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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 242, कुल 530 में से

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१४० वरिवस्यारहस्ये
मन्तौ च ॥ (१६) स्वराः सर्व्वेऽप्युदात्ताः । (१७) रेका लकाराश्च संवार नाद घोषाल्य
प्राणवन्तः । (१८) हकारास्तु संवारादित्रयवन्तो महाप्राणावन्तश्च । (१९) बिन्द्वादय-
स्त्वात्यन्तिक संवारादिचतुष्कवन्तः । इति बाह्यप्रयत्नः ॥ १
प्रलयाग्निनिभं प्रथमं मूलाधारादनाहतं स्पृशति ।
तस्मादाज्ञाचक्रं द्वितीय कूटं तु कोटि सूर्य्यम् ॥ २० ॥
तस्माल्ललाटमध्यं तार्तीयं कोटिचन्द्राभम् ।
मालामणिवद्वर्णाः क्रमेण भाव्या उपर्युपरि ॥ २१ ॥
प्रथम कूट एवं द्वितीय का स्वरूप
प्रलयाग्नि के सदृश दृष्टिगत होने वाला 'प्रथम कूट' मूलाधार से आरंभ करके
अनाहत चक्र को स्पर्श करता है । उससे (अर्थात् उस अनाहत चक्र से) आरंभ
करके यह कोटिसूर्य के समान आभा वाला द्वितीय कूट आज्ञा चक्र को स्पर्श
करता है ॥ २०