वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
प्रथमोऽंशः १२५
त्वर्धमात्रकम् ॥—के अनुसार (१) 'ह्रस्व' एक मात्रक (२) 'दीर्घ' द्विमात्रक एवं
(३) 'प्लुत' त्रिमात्रक हुआ करता है । कालपरमाणु 'लव' कहलाता है—
'कालपरमाणुर्लव इत्युच्यते ॥' किसी कमल पुष्प को सुई से छेदने में उसके
प्रत्येक दल को छेदे जाने में जितना समय लगता है उस वेधन-काल को 'लव'
कहते हैं—"नलिनीपत्र संहत्याः सूक्ष्मसूच्यभिवेदने । दले-दले तु यः कालः स कालो
लवसंज्ञितः । अतः सूक्ष्मतमः कालो नोपलब्ध्यो भृगूद्वह ॥" इस गणना के अनुसार
२५६ लवों की एक मात्रा होती है । षट्पञ्चाशदुत्तर शतद्वयलवैरेका मात्रा ।'१
हकारादिबिन्द्वन्त स्थूल वर्णों का उच्चारण-काल 'मात्रा' कहलाता है—
हकारादिबिन्द्वन्तानां स्थूलवर्णानामुच्चारण कालो मात्रा । बिन्द्वादि समनान्त का
उच्चारण काल अर्धमात्रा है । जो ह्रस्व, दीर्घ एवं प्लुत तीनों नहीं है किन्तु व्यञ्जन
है उसकी काल-मात्रा अर्धमात्रा है—'व्यञ्जनं चार्धमात्रकम् ॥' हलन्त व्यञ्जन की
उच्चारण मात्रा अर्धमात्रा है । मात्रा-विभाग की चरम सीमा १।५१२ है । मन के
ऊर्ध्वारोहण में काल-मात्रा क्षीण होती जाती है । काल की सूक्ष्मतम मात्रा (चरम
मात्रा) १।२५६ या १।५१२ है । बिन्दु में अर्धमात्रा है एवं उसके बाद १।४ मात्रा
एवं उसके बाद १।८ आदि । 'अर्धमात्रा' बिन्दु के ही वेग की मात्रा है ।
'कामकला'—"इति कामकला विद्या देवीचक्रमात्मिका सेयम् । विदिता येन
समुक्तौ भवति महात्रिपुरसुन्दरी रूपः ।२
- कामकला का स्वरूप *
सूर्य
मुख →
शृङ्गार
अग्नि → स्तन चन्द्र ← स्तन
हार्द्धकला
↑
योनि
१. प्रकाश २. कामकलाविलास (पुण्यानन्दनाथ)
१२६ वरिवस्यारहस्ये
'कामकला' का स्वरूप तत्व—सृष्टि की पहली अवस्था है । सृष्टि (१) भेद
प्रधान = 'आणवविसर्ग' (२) भेदाभेद प्रधान एवं = 'शाक्त विसर्ग' (३) अभेद
प्रधान = 'शांभव विसर्ग'—स्थूल, सूक्ष्म एवं सूक्ष्माति सूक्ष्म तीन प्रकार की है ।
शैवविसर्ग में न भेद रहता है और न तो भेदाभेद । इसमें विश्व भी नहीं रहता ।
यह आनन्दात्मक अभेदावस्था है । इस स्थिति में चित्त प्रलीन रहता है । केवल
संवित् या चैतन्य विद्यमान रहता है । विसर्ग शक्ति अखण्ड प्रकाश की पराशक्ति है
और इसे 'कामकला' के नाम से पुकारा जा सकता है । १ इच्छा जब बहिर्मुख
होती है तब उसे 'विसर्ग' कहते हैं । इसके बहिर्मुख होने का कारण है—
'क्षोभ' । क्षोभजन्य विसर्ग से उपहित शक्ति 'कामकला' है ।
सूर्य या काम एक ही वस्तु है । अग्नि और सोम का यह सामरस्य नित्य
सामरस्य है । सूर्य में ही अग्निशक्ति एवं सोमशक्ति दोनों हैं । अग्निशक्ति के द्वारा
ध्वंस कार्य एवं सोमशक्ति के द्वारा सृष्टि-कार्य होता है । 'कामकला' का प्रधान
बिन्दु ही रवि या सूर्य है । सृष्टि 'कामकला' का ही कार्य है इसीलिए ऋषियों ने
विश्व-सृष्टि के मूल में 'कामकला' का ही कार्य है । इसीलिए ऋषियों ने विश्व-सृष्टि
के मूल में 'कामकला' की क्रिया देखी थी । आत्मा ही 'परासंवित्', 'परमाशिव'
पूर्णतम सत्ता है—इन दोनों के सामरस्य से ही 'कामकला' का विकास होता है ।
'काम' नामक बिन्दु, 'विसर्ग' एवं 'हार्धकला' ('काम' नामक बिन्दु =
संमिश्रित बिन्दु । 'विसर्ग' = शोण एवं सित बिन्दु द्वय । 'हार्धकला' = अभिवृद्ध
रूप)—इन तीन अवयवों से युक्त एक अखण्ड पदार्थ 'कामकला' कहलाता है ।
यही है सम्पूर्ण सृष्टि का बीज ।
प्रकाश रूप अहमात्मक बिन्दु—इच्छा, ज्ञान, क्रिया रूप मातृत्रयात्मक अनन्त
सृष्टि । यथा सूर्याभिमुख दर्पण में, अन्तः प्रविष्ट रश्मियों द्वारा दोनों ओर से प्राप्त
किरणों के मिलन से, भित्ति पर तेजोबिन्दु विशेष उत्पन्न हो जाता है उसी प्रकार
प्राणियों के अदृष्टवश अपने में उपसंहृत सिसृक्षा से 'प्रकाश' रूप ब्रह्म अपनी
शक्ति के दर्शनार्थ अभिमुख होकर उसके अन्तराल में तेज रूप से प्रविष्ट होकर
'शुक्ल बिन्दु' बन जाता है । फिर शुक्ल बिन्दु में रक्तरूप शक्ति प्रविष्ट होती है ।
इससे संमिश्रित बिन्दु विकसित होता है । यही 'हार्धकला' कहलाता है । यह बिन्दु
(शिवशक्ति सामरस्य नामक अग्नीषोमात्मक) काम या 'रवि' कहलाता है । व्यष्टि
रूप में ये दो हैं—(१) शुक्ल बिन्दु = चन्द्र (२) रक्त बिन्दु = अग्नि । इस
बिन्दुद्वय को ही 'विसर्ग' कहते हैं । समष्टि बिन्दु ही रवि हैं । सारांश—काम
नामक बिन्दु, विसर्ग एवं हार्धकला—इन ३ अवयवों से युक्त अखण्ड पदार्थ ही
'कामकला' है । 'कामकला' में प्रथम तुरीय बिन्दु, उसके नीचे विसर्गाख्य बिन्दुद्वय
एवं उसके नीचे 'हार्धकला' स्थित है तुरीय एवं विसर्ग के मध्य में स्थित 'काम' ही
मध्य बिन्दु है । काम एवं विसर्ग के अन्तर्गत चैतन्य रूप से अकार एवं हकार
स्थित हैं । 'कामकला' अकार एवं हकार की एक स्वरूपता में स्थित है ।
१. भा० सं० और सा० (पृ० ३१८)
प्रथमोऽंशः १२७
“वरिवस्यारहस्यम्” में भास्करराय ने इन्हीं तथ्यों को इस प्रकार प्रस्तुत किया
है—'अहकारौ शिवशक्ति शून्याकारौ परस्पराश्लिष्टौ । स्फुरणप्रकाशरूपा वुपनिषदुक्तं
परं ब्रह्म । विश्वसिसृक्षावशतः स्वार्था शक्तिं विलोकयद्ब्रह्म । बिन्दू भवति तमिन्दुं
प्रविशति शक्तिस्तु रक्तबिन्दुतया । एतत्पिण्ड द्वितयं विसर्गद्वयं हकार चैतन्यम् मिश्रस्तु
तत्समष्टिः कामाख्यो रविरकार चैतन्यम् । एषाहम्पदतुर्यस्वर कामकलादिशब्दनिर्देश्या ।
वागर्थसृष्टिबीजं तेनाहन्तामयं विश्वम् ।।'१
अहन्तामय त्रिबिन्दुत्तत्त्वस्वरूप वर्णात्मा 'कामकला' त्रिगुणात्मक त्रिकोणरूप में
परिणत होकर जगज्जननी बनती है—"एवं कामकलात्मा त्रिबिन्दुत्तत्त्वस्वरूप वर्णमयी ।
सेयंन्त्रिकत्रिकोणरूपं याताः त्रिगुण स्वरूपिणी माता ।।'२ यह मिश्र, शुक्ल एवं
आरक्त त्रिबिन्दु से युक्त सिंघाड़े के आकार का सुरम्य त्रिकोण है । इसे ही प्रणव
