वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
५२ वरिवस्यारहस्ये
विकसित होकर परस्पर संयुक्त दो पत्तियों के रूप में प्रकट होता है । ‘वैखरी वाक्’
वाणी की वह अवस्था है जिसमें पृथक्-पृथक् रूप में अभिव्यक्त पत्तियों की भाँति
वाणी मुख (एवं उसके उच्चारण स्थानों) द्वारा स्पष्ट रूप से प्रकट होती है ।
‘नित्यतन्त्र’ के अनुसार—
(१) वायु के द्वारा सर्वप्रथम मूलाधार चक्र में वाक् का अव्यक्त आद्यस्वरूप
‘परावाक्’ जागृत होता है ।
(२) तदुपरान्त यह वायु और अधिक ऊपर उठकर स्वाधिष्ठान चक्र में व्यक्त
होती है और वाणी के अभिव्यक्ति की इस अवस्था को ‘पश्यन्तीवाक्’
कहते हैं ।
(३) यह वायु अनाहतचक्र में पहुँच कर एवं बुद्धि के साथ मिलकर वाणी को
अभिव्यक्ति की जो अवस्था प्रदान करता है उसे ‘मध्यमावाक्’ कहते हैं ।
(४) इसके उपरान्त मध्यमावाक् और अधिक प्रस्फुट अभिव्यक्ति के स्तर पर
आरूढ़ होने पर एवं विशुद्ध चक्र में व्यक्त होकर जो अवस्था प्राप्त
करता है उसे वैखरीवाक् कहते हैं । सारांश निम्नानुसार है—
(१) मूलाधार चक्र—परावाक् (क) अव्यक्तवाक् (ख) स्वाधिष्ठान चक्र (२)
पश्यन्तीवाक्—वाक् की अङ्कुरोन्मुखावस्था । (३) अनाहत चक्र—बुद्धि के साथ
संयोग : मध्यमा वाक् : प्रकट किन्तु संयुक्त पत्तों वाली । (४) विशुद्ध चक्र—
कण्ठ से व्यक्त : वैखरी वाक् ॥ पूर्ण प्रस्फुट ॥
‘पश्यन्ती’ = अ, सृष्टि, वामा, इच्छा । ‘मध्यमा’ = इ, रक्षा, ज्येष्ठा,
ज्ञाना । ‘वैखरी’ = ‘म’ ओम् । विनाशा रौद्री । क्रिया ॥
अम्बिका शक्ति + शान्ता शक्ति का सामरस्य—वामा (इच्छा), ज्येष्ठा (ज्ञान),
रौद्री (क्रिया) का विकास (= पूर्ण गिरि, जालंधर एवं उड्डीयान पीठ का विकास)
= ‘पश्यन्ती’ ‘मध्यमा’ एवं वैखरी वाक् । भगवान् शङ्कराचार्यजी ने ‘प्रपञ्चसारतन्त्र’
में वाक् चतुष्टय की उत्पत्ति एवं उनके स्वरूप का निम्नानुसार विवेचन किया है—
‘मूलाधारात प्रथममुदितो यस्तु भावः पराख्यः ।
पश्चात् पश्यन्त्यथ हृदयगो बुद्धियुङ्मध्यमाख्यः ।
वक्त्रे वैखर्यथ रुरुदिषोरस्य जन्तोः सुषुम्ना ।
बद्धस्तस्माद्भवति पवनप्रेरितो वर्णसङ्घः ॥’
आचार्य पद्मपाद-कृत वाणी-विभाग—आचार्य पद्मपाद ने प्रपञ्चसारतन्त्र की
टीका में वाक् तत्त्व के ५ एवं ७ भेद किये हैं जो निम्न हैं—(१) शून्य (२)
संवित् (३) सूक्ष्मा (४) परा (५) पश्यन्ती (६) मध्यमा (७) वैखरी ।
(१) सूक्ष्मा (२) परा (३) पश्यन्ती (४) मध्यमा (५) वैखरी । इनमें ‘शून्य’
वह है जो स्पन्दशून्य वाक् के रूप में स्थित है । ‘संवित्’ का अर्थ है—सिसृक्षु ।
‘सूक्ष्मा’ का अर्थ है—उत्पत्ति की अवस्था । ‘परा’ का अर्थ है—मूलाधार में
प्रथमोऽंशः ५३
प्रथमोदित । (अथवा सूक्ष्मा, परा, पश्यन्ती, मध्यमा, वैखरीति पञ्चपदीं वाचमाश्रित्याह
मूलाधारादिति । सप्तपद्यपि वागनेनैव सूचिता । शून्य-संवित्सूक्ष्मादीनि सप्तपदानि ।
तत्रानुत्पन्ना निष्पन्दा 'शून्या' ।। वागुत्पित्सुः 'संवित्' । उत्पत्यवस्था 'सूक्ष्मा' ।
मूलाधारात् प्रथममुदिता परेति विभागः ।।'१
स्वच्छन्दागम एवं वाग्विभाग—
'तस्माच्छून्यं समुत्पन्नं शून्यात्स्पर्शसमुद्भवः ।
तस्मान्नादः समुत्पन्नः पूर्वं वै कथितस्तव ।।'
—इस श्लोक द्वारा 'स्वच्छन्दतन्त्र' में शून्य (व्यापिनी) स्पर्श (शक्ति) आदि
की ओर सङ्केत करके वाणी के ७ भेदों की ओर सङ्केत किया गया है ।
'शब्दब्रह्मणि निष्णातः परब्रह्माधिगच्छति ।।'
'शब्दब्रह्म' = परावाक् = कुण्डलिनी = प्रणव = ओंकार 'परब्रह्म ।।'
'शब्दब्रह्म' ➔ 'परब्रह्म'
वैखरी वाक्
(कोई प्रकाशन नहीं है।)
मध्यमा वाक्
(चेतन । प्रकाशित)
पश्यन्ती वाक्
(चेतन । प्रकाशित)
परा वाक्
(शब्दब्रह्म)
शब्दातीत 'परब्रह्म'
शब्द-सोपान ➔
४. सूक्ष्मतम | परा वाक्
३. सूक्ष्मतर | पश्यन्ती वाक्
२. सूक्ष्म | मध्यमा वाक्
१. स्थूल | वैखरी वाक्
१. प्रपञ्चसार टीका
५४ वरिवस्यारहस्ये
(१) 'चक्रमयी'—सृष्टि चक्रमयी है । श्रीचक्र में ही समस्त प्रपञ्च अन्तर्गर्भित
है । श्रीचक्र का विकास ही जगत् है । श्रीचक्र नवयोन्यात्मक, चिदानन्दघन है और
नवात्मक है—
'नवयोन्या चक्रं चिदानन्दघनं महत् ।
चक्रं नवात्मकमिदं नवधा भिन्नमन्त्रकम् ।।'
| श्रीचक्र के अंतर्गत चक्र | अधिष्ठात्री देवी | ||
|---|---|---|---|
| सर्वानन्दमय चक्र | महात्रिपुरसुन्दरी | बिन्दु | केन्द्रस्थ रक्तबिन्दु |
| सर्वसिद्धिप्रद चक्र | त्रिपुराम्बा | पीतवर्ण का त्रिकोण | |
| सर्वरोगहर चक्र | त्रिपुरसिद्धा | काले रङ्ग के १० त्रिकोण | |
| सर्वरक्षाकर चक्र | त्रिपुरमालिनी | अन्तर्दशार चक्र | हरे रङ्ग के ८ त्रिकोण |
| सर्वार्थसाधक चक्र | त्रिपुराश्री | बहिर्दशार चक्र | लाल रङ्ग के १० त्रिकोण |
| सर्वसौभाग्यदायक चक्र | त्रिपुरवासिनी | नीले रङ्ग के १४ त्रिकोण | |
| सर्वसङ्क्षोभणकारक चक्र | त्रिपुरसुन्दरी | गुलाबी रङ्ग का अष्टदल कमल | |
| सर्वाशापरिपूरक चक्र | त्रिपुरेशी | पीतवर्ण का षोडशदल कमल | |
| त्रैलोक्यमोहन | त्रिपुरा | हरे रङ्ग का बाह्यस्थल | |
| श्रीचक्र की नौ योनियाँ है—(१) मध्यत्रिकोण (२) अष्टार (३) अन्तर्दशार | |||
| (४) बहिर्दशार (५) चतुर्दशार (६) अष्टदलपद्म (७) षोडश दल पद्म (८) तीन | |||
| वृत्त (९) भूपुर । | |||
| श्रीचक्र में ९ त्रिकोण होते हैं । इन्हें योनियाँ भी कहते हैं । इनमें (क) ५ | |||
| शक्ति त्रिकोण एवं (ख) ४ शिव त्रिकोण । 'शक्तित्रिकोण' अधोमुखी एवं शिव | |||
| त्रिकोण ऊर्ध्वमुखी होते हैं । यही कौलमत है । | |||
| (१) 'शक्तिचक्र'—त्रिकोण, अष्टार, अन्तर्दशार, बहिर्दशार चतुर्दशार (२) | |||
| 'शिवचक्र'—अष्टदलपद्म, षोडशदलपद्म तीन वृत्त, भूपुर । इन चक्रों का पिण्डस्थ | |||
| चक्रों के साथ निम्न सम्बन्ध हैं— |
प्रथमोऽंशः ५५
(१) अकुलेसुषुम्नामूलरुणसहस्रदलकमले त्रिपुराधिष्ठितं त्रैलोक्यमोहनचक्रम्।
(२) वह्नावाधारे चतुर्दशकमले त्रिपुरेश्यधिष्ठितं सर्वाशापरिपूरणं चक्रम्। (३)
