सूर्य-चन्द्र-अग्नि । इच्छा-ज्ञान-क्रिया । सत्-रज-
तम—इन त्रिकों की समष्टि ही त्रिबिन्दु है । परबिन्दु—त्रिबिन्दु । त्रिबिन्दु (१) श्वेत
बिन्दु (२) रक्त बिन्दु (३) मिश्र बिन्दु ॥ आर्थर एवेलॉन कहते हैं कि—'परबिन्दु'
शिव एवं शक्ति की अविभाजितावस्था है । विस्फोट होने पर इसके तीन भाग हो
जाते हैं—(१) 'बिन्दु' (२) 'बीज' (३) 'नाद' । 'नाद', 'बिन्दु' एवं 'बीज' तीनों
क्षोभावस्था के परिणाम हैं । क्षोभ-प्रक्रिया में बिन्दु एवं बीज में से एक क्षोभक एवं
एक क्षोभ्य है ।
१. कालीचरण : षट्चक्र निरूपण की टीका
२. तत्रैव
३. दि गारलैण्ड ऑफ लेटर्स, पृ० १२६
४. तत्रैव (१२८) ५. प्रपञ्चसार तन्त्र
६. गा० आ० ले० (पृ० १२९) ७. शारदातिलक
१५२ वरिवस्यारहस्ये
‘बिन्दु’ की चार शब्दात्मिका शक्तियाँ हैं । इन वृत्तियों के भेद से ही जीवों में
ज्ञान का भेद रहता है । इसका अतिक्रम करके ही साधक शिवत्व प्राप्त करता है ।
बिन्दु की शब्दात्मिका वृत्तियाँ निम्न हैं—(१) परा (२) पश्यन्ती (३) मध्यमा (४)
वैखरी । कुछ लोग पश्यन्ती को ही ‘अक्षर बिन्दु’ कहते हैं । अधिकांशः तांत्रिक
आचार्य ‘परावाक्’ से ही इच्छा-ज्ञान-क्रिया के रूप में स्थित त्रिबिन्दु का उद्भव
मानते हैं । त्रिबिन्दु से ही ५ पञ्चाशत मातृकाओं का उद्भव होता है । इनमें स्वर
वर्णों में ‘बीज’ (शिवांश) स्थित है तो व्यञ्जनों में (योनि शक्त्यांश) स्थित हैं ।
सारा विश्व इसी वर्णमाला से आबद्ध है ।
सृष्टि के मूल में ‘बिन्दु’ अवस्थित है । परमशिव के स्वातंत्र्य के कारण
स्पन्दन जब इस बिन्दु का स्पर्श करता है तो यह बिन्दु रेखारूप में परिणत हो
जाता है । इन तीन रेखाओं के संयोग से जो त्रिकोण उत्पन्न होता है वही सृष्टि
का मूल योनिरूप है जो इस प्रकार है—
त्रिकोण का केन्द्र ‘बिन्दु’ है ∇
‘नाद’ का स्वरूप—शिव और शक्ति का प्रथम विकास ‘नाद’ के रूप में ही
माना गया है ।¹ सर आर्थर एवलॉन कहते हैं "From the union of Śiva and
Śakti arrises creative ideation This union and mutual relalion is
called"—‘नाद’ अर्थात् शिव एवं शक्ति के संयोग से जो सृष्टि की कल्पना की
गई है उसमें शिव-शक्ति का संयोग एवं उन दोनों का पारस्परिक सम्बंध ‘नाद’
कहलाता है । जब शिव और शक्ति स्थिर शक्ति से क्रियात्मक रूप में रूपान्तरित
होने लगते हैं तभी नाद का उदय होता है । उनमें विकास की चेतना जाग्रत होती
है इसीलिए नाद क्रियारूप माना जाता है । इसी नाद से विश्व का विकास होता
है । शिव-शक्ति में नादोद्भव तब होता है जब उसमें विकास की चेतना जागती है ।
तात्विक धरातल पर जिसे ‘सदाख्यतत्त्व’ कहते हैं मन्त्रक्षेम में उसे ही ‘नाद’ कहा
जाता है ।² जिस प्रकार शिव-शक्ति से ‘सदाख्यतत्त्व विकसित होता है उसी प्रकार
क्रियाशक्ति रूप पर नाद (ब्रह्म) से ‘नाद’ विकसित होता है । ‘प्रयोगसार’ में कहा
गया है कि—‘‘हे देवि ! अंतरात्मा नाद के रूप में प्रस्फुटित होती है वही वायु
(जीवों में प्राणवायु) से पैरित होकर अक्षरों का रूप धारण करती है ।’’
तन्त्र शास्त्र के मन्त्र पक्ष में ‘नाद’ एवं ‘बिन्दु’ अहं एवं इदं के प्रतीक के
