वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
पृष्ठ 168, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ें६६ वरिवस्यारहस्ये
हैं—(१) 'गुण' (२) पवित्र व्यक्तित्व । वसुबंधु कहते हैं कि बुद्ध की 'रूपकाया'
(भौतिक शरीर) अपवित्र है अतः उसकी शरण लेना उचित नहीं है । 'धर्मकाया'
की ही शरण लेना औचित्यपूर्ण है ।
'सद्धर्मपुण्डरीक' में कहा गया है कि बुद्ध ने युगों-पूर्व बुद्धत्व ग्रहण किया
था । तथागत अशरीरी हैं । जगत् को बुद्ध की काया निर्मितकाया ('निर्माण काया')
ही दिखाई पड़ती है । उनका वास्तविक स्वरूप 'धर्मकाया' है । यही माध्यमिकों का
मत है । माध्यमिक मत में बुद्ध की लीला को मात्र 'आभास' माना गया है । बुद्ध
लीला के लिए कोई भी रूप धारण कर लेते हैं और यही 'रूप काया' या
'निर्माणकाया' है ।
तज्ज्ञानार्थमुपाया विद्या लोके चतुर्दश प्रोक्ताः ।
तेष्वपि¹ च सारभूता वेदास्तत्रापि गायत्री ॥ ६ ॥
(विमर्श शक्ति के परिज्ञान के उपाय)
उस (विमर्श शक्ति) के ज्ञान के लिए संसार में चौदह विद्यायें कही गई हैं।
उन (१४ विद्याओं) में भी सारभूता श्रुतियाँ हैं और उनमें (श्रुतियों में) भी सारभूत
गायत्री है ॥ ६ ॥ ·
- प्रकाश *
चतुर्दश विद्याः—चत्वारो वेदाः षडङ्गानि न्यायो मीमांसा पुराणं धर्मशास्त्रं चेति ।
तन्त्राणां धर्मशास्त्रेऽन्तर्भावः । तेषां प्रामाण्यसमर्थनं त्वस्मदीये² त्रिपुरसुन्दरीबाह्य-
वरिवस्याविधौ द्रष्टव्यम् । तन्त्रराजव्याख्याने च विस्तरेण तन्त्राणां धर्मशास्त्रेऽन्तर्भावः
प्रपञ्चयिष्यते । एवं च न शिष्टाकोपाधिकरणस्थवार्त्तिकविरोधः, शास्त्रपरिमाणानति-
क्रमात् ॥ ६ ॥ - सरोजिनी *
तज्ज्ञानार्थ = उस विमर्श शक्ति के ज्ञान के लिए । विद्या लोके चतुर्दश
प्रोक्ताः = संसार में चौदह विद्यायें कही गई हैं । चौदह विद्यायें—ऋग्वेद, यजुर्वेद,
सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, निरुक्ति, ज्योतिष, छन्द, व्याकरण, न्याय,
मीमांसा, पुराण, धर्मशास्त्र । जहाँ तक तन्त्रशास्त्र का प्रश्न है वह धर्म शास्त्र में ही
अंतर्भूत हैं । तेष्वपि च सारभूता वेदा = उन चौदह विद्याओं में भी चतुष्टय
सारभूत विद्यायें हैं । तत्रापि गायत्री = उन वेदों में भी गायत्री सारभूत है ।
गायत्री = गायत्री मन्त्र वेदमन्त्र है । इसका स्वरूप निम्नांकित है—
'ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ॥'
व्याहृतियाँ—गायत्री मन्त्र के प्रारम्भ में जो—(१) 'भूः' (२) 'भुवः' (३)
१. तास्वपि २. चास्मदीये