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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 143, कुल 530 में से

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पृष्ठ 143

प्रथमोऽंशः ४१
'अम्बिका' में 'शान्ता' का साम्य होने पर 'मूलबिन्दु' का उदय होता है ।
इसीका नाम है 'परावाक्' । परमात्मा या सदाशिव इसी 'मूलबिन्दु' की अवस्था
विशेष का नाम है । पौष्कर में परावाक् को 'सूक्ष्मा' अभिधान देकर इसका इस
प्रकार निरुपण किया गया है—'सूक्ष्माचिदेकशरणा निवृत्ताशेषशक्तिका ।'१
शैवपरिभाषाकार योगीन्द्रज्ञान शिवाचार्य इसका स्वरूप इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं—
'तत्र ज्ञानैकाश्रया अर्थसामान्य प्रकाशिका वाणी सूक्ष्मा ।।'२ विभिन्न वाणियों की
कारण-कार्य-परम्परा निम्नानुसार है—
'वैखर्याः कारणं मध्या, पश्यन्ती मध्यमां प्रति ।
पश्यन्त्याः कारणं सूक्ष्मा निर्विकल्प स्वरूपिणी ।।'२
तत्त्व की दृष्टि से 'सूक्ष्मा' का सम्बन्ध शिवतत्त्व से है—'तत्र शिवतत्त्वे
सूक्ष्माभिधानावाग्वृत्तिः ।।' इसी वाक्तत्त्व में शान्त्यतीत भुवनों का अवस्थान भी है ।
'विकल्पबोधायाणूनां तत्त्वानां स्थितये कलाः ।
पञ्च तत्त्वानि लोकांश्च मन्त्रा दीन सृजिक्षिवः ।
शान्त्यतीता पुराधारं शिवतत्त्वं पुराभवत् ।।'
'परावाक्' या 'सूक्ष्मा शब्दवृत्ति' शिवात्मक है—'अस्य शिवाधिष्ठितत्वेन
शिवतत्त्वव्यपदेशः ।।'३ 'तत्र शिवतत्त्वे सूक्ष्माभिधाना वाग्वृत्तिः । अत्रैव
शान्त्यतीतभुवनाना वस्थितिः ।'४
'परावाक्'—सभी शास्त्रों को अपने में निहित रखता है । इसमें बीजात्मना
(Germinally) सभी शास्त्र निहित रहते हैं । यही परावाक् धीरे-धीरे भौतिक स्तरों
में उतरता हुआ अक्षरों के रूप में (Syllables, vocables) वर्णमाला का सृजन
करता है । इस स्तर पर चैतन्य के दो स्तर परस्पर अभिन्न है तथा शब्द एवं अर्थ
एक दूसरे से अपृथक हैं । परा की उत्तरावस्था में (परवर्ती स्थितियों में) शब्द एवं
उसके अर्थ परस्पर भिन्न हो जाते हैं और वैखरी की अवस्था में तो विभिन्न
उच्चारणावयवों के माध्यम से पृथक् शब्द पृथक् अर्थों के साथ उच्चरित होने लगते
हैं । 'परावाक्' समस्त शास्त्रों का उद्गम या स्रोत है । ये शास्त्र सर्वोच्च सत्ता
(Supreme being) के पाँचों मुखों से, जो उसकी पाँच शक्तियों (चित, आनन्द,
इच्छा, ज्ञान एवं क्रिया) के प्रतीक हैं, निःसृत होते हैं । पञ्चविध शैव शासनाम्नाय
शिव के पञ्चमुखों से प्रकट होता है और तन्त्र के ९२ सम्प्रदायों का प्रवर्तन करता
है जो कि निम्न ३ भागों में वर्गीकृत हैं—(१) शिव तन्त्र = द्वैतपरक : १० (२)
रुद्रतन्त्र = द्वैताद्वैतवादी : १८ (३) भैरव तन्त्र = अद्वैतवादी : ६४ ।।
'परावाक्' विश्व-सृष्टि का मूलाधार है—वामकेश्वर तन्त्र में
(नित्याषोडशिकार्णव) में कहा गया है कि 'परमाशक्ति' (त्रिपुरा या परावाक्) जब
१. शैवपरिभाषा २. पौ०बिन्दु०प०
३-४. शैवपरिभाषा