वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽंशः १२९
पुरुषबिन्दु' एवं (४) 'रक्त स्त्रीबिन्दु' (जिसमें दो उत्पादक शक्तियों का योग होता
है) जब ये चारों तत्व मिलते हैं तब 'कामकला' का रूप धारण करते हैं और तभी
वागर्थमय सृष्टि का समारंभ होता है ।
शास्त्रकारों का कथन है कि जब स्त्रीतत्त्व 'बिन्दु' में प्रथम बार प्रविष्ट होता है
तब नाद के साथ 'हार्धकला' नामक एक अन्य तत्त्व भी विकसित होता है ।
ग्रन्थांतर में कहा गया है कि पराशक्ति का ही अभिधान है—'कामकला' । 'सूर्य'
(संयुक्त बिन्दु) उसका मुख है । 'अग्नि' एवं 'चन्द्र' (रक्तबिन्दु एवं श्वेत बिन्दु)
उसके पयोधर हैं और 'हार्धकला' उसकी योनि है जिससे कि सृष्टि का समारंभ
होता है । वह सृष्टि-विधात्री देवी समस्त देवताओं में उच्चतमा है और वही 'परा',
'ललिता', 'भट्टारिका', 'पराभट्टारिका' एवं त्रिपुरसुन्दरी कहलाती है ।
शिव 'अ' अक्षर एवं शक्ति 'ह' अक्षर है । यह 'ह' 'अर्धकला' कहलाता है ।
अतः उपर्युक्त स्त्रीतत्त्व या 'योनि' 'ह' के आकार का अर्धभाग (हार्धकला है। यह
अर्धकला या 'ह' शिव के प्रतीक 'अ' अक्षर से मिलकर 'कामकला' या
'त्रिपुरसुन्दरी' का प्रतीकात्मक रूप है जो शिव एवं शक्ति के संयोग का परिणाम
है। वह 'अहं' कहलाती है और स्वयमेव अहं से युक्त है । इसी कारण उसका
समस्त विकास (समस्त सृष्टि) अहङ्कारयुक्त है । समस्त आत्माएँ इसी 'त्रिपुरसुन्दरी'
की रूपमात्र हैं । जब आत्मायें देवी-चक्रों के साथ कामकलाविव्या एवं ज्ञान का
अभ्यास कर लेती हैं तब वे स्वयमेव 'त्रिपुरसुन्दरी' हो जाती हैं । त्रिपुरसुन्दरी से ही
समस्त शब्द (सम्पूर्ण वाक्) एवं उनके अर्थ (जगत् एवं समस्त जागतिक पदार्थ या
तत्व) उत्पन्न होते हैं । यह त्रिपुरादेवी ही पराशक्ति है । 'अहंदेवी न चान्योस्मि' की
भावना एवं त्रिपुरादेवी के रूप में आत्मरूपान्तरण ही शाक्तों की साधना एवं साधना
की चरम परिणति है ।
तांत्रिक दर्शन में शिव को 'प्रकाश' एवं शक्ति को 'विमर्श' कहा जाता है ।
प्रकाश का विमर्श के साथ संयोग होने पर ही जगत् की सृष्टि होती है । इस
संयोग की नारी एवं पुरुष के संयोग की उपमा दी गई है । जिस प्रकार स्त्री एवं
पुरुष के संयोग से मैथुनी सृष्टि होती है उसी प्रकार 'प्रकाश' (शिव) एवं 'विमर्श'
(शक्ति) के संयोग से 'बिन्दु' का जन्म होता है 'बिन्दु' शिवशक्ति के एकीकरण,
मिलन या संयुक्तावस्था, युगनद्धावस्था का द्योतक है । 'बिन्दु' की अवस्था में शक्ति
एवं शिव दोनों में सामरस्य रहता है और इसी अवस्था को 'स्वायंभूलिङ्ग' पद
अभिव्यंजित करता है । शक्ति एवं शिव के इस सामरस्य या समागम को 'कामरूप
पीठ' की आख्या दी गई है । कविराज जी ने ठीक ही कहा है कि 'प्रकाश' एवं
'विमर्श' सर्वातीता शक्ति के रूपद्वय हैं । उपनिषदों का परब्रह्म शैव-शाक्त दर्शन में
'परमशिव' कहलाता है और इस 'परमशिव' की शक्ति 'सर्वातीता शक्ति' कहलाती
है । शिव एवं क्रियाशक्तिरूपा विमर्शशक्ति उस सर्वातीत शक्ति के दो रूप हैं ।
अतः 'परमशिव' विश्वोत्तीर्ण अवस्था का अभिवयञ्जक है । शिव (प्रकाश) को
'अम्बिका शक्ति' एवं शक्ति (विमर्श) को 'शान्ता' भी कहा जाता है । इनके
९ वरि.