स्वाधिष्ठानस्थितषड्दलकमले त्रिपुरसुन्दर्य्यधिष्ठितं सर्वसङ्क्षोभण चक्रं । (४) नाभौ दश-
दल कमले त्रिपुरवासिन्यधिष्ठितं सर्वसौभाग्यदायक चक्रम् । (५) अनाहते द्वादश-
दलकमले त्रिपुरा श्रीसमधिष्ठितं सर्वार्थसाधकं चक्रं । (६) विशुद्धौ षोडशदलकमले
त्रिपुरमालिन्यधिष्ठितं सर्वरक्षाकरं चक्रं । (७) लम्बिकाग्रे तालुमूले अष्टदलकमले
त्रिपुरासिद्धयधिष्ठितं सर्वरोगहरं चक्रम् । (८) भ्रुवोरन्तरे द्विदलकमले त्रिपुराम्बिका-
धिष्ठितं सर्वसिद्धिप्रदं चक्रम् । (९) इन्दौ ललाटे बिन्दौ महात्रिपुरसुन्दर्यधिष्ठितं
सर्वानन्दमयं चक्रं भावयेत् ।।'१
(१) 'चक्रमयी'—सृष्टि चक्रमयी है । श्रीचक्र में ही समस्त प्रपञ्च अन्तर्गर्भित
है । श्रीचक्र का विकास ही जगत् है । श्रीचक्रान्तर्गत योनियों को भी 'चक्र' कहते
हैं वे निम्नलिखित हैं—
'नवमं त्र्यस्रमध्यं स्यात् तेषां नामान्यतः शृणु ।
त्रैलोक्यमोहनं चक्रं सर्वाशा परिपूरकम् ॥ ८२ ॥
सर्वसङ्क्षोभणं गौरि सर्वसौभाग्यदायकम् ।
सर्वार्थसाधकं चक्रं सर्वरक्षाकरं परम् ॥ ८३ ॥
सर्वरोगहरं देवि ! सर्वसिद्धिमयं तथा ।
सर्वानन्दमयं चापि नवमं शृणु सुन्दरि ॥ ८४ ॥
अत्र पूज्या महादेवी महात्रिपुरसुन्दरी ।
परिपूर्णं महाचक्रमजरामरकारकम् ॥ ८५ ॥'
'श्रीचक्र' नवयोन्यात्मक है, चिदानन्दघन है और नवात्मक है—
'नवयोन्यात्मक चक्रं चिदानन्दघनं महत् ।
चक्रं नवात्मकमिदं नवधा भिन्नमन्त्रकम् ।।'३
'श्रीचक्र' में जो अन्य ९ चक्र स्थित हैं वे निम्नांकित हैं—(१) त्रैलोक्यमोहन
(२) सर्वाशापरिपूरक (३) सर्वसङ्क्षोभण (४) सर्वसौभाग्यदायक (५) सर्वार्थसाधक
(६) सर्वरक्षाकर (७) सर्वरोगहर (८) सर्वसिद्धिमय (८) सर्वानन्दमय
(२) 'चक्रमयी'—पिण्ड में भी चक्र हैं जो निम्न हैं—(१) मूलाधार (२)
स्वाधिष्ठान (३) मणिपूरक (४) अनाहत (५) विशुद्धाख्य (६) आज्ञा (७) बिन्दु
(८) अर्द्धचन्द्र (९) रोधिनी (१०) नाद (११) नादान्त (१२) व्यापिनी (१३)
समना (१४) उन्मनी ।
'गोरक्षशतक' में पिण्डस्थ चक्रों को इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है
'चतुर्दलं स्यादाधारं स्वाधिष्ठानं च षड्दलम् । नाभौ दशदलं पद्मं सूर्यसंख्या दलं
१. योगिनीहृदय की टीका—'दीपिका'—अमृतानन्द
२-३. योगिनीहृदय
५६ वरिवस्यारहस्ये
हृदि । कण्ठे स्यात् षोड्शदलं भ्रूमध्ये द्विदलं तथा सहस्रदलमाख्यातं ब्रह्मरन्ध्रे
महापथे ॥'
'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' में ९ चक्रों का उल्लेख किया गया है जो निम्न हैं—
(१) (आधार में) ब्रह्मचक्र (२) स्वाधिष्ठान (३) नाभिचक्र (४) हृदयाधार (अष्टदल)
(५) कण्ठ चक्र (६) तालु चक्र (७) भ्रूचक्र (८) ब्रह्मरन्ध्र : निर्वाणचक्र (९)
आकाश चक्र । आज्ञाचक्र के ऊपर अन्य चक्र निम्न हैं—(१) बिन्दु, (२)
अर्धचन्द्र, (३) रोधिनी, (४) नाद, (५) नादान्त, (६) शक्ति, (७) व्यापिनी, (८)
समना, (९) उन्मना ।
बिन्द्वर्धचन्द्ररोधिन्यो नादनादान्त शक्तयः ।
व्यापिका समनोन्मन्य इति द्वादशसंहतिः ॥ (वरिवस्यारहस्यम्)
(३) 'चक्रमयी'—'यदा सा परमा शक्तिः स्वेच्छया विश्वरूपिणी
स्फुरत्तामात्मनः पश्येत्तदा चक्रस्य संभवः ।' (यो०हृ०) परमाशक्ति का परिणमन ही
चक्र है । ये चक्र निम्नांकित हैं—(क) श्रीचक्र । (ख) (१) मूलाधार (२)
स्वाधिष्ठान (३) मणिपूरक (४) अनाहत (५) विशुद्धाख्य (६) आज्ञा (७) बिन्दु
(८) अर्द्धचन्द्र (९) रोधिनी (१०) नाद (११) नादान्त (१२) शक्ति (१३)
व्यापिनी (१४) समना (१५) उन्मनी ।
'गोरक्षशतक' में इन चक्रों को इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है—
'चतुर्दलं स्यादाधारं स्वाधिष्ठानं च षड्शदलम् ।
नाभौ दशदलं पद्मं सूर्यसंख्या दलं हृदि ॥
कण्ठे स्यात् षोडशदलं भ्रूमध्ये द्विदलं तथा ।
सहस्रदलमाख्यातं ब्रह्मरन्ध्रे महापथे ॥'
'सिद्धसिद्धान्त पद्धति' में ९ चक्रों का उल्लेख किया है जो निम्न हैं—(१)
आधार में ब्रह्मचक्रं (२) स्वाधिष्ठान (३) नाभिचक्र (४) हृदयाधार (५) कण्ठचक्र
(६) तालुचक्र (७) भ्रूचक्र (८) ब्रह्मरन्ध्रः निर्वाणचक्र (९) आकाशचक्र ।
आगमानुसार 'आज्ञाचक्र' के ऊपर अन्य चक्र निम्न हैं—'बिन्दु', 'अर्द्धचन्द्र',
'रोधिनी', 'नाद', 'नादान्त', 'शक्ति', 'व्यापिनी', 'समना', 'उन्मना' ।
'बिन्द्वर्धचन्द्ररोधिन्यो नादं नादान्त शक्तयः ।
व्यापिका समनोन्मन्य इति द्वादशसंहतिः ॥'२
'सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषद' में निम्न नौ चक्रों का उल्लेख किया गया है—
(१) 'आधार चक्र'—मूलाधार में त्रिरावृत्तभङ्गया वह्निमण्डलाकार ब्रह्मचक्र है ।
यहीं मूलकन्द में पावकाकार शक्ति का ध्यान करना चाहिए । यहीं मूलाधार में
सर्वकामप्रद कामरूपपीठ स्थित है । यही है आधार चक्र का स्वरूप ।
१. गोरक्षनाथ—'योगशतक' २. 'वरिवस्यारहस्यम्'
प्रथमोऽंशः ५७
(२) 'स्वाधिष्ठान चक्र'—द्वितीय चक्र षडदलात्मक स्वाधिष्ठान है । उसके
मध्य में (मांसाकार) पश्चिमाभिमुखी ज्योतिर्लिङ्ग है जो कि प्रवाल सदृश है , यहीं
उड्डीयानपीठ है जो कि जगदाकर्षण सिद्धि प्रदान करने वाला है ।
(३) 'मणिपूरक चक्र'—तृतीय चक्र 'नाभिचक्र' है जो कि पञ्चावर्त सर्प
कुटिलाकार है । उसमें बालार्ककोटिप्रभा कुण्डलिनी का ध्यान करना चाहिए ।
मणिपूरक सर्वसिद्धिप्रद एवं सर्व सामर्थ्यवान चक्र है ।
(४) 'हृदय चक्र'—यह अधोमुखी अष्टदलात्मक चक्र है । इसके आकाश के
मध्य ज्योतिर्लिङ्ग का ध्यान करना चाहिए इसी अष्टदलात्मक हृदयचक्र में 'हंसकला'
स्थित है जो कि सर्वप्रिया एवं सर्वलोकवश्यकरी है ।
(५) 'कण्ठ चक्र'—चतुरङ्गुल कण्ठचक्र के वामभाग में इडा नाम्नी चन्द्रनाडी
एवं दक्षिण दिशा में पिङ्गला नाम्नी सूर्यनाड़ी एवं उसके मध्य में श्वेतवर्णा सुषुम्ना
का ध्यान करना चाहिए । ऐसे ध्याता को अनाहतसिद्धि प्राप्त होती है ।
(६) 'तालु चक्र'—तालुमूल चक्र में लक्ष्य का ध्यान करने से सूर्य एवं
चन्द्रमा को एकता स्थापित होती है । वहाँ अमृत प्रवाहित होता है । वहाँ
