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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 232, कुल 530 में से

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पृष्ठ 232

१३० वरिवस्यारहस्ये
सामरस्य के अनन्तर 'वामा' (इच्छा) 'ज्येष्ठा' (ज्ञान) एवं 'रौद्री' (क्रिया) शक्तियों
का विकास होता है ।
परिभाषिक शब्दावली में इन्हीं का नामान्त है—'पूर्णगिरि पीठ' 'जालंधर पीठ'
एवं उड्डीयान पीठ' । ये ही 'पश्यन्ती' 'मध्यमा' एवं 'वैखरी' वाक् की स्थितियाँ
भी हैं । इन सबसे परे हैं—सर्वातीता शक्ति या 'परावाक्' ।
उपर्युक्त प्रकाशबिन्दु जब 'विमर्शबिन्दु' में प्रविष्ट होता है तब 'बिन्दु' में
उच्छूनता (Swelling) आती है और इसके परिणामस्वरूप बिन्दु से 'नाद' का
उदय होता है । इसी 'नाद' में समस्त 'तत्त्व' समाहित रहते हैं । यही नाद
व्यक्तावस्था में 'त्रिकोण' रूप धारण करता है । त्रिकोण का एक कोण (एक बिन्दु)
'प्रकाश' है, दूसरा 'बिन्दु' 'विमर्श' है एवं इन दोनों के संयोग से 'रवि' या 'काम'
नामक 'मिश्रबिन्दु' व्यक्त होता है । 'अग्नि' एवं 'सोम' इसी 'काम' की 'कला' के
रूप में गृहीत हैं । इस प्रकार 'कामकला' शब्द से 'प्रकाश' एवं 'विमर्श' तथा
'काम' या 'रवि'—इन तीनों का द्योतन होता है । त्रिकोणात्मक पद्धति द्वारा
सृष्टि-विकास की यही अवधारणा 'कामकला' द्वारा प्रतिपादित की गई है । तांत्रिक
दर्शन में प्रत्येक देवता के मूल तत्व के संधान में लिङ्गयोन्यात्मक त्रिकोण में स्थित
'मध्यबिन्दु' की स्थिति प्रतिपादित की गई है । यही कारण है कि तांत्रिक दर्शन में
भोग एवं मोक्ष दोनों को एक ही प्रक्रिया द्वारा निरूपित किया गया है ।
त्रिकोणात्मक अभिव्यक्ति के मध्य मध्यबिन्दु में दिव्य मिथुन (शिव-शक्ति) का
शृङ्गारादिक विलास चलता रहता है ।
'हंस' ही त्रिकोणात्मक 'कामकला' है । 'कामकला' मन्त्रों का मूल तत्व है ।
तांत्रिक समाम्नाय में शब्दब्रह्म अपनी शक्तियों एवं त्रिविधात्मक पक्षों सहित जिस
स्वरूप का प्रतिनिधित्व करता है और जिसे “अबलालयम्” (शक्ति का गृह) कहा
गया है—वही 'कामकला' के नाम से प्रसिद्ध है । 'कामकला' सर्वोच्च त्रिकोण है ।
त्रिकोण के द्वारा देवी को इसलिए व्यक्त किया जाता है क्योंकि इसकी अभिव्यक्ति
की दिशायें भी तीन हैं जो निम्न हैं—(१) इच्छा (२) क्रिया (३) ज्ञान ॥
'कामकला' की वास्तविक प्रकृति या स्वरूप—'कामकलाविलास' में
'पराशक्ति अंकुराकारा है और उसने शिव-शक्ति के सामरस्य से विस्तार प्राप्त किया
है ।' इस श्लोक से प्रारम्भ करके-काम का अर्थ है इच्छा—मध्यस्थ दो बिन्दु सूर्य
एवं चन्द्रमा का प्रतिनिधित्व करते हैं । इस श्लोक के अन्ततक कामकला को बहुत
सुचारु रूप से समझाया गया है । 'कामकला' तत्व के अन्तर्गत बिन्दुत्रय का
विवरण है ।
शक्ति का परमधाम 'कामकला' कहलाता है । सहस्रार में स्थित द्वादशदल
संयुक्त श्वेतपद्म में शक्ति का निवास है और इसे 'कामकला'-कहा जाता है । अकार
रूप 'प्रकाश' के साथ हकार रूप विमर्श का (अग्नि के साथ सोम का) साम्यभाव
ही 'काम' या 'रवि' कहलाता है शास्त्रोक्त 'अग्निषोमात्मक बिन्दु' यही है ।