भी कहा गया है—बिन्दुत्रयात्मकं स्वात्मशृङ्गारं विद्धि सुन्दरम् । मिश्र शुक्लं च रक्तं
च पुराणं प्रणवात्मकम् ।।'३ काम कलाक्षर बिन्दुत्रयात्मक है । ये तीन बिन्दु हैं—
(१) सूर्य (२) सोम (३) अग्नि । सोम-सूर्य-अग्नि अकार-उकार-मकार से एकरूप
हैं ।—'कामकलाक्षरस्य बिन्दुत्रयात्मकत्वेन बिन्दुत्रयस्य सूर्य सोमाग्नित्वेन, सोमसूर्याग्नी
नाम कारोकारमकारात्मता सर्वत्रागमेषु दृष्टेत्येत्सर्वं त्रिकात्मकं कामकलाक्षरे विश्रान्तमिति
प्रणवेनापि कामकलाक्षरमेव गीयते ।।'४
भास्करराय द्वारा 'सेतुबंध' में वर्णित् कामकला के स्वरूप को अमृतानन्द ने
'दीपिका' में स्वीकार नहीं किया है ।
भास्करराय एवं अमृतानन्द की दृष्टियों में भेद—भास्करराय ने 'बिन्दुं सङ्कल्प
वक्त्रं तु' (नित्याषोडशिकार्णव १। विश्राम । श्लोक २०१) की व्याख्या करते हुए
इसे भिन्न रूप में दिखाते हुए कहा है कि—"ऊर्ध्व कामाख्यो बिदुरेकः
तदधोग्नीषोमात्मक बिन्दुद्वितयरूपोन्यः । तदधो हकारार्धरूपः कलाख्य स्तृतीयः तदिदं
प्रत्याहारन्याद्येनकामकलेत्युच्यते ।।''
“मध्यबिन्दुः ऊर्ध्वबिन्दुः अकारहकारसामरस्यरूपः । कामाख्यः । तदुक्तं
कामकला विलासे—बिन्दुरहङ्कारात्मा रविरेतन्मिथुन समरसाकारः । मुखं बिन्दुं कृत्वा
कुचयुगमधस्तस्य तदधोहरार्धं ध्यायेद्यो हममहिषि ते मन्मथ कलाम् ।।'५ तुरीयबिन्दु
ही अतितुर्य तत्त्व है ।
हकाररूपा शक्ति ही 'कला' कहलाती है—"हकार रूपा शक्तिरेव च
कलेत्युच्यते ।।'६ 'हकारोऽन्यः कला रूपः ।।'७ सेयं 'कामकला' भवति ।। काम
विशिष्टा कलेति मध्यम पदलोपी समाप्त' कामश्चासौ कला चेति कर्मधारयो वा ।।८
१. वरिवस्यारहस्यम् (६९-७२) २-३. कामकलाविलास
४. त्रिपुरामहिम्नस्तोत्र टीका ५. सौन्दर्यलहरी
६. सेतुबन्ध ७. संकेत पद्धति
८. सेतुबन्ध
१२८ वरिवस्यारहस्ये
दीपिकाकार कहते हैं—'बिन्दोः प्रस्पन्दसंविदः बिन्दुरग्नीषोमात्मकः कामाख्यो रविः
शिवशक्तिसामरस्य वाच्यात्मा जातः ।।१' 'कामकला' चक्ररूपात्मक भी है—'चक्रं
कामकलारूपं प्रसार परमार्थतः ।।'' 'कामकलाविलास' में कामकला का स्वरूप इस
प्रकार प्रस्तुत किया गया है—'सितशोणबिन्दुयुगलं विविक्त शिवशक्तिसंकुचत्प्रसरम् ।
वागर्थसृष्टिहेतु परस्परानुप्रविष्ट विस्पष्टम् । बिन्दुरहङ्कारात्मा रविरेतन्मिथुनसमसाकारः ।
कामः कमनीयतया कला च दहनेन्दुविग्रहौ बिन्दू । इति 'कामकलाविद्या' देवी
चक्रक्रमात्मिका सेयम् । विदिता येन स मुक्तो भवति महात्रिपुर सुन्दरी रूपा ।।इस
प्रकार 'कामकला' चक्ररूपात्मिका एवं महात्रिपुरसुन्दरीरूपा भी है ।२
(कामकला एवं शाक्त दर्शन)
'कामकला'—पराभट्टारिका भगवती महात्रिपुरसुन्दरी का नामान्तर 'कला कला'
[L
प्रथमोऽंशः १२९
पुरुषबिन्दु' एवं (४) 'रक्त स्त्रीबिन्दु' (जिसमें दो उत्पादक शक्तियों का योग होता
है) जब ये चारों तत्व मिलते हैं तब 'कामकला' का रूप धारण करते हैं और तभी
वागर्थमय सृष्टि का समारंभ होता है ।
शास्त्रकारों का कथन है कि जब स्त्रीतत्त्व 'बिन्दु' में प्रथम बार प्रविष्ट होता है
तब नाद के साथ 'हार्धकला' नामक एक अन्य तत्त्व भी विकसित होता है ।
ग्रन्थांतर में कहा गया है कि पराशक्ति का ही अभिधान है—'कामकला' । 'सूर्य'
(संयुक्त बिन्दु) उसका मुख है । 'अग्नि' एवं 'चन्द्र' (रक्तबिन्दु एवं श्वेत बिन्दु)
उसके पयोधर हैं और 'हार्धकला' उसकी योनि है जिससे कि सृष्टि का समारंभ
होता है । वह सृष्टि-विधात्री देवी समस्त देवताओं में उच्चतमा है और वही 'परा',
'ललिता', 'भट्टारिका', 'पराभट्टारिका' एवं त्रिपुरसुन्दरी कहलाती है ।
शिव 'अ' अक्षर एवं शक्ति 'ह' अक्षर है । यह 'ह' 'अर्धकला' कहलाता है ।
अतः उपर्युक्त स्त्रीतत्त्व या 'योनि' 'ह' के आकार का अर्धभाग (हार्धकला है। यह
अर्धकला या 'ह' शिव के प्रतीक 'अ' अक्षर से मिलकर 'कामकला' या
'त्रिपुरसुन्दरी' का प्रतीकात्मक रूप है जो शिव एवं शक्ति के संयोग का परिणाम
है। वह 'अहं' कहलाती है और स्वयमेव अहं से युक्त है । इसी कारण उसका
समस्त विकास (समस्त सृष्टि) अहङ्कारयुक्त है । समस्त आत्माएँ इसी 'त्रिपुरसुन्दरी'
की रूपमात्र हैं । जब आत्मायें देवी-चक्रों के साथ कामकलाविव्या एवं ज्ञान का
अभ्यास कर लेती हैं तब वे स्वयमेव 'त्रिपुरसुन्दरी' हो जाती हैं । त्रिपुरसुन्दरी से ही
समस्त शब्द (सम्पूर्ण वाक्) एवं उनके अर्थ (जगत् एवं समस्त जागतिक पदार्थ या
तत्व) उत्पन्न होते हैं । यह त्रिपुरादेवी ही पराशक्ति है । 'अहंदेवी न चान्योस्मि' की
भावना एवं त्रिपुरादेवी के रूप में आत्मरूपान्तरण ही शाक्तों की साधना एवं साधना
की चरम परिणति है ।
तांत्रिक दर्शन में शिव को 'प्रकाश' एवं शक्ति को 'विमर्श' कहा जाता है ।
प्रकाश का विमर्श के साथ संयोग होने पर ही जगत् की सृष्टि होती है । इस
संयोग की नारी एवं पुरुष के संयोग की उपमा दी गई है । जिस प्रकार स्त्री एवं
पुरुष के संयोग से मैथुनी सृष्टि होती है उसी प्रकार 'प्रकाश' (शिव) एवं 'विमर्श'
(शक्ति) के संयोग से 'बिन्दु' का जन्म होता है 'बिन्दु' शिवशक्ति के एकीकरण,
मिलन या संयुक्तावस्था, युगनद्धावस्था का द्योतक है । 'बिन्दु' की अवस्था में शक्ति
एवं शिव दोनों में सामरस्य रहता है और इसी अवस्था को 'स्वायंभूलिङ्ग' पद
अभिव्यंजित करता है । शक्ति एवं शिव के इस सामरस्य या समागम को 'कामरूप
पीठ' की आख्या दी गई है । कविराज जी ने ठीक ही कहा है कि 'प्रकाश' एवं
'विमर्श' सर्वातीता शक्ति के रूपद्वय हैं । उपनिषदों का परब्रह्म शैव-शाक्त दर्शन में
'परमशिव' कहलाता है और इस 'परमशिव' की शक्ति 'सर्वातीता शक्ति' कहलाती
है । शिव एवं क्रियाशक्तिरूपा विमर्शशक्ति उस सर्वातीत शक्ति के दो रूप हैं ।
अतः 'परमशिव' विश्वोत्तीर्ण अवस्था का अभिवयञ्जक है । शिव (प्रकाश) को
'अम्बिका शक्ति' एवं शक्ति (विमर्श) को 'शान्ता' भी कहा जाता है । इनके
९ वरि.
