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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

प्रथमोऽंशः ६१
सहस्रार से उत्पन्न यह 'बिन्दु' ही दशधा विभक्त होकर 'मूलाधार' एवं
स्वाधिष्ठान कमलों का दस दल बन जाता है । कौलमार्गियों के मतानुसार मूलाधार
एवं स्वाधिष्ठान ही 'कारणस्थान' है । सम्पूर्ण जगत् का 'कारण बिन्दु' जो
'सहस्रार' में स्थित है वही दशधा विभक्त होकर सभी चक्रों के दलों के रूप में
प्रकट होता है—
'दशधा भिद्यते बिन्दुः एक एव परात्मकः । चतुर्धाऽऽधार कमलेषोढा- ऽधिष्ठान
पङ्कजे, 'अधिष्ठानाधार द्वितयमिदमेव दशदलं । सहस्राराज्जात मणिपूर
मतोऽभूद्दशदलम् ।।' 'तदेवैको बिन्दुर्भवति जगदुत्पत्ति कृदयम् ।।'१
(क) सहस्रार से उत्पन्न (१) 'मूलाधार' एवं (२) 'स्वाधिष्ठान' के १० दल
'मणिपूर चक्र' के १० दल बन जाते हैं । (मणिपूर में मू०स्वा० दोनों हैं ।)
(ख) हृदय एवं मूलाधार के १२ + ४ दल मिलकर विशुद्धार चक्र के १६
दल बन जाते है । (विशुद्धाख्य में—अनाहत + मूलाधार दोनों हैं ।)
(ग) मणिपूर के १० दल एवं मूलाधार एवं स्वाधिष्ठान चक्र (२) = १० +
२ मिलकर अनाहत चक्र के १२ दल बन जाते हैं ।
(घ) मूलाधार एवं स्वाधिष्ठान आज्ञा चक्र में दो दलों के रूप में रूपान्तरित
हो जाता है । ये ही दो दल सहस्रार में एक बिन्दु के रूप में शेष रह जाते हैं ।
सारांश—मणिपूर से आज्ञा चक्र तक के समस्त चक्र मूलाधार एवं
स्वाधिष्ठानरूप हैं ।२ इसीलिए कहा गया है कि समस्त चक्रों का त्याग करके
सहस्रार में एक बिन्दु रूप में भगवती के परा संवित् रूप का ध्यान करना
चाहिए ।
'देहमयी'—'अण्ड' या 'पिण्ड' ही देह है । हिरण्यगर्भ भी स्वर्णाण्ड ही था ।
पराशक्ति सृष्टयोन्मुख होने पर 'अण्ड', 'ब्रह्माण्ड', 'प्रकृत्यण्ड', 'मायाण्ड' एवं
'शक्ताण्ड' के रूप में परिणत हो जाती है । उसमें ही समस्त षट्त्रिंशादात्म जगत्
निहित है—उस शक्ति के दो रूप हैं—(१) पुरुषरूप—'परमशिव' (२) नारीरूप—
'विमर्श' । उसी में षट्त्रिंशादात्म जगत् स्थित है—'भारूपं परिपूर्ण स्वात्मनि विश्रान्ति
तो महानन्दम् । इच्छा संवित्करणैर्निर्भरितम् अन्तः शक्तिपरिपूर्णं । सर्वविकल्पविहीनं
शुद्धं शान्तं लयोदयविहीनम् । यत्पर तत्त्वं तस्मिन् विभाति षट्त्रिंशादात्म जगत् ।'
देहों की दृष्टि से यदि विचार किया जाय तो विश्व में (१) पिण्डज (२)
जरायुज (३) स्वेदज (४) उद्भिज देह हैं । पार्थिव, आंभस, तैजस, वायव्य शरीर
भी हैं और उनके मिश्रित शरीर भी हैं । मानव शरीर ब्रह्माण्ड का प्रतिबिम्ब माना
१. सुभगोदय स्तुति
२. मूलाधार में यह बिन्दु मन, बुद्धि, चित्त एवं अहङ्कार तथा स्वाधिष्ठान में—
काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य (६) बन जाता है । एक परमतत्त्व
दशधा होकर जगत् की सृष्टि करता है ।

६२ वरिवस्यारहस्ये
जाता है और इसीलिए कहा गया है कि—'यत् पिण्डे तद् ब्रह्माण्डे' मानव शरीर
'ब्रह्मपुर' कहा गया है—ब्रह्म का नगर कहा गया है । ईश्वर स्वयमेव प्रपञ्च में
'जीव' बनकर प्रवेश करता है । 'तत्त्वमसि' इसी सत्य का साक्षी है । मानव शरीर
पञ्चकोशात्मक है । पञ्चकोश निम्नांकित हैं—(१) 'अन्नमय', (२) 'प्राणामय', (३)
'मनोमय', (४) 'विज्ञानमय', (५) 'आनन्दमय' ।
थियोसॉफी के अनुसार—(१) 'अन्नमय एवं प्राणमय कोश' = 'भौतिक
शरीर' । (अन्नमय = 'प्राणमय' = Dense/ethenic (२) 'मनोमय कोश' =
Astral and lower 'mental body' (काम शरीर) (३) 'विज्ञानमय कोश' =
उच्चस्तरीय मानसिक शरीर या 'कारणशरीर' (४) 'आनन्दमयकोश' = 'आत्मिक
शरीर' । (Ātmic body)
(१) पुराणों एवं षड्दर्शनों में ३ प्रकार के शरीर कहे गए हैं—(१)
'स्थूलशरीर' (षाट्कौशिक शरीर) (२) 'सूक्ष्म शरीर' (३) 'कारण शरीर' । (Gross
or Phenomenal body, Astral body, casual body)
(१) 'स्थूलशरीर' = पञ्चकोशात्मक, धातुमय, अन्न-रस, रक्त, मांस, मेद,
शुक्र से निर्मित जड़ एवं पांचभौतिक मांसल शरीर ।
(२) 'सूक्ष्मशरीर' = स्थूलशरीर से सूक्ष्मतर शरीर । ५ ज्ञानेन्द्रियों, ५
कर्मेन्द्रियों, मन, बुद्धि, चित्त, अहङ्कार, ५ प्राण से समन्वितशरीर ।
(३) 'कारणशरीर' = अज्ञान की उपाधि जो सुषुप्ति में भी वर्तमान रहती है
वह 'कारणशरीर' कहलाती है । मुक्ति के पूर्व इससे मुक्ति संभव नहीं । मोक्ष में ५
कोश भी नहीं रहते । सांख्य मत के अनुसार सूक्ष्म शरीर या लिङ्ग शरीर का जो
स्वरूप है वह अन्य शास्त्रों से भिन्न है ।
'सांख्यकारिका' में ईश्वरकृष्ण ने सूक्ष्म शरीर (लिङ्ग शरीर) का इस प्रकार
प्रस्तुतीकरण किया है—'पूर्वोत्पन्नमसक्तं नियतं महदादिसूक्ष्मपर्यन्तम् । संसरति
निरुपभोगं भावैरधिवासितं लिङ्गम् ।'१
यह सूक्ष्म शरीर १८ तत्त्वों से निर्मित होता है जो निम्न हैं—(१) मन (२)
बुद्धि (३) अहङ्कार (४) ५ ज्ञानेन्द्रियाँ (५) ५ कर्मेन्द्रियाँ (६) ५ तन्मात्रायें ।
इसका स्वरूप इस प्रकार है—'चित्रं यथाऽऽश्रयमृते, स्थाण्वादिभ्यो बिना
यथाच्छाया । तद्वद्विना विशेषैर्न तिष्ठति निराश्रयं लिङ्गम् ॥ (४१)२ पुरुषार्थहेतुकमिदं
निमित्तनैमित्तिकप्रसङ्गेन । प्रकृतेर्विभुत्वयोगान्नटवद् व्यवतिष्ठते लिङ्गम् ॥'(४२)३
अन्नमय कोश स्थूल शरीर है । प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय कोश सूक्ष्म
शरीर के तत्त्व हैं । वेदान्त मत में ५ ज्ञानेन्द्रियाँ, ५ कर्मेन्द्रियाँ, मन, बुद्धि एवं ५
प्राण मिलकर सूक्ष्मशरीर की रचना करते हैं ।
१-३. सांख्यकारिका

