वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽंशः १२७
“वरिवस्यारहस्यम्” में भास्करराय ने इन्हीं तथ्यों को इस प्रकार प्रस्तुत किया
है—'अहकारौ शिवशक्ति शून्याकारौ परस्पराश्लिष्टौ । स्फुरणप्रकाशरूपा वुपनिषदुक्तं
परं ब्रह्म । विश्वसिसृक्षावशतः स्वार्था शक्तिं विलोकयद्ब्रह्म । बिन्दू भवति तमिन्दुं
प्रविशति शक्तिस्तु रक्तबिन्दुतया । एतत्पिण्ड द्वितयं विसर्गद्वयं हकार चैतन्यम् मिश्रस्तु
तत्समष्टिः कामाख्यो रविरकार चैतन्यम् । एषाहम्पदतुर्यस्वर कामकलादिशब्दनिर्देश्या ।
वागर्थसृष्टिबीजं तेनाहन्तामयं विश्वम् ।।'१
अहन्तामय त्रिबिन्दुत्तत्त्वस्वरूप वर्णात्मा 'कामकला' त्रिगुणात्मक त्रिकोणरूप में
परिणत होकर जगज्जननी बनती है—"एवं कामकलात्मा त्रिबिन्दुत्तत्त्वस्वरूप वर्णमयी ।
सेयंन्त्रिकत्रिकोणरूपं याताः त्रिगुण स्वरूपिणी माता ।।'२ यह मिश्र, शुक्ल एवं
आरक्त त्रिबिन्दु से युक्त सिंघाड़े के आकार का सुरम्य त्रिकोण है । इसे ही प्रणव
भी कहा गया है—बिन्दुत्रयात्मकं स्वात्मशृङ्गारं विद्धि सुन्दरम् । मिश्र शुक्लं च रक्तं
च पुराणं प्रणवात्मकम् ।।'३ काम कलाक्षर बिन्दुत्रयात्मक है । ये तीन बिन्दु हैं—
(१) सूर्य (२) सोम (३) अग्नि । सोम-सूर्य-अग्नि अकार-उकार-मकार से एकरूप
हैं ।—'कामकलाक्षरस्य बिन्दुत्रयात्मकत्वेन बिन्दुत्रयस्य सूर्य सोमाग्नित्वेन, सोमसूर्याग्नी
नाम कारोकारमकारात्मता सर्वत्रागमेषु दृष्टेत्येत्सर्वं त्रिकात्मकं कामकलाक्षरे विश्रान्तमिति
प्रणवेनापि कामकलाक्षरमेव गीयते ।।'४
भास्करराय द्वारा 'सेतुबंध' में वर्णित् कामकला के स्वरूप को अमृतानन्द ने
'दीपिका' में स्वीकार नहीं किया है ।
भास्करराय एवं अमृतानन्द की दृष्टियों में भेद—भास्करराय ने 'बिन्दुं सङ्कल्प
वक्त्रं तु' (नित्याषोडशिकार्णव १। विश्राम । श्लोक २०१) की व्याख्या करते हुए
इसे भिन्न रूप में दिखाते हुए कहा है कि—"ऊर्ध्व कामाख्यो बिदुरेकः
तदधोग्नीषोमात्मक बिन्दुद्वितयरूपोन्यः । तदधो हकारार्धरूपः कलाख्य स्तृतीयः तदिदं
प्रत्याहारन्याद्येनकामकलेत्युच्यते ।।''
“मध्यबिन्दुः ऊर्ध्वबिन्दुः अकारहकारसामरस्यरूपः । कामाख्यः । तदुक्तं
कामकला विलासे—बिन्दुरहङ्कारात्मा रविरेतन्मिथुन समरसाकारः । मुखं बिन्दुं कृत्वा
कुचयुगमधस्तस्य तदधोहरार्धं ध्यायेद्यो हममहिषि ते मन्मथ कलाम् ।।'५ तुरीयबिन्दु
ही अतितुर्य तत्त्व है ।
हकाररूपा शक्ति ही 'कला' कहलाती है—"हकार रूपा शक्तिरेव च
कलेत्युच्यते ।।'६ 'हकारोऽन्यः कला रूपः ।।'७ सेयं 'कामकला' भवति ।। काम
विशिष्टा कलेति मध्यम पदलोपी समाप्त' कामश्चासौ कला चेति कर्मधारयो वा ।।८
१. वरिवस्यारहस्यम् (६९-७२) २-३. कामकलाविलास
४. त्रिपुरामहिम्नस्तोत्र टीका ५. सौन्दर्यलहरी
६. सेतुबन्ध ७. संकेत पद्धति
८. सेतुबन्ध