१३० वरिवस्यारहस्ये
सामरस्य के अनन्तर 'वामा' (इच्छा) 'ज्येष्ठा' (ज्ञान) एवं 'रौद्री' (क्रिया) शक्तियों
का विकास होता है ।
परिभाषिक शब्दावली में इन्हीं का नामान्त है—'पूर्णगिरि पीठ' 'जालंधर पीठ'
एवं उड्डीयान पीठ' । ये ही 'पश्यन्ती' 'मध्यमा' एवं 'वैखरी' वाक् की स्थितियाँ
भी हैं । इन सबसे परे हैं—सर्वातीता शक्ति या 'परावाक्' ।
उपर्युक्त प्रकाशबिन्दु जब 'विमर्शबिन्दु' में प्रविष्ट होता है तब 'बिन्दु' में
उच्छूनता (Swelling) आती है और इसके परिणामस्वरूप बिन्दु से 'नाद' का
उदय होता है । इसी 'नाद' में समस्त 'तत्त्व' समाहित रहते हैं । यही नाद
व्यक्तावस्था में 'त्रिकोण' रूप धारण करता है । त्रिकोण का एक कोण (एक बिन्दु)
'प्रकाश' है, दूसरा 'बिन्दु' 'विमर्श' है एवं इन दोनों के संयोग से 'रवि' या 'काम'
नामक 'मिश्रबिन्दु' व्यक्त होता है । 'अग्नि' एवं 'सोम' इसी 'काम' की 'कला' के
रूप में गृहीत हैं । इस प्रकार 'कामकला' शब्द से 'प्रकाश' एवं 'विमर्श' तथा
'काम' या 'रवि'—इन तीनों का द्योतन होता है । त्रिकोणात्मक पद्धति द्वारा
सृष्टि-विकास की यही अवधारणा 'कामकला' द्वारा प्रतिपादित की गई है । तांत्रिक
दर्शन में प्रत्येक देवता के मूल तत्व के संधान में लिङ्गयोन्यात्मक त्रिकोण में स्थित
'मध्यबिन्दु' की स्थिति प्रतिपादित की गई है । यही कारण है कि तांत्रिक दर्शन में
भोग एवं मोक्ष दोनों को एक ही प्रक्रिया द्वारा निरूपित किया गया है ।
त्रिकोणात्मक अभिव्यक्ति के मध्य मध्यबिन्दु में दिव्य मिथुन (शिव-शक्ति) का
शृङ्गारादिक विलास चलता रहता है ।
'हंस' ही त्रिकोणात्मक 'कामकला' है । 'कामकला' मन्त्रों का मूल तत्व है ।
तांत्रिक समाम्नाय में शब्दब्रह्म अपनी शक्तियों एवं त्रिविधात्मक पक्षों सहित जिस
स्वरूप का प्रतिनिधित्व करता है और जिसे “अबलालयम्” (शक्ति का गृह) कहा
गया है—वही 'कामकला' के नाम से प्रसिद्ध है । 'कामकला' सर्वोच्च त्रिकोण है ।
त्रिकोण के द्वारा देवी को इसलिए व्यक्त किया जाता है क्योंकि इसकी अभिव्यक्ति
की दिशायें भी तीन हैं जो निम्न हैं—(१) इच्छा (२) क्रिया (३) ज्ञान ॥
'कामकला' की वास्तविक प्रकृति या स्वरूप—'कामकलाविलास' में
'पराशक्ति अंकुराकारा है और उसने शिव-शक्ति के सामरस्य से विस्तार प्राप्त किया
है ।' इस श्लोक से प्रारम्भ करके-काम का अर्थ है इच्छा—मध्यस्थ दो बिन्दु सूर्य
एवं चन्द्रमा का प्रतिनिधित्व करते हैं । इस श्लोक के अन्ततक कामकला को बहुत
सुचारु रूप से समझाया गया है । 'कामकला' तत्व के अन्तर्गत बिन्दुत्रय का
विवरण है ।
शक्ति का परमधाम 'कामकला' कहलाता है । सहस्रार में स्थित द्वादशदल
संयुक्त श्वेतपद्म में शक्ति का निवास है और इसे 'कामकला'-कहा जाता है । अकार
रूप 'प्रकाश' के साथ हकार रूप विमर्श का (अग्नि के साथ सोम का) साम्यभाव
ही 'काम' या 'रवि' कहलाता है शास्त्रोक्त 'अग्निषोमात्मक बिन्दु' यही है ।
प्रथमोऽंशः १३१
'कालिकापुराण' में कहा गया है कि 'काम' द्वारा केवल देवी को द्योतित
किया जाता है। देवी को 'काम' इसलिए कहा गया है क्योंकि देवी कामेच्छावश
मेरे साथ नीले शिखरों वाले कैलास पर्वत के गुप्त स्थान में आई। उन्हें 'काम'
इसलिए भी कहा गया है क्योंकि वे इच्छा—इच्छाकर्ता, इच्छित एवं सुन्दर की पूर्ति
करती हैं, कामदेव (मन्मथ) के शरीर को संरक्षण देती हैं एवं काम के शरीर को
नष्ट भी करती हैं। इन्हीं कारणों से उन्हें 'काम' कहा जाता है।
निखिलप्रपञ्चगर्भा विमर्शशक्ति के संसर्ग से अक्षरस्वरूप 'प्रकाश' बिन्दुरूप
धारण करता है अर्थात् 'प्रकाश' विमर्शशक्ति में अनुप्रविष्ट होता है। इस बिन्दु का
नाम है- 'प्रकाशबिन्दु' (जो कि विमर्शशक्ति के गर्भ में स्थित रहता है।) इसके
उपरान्त विमर्शशक्ति भी प्रकाश बिन्दु में अनुप्रविष्ट होती है जिसके कारण गर्भस्थ
बिन्दु 'उच्छून' हो उठता है और उससे तेजोमम बीजस्वरूप 'नाद' उत्पन्न होता है,
(इस 'नाद' में समस्त तत्व सूक्ष्मरूप से निहित है)। नाद निर्गत होकर
त्रिकोणाकार रूप ग्रहण करता है। यही 'अहम्' संज्ञक बिन्दुनादात्मक प्रकाश-विमर्श
का कलेवर है। इसमें 'प्रकाश' शुक्लबिन्दु है एवं विमर्श रक्तबिन्दु है तथा दोनों
की पारस्परिक अनुप्रवेशात्मक समता 'मिश्रबिन्दु' है। इसी समता (साम्यभाव) का
नामान्तर है परमात्मा, 'रवि' या 'काम'। अग्नि एवं सोम इसी 'काम' की विशेष
कलायें हैं।
तांत्रिक समाम्नाय में सूर्य को 'कामतत्व' कहा गया है। 'कामाख्यों रविः॥'
इसी 'काम' की एक कला है—'अग्नि' एवं दूसरी कला है 'चन्द्र'। 'कामकला' के
बिन्दुत्रय ये ही हैं। सृष्टि एक ही महाशक्ति के दो विरुद्ध स्वरूपों की महाक्रीड़ा है
जो कि परस्पर विषम भाव ग्रहण करके परस्पर एक दूसरे के ऊपर क्रिया करने
लगती है इन दो शक्तियों में एक का नाम है—'अग्नि' एवं दूसरी का नाम है—
'सोम'॥ 'अग्नि' = तापमय, दुःखप्रद, मृत्युस्वरूप (क्योंकि काल अग्नि का ही
रूप है)। अविभक्त को विभक्त करके प्रकाशित करने वाला। 'सोम' = शीतली,
सुखप्रद, अमृतस्वरूप, विभक्त को अविभक्त करके प्रकाशित करने वाला॥ 'अग्नि'
= प्रकाशस्वरूप, अग्निक्रिया का नाम है—संहार। 'सोम' = विसर्गस्वरूप,
सोमक्रिया का नाम है सृष्टि।
अग्नि + सोम की साम्यावस्था—इस अवस्था में दोनों निष्क्रिय रहते हैं अतः
न सृष्टि होती है और न प्रलय। यही है नित्यस्थिति। इसी का नाम है 'रवि' या
'सूर्य'। सूर्य को ही 'कामतत्व' कहा गया है। यह अग्नि एवं नित्य, समरस,
अद्वय स्थिति है।
'कामकला' का ध्यान करते समय यह चिन्तन किया जाता है कि तीन
बिन्दु एवं 'हार्धकला' देवी त्रिपुरसुन्दरी का शरीर हैं। यह कल्पना की जाती है कि
त्रिपुरसुन्दरी के शरीर में तीन बिन्दु (इच्छा-ज्ञान-क्रिया; चन्द्र-अग्नि-सूर्य;
रजस्-तमस्-सत्व; एवं ब्रह्मा-रुद्र-विष्णु) स्थित हैं। योगिनी तन्त्र में इसकी
ध्यान-प्रक्रिया इस प्रकार बताई गई है—'कला के ऊपर तीन बिन्दुओं की कल्पना
१३२ वरिवस्यारहस्ये
करनी चाहिए और फिर यह कल्पना करनी चाहिए कि एक षोडशवर्षीया कन्या
इससे उदित हो रही है जो कि लाखों नवोदित सूर्यों के प्रकाश से प्रकाशित है ।
यह भी कल्पना करनी चाहिए कि उसका मुकुट से कण्ठ तक का शरीरावयव ऊर्ध्व
बिन्दु से एवं स्तनद्वय तथा त्रिवली बिन्दुद्वय से उत्पन्न हो रहे हैं । फिर यह
कल्पना करनी चाहिए कि शेष शरीर (जननेन्द्रिय से पादपर्यन्त का शेष भाग)