ऊर्ध्वमूलचक्ररन्ध्र में जो अन्तर्जिह्वा स्थित है और 'घण्टिकालिङ्ग' कहलाता है वहीं
राजदन्तावलम्बिनी विवर 'दशमद्वार' है । वहाँ वृत्ति शून्य होकर ध्यान करने से चित्त
का लय हो जाता है ।
(७) 'भ्रू चक्र'—सातवाँ चक्र जो अङ्गुष्ठमात्र है और 'भ्रू चक्र' कहलाता है ।
वहाँ ज्ञाननेत्र का दीप शिखाकार रूप में ध्यान करना चाहिए । वहीं कपालकन्द है ।
यह आज्ञाचक्र वाक्सिद्धि प्रदान करता है ।
(८) 'ब्रह्मरन्ध्र निर्वाणचक्र'—यह अष्टम चक्र है । यहाँ सूचिका गृह से भी
अधिक सूक्ष्म ('सूचिकागृहेतर') धूम्रशिखा का ध्यान करना चाहिए । वहीं
जालन्धरपीठ है जो मोक्षप्रद है और परब्रह्मचक्र है ।
(९) 'आकाश चक्र'—नवम चक्र आकाश चक्र है । यह षोडशदलोपेत एवं
ऊर्ध्वमुख है । उसके मध्य में स्थित है—त्रिकूटाकार ज्योति । ('त्रिकूट' = भ्रूमध्य)
'ऊर्ध्वमुन्नयते इत्योंकारः' के अनुसार ऊर्ध्वशक्तिता (तुरीयोंकाररूपता) ब्रह्माभिन्न
'परशून्य' का ध्यान करना चाहिए । वहीं सर्वेच्छासिद्धिसाधक 'पूर्णगिरिपीठ' विद्यमान
है ।
'स्वच्छन्दतन्त्र' में 'आधारपङ्कज' 'स्वाधिष्ठान' 'अनाहत' विशुद्ध के अतिरिक्त
लम्बिका के अग्रभाग में भी एक 'अष्टदलकमल' का वर्णन किया
गया है—
'कण्ठोर्ध्वं परमेशानि लम्बिकाचतुरङ्गुले ।
तस्यामष्ट दलं पद्मं रसिकादिभिरावृतम् ॥'
५८ वरिवस्यारहस्ये
यह सूक्ष्मजिह्वा स्थानीय है ।१ 'स्वच्छन्दतन्त्र' के ही अनुसार मूलाधार में ही
षड्दलात्मक 'कुलपद्म' भी है जो कि चतुर्दलात्मक मूलाधार चक्र से भिन्न है ।
उसके नीचे स्थित है—'अष्टदलसहस्र अकुल' । यह कुलपद्म से भिन्न है । 'अकुल'
कहने से 'कुलपद्म' एवं 'अकुल' दोनों का ग्रहण किया जाता है अतः दोनों के
व्यावर्तन हेतु अकुल को 'विषु' भी कहा जाता है ।२
षट्चक्रों का पूर्ण विवरण अगले पृष्ठ पर तालिका में इस प्रकार है—
सृष्टि और चक्र—'सहस्रार' बिन्दु होता है । इसी कारण वह 'बैन्दव गृह'
है । उस बिन्दु से ही कारण सहित यह सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न होता है । उस 'बिन्दु'
से ही 'मूलाधार' एवं 'स्वाधिष्ठान' के दस दलों की उत्पत्ति होती है । सहस्रार से
उत्पन्न होकर यही बिन्दु दस रूपों में रूपान्तरित हो जाता है—
'सहस्रारं बिन्दुर्भवति च ततो बैन्दवगृहं ।
तदेतस्माज्जातं जगदिदमशेषं स करणम् ।।
ततो मूलाधाराद्वितयमभवत्तद्दशदलं ।
सहस्राराज्जातं तदिति दशधाबिन्दुरभवत् ।।'३
इसी दशधा विभक्त 'बिन्दु' से मणिपूर के १०, अनाहत के १२, विशुद्धाख्य
के १६ एवं आज्ञा के २ दल निर्मित होते हैं । कौलमार्गी यह मानते हैं कि
'मूलाधार' एवं 'स्वाधिष्ठान' ही कारणस्थान हैं अतः वे इन्हीं में ही भगवती की
उपासना भी करते हैं ।४
'सृष्टिस्तु कुण्डली ख्याता' स्वीकार करके ऋषियों ने सृष्टि का उपादान एवं
उपादान कारण कुण्डली शक्ति को माना है । 'बिन्दु' ही सृष्टि का मूल केन्द्र है ।
शक्ति अपने निर्गुण स्वरूप में बिन्दुरूपा है । कुण्डलिनी शक्ति सहस्रार में परमशिव
से मिलकर बिन्दुरूपा हो जाती है । उन्मनी अवस्था में यह बिन्दुस्वरूपा है ।
कुण्डलिनी शक्ति सहस्रार में 'बिन्दु' रूप में निवास करती है । इसी कारण सहस्रार
को 'बैन्दव गृह' कहते हैं । शक्ति का यह रूप ही 'परम बिन्दु' या 'कारणबिन्दु'
है । समस्त प्रपञ्च का कारण होने के कारण ही इसे 'कारण बिन्दु' कहते हैं । यह
अवस्था चने की भाँति है । इसमें दो दालें एकरूप होकर रहती हैं । ये दो दालें
शिव एवं शक्ति एवं चना 'कारण बिन्दु' सदृश है ।
बीज से वृक्षोत्पत्ति की प्रक्रिया—(१) बीज फूलना, (२) दो दालों का
पृथक्-पृथक् होना फिर (३) अङ्कुर फूटना, (४) वृक्ष ।
निष्क्रिय ब्रह्म की सिसृक्षा—अहं का स्फुरण (बीज के फूलने के सदृश
अवस्था) = 'कारणबिन्दु'—अहं एवं इदं का उदय (शिव शक्ति का उदय)—
नाद-बिन्दु की उत्पत्ति । शिव-शक्ति = श्वेत + रक्त बिन्दु या कार्य बिन्दु + बीज ।
१-२. सेतुबन्ध ३. सुभगोदय स्तुति (गौड़पादाचार्य)
४. सुभगोदय स्तुति (श्लोक ४८)
प्रथमोऽंशः ५९
| चक्र | स्थान | पीठ | दल संख्या | वर्ण | तत्त्व/गुण | तत्त्व का रङ्ग | मण्डल का आकार | बीज/वाहन | देवता/वाहन | शक्ति/लिङ्ग |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १. मूलाधार चक्र | पायु-मुष्क के मध्य (रीढ़ के अधोभाग में) | कामाख्या पीठ | ०४ | व, श, ष, स, | पृथ्वी, आकर्षण/गंध | पीतवर्ण | वर्गाकार | लं/ ऐरावत | ब्रह्मा हंस | डाकिनी/ स्वयंभू |
| २. स्वाधिष्ठान चक्र | मेरुदण्ड में मेढ़ के ऊपर | — | ०६ | ब, भ, म, य, र, ल, | जल/सङ्कोचन/ रस | श्वेतवर्ण | अर्द्धचन्द्र | वं/ मकर | विष्णु गरुड़ | राकिनी |
| ३. मणिपूरचक्र | मेरुदण्ड में नाभि के पास | — | १० | ड, ढ, ण, त, थ, द, ध, न, प, फ | तेज/प्रसरण/ रूप | रक्तवर्ण | त्रिभुज | रं/ मेष | रुद्र वृषभ | लाकिनी |
| ४. अनाहतचक्र | हृदय के पास | पूर्णगिरि पीठ | १२ | क, ख, ग, घ, ङ, च, छ, ज, झ, ञ, ट, ठ | वायु/गति/ स्पर्श | धूम्रवर्ण | षट्कोण | यं/ कृष्णमृग | ईश | काकिनी/ बाण |
| ५. विशुद्धाख्य चक्र | कण्ठ के पास | जालंधर पीठ | १६ | अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ॠ, ऌ, ॡ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः | आकाश/ अवकाश/ शब्द | श्वेतवर्ण | वृत्त | हं/ श्वेत हस्ती | सदाशिव | शाकिनी |
६० वरिवस्यारहस्ये
| ६. आज्ञाचक्र | भ्रुवद्वय के मध्य | उड्डीयान पीठ | ०२ | हं, क्षं | मन | — | — | ओं | शाम्भु | हाकिनी शक्ति/इतरलिङ्ग |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ७. सहस्रार (शून्यचक्र) | महानाद के ऊपर, शंखिनी नाड़ी के ऊपर विसर्ग नामक शक्ति के नीचे पूर्णचन्द्र के समान शुभ्र सहस्रदल युक्त निम्नाभिमुख । सहस्रदल की कर्णिका में परमामृत समूह से स्निग्ध चन्द्र मण्डल है । उसके भीतर त्रिकोण है । उसके भीतर बिन्दु रूप शून्य है । यहीं स्थित हैं शून्याकार एवं सर्वात्मा परमशिव । | — | १००० | समस्त स्वर एवं समस्त व्यञ्जन | तत्त्वातीत/गुणातीत | श्वेतवर्ण | — | — | परमशिव परमहंस | — |