रूप में प्रयुक्त हुए हैं ।³ कतिपय तन्त्रग्रन्थों में ‘नाद’ को विराट शक्ति के रूप में
१. तन्त्राज़ देयर फिलॉसफी एण्ड औकल्ट सीक्रेट्स (डी०एन० बोस) पृ० ११९
२. दी गारलैण्ड ऑफ लेटर्स (पृ० ११२, ११४)
३. आर्थर एवेलॉन ‘सर्पेण्ट पावर’ (पृ० ३४)
प्रथमोऽंशः १५३
स्वीकार करके उसे सृष्टि-विकास का केन्द्र माना गया है ।¹ कतिपय तन्त्रों के
अनुसार सच्चिदानन्द सगुण परमात्मा शिव से शक्ति का एवं शक्ति से नाद-बिन्दु
की उत्पत्ति हुई है । इसी बिन्दु से समस्त सृष्टि की उत्पत्ति बताई गई है ।² अन्य
द्वैतवादी तांत्रिकों के मतानुसार 'शिव' एवं 'शक्ति' नामक दो तत्त्व हैं । शिव शक्ति
में प्रवेश करता है और बाद में बिन्दु का रूप धारण कर लेता है । बिन्दु का
प्रथम विकास 'नाद' के रूप में होता है और फिर सृष्टि का विकास होता है ।³
कुछ भेदवादी तांत्रिक शिव एवं शक्ति को समवाय सम्बन्ध से संयुक्त एक तत्त्व
तथा बिन्दु का दूसरा तत्त्व मानते हैं ।⁴ बौद्धतन्त्रों में 'बिन्दु' ज्ञान के प्रतीक एवं
हठयोगिक ज्योति के रूप में कल्पित किया गया है ।⁵ शैव तन्त्रों में 'नाद' 'बिन्दु'
को शिव-शक्ति के परिकल्पित स्वीकार किए गए हैं । बौद्ध तांत्रिकों ने इन्हें प्रज्ञा
एवं उपाय का वाचक भी माना है । तांत्रिक एवं हठयौगिक ग्रन्थों में (क) 'बिन्दु'
को—रसना, सूर्य, रवि, प्राण, शमन, काली, यमुना, रज, पुरुष, नाद एवं व्यञ्जन
(ख) 'नाद' को—ललना, चन्द्रा, शशि, अपान, घमन, अली, गङ्गा, शुक्रा, तमस्
अभाव, प्रकृति, ग्राहक एवं स्वर के रूप में गृहीत किया गया है ।⁶
'कौलज्ञाननिर्णय' में एक स्थल पर बिन्दु को महालिङ्ग की शक्ति एवं दूसरे
स्थल पर उसे शिव की सृजन-शक्ति कहा गया है । इसमें बिन्दु से ही नादोत्पत्ति
बताई गई है । योग उपनिषदों में 'बिन्दु' मन⁷ वायु⁸ बुद्धि⁹ एवं महेश्वर¹⁰ के अर्थ
में स्वीकार किया गया है ।
'शारदातिलक' के अनुसार—शब्दब्रह्मरूपिणी कुण्डलिनी से शक्ति, शक्ति से
ध्वनि, ध्वनि से नाद, नाद से निरोधिका, निरोधिका से अर्द्धेन्दु, अर्द्धेन्दु से बिन्दु
की उत्पत्ति होती है । 'शक्ति' = शुद्ध सत्त्व में प्रविष्ट चित्, रजोनुबिद्ध एवं सत्व
प्रविष्ट चित् शक्ति = 'ध्वनि' तमोनुविद्ध चित् शक्ति = 'नाद' । तमसप्राचुर्याचित्
शक्ति = निरोधिका । सत्वप्राचार्या चित् शक्ति = 'अर्द्धेन्दु' । सत्व + तमस से
विशिष्ट होने पर वही चित् शक्ति 'बिन्दु' कहलाती है । बिन्दु का स्थान सहस्रार
है । बिन्दु ही शब्दब्रह्म है । मन्त्र में नाद एवं बिन्दु दोनों प्रतिष्ठित हैं । इनमें
'नाद' नीचे एवं 'बिन्दु' ऊपर स्थित होता है । 'नाद' रूपा कुण्डलिनी मूलाधार में
(नीचे) एवं 'बिन्दु' रूपी शब्द ब्रह्म (ऊपर) सहस्रार में रहते हैं । ये ही दोनों शक्ति
एवं शिव हैं और इनका सम्मिलत कराना ही तान्त्रिकों का लक्ष्य है ।
नाद के कई स्वरूप हैं यथा—
(क) 'महानाद' या नादान्त = शब्दब्रह्म का प्रथम क्रियात्मक विकास
१-२. तन्त्राज़ देयर फिलॉसफी एण्ड औकल्ट सीक्रेट्स (पृ० १०७)
३. कलेक्टेड वर्क्स आफ आर० जी० भण्डारकर, पृ० २१९
४. गोपीनाथ कविराज—'तान्त्रिक दृष्टि' ५-६. इन्ट्रोडक्शन टू तान्त्रिक बुद्धिज्म