'काम' से उत्पन्न हो रहा है । इस प्रकार पूर्ण शरीर के निर्मित हो जाने पर उसे
समस्त आभूषणों एवं परिधानों से समलंकृत रूप में स्थित शक्ति के रूप में सोचना
चाहिए । इसके बाद साधक को कल्पना करनी चाहिए कि मेरा शरीर भी
'कामकला' से अभिन्न है ।' 'श्रीक्रम' नामक ग्रन्थ में इसके स्वरूप के चिन्तन के
विषय में इस प्रकार निर्देश दिया गया है । 'ओ देवों की शासिका देवी ! इन तीन
बिन्दुओं में से प्रथम को उसका 'मुख' और शेष दो बिन्दुओं को उसके पयोधर
द्वय के रूप में चिन्तित करना चाहिए और हार्धकला को उसकी योनि में कल्पना
करनी चाहिए ॥'
'त्रैपुरत्रिकोण' मूलाधार में 'कामकला' का स्थूल पक्ष है ।
आदिविद्यातत्व का आदि वाग्भव कूट 'कादि' है जबकि द्वितीय कामकला
युक्त हादिमत है । (त्रिपुरातापि०) परमात्मा का उजृंभण कामकलामय है—
“कामकलामयं जात इत्यनेन परमात्मनोज्जृंभणम् ।।' (त्रिपुरातापि०)
'त्रिपुरातापिन्योपनिषद' में 'कामकला चक्र' का इस प्रकार विवेचन किया
गया है—“अथातः कामकला भूतं चक्रं व्याख्यास्यामो । क्लीं मैं ब्लूं स्त्रौं एते पञ्च
कामाः सर्वचक्रंव्याप्त वर्तन्ते ।।" आदि ।
'मूलमन्त्रात्मिका' शब्द का प्रयोग देवी के लिए किए जाने पर यह उसके
सूक्ष्म शरीर को सङ्केतित करता है जिसे 'कामकला' कहा जाता है ।
कामबीज एवं त्रिपुर भैरवी—शिवसंहिताकार का मत—जिस स्थान पर
कुण्डलिनी देवी अधिष्ठित हैं इसी योनिमण्डल में बंधूक (गुलदुपहरिया) के पुष्प के
समान 'कामबीज' विद्यमान है । इस बीज का स्वच्छ स्वर्ण के समान रूप में
स्मरण करना चाहिए । 'तत्र बंधूक पुष्पाभं कामबीज प्रकीर्तितम् ।' इसी बीज से
सुषुम्ना नाड़ी संश्लिष्ट है । यह बीज शरदऋतु के चन्द्रमा के समान प्रभा से
मण्डित, तेजस्वरूप, करोड़ों सूर्यों के समान चमकता हुआ एवं करोड़ों चन्द्रों के
समान सुशीतल है । तेज, सूर्य एवं चन्द्र इन तीनों के मिलने से इस बीज की
संज्ञा “त्रिपुरभैरवी” है । यह 'कामबीज' अग्नि की शिखा के समान रूप वाला
है । यह सूक्ष्म है और उसमें योनिस्थित परमतेजस्वरूप स्वयंभूलिङ्ग स्थित है । यह
'कामबीज' क्रियाशक्ति एवं विज्ञानशक्ति के साथ मिलकर देह में विचरण करता है,
कभी ऊर्ध्वगामी होता है और कभी लिङ्गांतर्गत सलिल में प्रविष्ट हो जाता है ।
मूलाधार पद्म की भीतरी कली में योनिमण्डल है । इस योनि में कुण्डलिनी निवास
करती है । इसके ऊपर दीप्तिमान तेजःस्वरूप 'कामबीज' जगमगा रहा है—
प्रथमोऽंशः १३३
“सुषुम्नापि च संश्लिष्टा बीजं तन्त्र परं स्थितम् ।
शरच्चन्द्रनिभं तेजस्त्रयमेतत् स्फुरत् स्थितम् ॥
सूर्यकोटि प्रतीकाशं चन्द्रकोटि सुशीतलम् ।
एतत्रयं मिलित्वैव देवी त्रिपुरभैरवी ।
बीजसंज्ञं परं तेजस्तदेवं परिकीर्तितम् ॥
तत्पद्ममध्यगा योनिस्त्र कुण्डलिनी स्थिता ।
तस्या ऊर्ध्वे स्फुरत्तेजः कामबीजं भ्रमन्मतम् ॥”
षट्चक्रनिरूपणकार ने “त्रैपुरत्रिकोण” एव ‘कंदर्पवायु’ का विवरण इस
प्रकार दिया है ।
“वज्राख्या वक्त्रदेशे विलसति सततं कर्णिकामध्यसंस्थं ।
कोणं तत् त्रैपुराख्यं तड़िदिव विलसत् कोमलं कामरूपम् ॥
कन्दर्पोनाम वायुर्निवसति सततं तस्य मध्ये समन्तात् ।
जीवेशो बंधु जीव प्रकरमभिहसन् कोटि सूर्यप्रकाशः ॥”
वज्रानाड़ी के मुखप्रदेश में जो कर्णिका है उसके मध्य में ‘त्रैपुरत्रिकोण’
स्थित है और त्रिकोण के मध्य में ‘कामबीज’ स्थित है । त्रिकोण के भीतर
‘कंदर्प’ नामक वायु भी स्थित है । ‘शाक्तानन्द तरंगिणी’ में कहा गया है कि
मूलाधार पद्म की कर्णिका में ‘परमेश्वरी कामाख्या योनि’ स्थित है । यह योनि
इच्छा-ज्ञान एवं क्रियाशक्ति से युक्त है । इसी आधारचक्र के मध्य में (त्रिकोण यंत्र
में) ‘अपर’ नामक ‘कन्दर्प’ स्थित है । उसी में स्वयंभूलिङ्ग पश्चिमाभिमुख होकर
स्थित है ।
विपरीत रति—शाक्तगण सृष्टि की विवेचना के प्रसङ्ग में मिथुन परक् भाषा
का प्रयोग तो करते ही हैं साथ ही साथ विपरीत रति का भी प्रतिपादन करते हैं ।
परब्रह्म मूलतः निश्चेष्ट एवं निस्पंद है ।- केवल शक्ति ही सक्रिय होकर शब्दब्रह्म को
उत्पन्न करती है अतः महाकाल एवं महाकाली की विपरीत रति का (जिसमें
महाकाल निश्चेष्ट एवं महाकाली सचेष्ट रहती है) शाक्तागम में शृङ्गारिक विवेचन
किया गया है । तन्त्रग्रन्थों में कुण्डलिनी को ‘महामातृका सुन्दरी’ कहा गया है और
मूलाधार से प्रस्थान करके सहस्रारस्थ पति के ऊपर उस आरोहण का शृङ्गारपूर्ण
वर्णन किया गया है ।
इसी विपरीत रति को बोधित कराने के लिए ‘बिन्दु’ शब्द का प्रयोग किया
गया है और कहा गया है कि ‘बिन्दु’ प्रकृति या महाशक्ति के गर्भ में पालित होकर
कुण्डली के रूप में प्रकट होता है । यहाँ ‘बिन्दु’ शुक्र का प्रतिरूप है ।
शाक्त तन्त्रों में स्त्री-पुरुष के रति कर्म के माध्यम से कुण्डलिनी योग का
निरूपण किया गया है । जिस प्रकार की कोई रमणी किसी राजमार्ग पर अभिसार
के लिए चलती हुई किसी गुप्तस्थान में अपने प्रियतम से मिलती है और आलिङ्गन
१३४ वरिवस्यारहस्ये
के उपरान्त अमृत (रजस्) गिराती है उसी प्रकार कुण्डलिनी शक्ति सुषुम्ना के
राजमार्ग पर अभिसार के लिए चलकर चक्रों के गुप्तस्थानों में प्रियतम के विभिन्न
रूपों (शिवलिङ्गों) से मिलती हुई सहस्रार में परम प्रियतम (परशिव) से आलिंगित
होकर अमृत गिराती है ।
“लाक्षाभं परमामृतं परशिवात् पीत्वा ततः कुण्डली ।
नित्यानन्द महोदयात् कुलपथान्मूले विशेत् सुन्दरी ॥
तद्दि्वव्यामृतधारया स्थिरमतिः सन्तर्पयेद्दैवतं ।
योगी योग परम्परा विदितया ब्रह्माण्डभाण्डेस्थितम् ॥”
‘देवीपुराण’ में कुण्डलिनी को ‘शृङ्गारक’ के माध्यम से निरूपित करते हुए
कहा गया है कि जिस प्रकार स्त्री-पुरुष के मिलने पर पुरुष के भीतर अग्नि जागृत
हो उठती है उसी प्रकार कुण्डलिनी शक्ति के अपने प्रियतम से मिलने पर अग्नि
से चन्द्रमा द्रवित हो उठता है और अमृत टपकने लगता है ।
जिस प्रकार नर-नारी के सङ्घट्ट (मैथुन) से सन्तानोपत्ति होती है उसी प्रकार
शिवशक्ति के सङ्घट्ट (सामरस्य) द्वारा ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति होती है । इस
मध्यर्मंथकभाव में शक्ति मध्य एवं शक्तिमान् मंथक है । इसके द्वारा शक्ति इच्छा,
ज्ञान एवं क्रिया के रूप प्राप्त करती है । यही रूप त्रिकोण था, शृङ्गार (सिङ्घाड़ा)
द्वारा सङ्केतित है । यह ‘यामल’, ‘सङ्घट्ट’ या सामरस्य, ही सृष्टि का मूल कारण
