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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 239, कुल 530 में से

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पृष्ठ 239

प्रथमोऽंशः १३७
एकादश वाक्कूटे सार्धा एकादशोदिता मध्ये ॥ १७
सार्धा अष्टौ शाक्तावेकैकलवोनिता मात्राः ।
संहत्यैकत्रिंशन्मात्रा मन्त्रे लवत्रयन्यूनाः ॥ १८ ॥
(नाद, वाग्भवकूट, कामराजकूट एवं शक्तिकूट का मात्रा-काल)
इस प्रकार गणना करने पर (यह ज्ञात होता है कि) इस नाद का काल कुल
मिलाकर मात्रा काल होता है जिसमें एक लव न्यून रह जाता है । (इस प्रकार)
वाक्कूट में ग्यारह, मध्य वाले (कामराज कूट) में साढ़े ग्यारह ॥ १७ ॥
(एवं) शक्तिकूट में साढ़े आठ मात्राएँ होती हैं जिनमें एक लव की न्यूनता
सभी में होती है । (इस प्रकार) मन्त्र में सब मिलाकर तीन लव कम इकतीस
मात्रायें होती हैं ॥ १८ ॥
* प्रकाश *
शाक्तौ तृतीयकूटे ॥ १७-१८॥
* सरोजिनी *
'नाद' का उच्चारण-काल मात्र 'मात्रा' है जिसमें कि एक लव न्यून रह जाता
है । 'मात्रा' क्या है? 'मात्रा लध्वक्षरस्य कालः ॥' लघु अक्षर के उच्चारण में
जितना समय लगता है उस समय को 'मात्रा' कहते हैं । 'गुरु' अक्षर में द्विगुणित
मात्रायें होती हैं ।
(१) 'वाक्कूट' — ११
(२) 'कामराजकूट' — साढ़े ग्यारह मात्रा
(३) 'शक्तिकूट' — साढ़े आठ मात्रायें (एक लव शून्य साढ़े आठ मात्रायें)—
मात्रा नाम ह्रस्वस्योच्चारण कालः स च षट्पञ्चाशदुत्तर शतद्वयलवैर्भवति । लवो
नामकाल परमाणुः । मात्रा एवं लव की परिभाषा यही है ।¹
'नादस्य' — नाद का जिस विमर्श शक्ति में प्रपञ्च विलीन रहता है उसके
संसर्ग से प्रकाश बिन्दु का रूप धारण करता है । यह संसर्ग क्या है? विमर्श
शक्ति में प्रकाशानुप्रवेश । यह बिन्दु ही प्रकाश बिन्दु (जो विमर्श के गर्भ में स्थित
रहता है ।) फिर प्रकाशबिन्दु में विमर्शशक्ति का प्रवेश होता है उससे तेजोमय
बीजस्वरूप 'नाद' निर्गत होता है । इस 'नाद' में समस्त तत्त्व बीजात्मना स्थित
रहते हैं । 'नाद' निर्गत होकर त्रिकोण का रूप धारण करता है । यही है । 'अहं'
नामक बिन्दुनादात्मक प्रकाश विमर्श का शरीर । इसमें प्रकाश है—श्वेत बिन्दु एवं
विमर्श है—लोहित बिन्दु । दोनों का पारस्परिक अनुप्रवेशात्मक साम्य है—


१. सेतुबन्ध