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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 145, कुल 530 में से

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पृष्ठ 145

प्रथमोऽंशः ४३
शाक्ताद्वैत, ईश्वराद्वयवाद मे तो 'माया' 'प्रकृति' आदि 'परावाक्' से
निम्नस्तरीय तत्त्व माने गये हैं । 'महामाया' को द्वैतवादी तन्त्र में शिव की
परिग्रहरूपा बिन्दु शक्ति या 'परावाक्' स्वीकार किया गया है ।
लक्ष्मीधर की दृष्टि में 'परा' सतोगुणरजोगुण एवं तमोगुण की साम्यावस्था का
अभिधान है । 'एका परेति सत्वरजस्तमोगुण साम्यरूपा ।।'१
'परावाक्'—'प्रकृति' एवं 'प्रतिभा'—आचार्य लक्ष्मीधर ने सौन्दर्यलहरी की
अपनी टीका में परावाक् से प्रकृति का सम्बन्ध बताते हुए उसे प्रकृतिरूपात्मक
स्वीकार किया है । प्रकृति में निहित गुणत्रय 'ज्ञान', 'इच्छा', एवं 'क्रिया' के ही
प्रतीक हैं । ईश्वरप्रत्यभिज्ञाकार का कथन है कि 'पशुपति' की अवस्था में जो
'ज्ञान' 'क्रिया' एवं 'माया' शक्ति है वही 'पशु' दशा में 'सत्व' 'रज' एवं 'तम'
है—'स्वाङ्गरूपेषु भावेषु पत्युर्ज्ञानं क्रिया च या । मायातृतीये ते एव पशोः सत्वं
रजस्तमः ॥२ इच्छा आदि शक्तियाँ ही सङ्कुचित होकर सत्व-रज-तम (गुणमय) का
रूप धारण करती हैं ।
सांख्य, वैशेषिक, न्याय, मीमांसा आदि में निरूपित प्रकृति का स्वरूप अशुद्ध
प्रकृति का स्वरूप है जबकि तन्त्रोक्त प्रकृति शुद्धा प्रकृति है और इसमें इच्छा, ज्ञान
एवं क्रिया शक्ति तत्त्व के रूप में विद्यमान है—'इच्छादित्रिसमष्टिः शक्तिः शान्तास्य
सङ्कुचद्रूपा । सङ्कलितेच्छाद्यात्मक सत्त्वादिकसाम्य रूपिणी सती । बुद्ध्यादिसामरस्य-
स्वरूप चित्तात्मिका मता प्रकृतिः ॥'३ 'मूल प्रकृति' परावाक् है । इसी से
विश्ववैचित्र्य का आविर्भाव होता है । आचार्य व्यास ने 'गुणानांपरमं रूपं न
दृष्टिपथमृच्छति । यत्