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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 233, कुल 530 में से

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पृष्ठ 233

प्रथमोऽंशः १३१
'कालिकापुराण' में कहा गया है कि 'काम' द्वारा केवल देवी को द्योतित
किया जाता है। देवी को 'काम' इसलिए कहा गया है क्योंकि देवी कामेच्छावश
मेरे साथ नीले शिखरों वाले कैलास पर्वत के गुप्त स्थान में आई। उन्हें 'काम'
इसलिए भी कहा गया है क्योंकि वे इच्छा—इच्छाकर्ता, इच्छित एवं सुन्दर की पूर्ति
करती हैं, कामदेव (मन्मथ) के शरीर को संरक्षण देती हैं एवं काम के शरीर को
नष्ट भी करती हैं। इन्हीं कारणों से उन्हें 'काम' कहा जाता है।
निखिलप्रपञ्चगर्भा विमर्शशक्ति के संसर्ग से अक्षरस्वरूप 'प्रकाश' बिन्दुरूप
धारण करता है अर्थात् 'प्रकाश' विमर्शशक्ति में अनुप्रविष्ट होता है। इस बिन्दु का
नाम है- 'प्रकाशबिन्दु' (जो कि विमर्शशक्ति के गर्भ में स्थित रहता है।) इसके
उपरान्त विमर्शशक्ति भी प्रकाश बिन्दु में अनुप्रविष्ट होती है जिसके कारण गर्भस्थ
बिन्दु 'उच्छून' हो उठता है और उससे तेजोमम बीजस्वरूप 'नाद' उत्पन्न होता है,
(इस 'नाद' में समस्त तत्व सूक्ष्मरूप से निहित है)। नाद निर्गत होकर
त्रिकोणाकार रूप ग्रहण करता है। यही 'अहम्' संज्ञक बिन्दुनादात्मक प्रकाश-विमर्श
का कलेवर है। इसमें 'प्रकाश' शुक्लबिन्दु है एवं विमर्श रक्तबिन्दु है तथा दोनों
की पारस्परिक अनुप्रवेशात्मक समता 'मिश्रबिन्दु' है। इसी समता (साम्यभाव) का
नामान्तर है परमात्मा, 'रवि' या 'काम'। अग्नि एवं सोम इसी 'काम' की विशेष
कलायें हैं।
तांत्रिक समाम्नाय में सूर्य को 'कामतत्व' कहा गया है। 'कामाख्यों रविः॥'
इसी 'काम' की एक कला है—'अग्नि' एवं दूसरी कला है 'चन्द्र'। 'कामकला' के
बिन्दुत्रय ये ही हैं। सृष्टि एक ही महाशक्ति के दो विरुद्ध स्वरूपों की महाक्रीड़ा है
जो कि परस्पर विषम भाव ग्रहण करके परस्पर एक दूसरे के ऊपर क्रिया करने
लगती है इन दो शक्तियों में एक का नाम है—'अग्नि' एवं दूसरी का नाम है—
'सोम'॥ 'अग्नि' = तापमय, दुःखप्रद, मृत्युस्वरूप (क्योंकि काल अग्नि का ही
रूप है)। अविभक्त को विभक्त करके प्रकाशित करने वाला। 'सोम' = शीतली,
सुखप्रद, अमृतस्वरूप, विभक्त को अविभक्त करके प्रकाशित करने वाला॥ 'अग्नि'
= प्रकाशस्वरूप, अग्निक्रिया का नाम है—संहार। 'सोम' = विसर्गस्वरूप,
सोमक्रिया का नाम है सृष्टि।
अग्नि + सोम की साम्यावस्था—इस अवस्था में दोनों निष्क्रिय रहते हैं अतः
न सृष्टि होती है और न प्रलय। यही है नित्यस्थिति। इसी का नाम है 'रवि' या
'सूर्य'। सूर्य को ही 'कामतत्व' कहा गया है। यह अग्नि एवं नित्य, समरस,
अद्वय स्थिति है।
'कामकला' का ध्यान करते समय यह चिन्तन किया जाता है कि तीन
बिन्दु एवं 'हार्धकला' देवी त्रिपुरसुन्दरी का शरीर हैं। यह कल्पना की जाती है कि
त्रिपुरसुन्दरी के शरीर में तीन बिन्दु (इच्छा-ज्ञान-क्रिया; चन्द्र-अग्नि-सूर्य;
रजस्-तमस्-सत्व; एवं ब्रह्मा-रुद्र-विष्णु) स्थित हैं। योगिनी तन्त्र में इसकी
ध्यान-प्रक्रिया इस प्रकार बताई गई है—'कला के ऊपर तीन बिन्दुओं की कल्पना