प्रथमोऽंशः ६३
स्थूल शरीर और
उसके
पञ्चकोश
आत्मा ← [पञ्चकोश-चक्र] → अन्नमय कोश
प्राणमय कोश
मनोमय कोश
विज्ञानमय कोश
आनन्दमय कोश
माध्यमिक मत— 'धर्मकाया', रूपकाया, निर्माणकाया, संभोगकाया ।
'धर्मकाया' ही वास्तविक काया है और समस्त काया-समूह की जननी है ।
महायान—(१) रूपकाया (निर्माणकाया) (स्थूल एवं सूक्ष्म) (२) धर्मकाया ।
'निर्माणकाया' 'संभोगकाया' 'धर्मकाया' एवं 'सहजकाया'—मुख्यतः ये ही काया की
चार कोटियाँ हैं ।
'धर्मकाया'—द्वितीय काया है और प्रकाशमय है । सुषुप्ति के क्षय से
नित्यानित्य भेदों से रहित, मैत्री से पूर्ण, चित्त की निर्विकल्पावस्था को ही धर्मकाया
या चित्तवज्र कहते हैं । यह तर्कातीतावस्था है । प्रज्ञोपाय-ऐक्य के कारण इसे
'धर्मात्मा योग' भी कहा गया है । यह सुषुप्ति से उच्चतर स्थिति है । असङ्ग ने
'धर्मकाया' को पारमार्थिक एवं अज्ञेय माना है । भगवान् बुद्ध 'संभोगकाया' धारण
करके भक्तों को आन्तरिक उपदेश देते हैं । इसी काया से बुद्ध ने महायान का
उपदेश दिया ।
'संभोग काया' तृतीय काया है । इसी काया में स्थित होकर बुद्ध ने
गृद्धकूट पर्वत पर 'मन्त्रयान' का उपदेश दिया था । इसे ही 'वाग्वज्र' भी कहा
गया है । यही मन्त्रयोग एवं तन्त्रोपदेश की (बुद्ध द्वारा गृहीत) काया है । यहाँ
प्रज्ञोपाय की एकता है समस्त संस्कारों, तर्कों, इच्छाओं, तृष्णाओं के शान्त या
नष्ट हो जाने पर ही यह काया प्राप्त होती है । बीज मन्त्रों का जन्म भी इसी
काया में होता है ।

६४ वरिवस्यारहस्ये
'निर्माण काया'—वह भौतिक काया 'निर्माण काया' है जिसे धारण करके
शाक्य मुनि श्रावकयान, प्रत्येक यान एवं बोधिसत्वों को उपदेश देते हैं । भगवान्
बुद्ध—(१) निर्माण काया द्वारा बाह्य नैतिक उपदेश देते हैं । (२) संभोग काया
द्वारा गृद्धकूट पर महायान का उपदेश दिया । (३) संभोग काया द्वारा धान्यकूट पर
तन्त्रमार्ग का उपदेश दिया । धर्मकाया अज्ञेय है ।
'चतुर्थ काया'—'निर्माण काया' । जागृतावस्था का क्षय→निर्माण काया ।
'निर्माण काया' प्रारम्भिक होते हुए भी नारोपा के मतानुसार अंतिम अवस्था है और
यही 'सहज काया' है, यही शून्यता है, यही ज्ञानवज्र एवं शुद्ध योग है ।
सहजावस्था या सहज काया ही चतुर्थ काया है । 'सहज काया' ही निर्माण काया
है—सहज साधना→कायावज्र । असङ्ग के मतानुसार शिल्प, जन्म ज्ञान एवं निर्वाण
की शिक्षा देने हेतु भगवान् 'निर्माण काया' धारण करते हैं । यह काया कर्मों द्वारा
उत्पन्न नहीं होती । धर्मसंस्थापनार्थ यह धारण की जाती है । तान्त्रिक बौद्ध धर्म के
अनुसार काया-विवरण निम्नानुसार है—
काया
रूपकाया संभोगकाया 'धर्मकाया'
या (माध्यमिक) योगाचार
निर्माणकाया (स्वाभाविक काया)
(भौतिकशरीर) परसंभोगकाया स्वसंभोगकाया
(उपदेश के समय) (स्वर्गस्थित रूप) (अज्ञेय तत्त्व)
स्थूल सूक्ष्म
सांवृत्तिक सत्य पारमार्थिक सत्य
'वज्रयोग' के अनुसार काया विषयक विवरण—
(१) निर्माणकाया—कायावज्र—विशुद्धयोग—शून्यता विमोक्ष ।
(२) संभोगकाया—वागवज्र—धर्म योग—अनिमिता विमोक्ष ।
(३) धर्मकाया—चित् वज्र—मन्त्रयोग—अपरिहित ।
(४) सहजकाया—ज्ञानवज्र—संस्थान योग—अनभिसंस्कार ।
अभिसम्बोधि सिद्धान्त—अभिसम्बोधि = पूर्ण प्रकाश ।
(१) एकक्षणाभिसम्बोधि—सहजकाया (२) पञ्चकारसम्बोधि—धर्मकाया । (३)
विंशत्याकार सम्बोधि—संभोगकाया (४) मायाजालाभिसंबोधि—निर्माणकाया ।
'कायावज्र' = भौतिक शरीरादि की उन्नति । 'वाग्वज्र' = वाणी की पूर्णता ।
'चित्तवज्र' = मानसिक विकास । 'ज्ञानवज्र' = प्रज्ञा का विकास । वज्रयान
(मन्त्रयान) में तीन कायाओं के अतिरिक्त एक चतुर्थ काया—विज्ञान वादियों की

प्रथमोऽंशः ६५
'स्वाभाविक काया' का ही विकसित रूप है और इसे तन्त्र, 'सहजकाया' कहता है ।
यह तन्त्रों की अन्तिम साधना की निष्पत्ति है । 'सहजकाया' तुरीयावस्था से,
'धर्मकाया' सुषुप्ति से एवं संभोग काया स्वप्नावस्था से ऊँची है ।
तान्त्रिक बौद्धों ने कायों का जो वर्णन किया है उसका विवरण निम्नानुसार
है—
(१) 'सहजकाया'—करुणा—ज्ञानवज्र—विशुद्धियोग—तुरीय ।
(२) 'धर्मकाया'—मैत्री—चित्तवज्र—धर्मयोग—सुषुप्ति ।
(३) 'संभोगकाया'—मुदिता, वाग वज्र, मन्त्रयोग—स्वान ।
(४) 'निर्माण काया'—उपेक्षा, कायवज्र, संस्थानयोग—जाग्रत ।
तान्त्रिक बौद्धमत में महायान का 'काया सिद्धान्त' प्रसिद्ध है । हीनयान में भी
काया-सिद्धान्त मिलता है । हीनयानी गौतम बुद्ध को वास्तविक मनुष्य मानते थे।
'सर्वास्तिवाद' में (१) 'रूपकाया' एवं (२) 'धर्मकाया' को स्वीकार किया गया
है । प्रथम बाह्यकाया है और 'धर्मकाया' गुणों का शरीर है । महायान ने गुणों को
भी शून्य घोषित किया एवं धर्म-शून्यता का सिद्धान्त प्रतिपादित किया ।
चूँकि शरीर, गुण आदि सांवृत्तिक सत्य हैं, पारमार्थिक सत्य नहीं है अतः
माध्यमिकों के अनुसार वास्तविक 'धर्मकाया' अवर्ण्य, अवाङ्मनसगोचर, सर्वव्यापक,
सर्वाधार तत्त्व है और वह 'रूपकाया' 'निर्माणकाया' एवं 'संभोगकाया' का मूलाधार
है । तथागत बुद्ध का वास्तविक रूप 'धर्मकाया' है । महायान के अनुसार
काया-विभाजन प्रारंभिक रूप में निम्नानुसार है—(१) 'रूपकाया' (२) 'धर्मकाया' ।
'निर्माणकाया' स्थूल एवं सूक्ष्म दो प्रकार की है ।
'धर्मकाया'—धर्मों का शरीर (The body of merits) 'धर्मकाया' का प्रथम
रूप है । आध्यात्मिक काया (Metaphysical Principle underlying the
universe—the reality) तथता है । योगाचार सम्प्रदाय ने 'रूपकाया' के दो
भेद स्वीकार किये हैं—(१) 'रूपकाया' (२) 'संभोगकाया' । 'लङ्कावतार सूत्र' में
(१) संभोगकाया को 'निष्पन्द काया' कहा गया है । इसे ही 'निष्पन्दबुद्धि' भी
कहा गया है । योगाचारी 'धर्मकाया' भी स्वीकार करते हैं । यह 'स्वाभाविककाया'
है । 'पञ्चविंशतिसहस्रिका' में 'संभोगकाया' को सूक्ष्मशरीर के रूप में गृहीत किया
गया है । इसी 'सूक्ष्मकाया' से बुद्ध बोधिसत्वों को आंतरिक या गुह्य उपदेश देते
हैं । 'धर्मकाया' पावन शरीर है । माध्यमिक सम्प्रदाय जिसे 'तथता' या 'धर्मकाया'
कहता है, योगाचार उसे 'स्वाभाविक काया' कहता है । योगाचारी 'धर्मकाया' को
गुणों का समूह मानते हैं । इस प्रकार 'धर्मकाया' के स्वरूप के विषय में महायान
एवं योगाचार मत में मतभेद हैं । योगाचारी 'धर्मकाया' को एक 'पवित्र व्यक्तित्व'
(Purified Personality) कहते हैं जबकि माध्यमिक मत उसे 'अज्ञेय ब्रह्म' के
समान स्वीकार करता है । वसुबंधु के 'अभिधर्म कोश' में 'धर्मकाया' के दो अर्थ
५ वरि.

