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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 234, कुल 530 में से

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पृष्ठ 234

१३२ वरिवस्यारहस्ये
करनी चाहिए और फिर यह कल्पना करनी चाहिए कि एक षोडशवर्षीया कन्या
इससे उदित हो रही है जो कि लाखों नवोदित सूर्यों के प्रकाश से प्रकाशित है ।
यह भी कल्पना करनी चाहिए कि उसका मुकुट से कण्ठ तक का शरीरावयव ऊर्ध्व
बिन्दु से एवं स्तनद्वय तथा त्रिवली बिन्दुद्वय से उत्पन्न हो रहे हैं । फिर यह
कल्पना करनी चाहिए कि शेष शरीर (जननेन्द्रिय से पादपर्यन्त का शेष भाग)
'काम' से उत्पन्न हो रहा है । इस प्रकार पूर्ण शरीर के निर्मित हो जाने पर उसे
समस्त आभूषणों एवं परिधानों से समलंकृत रूप में स्थित शक्ति के रूप में सोचना
चाहिए । इसके बाद साधक को कल्पना करनी चाहिए कि मेरा शरीर भी
'कामकला' से अभिन्न है ।' 'श्रीक्रम' नामक ग्रन्थ में इसके स्वरूप के चिन्तन के
विषय में इस प्रकार निर्देश दिया गया है । 'ओ देवों की शासिका देवी ! इन तीन
बिन्दुओं में से प्रथम को उसका 'मुख' और शेष दो बिन्दुओं को उसके पयोधर
द्वय के रूप में चिन्तित करना चाहिए और हार्धकला को उसकी योनि में कल्पना
करनी चाहिए ॥'
'त्रैपुरत्रिकोण' मूलाधार में 'कामकला' का स्थूल पक्ष है ।
आदिविद्यातत्व का आदि वाग्भव कूट 'कादि' है जबकि द्वितीय कामकला
युक्त हादिमत है । (त्रिपुरातापि०) परमात्मा का उजृंभण कामकलामय है—
“कामकलामयं जात इत्यनेन परमात्मनोज्जृंभणम् ।।' (त्रिपुरातापि०)
'त्रिपुरातापिन्योपनिषद' में 'कामकला चक्र' का इस प्रकार विवेचन किया
गया है—“अथातः कामकला भूतं चक्रं व्याख्यास्यामो । क्लीं मैं ब्लूं स्त्रौं एते पञ्च
कामाः सर्वचक्रंव्याप्त वर्तन्ते ।।" आदि ।
'मूलमन्त्रात्मिका' शब्द का प्रयोग देवी के लिए किए जाने पर यह उसके
सूक्ष्म शरीर को सङ्केतित करता है जिसे 'कामकला' कहा जाता है ।
कामबीज एवं त्रिपुर भैरवी—शिवसंहिताकार का मत—जिस स्थान पर
कुण्डलिनी देवी अधिष्ठित हैं इसी योनिमण्डल में बंधूक (गुलदुपहरिया) के पुष्प के
समान 'कामबीज' विद्यमान है । इस बीज का स्वच्छ स्वर्ण के समान रूप में
स्मरण करना चाहिए । 'तत्र बंधूक पुष्पाभं कामबीज प्रकीर्तितम् ।' इसी बीज से
सुषुम्ना नाड़ी संश्लिष्ट है । यह बीज शरदऋतु के चन्द्रमा के समान प्रभा से
मण्डित, तेजस्वरूप, करोड़ों सूर्यों के समान चमकता हुआ एवं करोड़ों चन्द्रों के
समान सुशीतल है । तेज, सूर्य एवं चन्द्र इन तीनों के मिलने से इस बीज की
संज्ञा “त्रिपुरभैरवी” है । यह 'कामबीज' अग्नि की शिखा के समान रूप वाला
है । यह सूक्ष्म है और उसमें योनिस्थित परमतेजस्वरूप स्वयंभूलिङ्ग स्थित है । यह
'कामबीज' क्रियाशक्ति एवं विज्ञानशक्ति के साथ मिलकर देह में विचरण करता है,
कभी ऊर्ध्वगामी होता है और कभी लिङ्गांतर्गत सलिल में प्रविष्ट हो जाता है ।
मूलाधार पद्म की भीतरी कली में योनिमण्डल है । इस योनि में कुण्डलिनी निवास
करती है । इसके ऊपर दीप्तिमान तेजःस्वरूप 'कामबीज' जगमगा रहा है—