वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रिकारा, कुटिला, सुषुम्ना मार्गसंस्थिता पर देवता कुण्डली'—स्थित है । यह
कुण्डली जगत् संसृष्टिरूपा, निर्वाणसततोद्यता, वाच्यामवाच्या, देवनमस्कृता वाग्देवी
है।१ इडा-पिङ्गला के मध्य जो सुषुम्णा है उसके छः शक्तियाँ विद्यमान हैं जिन्हें
'षट्पद्म' कहते हैं ।२ मूलाधार से साढ़े तीन लाख नाड़ियाँ निकली हुई हैं ।३
गुदा-लिङ्ग के मध्य स्थित 'योनिमण्डल' ही 'कन्द' है जो कि पश्चिमाभिमुखी है ।
इसी के मूल में 'कुण्डली' स्थित है । यह नाड़ी-समूह से घिरी हुई, अपनी पूँछ
को मुख में डालकर सुषुम्णा छिद्र को घेरे हुए साढ़े तीन वलयों में स्थित है ।४
यह 'नागोपमा, सुप्ता, स्फुरन्ती, अहिवत संधिसंस्थाना, वाग्देवी एवं बीजसंज्ञका'
है ।५ यह 'स्वर्णभास्वरा, गुणत्रय प्रसूति का विष्णु शक्ति कुण्डली, 'कामबीज'
समन्वित इस योनिमण्डल में अधिष्ठित है । योनिमण्डल में स्थित यह 'कामबीज'
स्वच्छ स्वर्ण के समान है तथा इस बीज से सुषुम्ना भी जुड़ी है । यह 'कामबीज'
शरद ऋतु के चन्द्रमा के समान तेजवान, सूर्यकोटि प्रतीकाश एवं चन्द्रकोटि
सुशीतल है ।६ तेज, सूर्य एवं चन्द्र तीनों मिलकर यह 'कामबीज' 'त्रिपुरभैरवी' की
संज्ञा प्राप्त किए हैं । 'एतत्तत्रयंमिलित्वैव देवी त्रिपुरभैरवी ॥'७ यह 'कामबीज'
अग्निशिखावत है, सूक्ष्म है, क्रिया शक्ति एवं विज्ञानशक्ति के साथ यह 'काम बीज'
देह में ऊर्ध्व दिशा में एवं कभी नीचे, सदा घूमता रहता है (कभी लिङ्ग सलिल में
प्रविष्ट हो जाता है ।) इसी को 'आधार पद्म' कहते हैं एवं इसी के मूल में
'योनि' स्थित है—'आधारपद्ममेतद्वियोनिर्यस्यास्ति कंदतः ।' तेज (अग्नि) सूर्य एवं
चन्द्रमा लं, खं एवं ठं—ये तीनों एकत्रित होकर 'त्रिपुरभैरवी' देवी 'कामबीज' नाम
प्राप्त करके मूलाधार में स्थित हो गई हैं ।
'आधारपद्म' कुल संज्ञक है काञ्चनवर्ण है, स्वयंभूलिङ्ग से अधिष्ठित है । इस
पद्म में 'द्विरण्ड' नामक सिद्धलिङ्ग एवं डाकिनी देवी भी स्थित हैं । इसी पद्म की
भीतर की कली (कर्णिका) में 'योनिमण्डल' है जिसमें कि कुण्डलिनी स्थित है एवं
जिसके ऊर्ध्वदेश में दीप्तिमान एवं तेजःस्वरूप 'कामबीज' दमक रहा है—'तस्या
ऊर्ध्वं स्फुरतेजः कामबीजं भ्रमन्मतम् ॥'८
इडा (चन्द्रमा)—पिङ्गला (सूर्य) के मध्य सुषुम्णा (अग्नि) स्थित है । इन
तीनों के मध्य चित्रानाड़ी है । इसके मध्य में ही सूक्ष्मातिसूक्ष्मब्रह्मरंध्र है । यह
'सुषुम्ना मध्यचारिणी, पञ्चवर्णोज्ज्वला, विशुद्धा, अमृतानन्ददायिनी एवं दिव्यमार्ग-
स्वरूपा 'चित्रा' नाड़ी ध्यान मात्र से पापराशि नष्ट कर देती है तथा इसी के मध्य
में ब्रह्मरंध्र है जिसमें कुण्डली यात्रा करती है ।९
मेरूदण्ड के बाहर वामभाग में इड़ा (शशि) एवं दक्षिण भाग में पिङ्गला
(सूर्य) स्थित है किन्तु मेरूदण्ड के मध्य में 'त्रितयगुणमयी चन्द्रसूर्याग्निरूपा'
सुषुम्णा स्थित है और सुषुम्णा के मध्य 'वज्रा', 'वज्रा' के मध्य 'चित्रीणी' और
उसके मध्य में 'ब्रह्मनाड़ी' स्थित है ।१० इसके मुख में ही 'ब्रह्मद्वार' है । (इसी
१-९. शिवसंहिता
१०. षट्चक्रनिरूपण