प्रथमोऽंशः ६१
सहस्रार से उत्पन्न यह 'बिन्दु' ही दशधा विभक्त होकर 'मूलाधार' एवं
स्वाधिष्ठान कमलों का दस दल बन जाता है । कौलमार्गियों के मतानुसार मूलाधार
एवं स्वाधिष्ठान ही 'कारणस्थान' है । सम्पूर्ण जगत् का 'कारण बिन्दु' जो
'सहस्रार' में स्थित है वही दशधा विभक्त होकर सभी चक्रों के दलों के रूप में
प्रकट होता है—
'दशधा भिद्यते बिन्दुः एक एव परात्मकः । चतुर्धाऽऽधार कमलेषोढा- ऽधिष्ठान
पङ्कजे, 'अधिष्ठानाधार द्वितयमिदमेव दशदलं । सहस्राराज्जात मणिपूर
मतोऽभूद्दशदलम् ।।' 'तदेवैको बिन्दुर्भवति जगदुत्पत्ति कृदयम् ।।'१
(क) सहस्रार से उत्पन्न (१) 'मूलाधार' एवं (२) 'स्वाधिष्ठान' के १० दल
'मणिपूर चक्र' के १० दल बन जाते हैं । (मणिपूर में मू०स्वा० दोनों हैं ।)
(ख) हृदय एवं मूलाधार के १२ + ४ दल मिलकर विशुद्धार चक्र के १६
दल बन जाते है । (विशुद्धाख्य में—अनाहत + मूलाधार दोनों हैं ।)
(ग) मणिपूर के १० दल एवं मूलाधार एवं स्वाधिष्ठान चक्र (२) = १० +
२ मिलकर अनाहत चक्र के १२ दल बन जाते हैं ।
(घ) मूलाधार एवं स्वाधिष्ठान आज्ञा चक्र में दो दलों के रूप में रूपान्तरित
हो जाता है । ये ही दो दल सहस्रार में एक बिन्दु के रूप में शेष रह जाते हैं ।
सारांश—मणिपूर से आज्ञा चक्र तक के समस्त चक्र मूलाधार एवं
स्वाधिष्ठानरूप हैं ।२ इसीलिए कहा गया है कि समस्त चक्रों का त्याग करके
सहस्रार में एक बिन्दु रूप में भगवती के परा संवित् रूप का ध्यान करना
चाहिए ।
'देहमयी'—'अण्ड' या 'पिण्ड' ही देह है । हिरण्यगर्भ भी स्वर्णाण्ड ही था ।
पराशक्ति सृष्टयोन्मुख होने पर 'अण्ड', 'ब्रह्माण्ड', 'प्रकृत्यण्ड', 'मायाण्ड' एवं
'शक्ताण्ड' के रूप में परिणत हो जाती है । उसमें ही समस्त षट्त्रिंशादात्म जगत्
निहित है—उस शक्ति के दो रूप हैं—(१) पुरुषरूप—'परमशिव' (२) नारीरूप—
'विमर्श' । उसी में षट्त्रिंशादात्म जगत् स्थित है—'भारूपं परिपूर्ण स्वात्मनि विश्रान्ति
तो महानन्दम् । इच्छा संवित्करणैर्निर्भरितम् अन्तः शक्तिपरिपूर्णं । सर्वविकल्पविहीनं
शुद्धं शान्तं लयोदयविहीनम् । यत्पर तत्त्वं तस्मिन् विभाति षट्त्रिंशादात्म जगत् ।'
देहों की दृष्टि से यदि विचार किया जाय तो विश्व में (१) पिण्डज (२)
जरायुज (३) स्वेदज (४) उद्भिज देह हैं । पार्थिव, आंभस, तैजस, वायव्य शरीर
भी हैं और उनके मिश्रित शरीर भी हैं । मानव शरीर ब्रह्माण्ड का प्रतिबिम्ब माना
१. सुभगोदय स्तुति
२. मूलाधार में यह बिन्दु मन, बुद्धि, चित्त एवं अहङ्कार तथा स्वाधिष्ठान में—
काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य (६) बन जाता है । एक परमतत्त्व
दशधा होकर जगत् की सृष्टि करता है ।
६२ वरिवस्यारहस्ये
जाता है और इसीलिए कहा गया है कि—'यत् पिण्डे तद् ब्रह्माण्डे' मानव शरीर
'ब्रह्मपुर' कहा गया है—ब्रह्म का नगर कहा गया है । ईश्वर स्वयमेव प्रपञ्च में
'जीव' बनकर प्रवेश करता है । 'तत्त्वमसि' इसी सत्य का साक्षी है । मानव शरीर
पञ्चकोशात्मक है । पञ्चकोश निम्नांकित हैं—(१) 'अन्नमय', (२) 'प्राणामय', (३)
'मनोमय', (४) 'विज्ञानमय', (५) 'आनन्दमय' ।
थियोसॉफी के अनुसार—(१) 'अन्नमय एवं प्राणमय कोश' = 'भौतिक
शरीर' । (अन्नमय = 'प्राणमय' = Dense/ethenic (२) 'मनोमय कोश' =
Astral and lower 'mental body' (काम शरीर) (३) 'विज्ञानमय कोश' =
उच्चस्तरीय मानसिक शरीर या 'कारणशरीर' (४) 'आनन्दमयकोश' = 'आत्मिक
शरीर' । (Ātmic body)
(१) पुराणों एवं षड्दर्शनों में ३ प्रकार के शरीर कहे गए हैं—(१)
'स्थूलशरीर' (षाट्कौशिक शरीर) (२) 'सूक्ष्म शरीर' (३) 'कारण शरीर' । (Gross
or Phenomenal body, Astral body, casual body)
(१) 'स्थूलशरीर' = पञ्चकोशात्मक, धातुमय, अन्न-रस, रक्त, मांस, मेद,
शुक्र से निर्मित जड़ एवं पांचभौतिक मांसल शरीर ।
(२) 'सूक्ष्मशरीर' = स्थूलशरीर से सूक्ष्मतर शरीर । ५ ज्ञानेन्द्रियों, ५
कर्मेन्द्रियों, मन, बुद्धि, चित्त, अहङ्कार, ५ प्राण से समन्वितशरीर ।
(३) 'कारणशरीर' = अज्ञान की उपाधि जो सुषुप्ति में भी वर्तमान रहती है
वह 'कारणशरीर' कहलाती है । मुक्ति के पूर्व इससे मुक्ति संभव नहीं । मोक्ष में ५
कोश भी नहीं रहते । सांख्य मत के अनुसार सूक्ष्म शरीर या लिङ्ग शरीर का जो
स्वरूप है वह अन्य शास्त्रों से भिन्न है ।
'सांख्यकारिका' में ईश्वरकृष्ण ने सूक्ष्म शरीर (लिङ्ग शरीर) का इस प्रकार
प्रस्तुतीकरण किया है—'पूर्वोत्पन्नमसक्तं नियतं महदादिसूक्ष्मपर्यन्तम् । संसरति
निरुपभोगं भावैरधिवासितं लिङ्गम् ।'१
यह सूक्ष्म शरीर १८ तत्त्वों से निर्मित होता है जो निम्न हैं—(१) मन (२)
बुद्धि (३) अहङ्कार (४) ५ ज्ञानेन्द्रियाँ (५) ५ कर्मेन्द्रियाँ (६) ५ तन्मात्रायें ।
इसका स्वरूप इस प्रकार है—'चित्रं यथाऽऽश्रयमृते, स्थाण्वादिभ्यो बिना
यथाच्छाया । तद्वद्विना विशेषैर्न तिष्ठति निराश्रयं लिङ्गम् ॥ (४१)२ पुरुषार्थहेतुकमिदं
निमित्तनैमित्तिकप्रसङ्गेन । प्रकृतेर्विभुत्वयोगान्नटवद् व्यवतिष्ठते लिङ्गम् ॥'(४२)३
अन्नमय कोश स्थूल शरीर है । प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय कोश सूक्ष्म
शरीर के तत्त्व हैं । वेदान्त मत में ५ ज्ञानेन्द्रियाँ, ५ कर्मेन्द्रियाँ, मन, बुद्धि एवं ५
प्राण मिलकर सूक्ष्मशरीर की रचना करते हैं ।
१-३. सांख्यकारिका
प्रथमोऽंशः ६३
स्थूल शरीर और
उसके
पञ्चकोश
आत्मा ← [पञ्चकोश-चक्र] → अन्नमय कोश
प्राणमय कोश
मनोमय कोश
विज्ञानमय कोश
आनन्दमय कोश
माध्यमिक मत— 'धर्मकाया', रूपकाया, निर्माणकाया, संभोगकाया ।
'धर्मकाया' ही वास्तविक काया है और समस्त काया-समूह की जननी है ।
महायान—(१) रूपकाया (निर्माणकाया) (स्थूल एवं सूक्ष्म) (२) धर्मकाया ।
'निर्माणकाया' 'संभोगकाया' 'धर्मकाया' एवं 'सहजकाया'—मुख्यतः ये ही काया की
चार कोटियाँ हैं ।