हैं । जगत् में स्त्री-पुरुष का संयोग इसी पारमार्थिक यामल का पिण्डस्वरूप है ।
बौद्ध दार्शनिकों ने भी युगनद्धता के सिद्धान्त के प्रतिपादन द्वारा इसी तथ्य का
प्रतिपादन किया है ।
मूलाधार में ‘त्रैपुरत्रिकोण’ है जो कि सहस्रार के नीचे समस्त मन्त्रों का मूल
है । इसे ‘त्रैपुर’ इसलिए कहते हैं क्योंकि इस त्रिकोण में स्थित ‘क’ (काम बीज
का प्रथमाक्षर एवं प्रधान अक्षर) में देवी त्रिपुरा निवास करती हैं । ‘कं’ कामिनी-बीज
है और यह मूलाधार चक्र में त्रिपुरसुन्दरी की विद्यमानता का सङ्केतक है । यहाँ
‘वामा’ ‘ज्येष्ठा’ एवं ‘रौद्री’ (इच्छा-ज्ञान-क्रिया) तीन रेखायें हैं । त्रैपुर त्रिकोण
सहस्रार के नीचे ‘कामकला’ के रूप में स्थित सूक्ष्माशक्ति का स्थूल पक्ष है ।
कामतत्व—
“कामोस्मि भरतर्षभ” कहकर भगवान श्रीकृष्ण ने ‘गीता’ में काम का
दिव्यीकरण करते हुए उसको अपना स्वरूप घोषित किया है । ‘त्रिपुरातापिन्युपनिषद’
में ईश्वर को काम से अभिन्न स्वीकार किया गया है—‘स एष निरञ्जनोऽकामतवेनो-
र्जृंभते अ क च ट त प य शान् सृजते । तस्मादीश्वरः कामोऽभिधीयते ॥’—इस
परिभाषा से ‘काम’ ‘क’ को भी व्याप्त करता है—‘एतत् परिभाषया कामः ककारं
व्याप्नोति । काम एवेदं तत्तदिति ककारो गृह्यते ॥’१
१. त्रिपुराता०
प्रथमोऽंशः १३५
उच्चारण-काल का विवरण
(१) 'कामकला' (ई) एवं त्रिकोण (ए) की मात्राएँ : २ मात्राएँ ।
(२) बिन्दु-शून्य ह्रीङ्कार की मात्राएँ : ३ मात्राएँ ।
(३) अन्य वर्णों की मात्राएँ : १(१/२) मात्राएँ ।
(४) बिन्दु की मात्रा : १/२ मात्रा ॥
(५) नाद की मात्रा : १ लव कम १ मात्रा
२५६ लव = १ मात्रा: 'षट्पञ्चाशदुत्तर शतद्वय लवैरेका मात्रा ।' १२८ =
लव = 'बिन्दु' । ६४ लव = 'अर्धचन्द्र' । ३२ लव = 'रोधिनी' । १६ लव =
'नाद' । ८ लव = 'नादान्त' । लव = 'शक्ति' । २ लव = 'व्यापिका' । १ लव
= 'समना' । 'उन्मना' में काल है ही नहीं अतः वहाँ लव कल्पना ही व्यर्थ है ।१
'योगिनीहृदय' के 'चक्रसङ्केत' में दिया गया विवरण निम्नानुसार है—(१)
अर्धचन्द्र = १/२ मात्रा, इसके बाद 'शक्ति' पर्यन्त (२) अर्धचन्द्रादिक सभी आगे
के नादों की मात्रा उत्तरोत्तर पूर्ववर्ती नादों की तुलना में १/४; १/८; १/१६;—
इस प्रकार द्वैगुण्यकाल—'पूर्वपूर्वद्विगुणांश कालवत्वं सामान्येनोक्तं 'चतुःषष्टिस्तदूर्ध्वं तु
द्विगुणं द्विगुणं ततः ॥' इसके अनुसार तो—५१२ वाँ भाग 'उन्मनाकाल' होगा
'द्वादशोत्तर पञ्चशततमो भाग उन्मना कालः । मात्रास्वरूपं च द्वादशोत्तरपञ्चशत
लवात्मक त्वमेव प्रतीयते ॥' अर्थात् इस दृष्टि से उन्मना की माया ५१२ होगी ।
'देश-कालानवच्छिन्न तदूर्ध्वं, परमं महत्' कहकर उन्मना को कालानवच्छेद से परे,
कालातीत माना गया है । किन्तु 'चतुःषष्टि' इस श्लोक में 'शक्ति' ६४ वाँ भाग
('शक्तेस्तुः षष्टितमो मात्राभागः') उसके ऊपर 'व्यापिका' द्विगुणित (अष्टाविंशत्युत्तर-
शततमो भागः) १२८ वाँ भाग, उसके ऊपर द्विगुण । कहा गया है—'शक्त्यादीनां
च मात्रांशो मनोन्मन्यास्तथोन्मनी' यहाँ 'मनोन्मनी' पद समना का पर्याय मान लिया
गया है । एक मात्रो भवेद ह्रस्वो द्विमात्रो दीर्घ उच्यते ॥ किमात्रस्तु प्लुतोज्ञेयो
व्यञ्जनं त्वर्धमात्रकम् ॥''
'कालपरमाणुर्लवः' ॥ 'लव' कालगणना की सूक्ष्मतम इकाई है जो स्वरूपतः
निम्नानुसार है—'नलिनीपत्रसंहत्याः सूक्ष्म सूच्यभिवेदने । दले-दले तु यः कालः स
कालो लवसंज्ञितः । अतः सूक्ष्मतमः कालो नोपलब्धो भृगूद्वह ॥'
कमल को सुई से आर-पार वेधने के समय (अर्थात् यदि किसी कमल को
एक ओर से दूसरी ओर वेधने हेतु उसमें कोई सुई डाल कर उसे कमल के
आर-पार कर दी जाय तो उसमें लगने वाले समय) प्रत्येक दल को बेधने में जो
समय लगता है वही (प्रत्येक दल-बेधन का) वेधन-काल ही 'लव' है ।
षट्पञ्चाशतदुत्तरशतद्वयलवों की एक 'मात्रा' होती है ।
१. आचार्य भास्कर : 'वरिवस्यारहस्यम्' 'प्रकाश'
१३६ वरिवस्यारहस्ये
लव = 'बिन्दोरष्टाविंशत्युत्तरशतं लवाः ।।' 'अर्धचन्द्र' = ६४; 'रोधिनी' =
३२; 'नाद' = १६; 'नादान्त' = ८; 'शक्ति' = ४; 'व्यापिका' = २ लव;
'समना' = १ लव; 'उन्मना' = 'उन्मनादास्तु नास्त्येव कालः ।।' 'उन्मना' में काल
रहता ही नहीं अतः 'लव' (कालमात्रा) होना संभव ही नहीं है ।
'योगिनीहृदय' के चक्रसङ्केत में बताया गया है कि-दीपाकार 'बिन्दु' अर्धमात्रा
वाला है । अर्धचन्द्रादिक से शक्तिपर्यन्त चतुरांश-षोडशांश आदि उच्चारण काल है ।
यो०हृ० में कहा गया है-
“दीपाकारोऽर्ध मात्रश्च ललाटे वृत्त इष्यते ॥ २८ ॥
अर्धचन्द्रस्तथाकारः पादमात्रस्तदूर्ध्वके ।
ज्योत्स्नाकारा तदष्टांशा रोधिनी त्र्यस्रविग्रहा ॥२९ ॥”
'अर्धमात्रा' = 'ह्रस्वस्य उच्चारणकालो मात्रेत्युच्यते' 'मात्राया अर्धमुच्चारण
कालो यस्य सोऽर्धमात्रः ॥ दीपाकारोऽर्धमात्रोच्चारणकालो वृत्तसन्निवेशो बिन्दु-
रित्यर्थः ।।१ अर्धचन्द्रो बिन्दोरर्धभागः' तथाकारो दीपाकार एव । 'पादमात्रो' मात्रा-
कालस्य चतुर्थभागोच्चारण काल इत्यर्थः ।।२ 'तदूर्ध्वके'-बिन्दु के ऊर्ध्वभाग में
चतुर्थभागोच्चारण काल ॥
'रोधिनी' में मात्राष्टांशोच्चारण काल ('तदष्टांशा') है । उपर्युक्त विवरण के
अनुसार तो 'उन्मना' का भी उच्चारण काल सिद्ध होता है जो कि निम्न है-
'मात्रास्वरूपञ्च द्वादशोत्तर पञ्चशतलात्मक त्वमेव प्रतीयते ॥'३
अर्थात् अर्धमात्रा बिन्दु का वेग है । उसके बाद प्रत्येक परवर्ती की गति
अर्ध-अर्ध मात्रा के हिसाब से कम होती जाती है यथा (१) बिन्दु में अर्धमात्रा (२)
उसके बाद १।४ मात्रा (३) उसके बाद १।८ मात्रा ।
सूक्ष्मतम मात्रा = १।२५६ है या १।५१२ है ।४ यह सूक्ष्मता की चरम
मात्रा है । काल की सूक्ष्मता के अनुसार ही मन भी उतना ही सूक्ष्म होता जाता
है । शक्ति की मात्रा १।६४ कही गई है । व्यापिनी की मात्रा १।१२८ समना की
१।२५६; नाद की १।१६, नादान्त की १।३२, निरोधिका की १।८ अर्धचन्द्र की
१।४, बिन्दु की १/२ मात्रा है ।
काल की इकाइयाँ निम्न हैं-त्रुटि, लव, निमेष, काष्ठा, कला, मुहूर्त
अहोरात्र, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, वत्सर, युग, मन्वन्तर, कल्प, मुद्राकल्प ॥
कुछ आचार्यों के मतानुसार उन्मना में मात्रा एवं काल है नहीं किन्तु कुछ आचार्यों
के मतानुसार उसकी मात्रा है ।
१. योगिनी हृदय (च०सं०), अमृतानन्द : 'दीपिका'
२. योगिनी हृदय : 'दीपिका' ३. भास्कर-प्रकाश (श्लो० १५-१६)
४. समना की मात्रा - १।२५६, उन्मना की १।५१२ मात्रा है ।