६६ वरिवस्यारहस्ये
हैं—(१) 'गुण' (२) पवित्र व्यक्तित्व । वसुबंधु कहते हैं कि बुद्ध की 'रूपकाया'
(भौतिक शरीर) अपवित्र है अतः उसकी शरण लेना उचित नहीं है । 'धर्मकाया'
की ही शरण लेना औचित्यपूर्ण है ।
'सद्धर्मपुण्डरीक' में कहा गया है कि बुद्ध ने युगों-पूर्व बुद्धत्व ग्रहण किया
था । तथागत अशरीरी हैं । जगत् को बुद्ध की काया निर्मितकाया ('निर्माण काया')
ही दिखाई पड़ती है । उनका वास्तविक स्वरूप 'धर्मकाया' है । यही माध्यमिकों का
मत है । माध्यमिक मत में बुद्ध की लीला को मात्र 'आभास' माना गया है । बुद्ध
लीला के लिए कोई भी रूप धारण कर लेते हैं और यही 'रूप काया' या
'निर्माणकाया' है ।
तज्ज्ञानार्थमुपाया विद्या लोके चतुर्दश प्रोक्ताः ।
तेष्वपि¹ च सारभूता वेदास्तत्रापि गायत्री ॥ ६ ॥
(विमर्श शक्ति के परिज्ञान के उपाय)
उस (विमर्श शक्ति) के ज्ञान के लिए संसार में चौदह विद्यायें कही गई हैं।
उन (१४ विद्याओं) में भी सारभूता श्रुतियाँ हैं और उनमें (श्रुतियों में) भी सारभूत
गायत्री है ॥ ६ ॥ ·

  • प्रकाश *
    चतुर्दश विद्याः—चत्वारो वेदाः षडङ्गानि न्यायो मीमांसा पुराणं धर्मशास्त्रं चेति ।
    तन्त्राणां धर्मशास्त्रेऽन्तर्भावः । तेषां प्रामाण्यसमर्थनं त्वस्मदीये² त्रिपुरसुन्दरीबाह्य-
    वरिवस्याविधौ द्रष्टव्यम् । तन्त्रराजव्याख्याने च विस्तरेण तन्त्राणां धर्मशास्त्रेऽन्तर्भावः
    प्रपञ्चयिष्यते । एवं च न शिष्टाकोपाधिकरणस्थवार्त्तिकविरोधः, शास्त्रपरिमाणानति-
    क्रमात् ॥ ६ ॥
  • सरोजिनी *
    तज्ज्ञानार्थ = उस विमर्श शक्ति के ज्ञान के लिए । विद्या लोके चतुर्दश
    प्रोक्ताः = संसार में चौदह विद्यायें कही गई हैं । चौदह विद्यायें—ऋग्वेद, यजुर्वेद,
    सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, निरुक्ति, ज्योतिष, छन्द, व्याकरण, न्याय,
    मीमांसा, पुराण, धर्मशास्त्र । जहाँ तक तन्त्रशास्त्र का प्रश्न है वह धर्म शास्त्र में ही
    अंतर्भूत हैं । तेष्वपि च सारभूता वेदा = उन चौदह विद्याओं में भी चतुष्टय
    सारभूत विद्यायें हैं । तत्रापि गायत्री = उन वेदों में भी गायत्री सारभूत है ।
    गायत्री = गायत्री मन्त्र वेदमन्त्र है । इसका स्वरूप निम्नांकित है—
    'ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ॥'
    व्याहृतियाँ—गायत्री मन्त्र के प्रारम्भ में जो—(१) 'भूः' (२) 'भुवः' (३)
    १. तास्वपि २. चास्मदीये

प्रथमोऽंशः ६७
'स्वः' तीन व्याहृतियाँ हैं ।
छान्दोग्य श्रुति में एक कथा आती है कि एक समय प्रजापति ने लोकों में
सारतम वस्तु की जिज्ञासावश तप किया । तप—(१) पृथ्वी में अग्नि देवता को
(२) अन्तरिक्ष में वायु देवता को (३) स्वर्ग में आदित्य देवता को सार देखा ।
उन्होंने पुनः तप किया तो (१) अग्नि में ऋग्वेद को (२) वायु में यजुर्वेद को एवं
(३) आदित्य में सामवेद को सार देखा । उन्होंने पुनः तप किया (१) ऋग्वेद में
भूः को (२) यजुर्वेद में भुवः को एवं (३) सामवेद में स्वः व्याहृति को सार देखा ।
सार-क्रम (१) प्रथम दृष्ट्या सार—अग्नि, वायु, सूर्य (२) द्वितीय दृष्ट्या सार—
ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद । (३) तृतीय दृष्ट्या सार—(अन्तिम निष्कर्ष) : सारतमः
'भूः', 'भुवः', 'स्वः' ।। (१) 'भूः' = सत् (२) 'भुवः' = चित् (३) 'स्वः' =
आनन्द 'भूरिति सन्मात्रमुच्यते । भुव इति सर्वं भावयति प्रकाशयतीति व्युत्पत्या
चिद्रूपमुच्यते । सुप्रियते इति व्युत्पत्त्या स्वरिति सुष्ठु सर्वैन्द्रियमाणसुखस्वरूपमुच्यते ।'
(शाङ्कर भाष्य) ।। महः = सर्वातिशायी¹ महत्तर ।। तपः = सर्व तेजोरूप परतेज ।
जनः = सर्व का कारण । सत्य = सर्वबाधारहित । तत् = ब्रह्म । 'ॐ तत्सदिति
निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः' ।।²
'तच्छब्देन प्रत्यग्भूतं स्वतः सिद्धं परं ब्रह्मोच्यते इति ।।'³ 'सवितुः' शब्द भी
परमेश्वर का बोधक है । 'सवितुरिति सृष्टिस्थिति लयलक्षणस्य सर्वप्रपञ्चस्य
समस्तद्वैतविभ्रमस्याधिष्ठानं लक्ष्यत ।'⁴
'सवितुः सर्वान्तर्यामितया प्रेरकस्य जगत्स्रष्टुः परमेश्वरस्य इति ।।'⁵ 'वरेण्यं =
परमेश्वरस्यात्मभूतं वरेण्यं सर्वैरूपास्यतया ज्ञेयतया च संभजनीयम् ।।'⁶
भर्ग = अन्तर्यामी परज्योति । अविद्यादिदोषभर्जनात्मकज्ञानैक विषयत्वम् ।।'⁷
देवस्य = सर्व साक्षी चेता केवल निर्गुण ब्रह्मरूप आत्मा । धीमहि =
'आत्मत्येवोपासीत' आदि श्रुत्यर्थ के अनुष्ठान का सूचक । 'धियो यो नः
प्रचोदयात्' = प्रचोदयात् = अन्तर्यामी ब्राह्मण । 'धियो यो नः' अन्तर्यामी परब्रह्म
का प्रत्यगात्मा से अभेद ।
गायत्री मन्त्र का अर्थ—ॐकार का लक्ष्य, 'भूः' (सत्) 'भुवः' (चित्), 'स्वः'
(आनन्दस्वरूप), तत् = उस ('तत्त्वमसि' में प्रयुक्त तत् का व्यञ्जक), सवितुः =
(जगदुत्पादक, सूर्य के सूर्य), वरेण्यम् = (वरीय, श्रेष्ठतम्), भर्गः = (स्वज्ञान
द्वारा अविद्या का भर्जक, दाहक), देवस्य = ज्योतिः स्वरूप परब्रह्म का, धीमहि =
हम ध्यान करते हैं । प्रश्न—'वह स्वयं ज्योतिस्वरूप परब्रह्म कौन है? उत्तर—'धियो
यो नः प्रचोदयात्' (जो हमारी बुद्धि को शुभ कर्मों में प्रवृत्त करे)' अर्थात्—
अविद्यातत्कार्ययोर्भर्जनाद्भर्गः स्वयं ज्योतिः परब्रह्मात्मकं तेजः धीमहि तद्योऽहं सोऽसौ -


१. शङ्कराचार्य—प्रपञ्चसार तन्त्र । 'प्रपञ्चसार विवरण' (पद्मपादाचार्य)
२. गीता ३-४. शाङ्करभाष्य
५-६. सायण भाष्य ७. शाङ्करभाष्य

