वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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योऽसौ सोऽहमिति वयं ध्यायेम ।१ प्रणवात्त गायत्री जपादि द्वारा उपास्य है । यहाँ
शुद्ध गायत्री मन्त्र प्रत्यगभिन्न ब्रह्म का बोधक है । समस्त दृश्यों का द्रष्टा जो मेरा
स्वरूप है यही सर्वाधिष्ठान है, परमानन्दरूप है, माया एवं तत्कार्यात्मक समस्त
अनर्थों से शून्य है, स्वयं प्रकाश एवं चिदात्मक ब्रह्म है, — इस प्रकार हम ध्यान
करते हैं । स्वविवर्त जड़ प्रपञ्च के साथ ब्रह्म का रज्जु-सर्प की भाँति
बाध-सामानाधिकरण्यरूप अभेद है, चिद्रूप प्रत्यगात्मा के साथ ब्रह्म का मुख्य
तादात्म्यरूप अभेद है, इस प्रकार सर्वात्मक ब्रह्म का बोधक यह गायत्री मन्त्र सिद्ध
होता है—'सोऽयमिति न्यायेन सर्वसाक्षिप्रत्यगात्मने । ब्रह्मणा सह तादात्म्यरूपमेकत्वं
भवति इति सर्वात्मक ब्रह्मबोधकोऽयं गायत्री मन्त्रः सम्पद्यते ।'२
प्रणव तत्त्व का गायत्री तत्त्व में समावेश—'प्रणव' = अ, उ, म् = ३
मात्रायें । अकार = व्यष्टि-समष्टि वैश्वानर विराट । 'उकार' = तैजस् हिरण्यगर्भ ।
मकार = प्राज्ञ ईश्वर ।
(क) गायत्री का प्रथम पाद = 'तत्सवितुर्वरेण्यम्'—इस पाद से—समस्त
प्रसूयमान प्रपञ्च की कर्तृशक्ति के वरेण्य प्राज्ञ से अभिन्न ईश्वर तत्त्व का प्रतिपादन
किया गया है तथा कार्य-कारण में अभेद होने के कारण कर्तृशक्ति में समस्त
कार्यवर्ग का आरोप एवं अन्तर्भाव सूचित) ।
(ख) गायत्री का द्वितीय पाद = 'भर्गो देवस्य धीमहि' से तैजस हिरण्यगर्भ
का प्रतिपादन किया गया है । (तेजवाचक 'भर्ग' पद एवं ध्यानकर्तृवाचक 'धीमहि'
पद से उक्त अर्थ ध्वनित है ।)
(ग) गायत्री का तृतीय पाद = 'प्रचोदयात्' = (प्रकृष्ट चोदना क्रिया से युक्त
= 'प्रचोदयात्' पद से—प्रकृष्ट क्रियाधर्मी वैश्वानर विराट सूचित) ।
(ङ) गायत्री का चतुर्थ पाद—प्रणव की चतुर्थ मात्रा का अन्तर्भाव ।
सारांश = प्रणवतत्त्व भी गायत्री तत्त्व में समाविष्ट ।३
गायत्रीमन्त्रगत प्रकृतियों का अंतर्भाव—गायत्री मन्त्रगत प्रकृतियों के अनुसार
संसार की समस्त अवस्थाओं का वर्णन—
(१) 'तत्'—(तनुविस्तारे) : ईश्वर में सर्वप्रथम सिसृक्षारूप सृष्टि-विस्तार की
भावना—'एकोऽहं बहुस्याम्' के रूप में उत्पन्न होती है । उसकी विस्तारेच्छा =
'तत्' का वाचक ।
(२) 'सवितुः' (षूञ् प्राणिगर्भविमोचने) : परमात्मा इच्छा करने के बाद जगत्
को उत्पन्न करता है ।)
१. सायणभाष्य २. शाङ्करभाष्य
३. आत्मा का प्रथम पाद 'वैश्वानर', आत्मा का द्वितीय पाद—'तैजस', आत्मा का
तृतीय पाद—'प्राज्ञ' आत्मा का चतुर्थ पाद—'प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं
चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा विज्ञेयः' = 'माण्डूक्योपनिषद्' ।