प्रथमोऽंशः १३७
एकादश वाक्कूटे सार्धा एकादशोदिता मध्ये ॥ १७
सार्धा अष्टौ शाक्तावेकैकलवोनिता मात्राः ।
संहत्यैकत्रिंशन्मात्रा मन्त्रे लवत्रयन्यूनाः ॥ १८ ॥
(नाद, वाग्भवकूट, कामराजकूट एवं शक्तिकूट का मात्रा-काल)
इस प्रकार गणना करने पर (यह ज्ञात होता है कि) इस नाद का काल कुल
मिलाकर मात्रा काल होता है जिसमें एक लव न्यून रह जाता है । (इस प्रकार)
वाक्कूट में ग्यारह, मध्य वाले (कामराज कूट) में साढ़े ग्यारह ॥ १७ ॥
(एवं) शक्तिकूट में साढ़े आठ मात्राएँ होती हैं जिनमें एक लव की न्यूनता
सभी में होती है । (इस प्रकार) मन्त्र में सब मिलाकर तीन लव कम इकतीस
मात्रायें होती हैं ॥ १८ ॥
* प्रकाश *
शाक्तौ तृतीयकूटे ॥ १७-१८॥
* सरोजिनी *
'नाद' का उच्चारण-काल मात्र 'मात्रा' है जिसमें कि एक लव न्यून रह जाता
है । 'मात्रा' क्या है? 'मात्रा लध्वक्षरस्य कालः ॥' लघु अक्षर के उच्चारण में
जितना समय लगता है उस समय को 'मात्रा' कहते हैं । 'गुरु' अक्षर में द्विगुणित
मात्रायें होती हैं ।
(१) 'वाक्कूट' — ११
(२) 'कामराजकूट' — साढ़े ग्यारह मात्रा
(३) 'शक्तिकूट' — साढ़े आठ मात्रायें (एक लव शून्य साढ़े आठ मात्रायें)—
मात्रा नाम ह्रस्वस्योच्चारण कालः स च षट्पञ्चाशदुत्तर शतद्वयलवैर्भवति । लवो
नामकाल परमाणुः । मात्रा एवं लव की परिभाषा यही है ।¹
'नादस्य' — नाद का जिस विमर्श शक्ति में प्रपञ्च विलीन रहता है उसके
संसर्ग से प्रकाश बिन्दु का रूप धारण करता है । यह संसर्ग क्या है? विमर्श
शक्ति में प्रकाशानुप्रवेश । यह बिन्दु ही प्रकाश बिन्दु (जो विमर्श के गर्भ में स्थित
रहता है ।) फिर प्रकाशबिन्दु में विमर्शशक्ति का प्रवेश होता है उससे तेजोमय
बीजस्वरूप 'नाद' निर्गत होता है । इस 'नाद' में समस्त तत्त्व बीजात्मना स्थित
रहते हैं । 'नाद' निर्गत होकर त्रिकोण का रूप धारण करता है । यही है । 'अहं'
नामक बिन्दुनादात्मक प्रकाश विमर्श का शरीर । इसमें प्रकाश है—श्वेत बिन्दु एवं
विमर्श है—लोहित बिन्दु । दोनों का पारस्परिक अनुप्रवेशात्मक साम्य है—
१. सेतुबन्ध
१३८ वरिवस्यारहस्ये
'मिश्रबिन्दु' । इसी साम्य का नाम है—परमात्मा । यही 'रवि' या 'काम' । अग्नि
एवं सोम इसी काम की कलायें हैं । अतः 'कामकला' का अर्थ है—त्रिबिन्दु । इन
तीन बिन्दुओं का समष्टिभूत महात्रिकोण ही आधा शक्ति का स्वस्वरूप ।। इसके
मध्य में रवि बिन्दु देवी के मुख के रूप में; अग्नि एवं सोम बिन्दु स्तनद्वय के
रूप में, हकार की हार्धकला या अर्धकला के योनिरूप से कल्पित है । शिवशक्ति
के मिलन से उत्पन्न पीयूषधारा प्रवाहित होने पर जिस लीला तरङ्ग की उत्पत्ति होती
है । वही है—'हार्धकला' । 'सच्चिदानन्द विभवात् सकलात् परमेश्वरात् ।
आसीच्छक्तिः स्ततो नादो नादाद्बिन्दु समुद्भूत कहकर—सकल परमेश्वर से शक्ति,
शक्ति से नाद, नाद से बिन्दु का उद्भव भी बताया गया है ।
कण्ठे च कण्ठतालुनि तालुनि दन्तेषु मूर्ध्नि नासायाम् ।
स्पृष्टविवाराद्यान्तर बाह्यैर्ह्लास्तदक्षरोत्पत्तिः ॥ १९ ॥
(मन्त्राक्षरों के उच्चारण-स्थान)
(मन्त्र के उपर्युक्त) वर्णों की उत्पत्ति कण्ठ, कण्ठतालु, तालु, दाँत, मूर्धा एवं
नासा आदि उच्चारण-स्थानों में स्पृष्ट आदि आभ्यन्तर एवं विवारादिक बाह्य प्रयत्नों
द्वारा होती है ॥ १९ ॥
- प्रकाश *
ककारत्रयमकारदशकं हकारपञ्चकं च कण्ठे । द्वितीयमक्षरं कण्ठतालुनि ।
प्राणयङ्गत्वादेकवद्भावः ईकारचतुष्टयं तालुनि । लाकरत्रयं सकारद्वयं च दन्तेषु ।
रेफत्रयं तु मूर्ध्नि । बिन्दादिनवकत्रयं नासायाम् । स्पृष्टेति । ककाराः स्पृष्टयत्नाः ।
अकाराः संवृताः । ईकारा एकारश्च विवृताः । रेफा लकाराश्चेषत्स्पृष्टाः । हकाराः
सकारौ चेषद्विवृताः । बिन्दादयः संवृततमाः । इत्याभ्यन्तरो यत्नः । ककारा विवार-
श्वासाघोषवन्तोऽल्पप्राणवन्तश्च । सकारौ महाप्राणवन्तौ विवारादिमन्तौ च । स्वराः
सर्वेऽप्युदात्ताः । रेफा लकाराश्च संवारनादघोषाल्यप्राणवन्तः । हकारास्तु संवारादि-
त्रयवन्तो महाप्राणवन्तश्च । बिन्दादयस्त्वात्यन्तिकसंवारादिचतुष्कवन्तः । इति बाह्यः
प्रयत्नः ॥ १९ ॥ - सरोजिनी *
पाणिनीय व्याकरण के अनुसार-प्रयत्न एवं उच्चारण का स्वरूप—प्रयत्न—
(१) 'बाह्य प्रयत्न' (२) 'आभ्यन्तर प्रयत्न' ।
(१) 'बाह्य प्रयत्न'—(१) विवार (२) संवार (३) श्वास (४) नाद (५) घोष
(६) अघोष (७) अल्पप्राण (८) महाप्राण (९) उदान्त (१०) अनुदान्त (११)
स्वरित ।। (१) वर्गों के प्रथम, द्वितीय वर्ण एवं श, ष, स (खर) = 'विवार',
श्वास, अघोष शेष 'हश' का संवार, नाद एवं घोष । स्वरों का प्रयत्न =
उदात्त-अनुदात्त स्वरित । 'सवर्ण' = एक ही उच्चारण स्थान वाले वर्ण । 'असवर्ण'
= भिन्न स्थानों से उच्चारण किए हुए वर्ण ।। 'तुल्यास्य प्रयत्नं सवर्णम्'
प्रथमोऽंशः १३९
(२) आभ्यन्तर प्रयत्न—वर्गाणां प्रथमतृतीय पञ्चमाः यणाश्चाल्प प्राणाः ।
वर्गाणां द्वितीयचतुर्थौशलश्च महाप्राणः ।।' स्पृष्टःविवृत, संवृत आदि ।
प्रयत्न एवं वर्ण—(१) स्पर्श वर्णों का प्रयत्न 'स्पृष्ट' (२) अन्तस्थ वर्णों का
प्रयत्न = ईषत्स्पृष्ट । ऊष्म वर्णों का प्रयत्न = ईषद् विवृत । स्वरों का प्रयत्न =
विवृत । ह्रस्व अ का प्रयत्न = संवृत । (सिद्ध प्रयोग रूप में) अन्यथा अन्य स्वरों
की भाँति उसका भी प्रयत्न = 'विवृत' ।।
(३) उच्चारण-स्थान:—
(i) अकुह विसर्जनीयानां कण्ठः । (अ,आ,विसर्ग,क,ख,ग,घ,ङ,ह) = कण्ठ ।
(ii) इचुयशानां तालु । (इ,ई,य,च,छ,ज,झ,ञ,श) = तालु ।
(iii) ऋटुरषाणां मूर्द्धा । (ऋ,ॠ,र,ट,ठ,ड,ढ,ण,ष) = मूर्द्धा ।
(iv) ऌतुलसानां दन्ताः । (ऌ,ल,त,थ,द,ध,न,स,) = दन्त ।
(v) उपध्मानीयानाम् ओष्ठौ । (उ,ऊ,उपध्मानीय,प,फ,ब,भ,म) = ओष्ठ ।
(vi) ञमङणनानां नासिका च । (मुखनासिकावचनोऽनुनासिकः) = नासिका ।
(vii) एदैतौः कण्ठतालु ।। (ए,ऐ) = कण्ठ और तालुः
(viii) ओदौतौः कण्ठोष्ठम् । (ओ और औ) = कण्ठ और ओष्ठा
(ix) वकारस्य दन्तोष्ठम् । (व) = दाँत और ओष्ठ ।
(x) जिह्वामूलीयस्य जिह्वामूलम् । (जिह्वा की जड़ से ध्वनित) ।।
(xi) नासिकानुस्वारस्य ।। (अनुस्वार) = नासिका
वर्णोच्चारण में द्विविध प्रयत्न—(१) वर्णों के स्फुट उच्चारित होने के पूर्व
(२) उनके स्फुट उच्चरित होने के बाद ।
प्रथमोच्चारण की प्रयत्न = 'आभ्यन्तर प्रयत्न ।'
द्वितीयोच्चारण की प्रयत्न = 'बाह्य प्रयत्न ।'
आभ्यन्तर प्रयत्न—१. स्पृष्ट २. ईषतस्पृष्ट ३. ईषदविवृत ४. विवृत ५.
