वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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के उपरान्त अमृत (रजस्) गिराती है उसी प्रकार कुण्डलिनी शक्ति सुषुम्ना के
राजमार्ग पर अभिसार के लिए चलकर चक्रों के गुप्तस्थानों में प्रियतम के विभिन्न
रूपों (शिवलिङ्गों) से मिलती हुई सहस्रार में परम प्रियतम (परशिव) से आलिंगित
होकर अमृत गिराती है ।
“लाक्षाभं परमामृतं परशिवात् पीत्वा ततः कुण्डली ।
नित्यानन्द महोदयात् कुलपथान्मूले विशेत् सुन्दरी ॥
तद्दि्वव्यामृतधारया स्थिरमतिः सन्तर्पयेद्दैवतं ।
योगी योग परम्परा विदितया ब्रह्माण्डभाण्डेस्थितम् ॥”
‘देवीपुराण’ में कुण्डलिनी को ‘शृङ्गारक’ के माध्यम से निरूपित करते हुए
कहा गया है कि जिस प्रकार स्त्री-पुरुष के मिलने पर पुरुष के भीतर अग्नि जागृत
हो उठती है उसी प्रकार कुण्डलिनी शक्ति के अपने प्रियतम से मिलने पर अग्नि
से चन्द्रमा द्रवित हो उठता है और अमृत टपकने लगता है ।
जिस प्रकार नर-नारी के सङ्घट्ट (मैथुन) से सन्तानोपत्ति होती है उसी प्रकार
शिवशक्ति के सङ्घट्ट (सामरस्य) द्वारा ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति होती है । इस
मध्यर्मंथकभाव में शक्ति मध्य एवं शक्तिमान् मंथक है । इसके द्वारा शक्ति इच्छा,
ज्ञान एवं क्रिया के रूप प्राप्त करती है । यही रूप त्रिकोण था, शृङ्गार (सिङ्घाड़ा)
द्वारा सङ्केतित है । यह ‘यामल’, ‘सङ्घट्ट’ या सामरस्य, ही सृष्टि का मूल कारण
हैं । जगत् में स्त्री-पुरुष का संयोग इसी पारमार्थिक यामल का पिण्डस्वरूप है ।
बौद्ध दार्शनिकों ने भी युगनद्धता के सिद्धान्त के प्रतिपादन द्वारा इसी तथ्य का
प्रतिपादन किया है ।
मूलाधार में ‘त्रैपुरत्रिकोण’ है जो कि सहस्रार के नीचे समस्त मन्त्रों का मूल
है । इसे ‘त्रैपुर’ इसलिए कहते हैं क्योंकि इस त्रिकोण में स्थित ‘क’ (काम बीज
का प्रथमाक्षर एवं प्रधान अक्षर) में देवी त्रिपुरा निवास करती हैं । ‘कं’ कामिनी-बीज
है और यह मूलाधार चक्र में त्रिपुरसुन्दरी की विद्यमानता का सङ्केतक है । यहाँ
‘वामा’ ‘ज्येष्ठा’ एवं ‘रौद्री’ (इच्छा-ज्ञान-क्रिया) तीन रेखायें हैं । त्रैपुर त्रिकोण
सहस्रार के नीचे ‘कामकला’ के रूप में स्थित सूक्ष्माशक्ति का स्थूल पक्ष है ।
कामतत्व—
“कामोस्मि भरतर्षभ” कहकर भगवान श्रीकृष्ण ने ‘गीता’ में काम का
दिव्यीकरण करते हुए उसको अपना स्वरूप घोषित किया है । ‘त्रिपुरातापिन्युपनिषद’
में ईश्वर को काम से अभिन्न स्वीकार किया गया है—‘स एष निरञ्जनोऽकामतवेनो-
र्जृंभते अ क च ट त प य शान् सृजते । तस्मादीश्वरः कामोऽभिधीयते ॥’—इस
परिभाषा से ‘काम’ ‘क’ को भी व्याप्त करता है—‘एतत् परिभाषया कामः ककारं
व्याप्नोति । काम एवेदं तत्तदिति ककारो गृह्यते ॥’१
१. त्रिपुराता०