६८ वरिवस्यारहस्ये
योऽसौ सोऽहमिति वयं ध्यायेम ।१ प्रणवात्त गायत्री जपादि द्वारा उपास्य है । यहाँ
शुद्ध गायत्री मन्त्र प्रत्यगभिन्न ब्रह्म का बोधक है । समस्त दृश्यों का द्रष्टा जो मेरा
स्वरूप है यही सर्वाधिष्ठान है, परमानन्दरूप है, माया एवं तत्कार्यात्मक समस्त
अनर्थों से शून्य है, स्वयं प्रकाश एवं चिदात्मक ब्रह्म है, — इस प्रकार हम ध्यान
करते हैं । स्वविवर्त जड़ प्रपञ्च के साथ ब्रह्म का रज्जु-सर्प की भाँति
बाध-सामानाधिकरण्यरूप अभेद है, चिद्रूप प्रत्यगात्मा के साथ ब्रह्म का मुख्य
तादात्म्यरूप अभेद है, इस प्रकार सर्वात्मक ब्रह्म का बोधक यह गायत्री मन्त्र सिद्ध
होता है—'सोऽयमिति न्यायेन सर्वसाक्षिप्रत्यगात्मने । ब्रह्मणा सह तादात्म्यरूपमेकत्वं
भवति इति सर्वात्मक ब्रह्मबोधकोऽयं गायत्री मन्त्रः सम्पद्यते ।'२
प्रणव तत्त्व का गायत्री तत्त्व में समावेश—'प्रणव' = अ, उ, म् = ३
मात्रायें । अकार = व्यष्टि-समष्टि वैश्वानर विराट । 'उकार' = तैजस् हिरण्यगर्भ ।
मकार = प्राज्ञ ईश्वर ।
(क) गायत्री का प्रथम पाद = 'तत्सवितुर्वरेण्यम्'—इस पाद से—समस्त
प्रसूयमान प्रपञ्च की कर्तृशक्ति के वरेण्य प्राज्ञ से अभिन्न ईश्वर तत्त्व का प्रतिपादन
किया गया है तथा कार्य-कारण में अभेद होने के कारण कर्तृशक्ति में समस्त
कार्यवर्ग का आरोप एवं अन्तर्भाव सूचित) ।
(ख) गायत्री का द्वितीय पाद = 'भर्गो देवस्य धीमहि' से तैजस हिरण्यगर्भ
का प्रतिपादन किया गया है । (तेजवाचक 'भर्ग' पद एवं ध्यानकर्तृवाचक 'धीमहि'
पद से उक्त अर्थ ध्वनित है ।)
(ग) गायत्री का तृतीय पाद = 'प्रचोदयात्' = (प्रकृष्ट चोदना क्रिया से युक्त
= 'प्रचोदयात्' पद से—प्रकृष्ट क्रियाधर्मी वैश्वानर विराट सूचित) ।
(ङ) गायत्री का चतुर्थ पाद—प्रणव की चतुर्थ मात्रा का अन्तर्भाव ।
सारांश = प्रणवतत्त्व भी गायत्री तत्त्व में समाविष्ट ।३
गायत्रीमन्त्रगत प्रकृतियों का अंतर्भाव—गायत्री मन्त्रगत प्रकृतियों के अनुसार
संसार की समस्त अवस्थाओं का वर्णन—
(१) 'तत्'—(तनुविस्तारे) : ईश्वर में सर्वप्रथम सिसृक्षारूप सृष्टि-विस्तार की
भावना—'एकोऽहं बहुस्याम्' के रूप में उत्पन्न होती है । उसकी विस्तारेच्छा =
'तत्' का वाचक ।
(२) 'सवितुः' (षूञ् प्राणिगर्भविमोचने) : परमात्मा इच्छा करने के बाद जगत्
को उत्पन्न करता है ।)
१. सायणभाष्य २. शाङ्करभाष्य
३. आत्मा का प्रथम पाद 'वैश्वानर', आत्मा का द्वितीय पाद—'तैजस', आत्मा का
तृतीय पाद—'प्राज्ञ' आत्मा का चतुर्थ पाद—'प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं
चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा विज्ञेयः' = 'माण्डूक्योपनिषद्' ।

प्रथमोंऽशः ६९
(३) 'वरेण्यं' = (वृञ् वरणे)—प्रार्थनीय श्रेष्ठ ब्रह्मज्ञान को जीव प्राप्त करता
है।
(४) 'भर्गो देवस्य' = अज्ञान का भर्जन (विनाश) होता है।
(५) 'धीमहि' = विनाश के बाद जीवन्मुक्ति काल में ध्यानादि साधन
अपनाये जाते हैं। तत्पश्चात्—
(६) 'धियः' = आत्मतत्त्व विषयक चरम साक्षात्काररूप बुद्धि होती है। और
इसके बाद अभेदभाव से परमात्म प्राप्ति रूप मोक्ष होता है। वह परमात्मा कौन
है?
(७) 'यो नः प्रचोदयात्'—(१) जो हमारा सबका अन्तर्यामी प्रेरक है वह
परमात्मा। (२) न्यायदर्शन के अनुसार—सृष्टि की आरम्भावस्था में प्राणियों के
अदृष्टवश परमाणु में आद्य क्रिया प्रारंभ होती है—फिर 'यो नः'—(यूमिश्रणे)—
परमाणु द्वय आदि का मिश्रण होता है। फिर—'धियः' = आत्मा-मन एवं
बुद्धि-संयोग पूर्वक सांसारिक बुद्धिः सांसारिक भोगादि होते हैं। फिर—'धीमहि' =
अर्थात्—ध्यानादि साधनों द्वारा तत्वविषयक धी (ज्ञान) की प्राप्ति होती है।
'अदेवस्य भर्गो'—अज्ञान का भर्जन। 'वरेण्यं' = (मिथ्या ज्ञान के विनाश के
बाद वरेण्य अपवर्ग की प्राप्ति होती है ।) अपवर्ग क्या है? 'सवितुः'—कर्त्तास्वरूप
आत्मा की। 'तत्' = एकविंशति दुःख का अत्यन्त ध्वंस रूप अकर्तृत्व अवस्था।
(३) योगदर्शन के अनुसार गायत्रीमन्त्र की सार्थकता एवं एकात्मता—'प्रचोदयात्'
= कुण्डल्योत्थापन क्रिया में कुण्डलिनी-समुत्थान से लेकर षट्चक्रभेदनपूर्वक सहस्रार
कमल विकास पर्यन्त निःशेष क्रिया-कलाप, प्र + चुद् धातु से सङ्केतित है।
सारांश—सविता (क्लेश आदि से अस्पृष्ट परमात्मा) हमारी बुद्धि को शुभ
योग की क्रिया की ओर प्रवृत्त करे। आदि ॥
'गायत्री' सर्वात्मक है—'गायत्री' चतुर्विंशत्यक्षरात्मक मन्त्र एवं उससे बोधित
देवता का ही वाचक नहीं है—'गायत्री वा इदं सर्वं भूतं यदिदं किञ्च' (छा०)
'गायत्रीपुरश्चरण' में एकता का विधान भी है। उपासना के प्रसङ्ग में—'मन्त्र गुरु
देवतात्मकत्वेनात्मानं भावयन् यथाशक्ति गायत्री जपसमर्थः ॥'
गायत्री ब्रह्म की हृदय में उपासना—गायत्रीब्रह्म हृदयाकाश में ध्येय है—
योऽयमन्तर्हृदय आकाशस्तदेतत्पूर्णमप्रवर्तिपूर्णमप्रवर्तिनीं श्रियं लभते य एवं वेद ॥'
(उपनिषद)
गायत्री की अङ्गोपासना—चिदाशाकाशस्वरूप स्वयंज्योति गायत्री ब्रह्म की
उपासना के अङ्गरूप द्वारपालों की उपासना। (छान्दोग्यो०)
गायत्री ब्रह्मभवनरूप हृदय के ५ सुषि (छिद्र) हैं—
(१) पूर्वाभिमुखी पुरुष के हृदय का पूर्व छिद्र रूप द्वार—इसका द्वारपाल
प्राण है, वही चक्षु है, वही आदित्य है। प्राणरूप तेज का ध्यान—

७० वरिवस्यारहस्ये
तेजस्वी, अन्नाद ।
(२) दक्षिण सुषि = द्वारपाल—व्यान है । वही श्रोत्र एवं चन्द्रमा भी है ।
उसका श्री एवं यश रूप से चिन्तन→श्रीमान, यशस्वी ।
(३) पश्चिम सुषि = द्वारपाल—अपान है । वही-वाग एवं अग्नि है इस
अपान का ब्रह्मवर्चस एवं अन्नाद्य रूप से चिन्तन→वह व्यक्ति ब्रह्मवर्चस्वी
एवं अन्नाद हो जाता है ।
(४) उत्तर सुषि = द्वारपाल-समान है । वही मन एवं पर्जन्य दोनों है । समान
का कीर्ति एवं व्युष्टि (अपरोक्ष यश) के रूप में ध्यान→कीर्ति + व्युष्टि ।
(५) ऊर्ध्व सुषि = द्वारपाल = उदान वायु । वही वायु एवं आकाश है,
इसका ओज एवं महः रूप से चिन्तन→ओजस्वी एवं महान हो जाता
है ।
तस्या रूपद्वितयं तत्रैकं यत् प्रपठ्यते ऽस्पष्टम् ।
वेदेषु चतुर्ष्वपि परमत्यन्तं गोपनीयतरम् ॥ ७ ॥
(गायत्री के दो रूप)
उस (गायत्री) के दो रूप हैं । उनमें एक अस्पष्ट रूप में पढ़ा जाता है ।
(वह) चारों वेदों में भी अत्यन्त एवं परम गोपनीय है ॥ ७ ॥

  • प्रकाश *
    तस्या गायत्र्याः स्पष्टमस्पष्टं चेति पदच्छेद आवृत्त्या । चरणत्रयम् 'तत् सवितुः'
    इत्यादि स्पष्टम् । 'परोरजसे सावदोम्' इति चतुर्थचरणं त्वस्पष्टमित्यर्थः । परं
    श्रीविद्याख्यं द्वितीयं रूपम् ॥ ७ ॥
  • सरोजिनी *
    तस्याः = उस गायत्री के । रूपद्वितयं = दो रूप हैं । तत्रैकं = उनमें से
    एक । यत = जो, जिसे । प्रपठ्यतेऽस्पष्टम् = अस्पष्ट रूप में पढ़ा जाता है ।
    यहाँ विचारणीय बिन्दु यह है कि यदि दो रूपों में एक अस्पष्ट है तो दूसरा स्पष्ट
    होगा । इसीलिए भास्करराय कहते हैं—'तस्याः गायत्र्याः स्पष्टमस्पष्टं चेति ।।' वे
    कहते हैं कि इनमें से 'तत्सवितुः' इत्यादि तो सुस्पष्ट है किन्तु चतुर्थ चरण अस्पष्ट
    है । वेदेषु चतुर्ष्वपि = चारों वेदों में भी । परम—भास्करराय 'परम्' का अर्थ
    'श्रीविद्या' समझते हैं—'परं श्री विद्याख्यं द्वितीयं रूपं' अर्थात् गायत्री का जो दूसरा
    रूप है वह श्रीविद्या है । वेदेषु चतुर्ष्वपि परमत्यन्तं गोपनीयम् का दूसरा अर्थ यह
    होगा—'चारों वेदों में भी पर विद्या (श्रीविद्या) अत्यन्त गोपनीय है ।' इस पर विद्या
    (पञ्चदशाक्षरी मन्त्र) का स्वरूप निम्नांकित है—'क ए ई ल ह्रीं । ह स क ह ल
    ह्रीं । ह स क ह ल ह्रीं ॥'

