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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 169, कुल 530 में से

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पृष्ठ 169

प्रथमोऽंशः ६७
'स्वः' तीन व्याहृतियाँ हैं ।
छान्दोग्य श्रुति में एक कथा आती है कि एक समय प्रजापति ने लोकों में
सारतम वस्तु की जिज्ञासावश तप किया । तप—(१) पृथ्वी में अग्नि देवता को
(२) अन्तरिक्ष में वायु देवता को (३) स्वर्ग में आदित्य देवता को सार देखा ।
उन्होंने पुनः तप किया तो (१) अग्नि में ऋग्वेद को (२) वायु में यजुर्वेद को एवं
(३) आदित्य में सामवेद को सार देखा । उन्होंने पुनः तप किया (१) ऋग्वेद में
भूः को (२) यजुर्वेद में भुवः को एवं (३) सामवेद में स्वः व्याहृति को सार देखा ।
सार-क्रम (१) प्रथम दृष्ट्या सार—अग्नि, वायु, सूर्य (२) द्वितीय दृष्ट्या सार—
ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद । (३) तृतीय दृष्ट्या सार—(अन्तिम निष्कर्ष) : सारतमः
'भूः', 'भुवः', 'स्वः' ।। (१) 'भूः' = सत् (२) 'भुवः' = चित् (३) 'स्वः' =
आनन्द 'भूरिति सन्मात्रमुच्यते । भुव इति सर्वं भावयति प्रकाशयतीति व्युत्पत्या
चिद्रूपमुच्यते । सुप्रियते इति व्युत्पत्त्या स्वरिति सुष्ठु सर्वैन्द्रियमाणसुखस्वरूपमुच्यते ।'
(शाङ्कर भाष्य) ।। महः = सर्वातिशायी¹ महत्तर ।। तपः = सर्व तेजोरूप परतेज ।
जनः = सर्व का कारण । सत्य = सर्वबाधारहित । तत् = ब्रह्म । 'ॐ तत्सदिति
निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः' ।।²
'तच्छब्देन प्रत्यग्भूतं स्वतः सिद्धं परं ब्रह्मोच्यते इति ।।'³ 'सवितुः' शब्द भी
परमेश्वर का बोधक है । 'सवितुरिति सृष्टिस्थिति लयलक्षणस्य सर्वप्रपञ्चस्य
समस्तद्वैतविभ्रमस्याधिष्ठानं लक्ष्यत ।'⁴
'सवितुः सर्वान्तर्यामितया प्रेरकस्य जगत्स्रष्टुः परमेश्वरस्य इति ।।'⁵ 'वरेण्यं =
परमेश्वरस्यात्मभूतं वरेण्यं सर्वैरूपास्यतया ज्ञेयतया च संभजनीयम् ।।'⁶
भर्ग = अन्तर्यामी परज्योति । अविद्यादिदोषभर्जनात्मकज्ञानैक विषयत्वम् ।।'⁷
देवस्य = सर्व साक्षी चेता केवल निर्गुण ब्रह्मरूप आत्मा । धीमहि =
'आत्मत्येवोपासीत' आदि श्रुत्यर्थ के अनुष्ठान का सूचक । 'धियो यो नः
प्रचोदयात्' = प्रचोदयात् = अन्तर्यामी ब्राह्मण । 'धियो यो नः' अन्तर्यामी परब्रह्म
का प्रत्यगात्मा से अभेद ।
गायत्री मन्त्र का अर्थ—ॐकार का लक्ष्य, 'भूः' (सत्) 'भुवः' (चित्), 'स्वः'
(आनन्दस्वरूप), तत् = उस ('तत्त्वमसि' में प्रयुक्त तत् का व्यञ्जक), सवितुः =
(जगदुत्पादक, सूर्य के सूर्य), वरेण्यम् = (वरीय, श्रेष्ठतम्), भर्गः = (स्वज्ञान
द्वारा अविद्या का भर्जक, दाहक), देवस्य = ज्योतिः स्वरूप परब्रह्म का, धीमहि =
हम ध्यान करते हैं । प्रश्न—'वह स्वयं ज्योतिस्वरूप परब्रह्म कौन है? उत्तर—'धियो
यो नः प्रचोदयात्' (जो हमारी बुद्धि को शुभ कर्मों में प्रवृत्त करे)' अर्थात्—
अविद्यातत्कार्ययोर्भर्जनाद्भर्गः स्वयं ज्योतिः परब्रह्मात्मकं तेजः धीमहि तद्योऽहं सोऽसौ -


१. शङ्कराचार्य—प्रपञ्चसार तन्त्र । 'प्रपञ्चसार विवरण' (पद्मपादाचार्य)
२. गीता ३-४. शाङ्करभाष्य
५-६. सायण भाष्य ७. शाङ्करभाष्य