संवृत ।
(१) ककार त्रयमकार दशकं हकार पञ्चकं च कण्ठे । (२) द्वितीयमक्षरं
कण्ठतालुनि । (३) प्राण्यङ्गत्वादेकवद्भावः । ईकार चतुष्टयं तालुनि ।। (४) लकार
त्रयं सकारद्वयं च दन्तेषु । (५) रेकत्रयं तु मूर्ध्नि । (६) बिन्द्रादि नवक त्रयं
नासायाम् ।—स्पृष्टेति । (७) ककाराः स्पृष्टयत्नाः । (८) अकाराः संवृताः । (९)
ईकारा एकारश्च विवृताः । (१०) रेका लकाराश्चेषत्स्पृष्टाः । (११) हकाराः सकारौ
चेषद्विवृताः । (१२) बिन्द्रादयः संवृततमाः । (१३) इत्याभ्यन्तरो यत्नः । (१४)
ककारा विवार श्वासाघोषवन्तोऽल्पप्राणवन्तश्च । (१५) सकारौ महाप्राणवन्तौ विवारादि-
१४० वरिवस्यारहस्ये
मन्तौ च ॥ (१६) स्वराः सर्व्वेऽप्युदात्ताः । (१७) रेका लकाराश्च संवार नाद घोषाल्य
प्राणवन्तः । (१८) हकारास्तु संवारादित्रयवन्तो महाप्राणावन्तश्च । (१९) बिन्द्वादय-
स्त्वात्यन्तिक संवारादिचतुष्कवन्तः । इति बाह्यप्रयत्नः ॥ १
प्रलयाग्निनिभं प्रथमं मूलाधारादनाहतं स्पृशति ।
तस्मादाज्ञाचक्रं द्वितीय कूटं तु कोटि सूर्य्यम् ॥ २० ॥
तस्माल्ललाटमध्यं तार्तीयं कोटिचन्द्राभम् ।
मालामणिवद्वर्णाः क्रमेण भाव्या उपर्युपरि ॥ २१ ॥
प्रथम कूट एवं द्वितीय का स्वरूप
प्रलयाग्नि के सदृश दृष्टिगत होने वाला 'प्रथम कूट' मूलाधार से आरंभ करके
अनाहत चक्र को स्पर्श करता है । उससे (अर्थात् उस अनाहत चक्र से) आरंभ
करके यह कोटिसूर्य के समान आभा वाला द्वितीय कूट आज्ञा चक्र को स्पर्श
करता है ॥ २०
प्रथमोऽंशः १४१
'मूलाधारात्' = मूलाधार चक्र से । यहाँ पञ्चमी विभक्ति का प्रयोग "ल्यब्लोपे
कर्मण्यधिकरणे च' इस वार्तिक के नियमानुसार हुआ है जिसका अर्थ यह है कि
जब ल्यप् या क्त्वा प्रत्ययान्त क्रिया वाक्य में प्रकट नहीं की जाती, किन्तु छिपी
रहती है तो उस क्रिया के कर्म एवं आधार पञ्चमी में होते हैं यथा—
'श्वसुराज्जिह्वेति'—श्वसुर से लज्जा करती है । अर्थात् श्वसुर को देखकर लज्जा
करती है । यहाँ 'श्वसुरं वीक्ष्य जिह्वेति' के स्थान पर 'श्वसुराज्जिह्वेति' कहा गया है
अतः यहाँ पञ्चमी का प्रयोग 'ल्यब्लोपे०' सूत्रानुसार कहा जाएगा । 'अनाहतं'
'आज्ञाचक्रं' का अर्थ = अनाहत से आरंभ करके एवं आज्ञा चक्र से आरंभ करके ।
('ल्यब्लोपे०' वार्तिक के प्रयोग से निकले अर्थ को यहाँ द्योतित किया गया है ।)
'मूलाधार' 'अनाहत' एवं 'आज्ञाचक्र' के स्थानत्रय बिन्दु आदि रहित कूटत्रय के
स्थान हैं ।
'स्वच्छन्द तन्त्र' के अनुसार सुषुम्णा नामक नाड़ी के मूलाग्र भाग में दो
सहस्रदल कमल हैं; मध्य में अष्टदलपद्म आदि कमल स्थित हैं—और सब मिलाकर
तीस कमल स्थित हैं । गुदा के ऊपर दो अंगुल ऊपर, लिङ्ग देश में, नाभिदेश में,
हृदय प्रदेश में, कण्ठ में एवं भ्रूमध्य में—'मूलाधार', 'स्वाधिष्ठान', 'मणिपूर',
'अनाहत', 'विशुद्ध', 'आज्ञा' नामक कमल हैं जिनमें चार, छः, दश, द्वादश,
षोडश, दो दल हैं । यद्यपि दो दो ग्रन्थियाँ मध्य भाग में संदृष्ट हैं और वे चक्र भी
कहलाती हैं तथापि 'षडपद्म' (६ कमल) का ही कथन प्रायः होता है ।
'मूलाधार' 'अनाहत' एवं 'आज्ञा' चक्र—
(क) 'मूलाधार चक्र'—गुदा एवं लिङ्ग के मध्य चार दलों से युक्त एक
कमल है । उसके दलों में स्वर्ण सदृश दमक है । इस पर ही ऋतु (६ कोणों
वाला) पीली कान्ति युक्त पृथ्वी मण्डल है । चारों कोणों में वज्र आदि स्थित हैं ।
वहीं लं बीज है । यहीं पृथ्वी के रूप में ऐरावत हाथी पर स्थित, स्वर्णिम कान्ति
वाले वेदपाणि ब्रह्मा स्थित हैं । वे अक्षसूत्र, कमल एवं कमण्डल धारण किए हुए
हैं । उनके बाएँ भाग में सूर्यवत डाकिनी है । स्थित है । मूलचक्र के ऊपर
चतुर्भुजी, अक्षसूत्र एवं जलपात्र धारण किये हुए, अम्बिका देवी का ध्यान करने पर
वे योग-विद्या का प्रदर्शन करती है । चतुर्दल की कर्णिका में ऊर्ध्वकोण त्रिकोण है,
उसके ऊर्ध्व कोण में सुषुम्णा एवं बायीं-दायीं ओर क्रमशः इड़ा एवं पिङ्गला नाड़ियाँ
स्थित हैं । इड़ा चन्द्रनाड़ी एवं पिङ्गला सूर्यनाड़ी है । सुषुम्णा सूर्य, चन्द्र एवं अग्नि
के स्वरूप का है । सुषुम्णा के भीतर ही ब्रह्म नाड़ी है । उसमें ही ब्रह्मरंध्र है ।
इसी ब्रह्मरंध में कुण्डली के गमन का स्थान है । मूलचक्र से साढ़े तीन करोड़
नाड़ियाँ निकली हैं । त्रिकोण के ऊर्ध्वकोण में अनार के फूल के समान स्वयंभूलिङ्ग
है । यह लिङ्ग दस इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि एवं पञ्च प्राणों से युक्त है । १ यह
अपञ्चीकृत भूतों से निर्मित है तथा 'लिङ्गदेह' कहा जाता है । यह लिङ्ग शरीर में
वासनाओं से युक्त होकर जीव की मृत्यु के बाद देहान्तर प्राप्त करता है । जीवों
१. चक्र कौमुदी
१४२ वरिवस्यारहस्ये
की वासनाओं के नष्ट होने पर इस लिङ्ग का भी नाश हो जाता है । १ इस लिङ्ग
के आश्रयीभूत साढ़े तीन वलयों से युक्त, सर्पाकृतिवाली नित्या एवं प्रकृतिरूपा
कुण्डली स्थित है । २ यह प्रकृतिरूपा कुण्डली जब सत्व, रज एवं तम गुणों के
साम्य से युक्त हो जाती है तब इसे 'चित्कला' कहते हैं । इसके अर्द्धांश में ब्रह्म
का संश्लेष होने पर यह मूल प्रकृति 'ईश्वरी' कही जाती है । इसके वलय त्रय
सतोगुण रजोगुण एवं तमोगुण हैं । इस वलय का ऊपर उठा हुआ अंश ही
'ब्रह्मपुच्छ' एवं 'ब्रह्मांश' कहलाता है । ३ कुण्डली द्वारा ही जीव को धारण किया
जाता है । पञ्चाशद्वर्णात्मिका, मूलाधारोत्थिता, यह विद्या, जो समस्त प्राणियों का
चैतन्य है शब्दब्रह्म है । कुण्डली समस्त प्राणियों के मूलचक्र में 'शब्दब्रह्म' को
प्राप्त करके वर्णों के रूप में प्रकट होती है । गद्य-पद्य उसी के भेद हैं । ये
गद्य-पद्य हंस रूप आत्मा में आश्रित होकर प्रकट होते हैं । यह आत्मारूप हंस
प्राण के एवं प्राण नाड़ी-पथ के आश्रित हैं । बिन्दु एवं सर्ग ही पुरुष-प्रकृति है ।
पुरुष-प्रकृति रूप हंसों में 'हं' पुरुष एवं 'सः' प्रकृति है अतः 'हंस पद'
पुरुष-प्रकृति का वाचक है । ४ जीव जिसे प्राप्त करता है वह है हंस रूप अजपा
जप । ५ 'हं' के साथ प्राण को बाहर निकालते हुए 'सः' के साथ प्राण को प्रवेश
कराते हुए प्राणी को नित्य हंस पद का जप करना चाहिए । जब 'प्रकृति'
पुरुषाश्रय प्राप्त करके पुरुष रूप बन जाती है उस समय 'सोऽहं' स्थिति निर्मित
होती है । 'सोऽहं' पद में सकार एवं हकार का लोप करने पर यह 'ओं' बन
जाता है यह ओङ्कार ही एकाक्षर शब्द ब्रह्म है । ६ साधक को चाहिए कि वह प्रातः
उठकर मूलाधारचक्रस्थ शक्ति-गणेश को ६००, स्वाधिष्ठानचक्रस्थसावित्री-ब्रह्मा को
६००, मणिपरस्थ लक्ष्मीनारायण को ६००, अनाहतचक्रस्थ उमा-महेश्वर को ६००,
प्राण-शक्ति युक्त जीवात्मा को १०००, आज्ञाचक्रस्थ पराशक्ति युक्त 'विशुद्ध' संज्ञा
वाले परमात्मा को १००० एवं सहस्रारचक्रस्थ गुरु को १००० अजपा मन्त्रों का
समर्पण करें । ७
'मूलाधार चक्र' चार अंगुल चौड़ा है तथा यह गुदा से दो अंगुल ऊपर एवं