प्रथमोऽंशः ७१
गायत्री को पञ्चमुखी कहा गया है—(१) गायत्री के पाँच मुख—(क) ॐ
(ख) भूर्भुवः स्वः (ग) तत्सवितुर्वरेण्यम् (घ) भर्गो देवस्य धीमहि (ङ) धियो यो नः
प्रचोदयात् ।। या (१) ४ वेद (२) यज्ञ ।।
गायत्री का स्वरूप—गायत्री के पाँच मुख हैं ।
गायत्री के चरण एवं देवता—(१) गायत्री का प्रथम चरण—ब्रह्मा, (२)
गायत्री का द्वितीय चरण—विष्णु, (३) गायत्री का तृतीय चरण—महेश । (ये देवता
गायत्री के प्रमुख शक्ति पुञ्ज हैं ।)
महर्षि उद्दालक ने इसी गायत्री विद्या की प्राण-प्रतिष्ठा की थी । गायत्री मन्त्र
के पञ्चमुखों के प्रतिकार्थ—(१) चार वेद एवं यज्ञ (२) पञ्चतत्त्वात्मक जगत् एवं
स्वदेह से पृथक् अपने को आत्मसंवित समझने का सङ्केत (३) आत्मा पर चढ़े
पञ्चकोशों से भी अपने को पृथक् समझने का सङ्केत ।
(१) पाँच कोश (२) पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (३) पाँच कर्मेन्द्रियाँ (४) पाँच प्राण
(५) पाँच उपप्राण (६) पाँच तन्मात्रायें (७) पाँच विषय (८) पाँच महाभूत (९)
पाँच यज्ञ (१०) पाँच अवस्था (११) पाँच शूल (१२) पाँच क्लेश (१३) भगवान्
शिव के पाँच मुख (१४) पाँच आकाश आदि विभिन्न पञ्चकों का प्रतिकार्थ अत्यन्त
रहस्यमय हैं ।
'पञ्चस्यास्यास्तु गायत्र्याः विद्यां यस्त्ववगच्छति ।'
गायत्री का महत्त्व—'गायत्र्येव तपो योगः साधनं ध्यानमुच्यते । सिद्धि जनानां
सा माता नातः किंचिद् बृहत्तरम् ॥'१
गायत्री में स्थित नौ पद—(१) तत् (२) सवितुः (३) वरेण्यं (४) भर्गो (५)
देवस्य (६) धीमहि (७) धियो (८) यो नः (९) प्रचोदयात । (इसीलिए यज्ञोपवीत
में ९ सूत्र होते हैं । यज्ञोपवीत में तीन ग्रंथियाँ ब्रह्मग्रंथि, विष्णुग्रंथि एवं रुद्रग्रंथि—
इन देवों के प्रतीक है । यज्ञोपवीत गायत्री का एवं द्विजत्व का प्रतीक है । बड़ी
ग्रंथि ॐ की एवं तीन शेष ग्रंथियाँ भूः भुवः स्वः की प्रतीक हैं ।
'भूः' = अन्नमय कोश । 'भुवः' = प्राणमय एवं मनोमय कोश । 'स्वः' =
विज्ञानमय-आनन्दमय कोश । (सृष्टि के तीन स्तर = पृथ्वी, पाताल,
स्वर्ग । साधना के पिण्ड गत तीन स्तर—भूः, भुवः, स्वः) गायत्री 'त्रिपदा' कही
गई है ।२
गायत्री का निर्गुण ध्यान—'गायत्रीहृदय' में कहा गया है—'आत्मान आकाशो
भवति, आकाशाद्वायुर्भवति, वायोरग्निर्भवति, अग्नेरोंकारो भवति, ॐकाराद् व्याहति-
१. गायत्री लहरी, गायत्री मञ्जरी ।
२. गायत्री के तीन पाद या चरण—(१) 'भूः'—भूक्षेत्रीय (२) 'भुवः'—
पाताललोकीय (३) 'स्वः'—स्वर्ग एवं स्वर्गोपरि से सम्बद्ध । (१) 'भूः'—में
मन्त्रदीक्षा (२) 'भुवः'—में अग्नि दीक्षा (३) 'स्वः'—में ब्रह्म दीक्षा ।

७२ वरिवस्यारहस्ये
र्भवति, व्याहृतितो गायत्री भवति, गायत्र्याः सावित्री भवति, सावित्र्याः सरस्वती भवति,
सरस्वत्या वेदा भवन्ति, वेदेभ्यो लोकाः ॥१
सम्पूर्ण लोकों का वेदों में, वेदों का सरस्वती में, सरस्वती का सावित्री में,
सावित्री का गायत्री में, गायत्री का व्याहृतियों में, व्याहृतियों का ओंकार में,
ओंकार का अग्नि में, अग्नि का वायु में, वायु का आकाश में एवं आकाश का
ब्रह्मस्वरूप अपनी आत्मा में लय करने का ध्यान करें । 'सर्वमस्मीत्युपासीत तद्
व्रतम् तद् व्रतम् ॥'२
गायत्री का स्वरूप—'गायत्री पुरश्चरण पद्धति' नामक ग्रन्थ में ऋषि
याज्ञवल्क्यं ब्रह्मा से गायत्री के गोत्र, अक्षर, पाद, शिर एवं कुक्षि के विषय में
प्रश्न करते हैं । ब्रह्माजी का उत्तर निम्नांकित है—
(१) गायत्री का गोत्र = सांख्सायन । (२) गायत्री के वर्ण = बत्तीस ।
(३) गायत्री के पाद = चार, अन्त के पाद की गणना न होने के कारण गायत्री
त्रिप

प्रथमोऽंशः ७३
'य एतां वेद गायत्रीं पुण्यां सर्वगुणान्विताम् तत्त्वेन भरतश्रेष्ठ । स लोके न
प्रणश्यति ।'१ मनुस्मृतिकार कहते हैं कि—एक अक्षर, मात्र परब्रह्म है, परमतप मात्र
प्राणायाम है, परात्पर मात्र सावित्री है एवं सत्य मात्र मौन है—क्योंकि उसी से
उसकी उत्कृष्टता है—'एकाक्षरं परब्रह्म प्राणायामः परं तपः । सावित्र्यास्तु परं नास्ति
मौनात्सत्यं विशिष्यते ।'२ 'पद्मपुराण' में गायत्री-जाप को सर्व-पाप-विनाशक कहा
गया है—'ब्रह्महत्यादि पापानि गुरूणि च लघूनि च । नाशयत्यचिरेणैव गायत्री जापको
द्विजः ।।३
आचार्य शङ्कर ने 'प्रपञ्चसार तन्त्र' में गायत्री की विशद व्याख्या की है—
(१) गायत्री 'चतुर्विंशत्यक्षरात्मक'४ है । इसीलिए शङ्कराचार्य कहते हैं—
'चतुर्विंशतितत्त्वभेदैः ।'५
(२) यह वेदों का सार है—'अन्वर्थकं मन्त्रमिमन्तु वेदसारं पुनर्वेदविदो
वदन्ति ।।'६
(३) तार एवं व्याहृति आदि के साथ ही इस पराशक्ति गायत्री की उपासना
की जानी चाहिए—'तार व्याहृतिसंयुता सहशिरो गायत्र्युपास्या परा ।'७
(४) सप्त व्याहृतियों का सम्बन्ध (क) भूलोक (ख) भुवर्लोक (ग) स्वर्लोक
(घ) महर्लोक (ङ) जनलोक (च) तपलोक (छ) सत्यलोक—इन सातों लोकों से
है—'सभूर्भुवः स्वश्च महोजनस्तपः समन्वितं सत्यमिति क्रमेण ।'८
(५) गायत्री में प्रयुक्त प्रणव 'ॐ' के दो रूप हैं—१. निर्गुण २. सगुण ।९
आचार्य भास्कर के कथनानुसार—'कामो योनिः कमला वज्रपाणिर्गुहा हसा
मातरिश्वाऽभ्रमिन्द्रः । पुनर्गुहा सकला मायया च, पुरुच्येषा विश्वमातादिविद्या ।।' यह
ऋचा गायत्री मन्त्र को प्रकट करती है । इस ऋचा में पञ्चदशाक्षरी मन्त्र का उद्धार
भी निहित है । यह ऋचा आदि विद्या गायत्री की उद्धारिका है । यह कामराजो-
पासिता (कादि) विद्या का मन्त्र है । उक्त मन्त्र का रहस्यार्थ निम्नांकित है—
'काम' (क), 'योनि' (ए), 'कमला' (ई), 'वज्रपाणि' (इन्द्र = ल), 'गुहा'
(ह्रीं), ह, स, मातरिश्वा—वायु (क), अभ्र—आकाश (हा) इन्द्र (ल), गुहा (ह्रीं),
स क ल, माया (ह्रीं) ।।
सारांश—'क ए ई ल ह्रीं, ह स क ह ल ह्रीं, स क ल ह्रीं' (पञ्चदशाक्षरी
मन्त्र) ।।
१. महाभारत (भीष्मपर्व अ० १४।१६) २. मनुस्मृति ।
३. पद्मपुराण 'ऐहिकामुष्मिकं सर्व गायत्री जपतो भवेत् (अग्नि पु०) सर्वपापानि
नश्यन्ति गायत्री जपतोन्नृप । (भवि०पु०)
४. प्रपञ्चसार विवरण (पद्मपादाचार्य) ५-८. प्रपञ्चसार तन्त्र
९. प्रपञ्चसार विवरण

