वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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'कामकला' का स्वरूप तत्व—सृष्टि की पहली अवस्था है । सृष्टि (१) भेद
प्रधान = 'आणवविसर्ग' (२) भेदाभेद प्रधान एवं = 'शाक्त विसर्ग' (३) अभेद
प्रधान = 'शांभव विसर्ग'—स्थूल, सूक्ष्म एवं सूक्ष्माति सूक्ष्म तीन प्रकार की है ।
शैवविसर्ग में न भेद रहता है और न तो भेदाभेद । इसमें विश्व भी नहीं रहता ।
यह आनन्दात्मक अभेदावस्था है । इस स्थिति में चित्त प्रलीन रहता है । केवल
संवित् या चैतन्य विद्यमान रहता है । विसर्ग शक्ति अखण्ड प्रकाश की पराशक्ति है
और इसे 'कामकला' के नाम से पुकारा जा सकता है । १ इच्छा जब बहिर्मुख
होती है तब उसे 'विसर्ग' कहते हैं । इसके बहिर्मुख होने का कारण है—
'क्षोभ' । क्षोभजन्य विसर्ग से उपहित शक्ति 'कामकला' है ।
सूर्य या काम एक ही वस्तु है । अग्नि और सोम का यह सामरस्य नित्य
सामरस्य है । सूर्य में ही अग्निशक्ति एवं सोमशक्ति दोनों हैं । अग्निशक्ति के द्वारा
ध्वंस कार्य एवं सोमशक्ति के द्वारा सृष्टि-कार्य होता है । 'कामकला' का प्रधान
बिन्दु ही रवि या सूर्य है । सृष्टि 'कामकला' का ही कार्य है इसीलिए ऋषियों ने
विश्व-सृष्टि के मूल में 'कामकला' का ही कार्य है । इसीलिए ऋषियों ने विश्व-सृष्टि
के मूल में 'कामकला' की क्रिया देखी थी । आत्मा ही 'परासंवित्', 'परमाशिव'
पूर्णतम सत्ता है—इन दोनों के सामरस्य से ही 'कामकला' का विकास होता है ।
'काम' नामक बिन्दु, 'विसर्ग' एवं 'हार्धकला' ('काम' नामक बिन्दु =
संमिश्रित बिन्दु । 'विसर्ग' = शोण एवं सित बिन्दु द्वय । 'हार्धकला' = अभिवृद्ध
रूप)—इन तीन अवयवों से युक्त एक अखण्ड पदार्थ 'कामकला' कहलाता है ।
यही है सम्पूर्ण सृष्टि का बीज ।
प्रकाश रूप अहमात्मक बिन्दु—इच्छा, ज्ञान, क्रिया रूप मातृत्रयात्मक अनन्त
सृष्टि । यथा सूर्याभिमुख दर्पण में, अन्तः प्रविष्ट रश्मियों द्वारा दोनों ओर से प्राप्त
किरणों के मिलन से, भित्ति पर तेजोबिन्दु विशेष उत्पन्न हो जाता है उसी प्रकार
प्राणियों के अदृष्टवश अपने में उपसंहृत सिसृक्षा से 'प्रकाश' रूप ब्रह्म अपनी
शक्ति के दर्शनार्थ अभिमुख होकर उसके अन्तराल में तेज रूप से प्रविष्ट होकर
'शुक्ल बिन्दु' बन जाता है । फिर शुक्ल बिन्दु में रक्तरूप शक्ति प्रविष्ट होती है ।
इससे संमिश्रित बिन्दु विकसित होता है । यही 'हार्धकला' कहलाता है । यह बिन्दु
(शिवशक्ति सामरस्य नामक अग्नीषोमात्मक) काम या 'रवि' कहलाता है । व्यष्टि
रूप में ये दो हैं—(१) शुक्ल बिन्दु = चन्द्र (२) रक्त बिन्दु = अग्नि । इस
बिन्दुद्वय को ही 'विसर्ग' कहते हैं । समष्टि बिन्दु ही रवि हैं । सारांश—काम
नामक बिन्दु, विसर्ग एवं हार्धकला—इन ३ अवयवों से युक्त अखण्ड पदार्थ ही
'कामकला' है । 'कामकला' में प्रथम तुरीय बिन्दु, उसके नीचे विसर्गाख्य बिन्दुद्वय
एवं उसके नीचे 'हार्धकला' स्थित है तुरीय एवं विसर्ग के मध्य में स्थित 'काम' ही
मध्य बिन्दु है । काम एवं विसर्ग के अन्तर्गत चैतन्य रूप से अकार एवं हकार
स्थित हैं । 'कामकला' अकार एवं हकार की एक स्वरूपता में स्थित है ।
१. भा० सं० और सा० (पृ० ३१८)