'धर्मकाया'—द्वितीय काया है और प्रकाशमय है । सुषुप्ति के क्षय से
नित्यानित्य भेदों से रहित, मैत्री से पूर्ण, चित्त की निर्विकल्पावस्था को ही धर्मकाया
या चित्तवज्र कहते हैं । यह तर्कातीतावस्था है । प्रज्ञोपाय-ऐक्य के कारण इसे
'धर्मात्मा योग' भी कहा गया है । यह सुषुप्ति से उच्चतर स्थिति है । असङ्ग ने
'धर्मकाया' को पारमार्थिक एवं अज्ञेय माना है । भगवान् बुद्ध 'संभोगकाया' धारण
करके भक्तों को आन्तरिक उपदेश देते हैं । इसी काया से बुद्ध ने महायान का
उपदेश दिया ।
'संभोग काया' तृतीय काया है । इसी काया में स्थित होकर बुद्ध ने
गृद्धकूट पर्वत पर 'मन्त्रयान' का उपदेश दिया था । इसे ही 'वाग्वज्र' भी कहा
गया है । यही मन्त्रयोग एवं तन्त्रोपदेश की (बुद्ध द्वारा गृहीत) काया है । यहाँ
प्रज्ञोपाय की एकता है समस्त संस्कारों, तर्कों, इच्छाओं, तृष्णाओं के शान्त या
नष्ट हो जाने पर ही यह काया प्राप्त होती है । बीज मन्त्रों का जन्म भी इसी
काया में होता है ।
६४ वरिवस्यारहस्ये
'निर्माण काया'—वह भौतिक काया 'निर्माण काया' है जिसे धारण करके
शाक्य मुनि श्रावकयान, प्रत्येक यान एवं बोधिसत्वों को उपदेश देते हैं । भगवान्
बुद्ध—(१) निर्माण काया द्वारा बाह्य नैतिक उपदेश देते हैं । (२) संभोग काया
द्वारा गृद्धकूट पर महायान का उपदेश दिया । (३) संभोग काया द्वारा धान्यकूट पर
तन्त्रमार्ग का उपदेश दिया । धर्मकाया अज्ञेय है ।
'चतुर्थ काया'—'निर्माण काया' । जागृतावस्था का क्षय→निर्माण काया ।
'निर्माण काया' प्रारम्भिक होते हुए भी नारोपा के मतानुसार अंतिम अवस्था है और
यही 'सहज काया' है, यही शून्यता है, यही ज्ञानवज्र एवं शुद्ध योग है ।
सहजावस्था या सहज काया ही चतुर्थ काया है । 'सहज काया' ही निर्माण काया
है—सहज साधना→कायावज्र । असङ्ग के मतानुसार शिल्प, जन्म ज्ञान एवं निर्वाण
की शिक्षा देने हेतु भगवान् 'निर्माण काया' धारण करते हैं । यह काया कर्मों द्वारा
उत्पन्न नहीं होती । धर्मसंस्थापनार्थ यह धारण की जाती है । तान्त्रिक बौद्ध धर्म के
अनुसार काया-विवरण निम्नानुसार है—
काया
रूपकाया संभोगकाया 'धर्मकाया'
या (माध्यमिक) योगाचार
निर्माणकाया (स्वाभाविक काया)
(भौतिकशरीर) परसंभोगकाया स्वसंभोगकाया
(उपदेश के समय) (स्वर्गस्थित रूप) (अज्ञेय तत्त्व)
स्थूल सूक्ष्म
सांवृत्तिक सत्य पारमार्थिक सत्य
'वज्रयोग' के अनुसार काया विषयक विवरण—
(१) निर्माणकाया—कायावज्र—विशुद्धयोग—शून्यता विमोक्ष ।
(२) संभोगकाया—वागवज्र—धर्म योग—अनिमिता विमोक्ष ।
(३) धर्मकाया—चित् वज्र—मन्त्रयोग—अपरिहित ।
(४) सहजकाया—ज्ञानवज्र—संस्थान योग—अनभिसंस्कार ।
अभिसम्बोधि सिद्धान्त—अभिसम्बोधि = पूर्ण प्रकाश ।
(१) एकक्षणाभिसम्बोधि—सहजकाया (२) पञ्चकारसम्बोधि—धर्मकाया । (३)
विंशत्याकार सम्बोधि—संभोगकाया (४) मायाजालाभिसंबोधि—निर्माणकाया ।
'कायावज्र' = भौतिक शरीरादि की उन्नति । 'वाग्वज्र' = वाणी की पूर्णता ।
'चित्तवज्र' = मानसिक विकास । 'ज्ञानवज्र' = प्रज्ञा का विकास । वज्रयान
(मन्त्रयान) में तीन कायाओं के अतिरिक्त एक चतुर्थ काया—विज्ञान वादियों की
प्रथमोऽंशः ६५
'स्वाभाविक काया' का ही विकसित रूप है और इसे तन्त्र, 'सहजकाया' कहता है ।
यह तन्त्रों की अन्तिम साधना की निष्पत्ति है । 'सहजकाया' तुरीयावस्था से,
'धर्मकाया' सुषुप्ति से एवं संभोग काया स्वप्नावस्था से ऊँची है ।
तान्त्रिक बौद्धों ने कायों का जो वर्णन किया है उसका विवरण निम्नानुसार
है—
(१) 'सहजकाया'—करुणा—ज्ञानवज्र—विशुद्धियोग—तुरीय ।
(२) 'धर्मकाया'—मैत्री—चित्तवज्र—धर्मयोग—सुषुप्ति ।
(३) 'संभोगकाया'—मुदिता, वाग वज्र, मन्त्रयोग—स्वान ।
(४) 'निर्माण काया'—उपेक्षा, कायवज्र, संस्थानयोग—जाग्रत ।
तान्त्रिक बौद्धमत में महायान का 'काया सिद्धान्त' प्रसिद्ध है । हीनयान में भी
काया-सिद्धान्त मिलता है । हीनयानी गौतम बुद्ध को वास्तविक मनुष्य मानते थे।
'सर्वास्तिवाद' में (१) 'रूपकाया' एवं (२) 'धर्मकाया' को स्वीकार किया गया
है । प्रथम बाह्यकाया है और 'धर्मकाया' गुणों का शरीर है । महायान ने गुणों को
भी शून्य घोषित किया एवं धर्म-शून्यता का सिद्धान्त प्रतिपादित किया ।
चूँकि शरीर, गुण आदि सांवृत्तिक सत्य हैं, पारमार्थिक सत्य नहीं है अतः
माध्यमिकों के अनुसार वास्तविक 'धर्मकाया' अवर्ण्य, अवाङ्मनसगोचर, सर्वव्यापक,
सर्वाधार तत्त्व है और वह 'रूपकाया' 'निर्माणकाया' एवं 'संभोगकाया' का मूलाधार
है । तथागत बुद्ध का वास्तविक रूप 'धर्मकाया' है । महायान के अनुसार
काया-विभाजन प्रारंभिक रूप में निम्नानुसार है—(१) 'रूपकाया' (२) 'धर्मकाया' ।
'निर्माणकाया' स्थूल एवं सूक्ष्म दो प्रकार की है ।
'धर्मकाया'—धर्मों का शरीर (The body of merits) 'धर्मकाया' का प्रथम
रूप है । आध्यात्मिक काया (Metaphysical Principle underlying the
universe—the reality) तथता है । योगाचार सम्प्रदाय ने 'रूपकाया' के दो
भेद स्वीकार किये हैं—(१) 'रूपकाया' (२) 'संभोगकाया' । 'लङ्कावतार सूत्र' में
(१) संभोगकाया को 'निष्पन्द काया' कहा गया है । इसे ही 'निष्पन्दबुद्धि' भी
कहा गया है । योगाचारी 'धर्मकाया' भी स्वीकार करते हैं । यह 'स्वाभाविककाया'
है । 'पञ्चविंशतिसहस्रिका' में 'संभोगकाया' को सूक्ष्मशरीर के रूप में गृहीत किया
गया है । इसी 'सूक्ष्मकाया' से बुद्ध बोधिसत्वों को आंतरिक या गुह्य उपदेश देते
हैं । 'धर्मकाया' पावन शरीर है । माध्यमिक सम्प्रदाय जिसे 'तथता' या 'धर्मकाया'
कहता है, योगाचार उसे 'स्वाभाविक काया' कहता है । योगाचारी 'धर्मकाया' को
गुणों का समूह मानते हैं । इस प्रकार 'धर्मकाया' के स्वरूप के विषय में महायान
एवं योगाचार मत में मतभेद हैं । योगाचारी 'धर्मकाया' को एक 'पवित्र व्यक्तित्व'
(Purified Personality) कहते हैं जबकि माध्यमिक मत उसे 'अज्ञेय ब्रह्म' के
समान स्वीकार करता है । वसुबंधु के 'अभिधर्म कोश' में 'धर्मकाया' के दो अर्थ
५ वरि.