७४ वरिवस्यारहस्ये
इस ‘पञ्चदशाक्षरी विद्या’ में तीन कूट विद्यमान हैं—
(१) ‘वाग्भव कूट’ = १८ वर्ण ⎤ योग = ५८ वर्ण ॥
(२) ‘कामराज कूट’ = २२ वर्ण¹ ⎥ ‘संहत्याष्टपञ्चाशद्वर्णात्मिका विद्या’
(३) ‘शक्ति कूट’ = १८ वर्ण² ⎦ (भास्कर राय-‘प्रकाश’)
⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯
५८
(१) क ए ई ल ह्रीं = (वाग्भव कूट) — ‘कादिविद्या’
(२) ह स क ह ल ह्रीं = (कामराज कूट) — ‘हादिविद्या’
(३) स क ल ह्रीं = (शक्ति कूट) — ‘सादिविद्या’
मनु, चन्द्र कुबेर, लोपामुद्रा, मन्मथ, शिव, दुर्वासा आदि के सम्प्रदायों में से
अब मात्र (१) ‘कामदेव (मन्मथ)’ एवं (२) ‘लोपामुद्रा’ सम्प्रदाय ही अवशिष्ट रह
गए हैं । इन दोनों में भी ‘मन्मथ सम्प्रदाय’ अधिक प्रचलित है । ‘कामराज-विद्या’
(१५ अक्षर वाली) के दो भेद हैं—(क) शाक्त (ख) शांभव । शाक्त
कामराज-विद्या—ऊर्ध्वाम्नाय से सम्बद्ध है और कीलित नहीं है । जबकि शांभव
कामराज-विद्या पूर्वाम्नाय से सम्बद्ध है तथा सदोष है । ‘लोपामुद्रा विद्या’ भी १५
अक्षरों वाली है और यह द्विभेदात्मक है—(१) शाक्त (२) शाम्भव ।
(१) मनु द्वारा उपासित श्रीविद्या—१८ वर्ण । (२) दुर्वासोपासित विद्या के
वर्ण—१३ वर्ण । (३) चन्द्र एवं कुबेर से उपासित श्रीविद्या—२२ वर्ण । (४)
कहीं-कहीं इन्द्र एवं अग्नि के स्थान पर नन्दी एवं विष्णु के सम्प्रदाय का उल्लेख
मिलता है । (५) बह्वचोपनिषद् में जिस ‘कादि’ ‘हादि’ एवं ‘सादि’ विद्याओं का
उल्लेख किया गया है इसका सम्बन्ध शांभव विद्या से है ।³
पञ्चदशाक्षरी मन्त्र एवं उसका स्वरूप—पञ्चदशाक्षरी मन्त्र—क ए ई ल ह्रीं ।
ह स क ह ल ह्रीं । स क ल ह्रीं (१५ वर्ण) ॥
मन्त्रावयव—(१) ३ ककार (२) १ एकार (३) १ ई (४) ३ लकार (५)
३ ह्रींकार (६) २ हकार (७) २ सकार (८) ह्रीं में—ह, र, ई, बिन्दु । ‘ह्रीं’—
ह, र, ई, बिन्दु । ‘ह्रीं’—ह, र, ई बिन्दु । (सामान्य गणनानुसार २७ वर्ण या
मातृकायें) पञ्चदशाक्षरी मन्त्र के तीन विभाग (१) वाग्भव कूट (२) कामराज कूट
(३) शक्ति कूट ।
(१) प्रथम कूट = १८ वर्ण ⎤ ‘एवं च प्रथम-तृतीय कूटे अष्टादश
(२) द्वितीय कूट = २२ वर्ण ⎥ वर्णात्मके । मध्यमकूटं तु चतुरधिकम
(३) तृतीय कूट = १८ वर्ण ⎥ संहत्याष्ट पञ्चाशद्वर्णात्मिका विद्येति
⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯ ⎥ सिद्धम् ॥’
५८ ⎦
१. भास्करराय प्रथम तृतीय कूटे अष्टादशवर्णात्मके । (प्रकाश)
२. मध्यमकूटं तु चतुरधिकम्
३. गोपीनाथकविराजः ‘योगिनीहृदय की भूमिका’ (Preface to the 2nd edition)

प्रथमोँऽशः ७५
'हल्लेखा' 'ह्रीं' के अन्तर्गत (१) व्योम, (२) अग्नि, (३) वामलोचना (ई),
(४) बिन्दु (.), (५) अर्धचन्द्र, (६) रोधिनी, (७) नाद, (८) नादान्त, (९)
शक्ति, (१०) व्यापिका, (११) समना, (१२) उन्मनी ॥ (ह्रींकार के १२
अवयव) ॥ 'नाद' किसे कहते हैं? 'बिन्दु', 'अर्धचन्द्र', 'रोधिनी', 'नाद', 'नादान्त',
'शक्ति', 'व्यापिका', 'समना' एवं उन्मनी—इस नव के समूह को नाद कहते हैं—
'बिन्दादीनां नवानां तु समष्टिर्नाद उच्यते ॥'
'बिन्दु विनिर्मुक्तानामष्टा नामेव नाद संज्ञा मन्त्र शास्त्रे तथापि व्यवहार सौकर्याय
तत्सहितानामेव सात्र कृता इति ध्येयम् ।१ यद्यपि बिन्दु को छोड़कर शेष अङ्गों को
ही 'नाद' कहा जाता है किन्तु-व्यवहार-सौविध्य के लिए उसे भी नाद में (यहाँ)
अन्तर्भुक्त कर लिया गया है ।
(क) १८ वर्ण कूट 'वाग्भव कूट'—१. क् + २. अ ('क'), योनि।
कोणत्रय ३. ('ए'), लक्ष्मी ४. ('ई'), ५. ल् + ६. अ ('ल') । 'ह्रीं' के १२
अवयव = ६ + १२ = १८ अवयव ॥
(ख) २२ वर्ण कूट 'कामराजकूट'—(१) ह + अ ('ह') (२) स + अ
('स') (३) क + अ ('क') (४) ह + अ ('ह') (५) ल् + अ ('ल') = १०
एवं 'ह्रीं' के १२ अवयव = १० + १२ = २२ अवयव ।
(ग) १८ वर्ण कूट 'शक्ति कूट'—'स्' + अ = ('स'), (२) क् + अ
('क') (३) ल् + अ ('ल') = ६ एवं 'ह्रीं' के १२ अवयव = ६ + १२ =
१८ अवयव । 'वाग्भव कूट' के १८, कामराजकूट के २२ अवयव एवं शक्ति कूट
के १८ अवयव = १८ + २२ + १८ = ५८ अवयव ।
सारांश—पञ्चदशाक्षरी मन्त्र में ५८ वर्ण हैं—(प्रथमेऽष्टादश वर्णा द्वाविंशति-
रक्षराणि मध्ये स्युः । प्रथमेन तुल्यमन्त्यं संघाते नाष्टपञ्चाशत ।')२
पञ्चदशाक्षरी मन्त्र का अर्थ—'कादि' 'हादि' एवं 'सादि' ये तीन प्रकार की
विद्यायें भी बहुचर्चित हैं । 'योगिनीहृदय' 'तन्त्रराजतन्त्र' 'मातृकार्णव' 'त्रिपुरार्णव'—
'कादि मत' के ग्रन्थ हैं ।३ भास्करराय ने भावनोपनिषद की टीका में 'योगिनीहृदय'
को 'कादिमत' का कहकर भी 'वरिवस्यारहस्यम्' में 'योगिनीहृदय' की हादि मत के
अनुकूल व्याख्या स्वीकार की है ।
यद्यपि तन्त्रराजादौ सौन्दर्यलहर्यां चं हादिविद्याया एव प्रथममुद्धारो दृश्यते, तथापि
'श्रीविद्यैव तु मन्त्राणां तत्र कादिर्र्यथा परा' इति वचनात्, षोडशीघटकत्वाच्च,
'यदक्षरैकमात्रेऽपि', 'यदेकादशमाधारम्' इत्यादिरहस्यार्थप्रतिपाद्याक्षरशालित्वाच्च,
त्रिंशत्यामस्या एवादराच्च, त्रिपुरोपनिषद्येतन्मूलकत्वेनैवान्यासासुद्धाराच्च, योगिनीहृदया-
दावुक्तानामिहापि वक्ष्यमाणानामर्थनामत्रैव स्वारस्याच्च, शाङ्खायनश्रुतौ 'चत्वार ईं
१. भास्करराय—'प्रकाश' २. 'वरिवस्यारहस्यम्'
३. 'मनोरमा', भास्करराय—भावनोपनिषद की टीका में ।

