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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 144, कुल 530 में से

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पृष्ठ 144

४२ वरिवस्यारहस्ये
स्वनिष्ठ स्फुरत्ता का साक्षात्कार करती है तभी विश्व का उदय होता है—'यथा सा
परमा शक्तिः स्वेच्छया विश्वरूपिणी । स्फुरत्तामात्मनः पश्येत्तदा चक्रस्य संभवः ॥'
परमाशक्ति के ईक्षण-व्यापार में इच्छा के साथ ही साथ ज्ञान एवं क्रिया भी
सूक्ष्मात्मना विद्यमान रहते हैं । भास्करराय मखिन् ने 'सेतुबंध' में कहा है कि
'तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेय' इस वाक्य में 'बहुस्यां' के ईक्षण के आकारित होने के
पूर्व (उठी हुई प्राथमिकी वृत्ति) इच्छा एवं ज्ञान दोनों शक्तियों से युक्त थी । इतना
ही नहीं 'स्वाभाविकी ज्ञान बल क्रिया च' आदि श्रुति-वाक्यों से यह भी प्रमाणित है
कि उक्त प्राथमिक इच्छा-ज्ञान शक्ति के साथ क्रियाशक्ति भी समवेत थी ।
पद्मपादाचार्य प्रपञ्चसार तन्त्र की टीका में परावाक् की व्याख्या करते हुए
कहते हैं कि—मूलाधार से उत्पन्न चैतन्याभास और माया शक्त्यात्मक भाव परावाक्
है—'तस्मात् प्रथममुदितः चैतन्याभासः भावश्च यः जगद्भावयतीति माया शक्तिर्भावः स
पराख्यः ॥' 'चैतन्याभासविशिष्टतया प्रकाशिका माया निष्पन्दा परावागित्यर्थः ॥'
'मूलाधार' में मूल का अर्थ है जगत् की मूलभूतात्मिका परिणामिनी माया शक्ति एवं
उसका अधिष्ठानभूत चिदात्मा । शरीरगत मूलाधार भी चिदात्मा की अभिव्यक्ति का
स्थान है । इसी स्थान से उत्पन्न मायाशक्त्यात्मक चैतन्याभास एवं निष्पन्दा वाक्
को 'परा' आख्या दी गई है । शङ्कराचार्य ने मूलाधार से प्रथमोदित वाक् को 'परा'
कहा है—'मूलाधारात् प्रथममुदितो यश्च भावः पराख्यः ॥'१ शङ्कराचार्य की व्याख्या
के अनुसार 'परावाक्' मूलाधारोत्पन्न प्राथमिक 'भाव' है ।
परावाक् की 'परा' संज्ञा इसलिए है क्योंकि यह 'पूर्ण' है—'पूर्णत्वात् परा ॥'२
परावाक् वाणी की पराकाष्ठा है—यही शब्दब्रह्म है । इसे 'वाक्' इसलिए कहा गया
है क्योंकि यह प्रत्यवमर्श द्वारा कथन करती है—'वक्ति' विश्वं अपलपति प्रत्यवमर्शेन
इति च वाक् ॥'
'परावाक्', चिदात्मक, स्वात्मविश्रान्त 'अहं' के रूप में नित्योदित परमात्मा की
स्वातंत्र्यशक्ति के रूप में अवस्थित है तथा सदा निरपेक्ष रूप से रहती है ।
संसार का साररूप एवं मालिनी शक्ति 'परावाक्' है । यही समस्त मन्त्रों की
जननी है । यही तुरीय पद 'अव्यक्त' भी कहा गया है । 'परावाक्' में
इच्छा-ज्ञान-क्रिया समष्टि रूप से अवस्थित रहती है । इसे 'कारणबिन्दु' भी कहा
गया है क्योंकि यह जगदाङ्कुर के लिए कन्दस्वरूपा है । शब्दब्रह्मरूपात्मिका का यह
परावाक् आत्मप्रतिष्ठ होने के कारण निःस्पन्द है ।
अपने मूल स्वरूप में परावाक् चित्शक्ति का ही अपर पर्याय है । 'अथवा
चिच्छक्तिरेव पराख्या चैतन्याभास विशिष्टतया प्रकाशिका माया निष्पन्दा परा-
वगित्यर्थः ॥'३ चैतन्याभासविशिष्ट होने के फलस्वरूप प्रकाशिका माया ही स्पन्दहीन
'परावाक्' है ।
१. प्रपञ्चसार तन्त्र २. ई०प्र० विमर्शिनी
३. पदार्थदर्श