६६ वरिवस्यारहस्ये
हैं—(१) 'गुण' (२) पवित्र व्यक्तित्व । वसुबंधु कहते हैं कि बुद्ध की 'रूपकाया'
(भौतिक शरीर) अपवित्र है अतः उसकी शरण लेना उचित नहीं है । 'धर्मकाया'
की ही शरण लेना औचित्यपूर्ण है ।
'सद्धर्मपुण्डरीक' में कहा गया है कि बुद्ध ने युगों-पूर्व बुद्धत्व ग्रहण किया
था । तथागत अशरीरी हैं । जगत् को बुद्ध की काया निर्मितकाया ('निर्माण काया')
ही दिखाई पड़ती है । उनका वास्तविक स्वरूप 'धर्मकाया' है । यही माध्यमिकों का
मत है । माध्यमिक मत में बुद्ध की लीला को मात्र 'आभास' माना गया है । बुद्ध
लीला के लिए कोई भी रूप धारण कर लेते हैं और यही 'रूप काया' या
'निर्माणकाया' है ।
तज्ज्ञानार्थमुपाया विद्या लोके चतुर्दश प्रोक्ताः ।
तेष्वपि¹ च सारभूता वेदास्तत्रापि गायत्री ॥ ६ ॥
(विमर्श शक्ति के परिज्ञान के उपाय)
उस (विमर्श शक्ति) के ज्ञान के लिए संसार में चौदह विद्यायें कही गई हैं।
उन (१४ विद्याओं) में भी सारभूता श्रुतियाँ हैं और उनमें (श्रुतियों में) भी सारभूत
गायत्री है ॥ ६ ॥ ·
- प्रकाश *
चतुर्दश विद्याः—चत्वारो वेदाः षडङ्गानि न्यायो मीमांसा पुराणं धर्मशास्त्रं चेति ।
तन्त्राणां धर्मशास्त्रेऽन्तर्भावः । तेषां प्रामाण्यसमर्थनं त्वस्मदीये² त्रिपुरसुन्दरीबाह्य-
वरिवस्याविधौ द्रष्टव्यम् । तन्त्रराजव्याख्याने च विस्तरेण तन्त्राणां धर्मशास्त्रेऽन्तर्भावः
प्रपञ्चयिष्यते । एवं च न शिष्टाकोपाधिकरणस्थवार्त्तिकविरोधः, शास्त्रपरिमाणानति-
क्रमात् ॥ ६ ॥ - सरोजिनी *
तज्ज्ञानार्थ = उस विमर्श शक्ति के ज्ञान के लिए । विद्या लोके चतुर्दश
प्रोक्ताः = संसार में चौदह विद्यायें कही गई हैं । चौदह विद्यायें—ऋग्वेद, यजुर्वेद,
सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, निरुक्ति, ज्योतिष, छन्द, व्याकरण, न्याय,
मीमांसा, पुराण, धर्मशास्त्र । जहाँ तक तन्त्रशास्त्र का प्रश्न है वह धर्म शास्त्र में ही
अंतर्भूत हैं । तेष्वपि च सारभूता वेदा = उन चौदह विद्याओं में भी चतुष्टय
सारभूत विद्यायें हैं । तत्रापि गायत्री = उन वेदों में भी गायत्री सारभूत है ।
गायत्री = गायत्री मन्त्र वेदमन्त्र है । इसका स्वरूप निम्नांकित है—
'ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ॥'
व्याहृतियाँ—गायत्री मन्त्र के प्रारम्भ में जो—(१) 'भूः' (२) 'भुवः' (३)
१. तास्वपि २. चास्मदीये
प्रथमोऽंशः ६७
'स्वः' तीन व्याहृतियाँ हैं ।
छान्दोग्य श्रुति में एक कथा आती है कि एक समय प्रजापति ने लोकों में
सारतम वस्तु की जिज्ञासावश तप किया । तप—(१) पृथ्वी में अग्नि देवता को
(२) अन्तरिक्ष में वायु देवता को (३) स्वर्ग में आदित्य देवता को सार देखा ।
उन्होंने पुनः तप किया तो (१) अग्नि में ऋग्वेद को (२) वायु में यजुर्वेद को एवं
(३) आदित्य में सामवेद को सार देखा । उन्होंने पुनः तप किया (१) ऋग्वेद में
भूः को (२) यजुर्वेद में भुवः को एवं (३) सामवेद में स्वः व्याहृति को सार देखा ।
सार-क्रम (१) प्रथम दृष्ट्या सार—अग्नि, वायु, सूर्य (२) द्वितीय दृष्ट्या सार—
ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद । (३) तृतीय दृष्ट्या सार—(अन्तिम निष्कर्ष) : सारतमः
'भूः', 'भुवः', 'स्वः' ।। (१) 'भूः' = सत् (२) 'भुवः' = चित् (३) 'स्वः' =
आनन्द 'भूरिति सन्मात्रमुच्यते । भुव इति सर्वं भावयति प्रकाशयतीति व्युत्पत्या
चिद्रूपमुच्यते । सुप्रियते इति व्युत्पत्त्या स्वरिति सुष्ठु सर्वैन्द्रियमाणसुखस्वरूपमुच्यते ।'
(शाङ्कर भाष्य) ।। महः = सर्वातिशायी¹ महत्तर ।। तपः = सर्व तेजोरूप परतेज ।
जनः = सर्व का कारण । सत्य = सर्वबाधारहित । तत् = ब्रह्म । 'ॐ तत्सदिति
निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः' ।।²
'तच्छब्देन प्रत्यग्भूतं स्वतः सिद्धं परं ब्रह्मोच्यते इति ।।'³ 'सवितुः' शब्द भी
परमेश्वर का बोधक है । 'सवितुरिति सृष्टिस्थिति लयलक्षणस्य सर्वप्रपञ्चस्य
समस्तद्वैतविभ्रमस्याधिष्ठानं लक्ष्यत ।'⁴
'सवितुः सर्वान्तर्यामितया प्रेरकस्य जगत्स्रष्टुः परमेश्वरस्य इति ।।'⁵ 'वरेण्यं =
परमेश्वरस्यात्मभूतं वरेण्यं सर्वैरूपास्यतया ज्ञेयतया च संभजनीयम् ।।'⁶
भर्ग = अन्तर्यामी परज्योति । अविद्यादिदोषभर्जनात्मकज्ञानैक विषयत्वम् ।।'⁷