७. योगकुण्डल्योपनिषद ८. योगशिखोपनिषद
९-१०. ध्यानबिन्दूपनिषद
१५४ वरिवस्यारहस्ये
(ख) 'नाद' = नादान्त की पूर्वावस्था । जो विश्व को नादान्त से भरे हुए हैं ।
'निरोधिनी'—नाद की वह अवस्था निरोधिनी है जिसमें बिन्दु का विकसित
करने की क्षमता निहित हो ।१ नाद की अत्यन्त सूक्ष्म अवस्थायें हैं उनमें 'निष्कल
उन्मनी' अन्यतम हैं । 'उन्मनी' निराकार निरुच्चार, निरूप एवं विशेषणशून्य वह
अव्यक्तवस्था है जो अवाङ्मनसगोचरा है । यह अनुत्पन्न निष्पन्द वाक् है । यह
कारणरूपा शक्ति की अवस्था है । इस अवस्था में काल, कला एवं देवता आदि
का भान नहीं होता ॥ “उन्मनी is Nirākār and Niruchchār (निराकार, निरुच्चार)
roundless and without ulternate defind by any adjective, being for
beyound mind and speech and universe"२ यह निर्वाणपद है एवं निर्विकल्प
निरञ्जन शिवशक्ति है ।३
बिन्दु से नादाविर्भाव—कतिपय तांत्रिकों का कथन है कि बिन्दु से भी नादों
का उदय होता है जो निम्न है—(१) 'सूक्ष्मनाद'—बिन्दु का प्रथम स्तर, अचिन्त्य
तत्त्व एवं अभिधेय बुद्धि का कारण है । (२) 'अक्षरनाद'—यह परामर्श ज्ञान
समन्वित एवं सूक्ष्मनाद का कार्य है । (३) 'वर्णनाद'—यह आकाश एवं वायु से
उत्पन्न होता है । कुण्डलिनी को भी 'नाद' कहा गया है ।४
तांत्रिकों के अनुसार 'नाद' से बिन्दु का उद्भव होता है । 'नाद' एवं 'बिन्दु'
ये दोनों शक्ति के रूप हैं । शक्ति के इन दोनों रूपों में क्रिया शक्ति स्थित है ।५
'अहं' द्रष्टा है और 'इदम्' दृश्य है । द्रष्टा की दृश्यरूपी शून्य पर दृष्टि
पड़ने पर उस शून्य से एक अव्यक्त नाद ध्वनि झंकृत होती है जिसे 'आदिनाद' या
'परनाद' कहते हैं । नाद की स्फूर्ति के साथ ही ज्योति का भी विकास होता है ।
नाद एवं ज्योति दोनों एक ही महासत्य की दो अवस्थायें हैं । शक्ति की क्रियावस्था
ही नाद है और निष्क्रिय अवस्था 'कला' है । 'शक्ति' स्वरूपनिष्ठ क्रिया द्वारा
कार्योंन्मुख होकर 'नाद' के रूप में आत्मप्रकाश करती है । 'नाद' घनीभूत होकर
साम्यावस्था में 'परमविन्दु' के रूप में प्रकाशित होता है । पर बिन्दु जब महानाद
में से अपर बिन्दु में अवतीर्ण होता है तब बिन्दु जब बीज का स्पर्श करता है तब
सारे बीज बिन्दुयुक्त होकर गुञ्जन करते रहते हैं—यही 'नाद' है । मानव-हृदय में
अस्फुटभाव से जो चिन्ताएँ क्रीड़ा करती हैं वह नाद की ही क्रीड़ा है । किसी
वृत्तिरूप में अन्तःकरण का जो परिणाम होता है वह 'नाद' से व्याप्त होता है ।
महानाद पर 'प्रणव' है । शक्ति की बहिर्मुख अवस्था ही नाद एवं ज्योति है ।
'बिन्दु' ही क्षुब्ध होकर नादरूप में परिणत होता है । 'नाद' वायु के सङ्घर्ष के
कारण वर्णमाला रूप में प्रकाशित होता है । 'पादुकापञ्चक' में कहा गया है कि—
'पराशक्ति' ही बिन्दु है और उसका रूपान्तरण है—बिन्दु, नाद एवं 'बीज'
'बिन्दु'—रक्तवर्ण है और सूर्य है । 'नाद'—श्वेतवर्ण है और चन्द्रमा है । ये दोनों
ही मिलकर आनन्दमय कोश का निर्माण करते हैं 'कारणबिन्दु' जब प्रस्फुटित होता
१-५. दी गारलैण्ड ऑफ लेटर्स (पृ० ११४-१३०)