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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 235, कुल 530 में से

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पृष्ठ 235

प्रथमोऽंशः १३३
“सुषुम्नापि च संश्लिष्टा बीजं तन्त्र परं स्थितम् ।
शरच्चन्द्रनिभं तेजस्त्रयमेतत् स्फुरत् स्थितम् ॥
सूर्यकोटि प्रतीकाशं चन्द्रकोटि सुशीतलम् ।
एतत्रयं मिलित्वैव देवी त्रिपुरभैरवी ।
बीजसंज्ञं परं तेजस्तदेवं परिकीर्तितम् ॥
तत्पद्ममध्यगा योनिस्त्र कुण्डलिनी स्थिता ।
तस्या ऊर्ध्वे स्फुरत्तेजः कामबीजं भ्रमन्मतम् ॥”
षट्चक्रनिरूपणकार ने “त्रैपुरत्रिकोण” एव ‘कंदर्पवायु’ का विवरण इस
प्रकार दिया है ।
“वज्राख्या वक्त्रदेशे विलसति सततं कर्णिकामध्यसंस्थं ।
कोणं तत् त्रैपुराख्यं तड़िदिव विलसत् कोमलं कामरूपम् ॥
कन्दर्पोनाम वायुर्निवसति सततं तस्य मध्ये समन्तात् ।
जीवेशो बंधु जीव प्रकरमभिहसन् कोटि सूर्यप्रकाशः ॥”
वज्रानाड़ी के मुखप्रदेश में जो कर्णिका है उसके मध्य में ‘त्रैपुरत्रिकोण’
स्थित है और त्रिकोण के मध्य में ‘कामबीज’ स्थित है । त्रिकोण के भीतर
‘कंदर्प’ नामक वायु भी स्थित है । ‘शाक्तानन्द तरंगिणी’ में कहा गया है कि
मूलाधार पद्म की कर्णिका में ‘परमेश्वरी कामाख्या योनि’ स्थित है । यह योनि
इच्छा-ज्ञान एवं क्रियाशक्ति से युक्त है । इसी आधारचक्र के मध्य में (त्रिकोण यंत्र
में) ‘अपर’ नामक ‘कन्दर्प’ स्थित है । उसी में स्वयंभूलिङ्ग पश्चिमाभिमुख होकर
स्थित है ।
विपरीत रति—शाक्तगण सृष्टि की विवेचना के प्रसङ्ग में मिथुन परक् भाषा
का प्रयोग तो करते ही हैं साथ ही साथ विपरीत रति का भी प्रतिपादन करते हैं ।
परब्रह्म मूलतः निश्चेष्ट एवं निस्पंद है ।- केवल शक्ति ही सक्रिय होकर शब्दब्रह्म को
उत्पन्न करती है अतः महाकाल एवं महाकाली की विपरीत रति का (जिसमें
महाकाल निश्चेष्ट एवं महाकाली सचेष्ट रहती है) शाक्तागम में शृङ्गारिक विवेचन
किया गया है । तन्त्रग्रन्थों में कुण्डलिनी को ‘महामातृका सुन्दरी’ कहा गया है और
मूलाधार से प्रस्थान करके सहस्रारस्थ पति के ऊपर उस आरोहण का शृङ्गारपूर्ण
वर्णन किया गया है ।
इसी विपरीत रति को बोधित कराने के लिए ‘बिन्दु’ शब्द का प्रयोग किया
गया है और कहा गया है कि ‘बिन्दु’ प्रकृति या महाशक्ति के गर्भ में पालित होकर
कुण्डली के रूप में प्रकट होता है । यहाँ ‘बिन्दु’ शुक्र का प्रतिरूप है ।
शाक्त तन्त्रों में स्त्री-पुरुष के रति कर्म के माध्यम से कुण्डलिनी योग का
निरूपण किया गया है । जिस प्रकार की कोई रमणी किसी राजमार्ग पर अभिसार
के लिए चलती हुई किसी गुप्तस्थान में अपने प्रियतम से मिलती है और आलिङ्गन