वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽंशः १२५
त्वर्धमात्रकम् ॥—के अनुसार (१) 'ह्रस्व' एक मात्रक (२) 'दीर्घ' द्विमात्रक एवं
(३) 'प्लुत' त्रिमात्रक हुआ करता है । कालपरमाणु 'लव' कहलाता है—
'कालपरमाणुर्लव इत्युच्यते ॥' किसी कमल पुष्प को सुई से छेदने में उसके
प्रत्येक दल को छेदे जाने में जितना समय लगता है उस वेधन-काल को 'लव'
कहते हैं—"नलिनीपत्र संहत्याः सूक्ष्मसूच्यभिवेदने । दले-दले तु यः कालः स कालो
लवसंज्ञितः । अतः सूक्ष्मतमः कालो नोपलब्ध्यो भृगूद्वह ॥" इस गणना के अनुसार
२५६ लवों की एक मात्रा होती है । षट्पञ्चाशदुत्तर शतद्वयलवैरेका मात्रा ।'१
हकारादिबिन्द्वन्त स्थूल वर्णों का उच्चारण-काल 'मात्रा' कहलाता है—
हकारादिबिन्द्वन्तानां स्थूलवर्णानामुच्चारण कालो मात्रा । बिन्द्वादि समनान्त का
उच्चारण काल अर्धमात्रा है । जो ह्रस्व, दीर्घ एवं प्लुत तीनों नहीं है किन्तु व्यञ्जन
है उसकी काल-मात्रा अर्धमात्रा है—'व्यञ्जनं चार्धमात्रकम् ॥' हलन्त व्यञ्जन की
उच्चारण मात्रा अर्धमात्रा है । मात्रा-विभाग की चरम सीमा १।५१२ है । मन के
ऊर्ध्वारोहण में काल-मात्रा क्षीण होती जाती है । काल की सूक्ष्मतम मात्रा (चरम
मात्रा) १।२५६ या १।५१२ है । बिन्दु में अर्धमात्रा है एवं उसके बाद १।४ मात्रा
एवं उसके बाद १।८ आदि । 'अर्धमात्रा' बिन्दु के ही वेग की मात्रा है ।
'कामकला'—"इति कामकला विद्या देवीचक्रमात्मिका सेयम् । विदिता येन
समुक्तौ भवति महात्रिपुरसुन्दरी रूपः ।२
- कामकला का स्वरूप *
सूर्य
मुख →
शृङ्गार
अग्नि → स्तन चन्द्र ← स्तन
हार्द्धकला
↑
योनि
१. प्रकाश २. कामकलाविलास (पुण्यानन्दनाथ)