७६ वरिवस्यारहस्ये
बिभ्रति' इत्यस्यामृचि च प्रथममस्या एवोद्धाराच्च कादिविद्यायाः प्राधान्यमिति
१द्योतयंस्तस्याः प्रतीकमादत्ते—
कामो योनिः कमलेत्येवं २साङ्केतिकैः शब्दैः ।
व्यवहरति न तु प्रकटं यां विद्यां वेदपुरुषोऽपि ॥ ८ ॥
(श्रीविद्या की गोपनीयता)
जिस विद्या को वेद पुरुष भी 'कामो योनिः कमला' इस प्रकार के सांकेतिक
शब्दों द्वारा (प्रतीकात्मक रीति से) व्यवहृत करता है न कि प्रकट रूप से (वही यह
परमगोप्या श्रीविद्या है ।) ॥ ८ ॥

  • प्रकाश *
    'कामो योनिः कमला वज्रपाणिर्गुहाहसा मातरिश्वाभ्रमिन्द्रः ।
    पुनर्गुहासकला मायया च पुरुच्येषा विश्वमातादिविद्या ॥'
    इति शाङ्खायनश्रुतिः । कामो मातरिश्वा च ककारः । योनिरकारः । कमला
    तुरीयः स्वरः । वज्रपाणिरिन्द्रश्च लकारः । गुहाद्वयं माया च लज्जाबीजम् । हसेति
    सकलेति च स्वरूपम् । गुहया सह समासाद्बहुवचनं न पुनः सकारो दीर्घः । एवं
    लकारोऽपि । अभ्रं हकारः । एतादृशैः साङ्केतिकैः शब्दैर्व्यवहारादत्यन्तगोपनीयत्वं
    समर्थितं भवति ॥ ८ ॥
  • सरोजिनी *
    कामो = क । न तु प्रकटं—न कि प्रकट रूप से । प्रकट रूप से क्यों
    नहीं ? 'मन्त्र' स्वयं शिव हैं । यथा किसी व्यक्ति का नाम लेने से वह व्यक्ति स्वयं
    सम्मुख उपस्थित हो जाता है उसी प्रकार मन्त्र-प्रयोग से मन्त्र का देवता प्रकट हो
    जाता है अतः—'तस्माद् मन्त्र महासेन रहस्यं न प्रकाशय ।' (वातुल० तन्त्र)
    योनी = एकार । कमला = तुरीय स्वर—'ई'। वज्रपाणि = इन्द्र । लकार ।
    गुहाद्वय = माया एवं लज्जाबीज । अभ्र = नभ । हकार ।
    कामो योनिः कमला—यह वाक्यांश निम्न श्लोक का प्रारंभिक अंश है—
    'कामो योनिः कमला वज्रपाणिर्गुहा हसा मातरिश्वाभ्रमिन्द्रः । पुनर्गुहा सकला मायया
    च पुरुच्यैषा विश्वमातादिविद्योम् । कामो = क, योनिः = ए, कमला = ई,
    वज्रपाणि = इन्द्र अर्थात् 'ल', गुहा = ह्रीं, ह, स—दो वर्ण, मातरिश्वा = वायु
    अर्थात् 'क', अभ्र = आकाश अर्थात् 'ह', 'इन्द्रः' (शतक्रतु) = 'ल', पुनः 'गुहा'
    (गुफा)—'ह्रीं', स, क, ल,—३ वर्ण, 'माया' अर्थात् 'ह्रीं'—यह सर्वात्मिका
    जगन्माता की मूल विद्या है और ब्रह्मरूपिणी है ॥' यह मन्त्र इस प्रकार है—
    'क ए ई ल ह्री, ह स क ह ल ह्रीं, स क ल ह्रीं' ॥
    १. द्योतयन्नस्याः २. संकेतितैः

प्रथमोऽंशः ७७
यह मन्त्र समस्त मन्त्रों का मुकुटमणि है और मन्त्रशास्त्र में 'पञ्चदशी'
'श्रीविद्या' आदि के नाम से प्रख्यात है । इसके छः प्रकार के अर्थ हैं—भावार्थ,
वाच्यार्थ, सम्प्रदायार्थ, लौकिकार्थ, रहस्यार्थ, तत्वार्थ ।¹ इसमें जो 'ह्रीं' अक्षर है वह
देवी का बीज है—यह स्वतन्त्र रूप में एक मन्त्र है—यह मन्त्र देवी प्रणव है—
ओंकारवत व्यापक अर्थों से परिपूरित है । इसका संक्षिप्त अर्थ है—
इच्छा-ज्ञान-क्रिया, अद्वैत, अखण्ड, सच्चिदानन्द समरसीभूत, शिवशक्तिस्फुरण । इसी
के विषय में 'श्रीदेव्यथर्वशीर्ष, में कहा गया है—'वियदीकारसंयुक्तं वीतिहोत्र
समन्वितम् । अर्धेन्दुलसितं देव्या बीजं सर्वार्थसाधकम् ।।'
वियत् (आकाश) = 'ह' । 'ईकार' । 'वीतिहोत्र' (अग्नि) अर्थात् 'र' ।
'अर्धचन्द्र' अर्थात् ( ँ ) । 'एवमेकाक्षरं ब्रह्म यतयः शुद्ध चेतसः । ध्यायन्ति
परमानन्दमया ज्ञानाम्बुराशयः ।।' यह 'ह्रीं' नामक देवी प्रणव 'एकाक्षर ब्रह्म' है ।
आचार्य भास्करराय कहते हैं ² कि यद्यपि 'तन्त्रराजतन्त्र' एवं शङ्कराचार्य की
'सौन्दर्यलहरी' में हादि विद्या का ही 'प्रथमोद्धार दिखाई पड़ता है'—अर्थात् उसको
ही प्राधान्य प्रदान किया गया है तथापि शास्त्रों में तो यह कहा गया है कि—'मन्त्रों
में श्रीविद्या एवं उसमें भी कादि विद्या प्रमुख है'—'श्रीविद्यैव तु मन्त्राणां तन्त्र
कादिर्यथा परा ।।'
भास्करराय कहते हैं कि विद्याओं में 'कादिविद्या' ही प्रमुख है क्योंकि—
१. श्रीविद्यैव तु मन्त्राणां तन्त्र कादिर्यथा परा'
२. 'यदक्षरैकमात्रेऽपि' (षोडशीघटक)
३. 'यदेकादशमाधारम्' (रहस्यार्थ प्रतिपाद्याक्षरशालित्व के कारण)
४. 'त्रिपुरोपनिषद' के एतन्मूलक एवं प्राधान्यप्रद होने के कारण
५. 'योगिनीहृदय' आदि ग्रन्थों में इसके प्राधान्य के कारण
६. शाङ्खायन श्रुति में 'चत्वार ई विभ्रति' में कादि विद्या को प्राधान्य दिये
जाने के कारण—
७. 'कामो योनिः कमला वज्रपाणिर्गुहाहसा मातरिश्वाभ्रमिन्द्रः । पुनर्गुहा सकला
मायया च पुरुच्येषा विश्वमातादिविद्या, —इस शाङ्खायन श्रुति में 'काम'
शब्द के प्रतीकात्मक प्रयोग के कारण 'कादिविद्या' ही अधिक प्रशस्त एवं
प्रमुख है ।
'कादि विद्या'—कामराजविद्या ककादिपञ्चदशवर्णात्मक है । इसीको कादि
विद्या' भी कहते हैं । तन्त्रराज तन्त्र में शिवजी देवी से कहते हैं—'हे देवी पार्वती ।
कादिविद्या तुम्हारा स्वरूप ही है । और उससे सब प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त होती
१. 'नित्यषोडशिकार्णव' 'वरिवस्यारहस्यम्'
२. प्रकाश

