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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 244, कुल 530 में से

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पृष्ठ 244

१४२ वरिवस्यारहस्ये
की वासनाओं के नष्ट होने पर इस लिङ्ग का भी नाश हो जाता है । १ इस लिङ्ग
के आश्रयीभूत साढ़े तीन वलयों से युक्त, सर्पाकृतिवाली नित्या एवं प्रकृतिरूपा
कुण्डली स्थित है । २ यह प्रकृतिरूपा कुण्डली जब सत्व, रज एवं तम गुणों के
साम्य से युक्त हो जाती है तब इसे 'चित्कला' कहते हैं । इसके अर्द्धांश में ब्रह्म
का संश्लेष होने पर यह मूल प्रकृति 'ईश्वरी' कही जाती है । इसके वलय त्रय
सतोगुण रजोगुण एवं तमोगुण हैं । इस वलय का ऊपर उठा हुआ अंश ही
'ब्रह्मपुच्छ' एवं 'ब्रह्मांश' कहलाता है । ३ कुण्डली द्वारा ही जीव को धारण किया
जाता है । पञ्चाशद्वर्णात्मिका, मूलाधारोत्थिता, यह विद्या, जो समस्त प्राणियों का
चैतन्य है शब्दब्रह्म है । कुण्डली समस्त प्राणियों के मूलचक्र में 'शब्दब्रह्म' को
प्राप्त करके वर्णों के रूप में प्रकट होती है । गद्य-पद्य उसी के भेद हैं । ये
गद्य-पद्य हंस रूप आत्मा में आश्रित होकर प्रकट होते हैं । यह आत्मारूप हंस
प्राण के एवं प्राण नाड़ी-पथ के आश्रित हैं । बिन्दु एवं सर्ग ही पुरुष-प्रकृति है ।
पुरुष-प्रकृति रूप हंसों में 'हं' पुरुष एवं 'सः' प्रकृति है अतः 'हंस पद'
पुरुष-प्रकृति का वाचक है । ४ जीव जिसे प्राप्त करता है वह है हंस रूप अजपा
जप । ५ 'हं' के साथ प्राण को बाहर निकालते हुए 'सः' के साथ प्राण को प्रवेश
कराते हुए प्राणी को नित्य हंस पद का जप करना चाहिए । जब 'प्रकृति'
पुरुषाश्रय प्राप्त करके पुरुष रूप बन जाती है उस समय 'सोऽहं' स्थिति निर्मित
होती है । 'सोऽहं' पद में सकार एवं हकार का लोप करने पर यह 'ओं' बन
जाता है यह ओङ्कार ही एकाक्षर शब्द ब्रह्म है । ६ साधक को चाहिए कि वह प्रातः
उठकर मूलाधारचक्रस्थ शक्ति-गणेश को ६००, स्वाधिष्ठानचक्रस्थसावित्री-ब्रह्मा को
६००, मणिपरस्थ लक्ष्मीनारायण को ६००, अनाहतचक्रस्थ उमा-महेश्वर को ६००,
प्राण-शक्ति युक्त जीवात्मा को १०००, आज्ञाचक्रस्थ पराशक्ति युक्त 'विशुद्ध' संज्ञा
वाले परमात्मा को १००० एवं सहस्रारचक्रस्थ गुरु को १००० अजपा मन्त्रों का
समर्पण करें । ७
'मूलाधार चक्र' चार अंगुल चौड़ा है तथा यह गुदा से दो अंगुल ऊपर एवं
लिङ्ग से दो अंगुल नीचे स्थित है । ८ इसी पद्म में कलियों (कर्णिकाओं) के मध्य
परमरमणीय त्रिकोणात्मक 'योनिमण्डल' स्थित है । ९ वहीं 'विद्युल्लताकारा, सार्ध-
१-७. चक्र कौमुदी
८. 'मूलाधार पद्म' लिङ्ग स्थान से दो अंगुल नीचे है या कि एक ?- यह
विवादास्पद है ।
'शिवसंहिता' में दो स्थलों पर दो बातें कहीं गई हैं- १. गुदा से दो अंगुल
ऊपर एवं लिंग से दो अंगुल नीचे २. गुदा से दो अंगुल ऊपर एवं लिङ्ग से
एक अंगुल नीचे- 'मूलाधार पद्म' है ।
'गुदान्तु द्वयंगुलादूर्ध्वं मेढैकांगुलतस्त्वधः ।' (शिवसंहिता २।२१)
'गुदाद् द्वयंगुलतश्चोर्ध्वं मेढैकांगुलतस्त्वधः ।' (शिवसंहिता ५।५६)
९. शिवसंहिता