वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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'स्वाभाविक काया' का ही विकसित रूप है और इसे तन्त्र, 'सहजकाया' कहता है ।
यह तन्त्रों की अन्तिम साधना की निष्पत्ति है । 'सहजकाया' तुरीयावस्था से,
'धर्मकाया' सुषुप्ति से एवं संभोग काया स्वप्नावस्था से ऊँची है ।
तान्त्रिक बौद्धों ने कायों का जो वर्णन किया है उसका विवरण निम्नानुसार
है—
(१) 'सहजकाया'—करुणा—ज्ञानवज्र—विशुद्धियोग—तुरीय ।
(२) 'धर्मकाया'—मैत्री—चित्तवज्र—धर्मयोग—सुषुप्ति ।
(३) 'संभोगकाया'—मुदिता, वाग वज्र, मन्त्रयोग—स्वान ।
(४) 'निर्माण काया'—उपेक्षा, कायवज्र, संस्थानयोग—जाग्रत ।
तान्त्रिक बौद्धमत में महायान का 'काया सिद्धान्त' प्रसिद्ध है । हीनयान में भी
काया-सिद्धान्त मिलता है । हीनयानी गौतम बुद्ध को वास्तविक मनुष्य मानते थे।
'सर्वास्तिवाद' में (१) 'रूपकाया' एवं (२) 'धर्मकाया' को स्वीकार किया गया
है । प्रथम बाह्यकाया है और 'धर्मकाया' गुणों का शरीर है । महायान ने गुणों को
भी शून्य घोषित किया एवं धर्म-शून्यता का सिद्धान्त प्रतिपादित किया ।
चूँकि शरीर, गुण आदि सांवृत्तिक सत्य हैं, पारमार्थिक सत्य नहीं है अतः
माध्यमिकों के अनुसार वास्तविक 'धर्मकाया' अवर्ण्य, अवाङ्मनसगोचर, सर्वव्यापक,
सर्वाधार तत्त्व है और वह 'रूपकाया' 'निर्माणकाया' एवं 'संभोगकाया' का मूलाधार
है । तथागत बुद्ध का वास्तविक रूप 'धर्मकाया' है । महायान के अनुसार
काया-विभाजन प्रारंभिक रूप में निम्नानुसार है—(१) 'रूपकाया' (२) 'धर्मकाया' ।
'निर्माणकाया' स्थूल एवं सूक्ष्म दो प्रकार की है ।
'धर्मकाया'—धर्मों का शरीर (The body of merits) 'धर्मकाया' का प्रथम
रूप है । आध्यात्मिक काया (Metaphysical Principle underlying the
universe—the reality) तथता है । योगाचार सम्प्रदाय ने 'रूपकाया' के दो
भेद स्वीकार किये हैं—(१) 'रूपकाया' (२) 'संभोगकाया' । 'लङ्कावतार सूत्र' में
(१) संभोगकाया को 'निष्पन्द काया' कहा गया है । इसे ही 'निष्पन्दबुद्धि' भी
कहा गया है । योगाचारी 'धर्मकाया' भी स्वीकार करते हैं । यह 'स्वाभाविककाया'
है । 'पञ्चविंशतिसहस्रिका' में 'संभोगकाया' को सूक्ष्मशरीर के रूप में गृहीत किया
गया है । इसी 'सूक्ष्मकाया' से बुद्ध बोधिसत्वों को आंतरिक या गुह्य उपदेश देते
हैं । 'धर्मकाया' पावन शरीर है । माध्यमिक सम्प्रदाय जिसे 'तथता' या 'धर्मकाया'
कहता है, योगाचार उसे 'स्वाभाविक काया' कहता है । योगाचारी 'धर्मकाया' को
गुणों का समूह मानते हैं । इस प्रकार 'धर्मकाया' के स्वरूप के विषय में महायान
एवं योगाचार मत में मतभेद हैं । योगाचारी 'धर्मकाया' को एक 'पवित्र व्यक्तित्व'
(Purified Personality) कहते हैं जबकि माध्यमिक मत उसे 'अज्ञेय ब्रह्म' के
समान स्वीकार करता है । वसुबंधु के 'अभिधर्म कोश' में 'धर्मकाया' के दो अर्थ
५ वरि.