देवस्य = सर्व साक्षी चेता केवल निर्गुण ब्रह्मरूप आत्मा । धीमहि =
'आत्मत्येवोपासीत' आदि श्रुत्यर्थ के अनुष्ठान का सूचक । 'धियो यो नः
प्रचोदयात्' = प्रचोदयात् = अन्तर्यामी ब्राह्मण । 'धियो यो नः' अन्तर्यामी परब्रह्म
का प्रत्यगात्मा से अभेद ।
गायत्री मन्त्र का अर्थ—ॐकार का लक्ष्य, 'भूः' (सत्) 'भुवः' (चित्), 'स्वः'
(आनन्दस्वरूप), तत् = उस ('तत्त्वमसि' में प्रयुक्त तत् का व्यञ्जक), सवितुः =
(जगदुत्पादक, सूर्य के सूर्य), वरेण्यम् = (वरीय, श्रेष्ठतम्), भर्गः = (स्वज्ञान
द्वारा अविद्या का भर्जक, दाहक), देवस्य = ज्योतिः स्वरूप परब्रह्म का, धीमहि =
हम ध्यान करते हैं । प्रश्न—'वह स्वयं ज्योतिस्वरूप परब्रह्म कौन है? उत्तर—'धियो
यो नः प्रचोदयात्' (जो हमारी बुद्धि को शुभ कर्मों में प्रवृत्त करे)' अर्थात्—
अविद्यातत्कार्ययोर्भर्जनाद्भर्गः स्वयं ज्योतिः परब्रह्मात्मकं तेजः धीमहि तद्योऽहं सोऽसौ -
१. शङ्कराचार्य—प्रपञ्चसार तन्त्र । 'प्रपञ्चसार विवरण' (पद्मपादाचार्य)
२. गीता ३-४. शाङ्करभाष्य
५-६. सायण भाष्य ७. शाङ्करभाष्य
६८ वरिवस्यारहस्ये
योऽसौ सोऽहमिति वयं ध्यायेम ।१ प्रणवात्त गायत्री जपादि द्वारा उपास्य है । यहाँ
शुद्ध गायत्री मन्त्र प्रत्यगभिन्न ब्रह्म का बोधक है । समस्त दृश्यों का द्रष्टा जो मेरा
स्वरूप है यही सर्वाधिष्ठान है, परमानन्दरूप है, माया एवं तत्कार्यात्मक समस्त
अनर्थों से शून्य है, स्वयं प्रकाश एवं चिदात्मक ब्रह्म है, — इस प्रकार हम ध्यान
करते हैं । स्वविवर्त जड़ प्रपञ्च के साथ ब्रह्म का रज्जु-सर्प की भाँति
बाध-सामानाधिकरण्यरूप अभेद है, चिद्रूप प्रत्यगात्मा के साथ ब्रह्म का मुख्य
तादात्म्यरूप अभेद है, इस प्रकार सर्वात्मक ब्रह्म का बोधक यह गायत्री मन्त्र सिद्ध
होता है—'सोऽयमिति न्यायेन सर्वसाक्षिप्रत्यगात्मने । ब्रह्मणा सह तादात्म्यरूपमेकत्वं
भवति इति सर्वात्मक ब्रह्मबोधकोऽयं गायत्री मन्त्रः सम्पद्यते ।'२
प्रणव तत्त्व का गायत्री तत्त्व में समावेश—'प्रणव' = अ, उ, म् = ३
मात्रायें । अकार = व्यष्टि-समष्टि वैश्वानर विराट । 'उकार' = तैजस् हिरण्यगर्भ ।
मकार = प्राज्ञ ईश्वर ।
(क) गायत्री का प्रथम पाद = 'तत्सवितुर्वरेण्यम्'—इस पाद से—समस्त
प्रसूयमान प्रपञ्च की कर्तृशक्ति के वरेण्य प्राज्ञ से अभिन्न ईश्वर तत्त्व का प्रतिपादन
किया गया है तथा कार्य-कारण में अभेद होने के कारण कर्तृशक्ति में समस्त
कार्यवर्ग का आरोप एवं अन्तर्भाव सूचित) ।
(ख) गायत्री का द्वितीय पाद = 'भर्गो देवस्य धीमहि' से तैजस हिरण्यगर्भ
का प्रतिपादन किया गया है । (तेजवाचक 'भर्ग' पद एवं ध्यानकर्तृवाचक 'धीमहि'
पद से उक्त अर्थ ध्वनित है ।)
(ग) गायत्री का तृतीय पाद = 'प्रचोदयात्' = (प्रकृष्ट चोदना क्रिया से युक्त
= 'प्रचोदयात्' पद से—प्रकृष्ट क्रियाधर्मी वैश्वानर विराट सूचित) ।
(ङ) गायत्री का चतुर्थ पाद—प्रणव की चतुर्थ मात्रा का अन्तर्भाव ।
सारांश = प्रणवतत्त्व भी गायत्री तत्त्व में समाविष्ट ।३
गायत्रीमन्त्रगत प्रकृतियों का अंतर्भाव—गायत्री मन्त्रगत प्रकृतियों के अनुसार
संसार की समस्त अवस्थाओं का वर्णन—
(१) 'तत्'—(तनुविस्तारे) : ईश्वर में सर्वप्रथम सिसृक्षारूप सृष्टि-विस्तार की
भावना—'एकोऽहं बहुस्याम्' के रूप में उत्पन्न होती है । उसकी विस्तारेच्छा =
'तत्' का वाचक ।
(२) 'सवितुः' (षूञ् प्राणिगर्भविमोचने) : परमात्मा इच्छा करने के बाद जगत्
को उत्पन्न करता है ।)
१. सायणभाष्य २. शाङ्करभाष्य
३. आत्मा का प्रथम पाद 'वैश्वानर', आत्मा का द्वितीय पाद—'तैजस', आत्मा का
तृतीय पाद—'प्राज्ञ' आत्मा का चतुर्थ पाद—'प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं
चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा विज्ञेयः' = 'माण्डूक्योपनिषद्' ।
प्रथमोंऽशः ६९
(३) 'वरेण्यं' = (वृञ् वरणे)—प्रार्थनीय श्रेष्ठ ब्रह्मज्ञान को जीव प्राप्त करता
है।
(४) 'भर्गो देवस्य' = अज्ञान का भर्जन (विनाश) होता है।
(५) 'धीमहि' = विनाश के बाद जीवन्मुक्ति काल में ध्यानादि साधन
अपनाये जाते हैं। तत्पश्चात्—
(६) 'धियः' = आत्मतत्त्व विषयक चरम साक्षात्काररूप बुद्धि होती है। और
इसके बाद अभेदभाव से परमात्म प्राप्ति रूप मोक्ष होता है। वह परमात्मा कौन
है?