लिङ्ग से दो अंगुल नीचे स्थित है । ८ इसी पद्म में कलियों (कर्णिकाओं) के मध्य
परमरमणीय त्रिकोणात्मक 'योनिमण्डल' स्थित है । ९ वहीं 'विद्युल्लताकारा, सार्ध-
१-७. चक्र कौमुदी
८. 'मूलाधार पद्म' लिङ्ग स्थान से दो अंगुल नीचे है या कि एक ?- यह
विवादास्पद है ।
'शिवसंहिता' में दो स्थलों पर दो बातें कहीं गई हैं- १. गुदा से दो अंगुल
ऊपर एवं लिंग से दो अंगुल नीचे २. गुदा से दो अंगुल ऊपर एवं लिङ्ग से
एक अंगुल नीचे- 'मूलाधार पद्म' है ।
'गुदान्तु द्वयंगुलादूर्ध्वं मेढैकांगुलतस्त्वधः ।' (शिवसंहिता २।२१)
'गुदाद् द्वयंगुलतश्चोर्ध्वं मेढैकांगुलतस्त्वधः ।' (शिवसंहिता ५।५६)
९. शिवसंहिता
त्रिकारा, कुटिला, सुषुम्ना मार्गसंस्थिता पर देवता कुण्डली'—स्थित है । यह
कुण्डली जगत् संसृष्टिरूपा, निर्वाणसततोद्यता, वाच्यामवाच्या, देवनमस्कृता वाग्देवी
है।१ इडा-पिङ्गला के मध्य जो सुषुम्णा है उसके छः शक्तियाँ विद्यमान हैं जिन्हें
'षट्पद्म' कहते हैं ।२ मूलाधार से साढ़े तीन लाख नाड़ियाँ निकली हुई हैं ।३
गुदा-लिङ्ग के मध्य स्थित 'योनिमण्डल' ही 'कन्द' है जो कि पश्चिमाभिमुखी है ।
इसी के मूल में 'कुण्डली' स्थित है । यह नाड़ी-समूह से घिरी हुई, अपनी पूँछ
को मुख में डालकर सुषुम्णा छिद्र को घेरे हुए साढ़े तीन वलयों में स्थित है ।४
यह 'नागोपमा, सुप्ता, स्फुरन्ती, अहिवत संधिसंस्थाना, वाग्देवी एवं बीजसंज्ञका'
है ।५ यह 'स्वर्णभास्वरा, गुणत्रय प्रसूति का विष्णु शक्ति कुण्डली, 'कामबीज'
समन्वित इस योनिमण्डल में अधिष्ठित है । योनिमण्डल में स्थित यह 'कामबीज'
स्वच्छ स्वर्ण के समान है तथा इस बीज से सुषुम्ना भी जुड़ी है । यह 'कामबीज'
शरद ऋतु के चन्द्रमा के समान तेजवान, सूर्यकोटि प्रतीकाश एवं चन्द्रकोटि
सुशीतल है ।६ तेज, सूर्य एवं चन्द्र तीनों मिलकर यह 'कामबीज' 'त्रिपुरभैरवी' की
संज्ञा प्राप्त किए हैं । 'एतत्तत्रयंमिलित्वैव देवी त्रिपुरभैरवी ॥'७ यह 'कामबीज'
अग्निशिखावत है, सूक्ष्म है, क्रिया शक्ति एवं विज्ञानशक्ति के साथ यह 'काम बीज'
देह में ऊर्ध्व दिशा में एवं कभी नीचे, सदा घूमता रहता है (कभी लिङ्ग सलिल में
प्रविष्ट हो जाता है ।) इसी को 'आधार पद्म' कहते हैं एवं इसी के मूल में
'योनि' स्थित है—'आधारपद्ममेतद्वियोनिर्यस्यास्ति कंदतः ।' तेज (अग्नि) सूर्य एवं
चन्द्रमा लं, खं एवं ठं—ये तीनों एकत्रित होकर 'त्रिपुरभैरवी' देवी 'कामबीज' नाम
प्राप्त करके मूलाधार में स्थित हो गई हैं ।
'आधारपद्म' कुल संज्ञक है काञ्चनवर्ण है, स्वयंभूलिङ्ग से अधिष्ठित है । इस
पद्म में 'द्विरण्ड' नामक सिद्धलिङ्ग एवं डाकिनी देवी भी स्थित हैं । इसी पद्म की
भीतर की कली (कर्णिका) में 'योनिमण्डल' है जिसमें कि कुण्डलिनी स्थित है एवं
जिसके ऊर्ध्वदेश में दीप्तिमान एवं तेजःस्वरूप 'कामबीज' दमक रहा है—'तस्या
ऊर्ध्वं स्फुरतेजः कामबीजं भ्रमन्मतम् ॥'८
इडा (चन्द्रमा)—पिङ्गला (सूर्य) के मध्य सुषुम्णा (अग्नि) स्थित है । इन
तीनों के मध्य चित्रानाड़ी है । इसके मध्य में ही सूक्ष्मातिसूक्ष्मब्रह्मरंध्र है । यह
'सुषुम्ना मध्यचारिणी, पञ्चवर्णोज्ज्वला, विशुद्धा, अमृतानन्ददायिनी एवं दिव्यमार्ग-
स्वरूपा 'चित्रा' नाड़ी ध्यान मात्र से पापराशि नष्ट कर देती है तथा इसी के मध्य
में ब्रह्मरंध्र है जिसमें कुण्डली यात्रा करती है ।९
मेरूदण्ड के बाहर वामभाग में इड़ा (शशि) एवं दक्षिण भाग में पिङ्गला
(सूर्य) स्थित है किन्तु मेरूदण्ड के मध्य में 'त्रितयगुणमयी चन्द्रसूर्याग्निरूपा'
सुषुम्णा स्थित है और सुषुम्णा के मध्य 'वज्रा', 'वज्रा' के मध्य 'चित्रीणी' और
उसके मध्य में 'ब्रह्मनाड़ी' स्थित है ।१० इसके मुख में ही 'ब्रह्मद्वार' है । (इसी
१-९. शिवसंहिता
१०. षट्चक्रनिरूपण
१४४ वरिवस्यारहस्ये
ब्रह्मद्वार को ढके हुए कुण्डलिनी स्थित है ।) 'कन्द' (गुदा से ऊपर एवं लिंग से
नीचे जो कन्द है) वहीं सुषुम्णा भी स्थित है । उसी सुषुम्णा में अधोमुख, चतुर्दल
युक्त, लाल, व, श, ष, स वर्णों से अंकित कमल-दलों वाला मूलाधार पद्म है ।
मूलाधार चतुष्कोण चक्र है ।१ इस पद्म की कर्णिका में चतुष्कोण पृथ्वीमण्डल है ।
पृथ्वीमण्डल की आठों दिशाओं में सुदीप्त अष्टशूल हैं । पृथ्वीमण्डल एवं इस
मण्डल का बीज दोनों पीले हैं । बीज के मध्य स्थित इन्द्र भी पीले हैं । ये
वज्रपाणि हैं । यहाँ स्थित ऐरावत पर प्रातःकालीन सूर्यवत् ब्रह्मा स्थित हैं जो कि
चारों वेद, दण्ड, कमण्डल, अक्षसूत्र एवं अभयमुद्रा हाँथों में धारण किए हैं ।
'वज्रा' के मुख में स्थित कर्णिका में स्थित 'त्रिकोण' ('कामरूप') एवं 'त्रैपुर' जो
विद्युतवद है । यहाँ सर्वत्र 'कन्दर्पवायु' (अपानवायु का एक रूप) है जो कि
बंधुजीव की भाँति लाल, कोटिसूर्य प्रतीकाश एवं जीवेश है । 'त्रिकोण' के मध्य में
'स्वयंभूलिङ्ग' स्थित है जो कि पिघले सोने की भाँति सुन्दर है और निम्नाभिमुखी
है । यह ज्ञान एवं ध्यान से प्रकट होता है और नई पत्ती के रङ्ग-रूप का है । यह
विद्युत की शीतल किरणों एवं पूर्णचन्द्र के समान सुन्दर है ।२ (यह
कामबीज-परिचालित है ।) 'शाक्तानन्द तरङ्गिणी' के अनुसार यह श्यामवर्ण का है ।
उसके ऊपर बिसतन्तुसूक्ष्मा, जगन्मोहिनी, ब्रह्मद्वार के मुख को स्वमुख से ढककर
उस पर सोने वाली, नवीन चपलाकारा, शङ्खावर्तनिभा, सर्पसमा, शिवोपरिस्थिता,
मतवाले भ्रमरों के समान कूजन करने वाली, कोमलकाव्य का सृजन करने वाली,
श्वासोच्छ्वास द्वारा समस्त प्राणियों का पालन करने वाली, प्रोद्दाम दीप्तावलि के
समान दीप्तिमती वह कुण्डली मूलाम्बुज गह्वर में स्थित है । (कुण्डलिनी में
'परावाक्' स्थित है ।)३ कुण्डलिनी के ऊपर एक सीधे सूत्र के समान 'पराशक्ति'
विद्यमान है । वह नित्य प्रबोधोदया, सूक्ष्मातिसूक्ष्मा, नित्यानन्दपरम्परातिविगलत्पीयूष
धाराधरा श्रीपरमेश्वरी रूप 'पराशक्ति' परमा कला है ।४
(ख) 'अनाहत चक्र'५—स्थान—हृदय । भूषण—दिव्यलिङ्ग से भूषित ।
वर्ण—क से ठ पर्यन्त द्वादश वर्ण । वायु—इस पद्म में अनादिकर्म-संसृष्ट,
अहङ्कारोपेत, अनेक वासना-पंकिल 'प्राणवायु' स्थित है । दल = १२ । इस पद्म
का नामान्तर६ प्रसादस्थान (प्रसाद का स्थान = प्रसन्न लो) बीज = वायु बीज 'यं' ।
लिङ्ग = परम तेजःस्वरूप 'बाणलिङ्ग' । पिनाकी सिद्धलिङ्गा देवी = काकिनी ।७
ध्यान-फल—कामिनी वशीकरण, दूरदर्शन, दूरश्रवण, आकाश में स्वेच्छा सञ्चरण,
देवों-योगिनियों के दर्शन, खेचरी-सिद्धि, भूचरी-सिद्धि ।।८ रङ्ग = बंधूककान्त्युज्ज्वल ।
वायु = धूम्रवर्ण का ।। कोण = छः । (मध्य में जो वायुमण्डल है उसमें
बीज-स्थिति है । मण्डल का रङ्ग = धूम्रावली धूसर ।।९) देवी = काकिनी जो
त्रिनेत्रा हैं, सर्वालङ्कारभूषिता, नवतडितवतपीता है और कङ्कालमालाधरा हैं । त्रिकोण
= पद्म-कर्णिका में कोटि विद्युतप्रभान्वित त्रिकोण । लिङ्ग—त्रिकोण में चमकते सोने
१-४. षट्चक्रनिरूपण ५-८. शिवसंहिता
९. षट्चक्रनिरूपण