वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽंशः १४१
'मूलाधारात्' = मूलाधार चक्र से । यहाँ पञ्चमी विभक्ति का प्रयोग "ल्यब्लोपे
कर्मण्यधिकरणे च' इस वार्तिक के नियमानुसार हुआ है जिसका अर्थ यह है कि
जब ल्यप् या क्त्वा प्रत्ययान्त क्रिया वाक्य में प्रकट नहीं की जाती, किन्तु छिपी
रहती है तो उस क्रिया के कर्म एवं आधार पञ्चमी में होते हैं यथा—
'श्वसुराज्जिह्वेति'—श्वसुर से लज्जा करती है । अर्थात् श्वसुर को देखकर लज्जा
करती है । यहाँ 'श्वसुरं वीक्ष्य जिह्वेति' के स्थान पर 'श्वसुराज्जिह्वेति' कहा गया है
अतः यहाँ पञ्चमी का प्रयोग 'ल्यब्लोपे०' सूत्रानुसार कहा जाएगा । 'अनाहतं'
'आज्ञाचक्रं' का अर्थ = अनाहत से आरंभ करके एवं आज्ञा चक्र से आरंभ करके ।
('ल्यब्लोपे०' वार्तिक के प्रयोग से निकले अर्थ को यहाँ द्योतित किया गया है ।)
'मूलाधार' 'अनाहत' एवं 'आज्ञाचक्र' के स्थानत्रय बिन्दु आदि रहित कूटत्रय के
स्थान हैं ।
'स्वच्छन्द तन्त्र' के अनुसार सुषुम्णा नामक नाड़ी के मूलाग्र भाग में दो
सहस्रदल कमल हैं; मध्य में अष्टदलपद्म आदि कमल स्थित हैं—और सब मिलाकर
तीस कमल स्थित हैं । गुदा के ऊपर दो अंगुल ऊपर, लिङ्ग देश में, नाभिदेश में,
हृदय प्रदेश में, कण्ठ में एवं भ्रूमध्य में—'मूलाधार', 'स्वाधिष्ठान', 'मणिपूर',
'अनाहत', 'विशुद्ध', 'आज्ञा' नामक कमल हैं जिनमें चार, छः, दश, द्वादश,
षोडश, दो दल हैं । यद्यपि दो दो ग्रन्थियाँ मध्य भाग में संदृष्ट हैं और वे चक्र भी
कहलाती हैं तथापि 'षडपद्म' (६ कमल) का ही कथन प्रायः होता है ।
'मूलाधार' 'अनाहत' एवं 'आज्ञा' चक्र—
(क) 'मूलाधार चक्र'—गुदा एवं लिङ्ग के मध्य चार दलों से युक्त एक
कमल है । उसके दलों में स्वर्ण सदृश दमक है । इस पर ही ऋतु (६ कोणों
वाला) पीली कान्ति युक्त पृथ्वी मण्डल है । चारों कोणों में वज्र आदि स्थित हैं ।
वहीं लं बीज है । यहीं पृथ्वी के रूप में ऐरावत हाथी पर स्थित, स्वर्णिम कान्ति
वाले वेदपाणि ब्रह्मा स्थित हैं । वे अक्षसूत्र, कमल एवं कमण्डल धारण किए हुए
हैं । उनके बाएँ भाग में सूर्यवत डाकिनी है । स्थित है । मूलचक्र के ऊपर
चतुर्भुजी, अक्षसूत्र एवं जलपात्र धारण किये हुए, अम्बिका देवी का ध्यान करने पर
वे योग-विद्या का प्रदर्शन करती है । चतुर्दल की कर्णिका में ऊर्ध्वकोण त्रिकोण है,
उसके ऊर्ध्व कोण में सुषुम्णा एवं बायीं-दायीं ओर क्रमशः इड़ा एवं पिङ्गला नाड़ियाँ
स्थित हैं । इड़ा चन्द्रनाड़ी एवं पिङ्गला सूर्यनाड़ी है । सुषुम्णा सूर्य, चन्द्र एवं अग्नि
के स्वरूप का है । सुषुम्णा के भीतर ही ब्रह्म नाड़ी है । उसमें ही ब्रह्मरंध्र है ।
इसी ब्रह्मरंध में कुण्डली के गमन का स्थान है । मूलचक्र से साढ़े तीन करोड़
नाड़ियाँ निकली हैं । त्रिकोण के ऊर्ध्वकोण में अनार के फूल के समान स्वयंभूलिङ्ग
है । यह लिङ्ग दस इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि एवं पञ्च प्राणों से युक्त है । १ यह
अपञ्चीकृत भूतों से निर्मित है तथा 'लिङ्गदेह' कहा जाता है । यह लिङ्ग शरीर में
वासनाओं से युक्त होकर जीव की मृत्यु के बाद देहान्तर प्राप्त करता है । जीवों
१. चक्र कौमुदी