७८ वरिवस्यारहस्ये
है ।।' कादिविद्या का उद्धार आथर्वणात्रिपुरोपनिषद में—'कामोयोनिः.... विश्वमातादि
विद्या' द्वारा किया गया है ।
'लोपामुद्रा विद्या' ही 'हादिविद्या' है । यह भी पञ्चदशवर्णात्मिका है ।
कामेश्वराङ्कस्थिता कामेश्वरी के पूजामन्त्रों में 'कादि' एवं 'हादि' दोनों विद्याओं से
युक्त नाममन्त्र की योजना प्रचलित है । मनु, चन्द्र, कुबेर, अगस्ति, अग्नि, सूर्य,
इन्द्र, स्कन्द, शिव एवं क्रोधभट्टारक (दुर्वासा) १० विद्यायें केवल आम्नायपाठ मात्र
में उल्लिखित है । प्रचलित उपासना-पद्धतियों में उनका विशेष उपयोग नहीं है ।
वस्तुतः श्रीविद्या के १२ सम्प्रदाय थे । जो निम्न है—'मनुश्चन्द्रः कुबेरश्च लोपामुद्रा
च मन्मथः । अगस्तिः सूर्यश्च इन्द्रः स्कन्दः शिवस्तथा । क्रोधभट्टारको देव्या
द्वादशामी उपासकाः ॥'
इनमें से मनु, चन्द्र, कुबेर, लोपामुद्रा, मन्मथ, अगस्ति, अग्नि, सूर्य, इन्द्र,
स्कन्द, शिव एवं क्रोधभट्टारक (दुर्वासा)—सभी बारहों श्रीविद्या के उपासकों का
पृथक्-पृथक् अपना सम्प्रदाय था किन्तु इनमें चतुर्थ और पञ्चम (लोपामुद्रा एवं
मन्मथ) को छोड़कर अन्य सम्प्रदाय प्रचलित नहीं है । इनमें भी 'कामराजविद्या'
(मन्मथ सम्प्रदाय) का ही अधिक प्रसार है । 'त्रिपुरारहस्य' के माहात्म्यखण्ड के
अनुसार कामदेव ने भगवती त्रिपुरा की निर्व्याज, एकनिष्ठ उपासना करके उनसे जो
वर प्राप्त किए उसमें स्वोपासित 'कामराजविद्या' के उपासकों के लिए बहुत अधिक
सुविधायें प्राप्त करा दीं अतः 'कादि विद्या' अधिक प्राधान्य प्राप्त कर गई ।
'कामकलाविलास' के टीकाकार नटनानन्दनाथ ने 'चिद्वल्ली' में कहा है कि—
'इह श्रीविद्यारत्नागमे सन्तानद्वयमस्ति । कामराज सन्तानो लोपामुद्रासन्तानश्चेति ।
कामराजसन्तानक्रमस्तु सकल विद्यानुसन्ध्यविच्छिन्न इति प्राचीनगुरवोऽप्याचक्षते ।
लोपामुद्रासन्तानक्रमस्तु विच्छिन्नतया प्रवर्तत इति वर्णयन्ति ।।' इस प्रकार
नटनानन्दनाथ—(१) 'कामराज विद्या' (कादि विद्या) एवं (२) 'लोपामुद्रा विद्या'
(हादि विद्या) दो का ही उल्लेख करते हैं ।
'कामराज विद्या' (कादि विद्या)—यह विद्या ककारादिपञ्चदशवर्णात्मिका है
इसीलिए इसका नाम 'कादिविद्या' है । 'लोपामुद्रा' ऋग्वेद के अन्यतम ऋषि हैं
(ऋग्वेद १।१७९।१-२) ।
पञ्चदशाक्षरी विद्या—
(क) 'वाग्भवकूट' (आद्य खण्ड) : क ए ई ल ह्रीं ।—कादि विद्या ।
(प्रथम खण्ड)
(ख) 'कामकूट' : ह स क ह ल ह्रीं । हादि विद्या (द्वितीय खण्ड)
(ग) 'शक्तिकूट' : स क ल ह्रीं । सादि विद्या (तृतीय खण्ड)
१. 'लोपामुद्राविद्या'—ह, स, क, ह, ल, ह्रीं ।
२. 'क्रोधमुनिविद्या'—ह, स, क, ह, ल, ह्रीं ।

प्रथमोऽंशः ७९
३. 'मानवीविद्या'—ह, स, क, ह, ल, ह्रीं, क ए ई ल ह्रीं, ह स क ह
ल ह्रीं ।
४. 'चान्द्रीविद्या'—ह, स, क, ह, ल, ह्रीं, क, ए, ई, ल, ह्रीं, ह स क
ह ल ह्रीं, स क ल ह्रीं ।
५. 'कौबेरीविद्या'—ह, स, क, ह, ल, ह्रीं, क ए ई ल ह्रीं, ह, स, क,
ह, ल, ह्रीं, स क ल ह्रीं, ह, स, क, ह, ल, ह्रीं ।
६. 'अगस्त्यविद्या'—ह ह स क ह स क ए ल ह्रीं, ह स ह स क ह ल
ह्रीं ।
७. 'नन्दिविद्या'—ह, ह, स क ह स क ए ल ह्रीं, ह स ह स क ह ल
ह्रीं, ह स स क ल ह्रीं ।
८. 'प्रभाकरीविद्या'—क ए ल ह्रीं, ह स क ए ल ह्रीं, ह स ह स क ह
ल ह्रीं, ह स स क ल ह्रीं, ह स स क ल ह्रीं, स क ल ह्रीं ।
९. 'षण्मुखीमुद्रा'—ह्रीं, क्लीं हंसः, क्लीं लं ह्रीं, ह स क ह ल ह्रीं, सोहं
क्लीं हंसः, ह्रीं, हंसः सोहं हंसः । ह्रीं क्लीं हंसः, क्लीं लं ह्रीं, ह स
क ह ल ह्रीं, सोहं क्लीं हंसः ह्रीं हंसः, सोहं हंसः ह स क ए ल ह्रीं
ह स ह स क ह ल ह्रीं ह स स क ल ह्रीं ।
१०. 'वैष्णवी विद्या'—ह स क ए ल ह्रीं, ह स ह स क ह ल ह्रीं, ह स
स क ल ह्रीं, क ए ई ल ह्रीं, ह स क ह ल ह्रीं, क ए ई ल ह्रीं,
ह स क ह ल ह्रीं, स क ल ह्रीं, ह स क ह ल ह्रीं, ह स क ह ल
ह्रीं, स क ल ह्रीं ।
११. आदिविद्या (शक्ति-शिव विद्या)—(१) क ए ई ल ह्रीं (वाग्भवकूट)
(२) ह स क ह ल ह्रीं (कामकूट) (३) स क ल ह्रीं, (शक्तिकूट)
द्वादशविद्यायें—शक्तिशिव विद्या । लोपामुद्रा विद्या । क्रोधमुनिविद्या । मानवी
विद्या । चान्द्री विद्या । कौबेरी विद्या । अगस्त्य विद्या । नन्दि विद्या । प्रभाकरी
विद्या । षण्मुखी विद्या । परमशिव विद्या । वैष्णवी विद्या ॥
श्री विद्या का उपासना क्रम
काली क्रम सुन्दरी क्रम तारा क्रम
(कुण्डलिनी क्रम, (हंस क्रम, (समवरोधिनी क्रम,
कादिविद्या, हादिविद्या, सादिविद्या,
सत्वगुण प्रधान) रजोगुण प्रधान ।) तमोगुण प्रधान)
दश महाविद्यायें—'काली तारा षोडशी च बगला भुवनेश्वरी । धूमा छिन्ना च
मातङ्गी भैरवी कमलात्मिका ॥'

८० वरिवस्यारहस्ये
(१) 'कादि विद्या'—'क' से प्रारंभ (२) 'हादि विद्या'--'ह' से प्रारंभ (३)
'सादिविद्या'—'स' से प्रारंभ । पञ्चदशाक्षरी मन्त्र के ३ ककार + २ हकार =
('शिववर्ण') शेष बीजाक्षर = ('शक्ति वर्ण') ३ ह्रींकार (शिवशक्त्यात्मक) ।
('पञ्चदशीविद्या' = षोडशी 'विद्या' = पञ्चदशाक्षरी विद्या ।)
विद्यावर्णानुद्धरति—
क्रोधीशः श्रीकण्ठारूढः कोणत्रयं लक्ष्मीः ।
मांसमनुत्तररूढं वाग्भवकूटं प्रकीर्तितं प्रथमम् ॥ ९ ॥
शिवहंसब्रह्मवियच्छक्राः प्रत्येकमक्षरारूढाः ।
द्वितीयीकं कूटं कथितं तत् कामराजाख्यम् ॥ १० ॥
शिवतो वियतो मुक्तं तृतीयमिदमेव शक्तिकूटाख्यम् ।
हृल्लेखानां त्रितयं 'कूटत्रितयेऽपि योज्यमन्ते स्यात् ॥ ११ ॥
(कूटत्रय का स्वरूप)
(क) वाग्भव कूट का स्वरूप—'क ए ई ल'-ह्रीं—
श्रीकण्ठ (अ) से समन्वित क्रोधीश (क), कोणत्रय (त्रिकोण = त्रिभुज 'ए'),
लक्ष्मी (ई), अनुत्तर (अ) एवं मांस (ल) से युक्त प्रथम कूट 'वाग्भवकूट' कहा गया
है ॥ ९ ॥
(ख) कामराज कूट का स्वरूप— 'ह स क ह ल'-ह्री—
शिव (ह), हंस (स्), ब्रह्मा (क्), वियत् (ह), एवं शक्र (ल्),
(वर्ण-समुदाय) अक्षर (अ) से समन्वित होकर द्वितीय कूट 'कामराजकूट' कहा गया
है ॥ १० ॥
(ग) शक्ति कूट का स्वरूप—'स क ल-ह्रीं'—
शिव (ह) एवं वियत् (ह) से विरहित यही ('कामराज कूट') 'शक्तिकूट' नाम
वाला तृतीय (कूट) है । तीनों कूटों में अन्त में हृल्लेखा त्रिक जोड़ लेना चाहिए
(अर्थात् प्रत्येक कूट के अन्त में 'ह्रीं' जोड़ लेना चाहिए) ॥ ११ ॥

  • प्रकाश *
    क्रोधीशो ब्रह्मा च ककारः । श्रीकण्ठोऽनुत्तरमक्षरं चाकारः । तमारूढस्तेन
    युक्तः । कोणत्रयं योनिः । लक्ष्मीः कमला । मांसं शक्रश्चेन्द्रः । शिवो वियच्च हकारः ।
    हंसः सकारः । अक्षरसमूहात्मकत्वात् कूटत्वव्यपदेशः ॥ ९-११ ॥
  • सरोजिनी *
    उपर्युक्त श्लोक त्रय में पञ्चदशी (पञ्चदशाक्षरी । षोडशी) मन्त्र एवं उसके कूटों
    का विवरण प्रस्तुत किया गया है जो इस प्रकार है—