वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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लव = 'बिन्दोरष्टाविंशत्युत्तरशतं लवाः ।।' 'अर्धचन्द्र' = ६४; 'रोधिनी' =
३२; 'नाद' = १६; 'नादान्त' = ८; 'शक्ति' = ४; 'व्यापिका' = २ लव;
'समना' = १ लव; 'उन्मना' = 'उन्मनादास्तु नास्त्येव कालः ।।' 'उन्मना' में काल
रहता ही नहीं अतः 'लव' (कालमात्रा) होना संभव ही नहीं है ।
'योगिनीहृदय' के चक्रसङ्केत में बताया गया है कि-दीपाकार 'बिन्दु' अर्धमात्रा
वाला है । अर्धचन्द्रादिक से शक्तिपर्यन्त चतुरांश-षोडशांश आदि उच्चारण काल है ।
यो०हृ० में कहा गया है-
“दीपाकारोऽर्ध मात्रश्च ललाटे वृत्त इष्यते ॥ २८ ॥
अर्धचन्द्रस्तथाकारः पादमात्रस्तदूर्ध्वके ।
ज्योत्स्नाकारा तदष्टांशा रोधिनी त्र्यस्रविग्रहा ॥२९ ॥”
'अर्धमात्रा' = 'ह्रस्वस्य उच्चारणकालो मात्रेत्युच्यते' 'मात्राया अर्धमुच्चारण
कालो यस्य सोऽर्धमात्रः ॥ दीपाकारोऽर्धमात्रोच्चारणकालो वृत्तसन्निवेशो बिन्दु-
रित्यर्थः ।।१ अर्धचन्द्रो बिन्दोरर्धभागः' तथाकारो दीपाकार एव । 'पादमात्रो' मात्रा-
कालस्य चतुर्थभागोच्चारण काल इत्यर्थः ।।२ 'तदूर्ध्वके'-बिन्दु के ऊर्ध्वभाग में
चतुर्थभागोच्चारण काल ॥
'रोधिनी' में मात्राष्टांशोच्चारण काल ('तदष्टांशा') है । उपर्युक्त विवरण के
अनुसार तो 'उन्मना' का भी उच्चारण काल सिद्ध होता है जो कि निम्न है-
'मात्रास्वरूपञ्च द्वादशोत्तर पञ्चशतलात्मक त्वमेव प्रतीयते ॥'३
अर्थात् अर्धमात्रा बिन्दु का वेग है । उसके बाद प्रत्येक परवर्ती की गति
अर्ध-अर्ध मात्रा के हिसाब से कम होती जाती है यथा (१) बिन्दु में अर्धमात्रा (२)
उसके बाद १।४ मात्रा (३) उसके बाद १।८ मात्रा ।
सूक्ष्मतम मात्रा = १।२५६ है या १।५१२ है ।४ यह सूक्ष्मता की चरम
मात्रा है । काल की सूक्ष्मता के अनुसार ही मन भी उतना ही सूक्ष्म होता जाता
है । शक्ति की मात्रा १।६४ कही गई है । व्यापिनी की मात्रा १।१२८ समना की
१।२५६; नाद की १।१६, नादान्त की १।३२, निरोधिका की १।८ अर्धचन्द्र की
१।४, बिन्दु की १/२ मात्रा है ।
काल की इकाइयाँ निम्न हैं-त्रुटि, लव, निमेष, काष्ठा, कला, मुहूर्त
अहोरात्र, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, वत्सर, युग, मन्वन्तर, कल्प, मुद्राकल्प ॥
कुछ आचार्यों के मतानुसार उन्मना में मात्रा एवं काल है नहीं किन्तु कुछ आचार्यों
के मतानुसार उसकी मात्रा है ।
१. योगिनी हृदय (च०सं०), अमृतानन्द : 'दीपिका'
२. योगिनी हृदय : 'दीपिका' ३. भास्कर-प्रकाश (श्लो० १५-१६)
४. समना की मात्रा - १।२५६, उन्मना की १।५१२ मात्रा है ।