(७) 'यो नः प्रचोदयात्'—(१) जो हमारा सबका अन्तर्यामी प्रेरक है वह
परमात्मा। (२) न्यायदर्शन के अनुसार—सृष्टि की आरम्भावस्था में प्राणियों के
अदृष्टवश परमाणु में आद्य क्रिया प्रारंभ होती है—फिर 'यो नः'—(यूमिश्रणे)—
परमाणु द्वय आदि का मिश्रण होता है। फिर—'धियः' = आत्मा-मन एवं
बुद्धि-संयोग पूर्वक सांसारिक बुद्धिः सांसारिक भोगादि होते हैं। फिर—'धीमहि' =
अर्थात्—ध्यानादि साधनों द्वारा तत्वविषयक धी (ज्ञान) की प्राप्ति होती है।
'अदेवस्य भर्गो'—अज्ञान का भर्जन। 'वरेण्यं' = (मिथ्या ज्ञान के विनाश के
बाद वरेण्य अपवर्ग की प्राप्ति होती है ।) अपवर्ग क्या है? 'सवितुः'—कर्त्तास्वरूप
आत्मा की। 'तत्' = एकविंशति दुःख का अत्यन्त ध्वंस रूप अकर्तृत्व अवस्था।
(३) योगदर्शन के अनुसार गायत्रीमन्त्र की सार्थकता एवं एकात्मता—'प्रचोदयात्'
= कुण्डल्योत्थापन क्रिया में कुण्डलिनी-समुत्थान से लेकर षट्चक्रभेदनपूर्वक सहस्रार
कमल विकास पर्यन्त निःशेष क्रिया-कलाप, प्र + चुद् धातु से सङ्केतित है।
सारांश—सविता (क्लेश आदि से अस्पृष्ट परमात्मा) हमारी बुद्धि को शुभ
योग की क्रिया की ओर प्रवृत्त करे। आदि ॥
'गायत्री' सर्वात्मक है—'गायत्री' चतुर्विंशत्यक्षरात्मक मन्त्र एवं उससे बोधित
देवता का ही वाचक नहीं है—'गायत्री वा इदं सर्वं भूतं यदिदं किञ्च' (छा०)
'गायत्रीपुरश्चरण' में एकता का विधान भी है। उपासना के प्रसङ्ग में—'मन्त्र गुरु
देवतात्मकत्वेनात्मानं भावयन् यथाशक्ति गायत्री जपसमर्थः ॥'
गायत्री ब्रह्म की हृदय में उपासना—गायत्रीब्रह्म हृदयाकाश में ध्येय है—
योऽयमन्तर्हृदय आकाशस्तदेतत्पूर्णमप्रवर्तिपूर्णमप्रवर्तिनीं श्रियं लभते य एवं वेद ॥'
(उपनिषद)
गायत्री की अङ्गोपासना—चिदाशाकाशस्वरूप स्वयंज्योति गायत्री ब्रह्म की
उपासना के अङ्गरूप द्वारपालों की उपासना। (छान्दोग्यो०)
गायत्री ब्रह्मभवनरूप हृदय के ५ सुषि (छिद्र) हैं—
(१) पूर्वाभिमुखी पुरुष के हृदय का पूर्व छिद्र रूप द्वार—इसका द्वारपाल
प्राण है, वही चक्षु है, वही आदित्य है। प्राणरूप तेज का ध्यान—
७० वरिवस्यारहस्ये
तेजस्वी, अन्नाद ।
(२) दक्षिण सुषि = द्वारपाल—व्यान है । वही श्रोत्र एवं चन्द्रमा भी है ।
उसका श्री एवं यश रूप से चिन्तन→श्रीमान, यशस्वी ।
(३) पश्चिम सुषि = द्वारपाल—अपान है । वही-वाग एवं अग्नि है इस
अपान का ब्रह्मवर्चस एवं अन्नाद्य रूप से चिन्तन→वह व्यक्ति ब्रह्मवर्चस्वी
एवं अन्नाद हो जाता है ।
(४) उत्तर सुषि = द्वारपाल-समान है । वही मन एवं पर्जन्य दोनों है । समान
का कीर्ति एवं व्युष्टि (अपरोक्ष यश) के रूप में ध्यान→कीर्ति + व्युष्टि ।
(५) ऊर्ध्व सुषि = द्वारपाल = उदान वायु । वही वायु एवं आकाश है,
इसका ओज एवं महः रूप से चिन्तन→ओजस्वी एवं महान हो जाता
है ।
तस्या रूपद्वितयं तत्रैकं यत् प्रपठ्यते ऽस्पष्टम् ।
वेदेषु चतुर्ष्वपि परमत्यन्तं गोपनीयतरम् ॥ ७ ॥
(गायत्री के दो रूप)
उस (गायत्री) के दो रूप हैं । उनमें एक अस्पष्ट रूप में पढ़ा जाता है ।
(वह) चारों वेदों में भी अत्यन्त एवं परम गोपनीय है ॥ ७ ॥
- प्रकाश *
तस्या गायत्र्याः स्पष्टमस्पष्टं चेति पदच्छेद आवृत्त्या । चरणत्रयम् 'तत् सवितुः'
इत्यादि स्पष्टम् । 'परोरजसे सावदोम्' इति चतुर्थचरणं त्वस्पष्टमित्यर्थः । परं
श्रीविद्याख्यं द्वितीयं रूपम् ॥ ७ ॥ - सरोजिनी *
तस्याः = उस गायत्री के । रूपद्वितयं = दो रूप हैं । तत्रैकं = उनमें से
एक । यत = जो, जिसे । प्रपठ्यतेऽस्पष्टम् = अस्पष्ट रूप में पढ़ा जाता है ।
यहाँ विचारणीय बिन्दु यह है कि यदि दो रूपों में एक अस्पष्ट है तो दूसरा स्पष्ट
होगा । इसीलिए भास्करराय कहते हैं—'तस्याः गायत्र्याः स्पष्टमस्पष्टं चेति ।।' वे
कहते हैं कि इनमें से 'तत्सवितुः' इत्यादि तो सुस्पष्ट है किन्तु चतुर्थ चरण अस्पष्ट
है । वेदेषु चतुर्ष्वपि = चारों वेदों में भी । परम—भास्करराय 'परम्' का अर्थ
'श्रीविद्या' समझते हैं—'परं श्री विद्याख्यं द्वितीयं रूपं' अर्थात् गायत्री का जो दूसरा
रूप है वह श्रीविद्या है । वेदेषु चतुर्ष्वपि परमत्यन्तं गोपनीयम् का दूसरा अर्थ यह
होगा—'चारों वेदों में भी पर विद्या (श्रीविद्या) अत्यन्त गोपनीय है ।' इस पर विद्या
(पञ्चदशाक्षरी मन्त्र) का स्वरूप निम्नांकित है—'क ए ई ल ह्रीं । ह स क ह ल
ह्रीं । ह स क ह ल ह्रीं ॥'
प्रथमोऽंशः ७१
गायत्री को पञ्चमुखी कहा गया है—(१) गायत्री के पाँच मुख—(क) ॐ
(ख) भूर्भुवः स्वः (ग) तत्सवितुर्वरेण्यम् (घ) भर्गो देवस्य धीमहि (ङ) धियो यो नः
प्रचोदयात् ।। या (१) ४ वेद (२) यज्ञ ।।
गायत्री का स्वरूप—गायत्री के पाँच मुख हैं ।
गायत्री के चरण एवं देवता—(१) गायत्री का प्रथम चरण—ब्रह्मा, (२)
गायत्री का द्वितीय चरण—विष्णु, (३) गायत्री का तृतीय चरण—महेश । (ये देवता
गायत्री के प्रमुख शक्ति पुञ्ज हैं ।)
महर्षि उद्दालक ने इसी गायत्री विद्या की प्राण-प्रतिष्ठा की थी । गायत्री मन्त्र
के पञ्चमुखों के प्रतिकार्थ—(१) चार वेद एवं यज्ञ (२) पञ्चतत्त्वात्मक जगत् एवं
स्वदेह से पृथक् अपने को आत्मसंवित समझने का सङ्केत (३) आत्मा पर चढ़े
पञ्चकोशों से भी अपने को पृथक् समझने का सङ्केत ।
(१) पाँच कोश (२) पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (३) पाँच कर्मेन्द्रियाँ (४) पाँच प्राण
(५) पाँच उपप्राण (६) पाँच तन्मात्रायें (७) पाँच विषय (८) पाँच महाभूत (९)
पाँच यज्ञ (१०) पाँच अवस्था (११) पाँच शूल (१२) पाँच क्लेश (१३) भगवान्
शिव के पाँच मुख (१४) पाँच आकाश आदि विभिन्न पञ्चकों का प्रतिकार्थ अत्यन्त
रहस्यमय हैं ।
'पञ्चस्यास्यास्तु गायत्र्याः विद्यां यस्त्ववगच्छति ।'
गायत्री का महत्त्व—'गायत्र्येव तपो योगः साधनं ध्यानमुच्यते । सिद्धि जनानां
सा माता नातः किंचिद् बृहत्तरम् ॥'१
गायत्री में स्थित नौ पद—(१) तत् (२) सवितुः (३) वरेण्यं (४) भर्गो (५)
देवस्य (६) धीमहि (७) धियो (८) यो नः (९) प्रचोदयात । (इसीलिए यज्ञोपवीत
में ९ सूत्र होते हैं । यज्ञोपवीत में तीन ग्रंथियाँ ब्रह्मग्रंथि, विष्णुग्रंथि एवं रुद्रग्रंथि—
इन देवों के प्रतीक है । यज्ञोपवीत गायत्री का एवं द्विजत्व का प्रतीक है । बड़ी
ग्रंथि ॐ की एवं तीन शेष ग्रंथियाँ भूः भुवः स्वः की प्रतीक हैं ।
'भूः' = अन्नमय कोश । 'भुवः' = प्राणमय एवं मनोमय कोश । 'स्वः' =
विज्ञानमय-आनन्दमय कोश । (सृष्टि के तीन स्तर = पृथ्वी, पाताल,
स्वर्ग । साधना के पिण्ड गत तीन स्तर—भूः, भुवः, स्वः) गायत्री 'त्रिपदा' कही
गई है ।२
गायत्री का निर्गुण ध्यान—'गायत्रीहृदय' में कहा गया है—'आत्मान आकाशो
भवति, आकाशाद्वायुर्भवति, वायोरग्निर्भवति, अग्नेरोंकारो भवति, ॐकाराद् व्याहति-
१. गायत्री लहरी, गायत्री मञ्जरी ।
२. गायत्री के तीन पाद या चरण—(१) 'भूः'—भूक्षेत्रीय (२) 'भुवः'—
पाताललोकीय (३) 'स्वः'—स्वर्ग एवं स्वर्गोपरि से सम्बद्ध । (१) 'भूः'—में
मन्त्रदीक्षा (२) 'भुवः'—में अग्नि दीक्षा (३) 'स्वः'—में ब्रह्म दीक्षा ।