वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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'मिश्रबिन्दु' । इसी साम्य का नाम है—परमात्मा । यही 'रवि' या 'काम' । अग्नि
एवं सोम इसी काम की कलायें हैं । अतः 'कामकला' का अर्थ है—त्रिबिन्दु । इन
तीन बिन्दुओं का समष्टिभूत महात्रिकोण ही आधा शक्ति का स्वस्वरूप ।। इसके
मध्य में रवि बिन्दु देवी के मुख के रूप में; अग्नि एवं सोम बिन्दु स्तनद्वय के
रूप में, हकार की हार्धकला या अर्धकला के योनिरूप से कल्पित है । शिवशक्ति
के मिलन से उत्पन्न पीयूषधारा प्रवाहित होने पर जिस लीला तरङ्ग की उत्पत्ति होती
है । वही है—'हार्धकला' । 'सच्चिदानन्द विभवात् सकलात् परमेश्वरात् ।
आसीच्छक्तिः स्ततो नादो नादाद्बिन्दु समुद्भूत कहकर—सकल परमेश्वर से शक्ति,
शक्ति से नाद, नाद से बिन्दु का उद्भव भी बताया गया है ।
कण्ठे च कण्ठतालुनि तालुनि दन्तेषु मूर्ध्नि नासायाम् ।
स्पृष्टविवाराद्यान्तर बाह्यैर्ह्लास्तदक्षरोत्पत्तिः ॥ १९ ॥
(मन्त्राक्षरों के उच्चारण-स्थान)
(मन्त्र के उपर्युक्त) वर्णों की उत्पत्ति कण्ठ, कण्ठतालु, तालु, दाँत, मूर्धा एवं
नासा आदि उच्चारण-स्थानों में स्पृष्ट आदि आभ्यन्तर एवं विवारादिक बाह्य प्रयत्नों
द्वारा होती है ॥ १९ ॥
- प्रकाश *
ककारत्रयमकारदशकं हकारपञ्चकं च कण्ठे । द्वितीयमक्षरं कण्ठतालुनि ।
प्राणयङ्गत्वादेकवद्भावः ईकारचतुष्टयं तालुनि । लाकरत्रयं सकारद्वयं च दन्तेषु ।
रेफत्रयं तु मूर्ध्नि । बिन्दादिनवकत्रयं नासायाम् । स्पृष्टेति । ककाराः स्पृष्टयत्नाः ।
अकाराः संवृताः । ईकारा एकारश्च विवृताः । रेफा लकाराश्चेषत्स्पृष्टाः । हकाराः
सकारौ चेषद्विवृताः । बिन्दादयः संवृततमाः । इत्याभ्यन्तरो यत्नः । ककारा विवार-
श्वासाघोषवन्तोऽल्पप्राणवन्तश्च । सकारौ महाप्राणवन्तौ विवारादिमन्तौ च । स्वराः
सर्वेऽप्युदात्ताः । रेफा लकाराश्च संवारनादघोषाल्यप्राणवन्तः । हकारास्तु संवारादि-
त्रयवन्तो महाप्राणवन्तश्च । बिन्दादयस्त्वात्यन्तिकसंवारादिचतुष्कवन्तः । इति बाह्यः
प्रयत्नः ॥ १९ ॥ - सरोजिनी *
पाणिनीय व्याकरण के अनुसार-प्रयत्न एवं उच्चारण का स्वरूप—प्रयत्न—
(१) 'बाह्य प्रयत्न' (२) 'आभ्यन्तर प्रयत्न' ।
(१) 'बाह्य प्रयत्न'—(१) विवार (२) संवार (३) श्वास (४) नाद (५) घोष
(६) अघोष (७) अल्पप्राण (८) महाप्राण (९) उदान्त (१०) अनुदान्त (११)
स्वरित ।। (१) वर्गों के प्रथम, द्वितीय वर्ण एवं श, ष, स (खर) = 'विवार',
श्वास, अघोष शेष 'हश' का संवार, नाद एवं घोष । स्वरों का प्रयत्न =
उदात्त-अनुदात्त स्वरित । 'सवर्ण' = एक ही उच्चारण स्थान वाले वर्ण । 'असवर्ण'
= भिन्न स्थानों से उच्चारण किए हुए वर्ण ।। 'तुल्यास्य प्रयत्नं सवर्णम्'