वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
DevanagariHindipublished530 पृष्ठ
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संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 237प्रथमोऽंशः १३५
प्रथमोऽंशः १३५
उच्चारण-काल का विवरण
(१) 'कामकला' (ई) एवं त्रिकोण (ए) की मात्राएँ : २ मात्राएँ ।
(२) बिन्दु-शून्य ह्रीङ्कार की मात्राएँ : ३ मात्राएँ ।
(३) अन्य वर्णों की मात्राएँ : १(१/२) मात्राएँ ।
(४) बिन्दु की मात्रा : १/२ मात्रा ॥
(५) नाद की मात्रा : १ लव कम १ मात्रा
२५६ लव = १ मात्रा: 'षट्पञ्चाशदुत्तर शतद्वय लवैरेका मात्रा ।' १२८ =
लव = 'बिन्दु' । ६४ लव = 'अर्धचन्द्र' । ३२ लव = 'रोधिनी' । १६ लव =
'नाद' । ८ लव = 'नादान्त' । लव = 'शक्ति' । २ लव = 'व्यापिका' । १ लव
= 'समना' । 'उन्मना' में काल है ही नहीं अतः वहाँ लव कल्पना ही व्यर्थ है ।१
'योगिनीहृदय' के 'चक्रसङ्केत' में दिया गया विवरण निम्नानुसार है—(१)
अर्धचन्द्र = १/२ मात्रा, इसके बाद 'शक्ति' पर्यन्त (२) अर्धचन्द्रादिक सभी आगे
के नादों की मात्रा उत्तरोत्तर पूर्ववर्ती नादों की तुलना में १/४; १/८; १/१६;—
इस प्रकार द्वैगुण्यकाल—'पूर्वपूर्वद्विगुणांश कालवत्वं सामान्येनोक्तं 'चतुःषष्टिस्तदूर्ध्वं तु
द्विगुणं द्विगुणं ततः ॥' इसके अनुसार तो—५१२ वाँ भाग 'उन्मनाकाल' होगा
'द्वादशोत्तर पञ्चशततमो भाग उन्मना कालः । मात्रास्वरूपं च द्वादशोत्तरपञ्चशत
लवात्मक त्वमेव प्रतीयते ॥' अर्थात् इस दृष्टि से उन्मना की माया ५१२ होगी ।
'देश-कालानवच्छिन्न तदूर्ध्वं, परमं महत्' कहकर उन्मना को कालानवच्छेद से परे,
कालातीत माना गया है । किन्तु 'चतुःषष्टि' इस श्लोक में 'शक्ति' ६४ वाँ भाग
('शक्तेस्तुः षष्टितमो मात्राभागः') उसके ऊपर 'व्यापिका' द्विगुणित (अष्टाविंशत्युत्तर-
शततमो भागः) १२८ वाँ भाग, उसके ऊपर द्विगुण । कहा गया है—'शक्त्यादीनां
च मात्रांशो मनोन्मन्यास्तथोन्मनी' यहाँ 'मनोन्मनी' पद समना का पर्याय मान लिया
गया है । एक मात्रो भवेद ह्रस्वो द्विमात्रो दीर्घ उच्यते ॥ किमात्रस्तु प्लुतोज्ञेयो
व्यञ्जनं त्वर्धमात्रकम् ॥''
'कालपरमाणुर्लवः' ॥ 'लव' कालगणना की सूक्ष्मतम इकाई है जो स्वरूपतः
निम्नानुसार है—'नलिनीपत्रसंहत्याः सूक्ष्म सूच्यभिवेदने । दले-दले तु यः कालः स
कालो लवसंज्ञितः । अतः सूक्ष्मतमः कालो नोपलब्धो भृगूद्वह ॥'
कमल को सुई से आर-पार वेधने के समय (अर्थात् यदि किसी कमल को
एक ओर से दूसरी ओर वेधने हेतु उसमें कोई सुई डाल कर उसे कमल के
आर-पार कर दी जाय तो उसमें लगने वाले समय) प्रत्येक दल को बेधने में जो
समय लगता है वही (प्रत्येक दल-बेधन का) वेधन-काल ही 'लव' है ।
षट्पञ्चाशतदुत्तरशतद्वयलवों की एक 'मात्रा' होती है ।
१. आचार्य भास्कर : 'वरिवस्यारहस्यम्' 'प्रकाश'