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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 146, कुल 530 में से

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४४ वरिवस्यारहस्ये
परा ।।'१ यही स्वरसोदित परावाक् समस्त वर्णसमुदाय, नादसमुदाय, प्रमेय समुदाय
समग्र जगत् एवं मन्त्रसमुदाय का मूल स्रोत है ।
'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' में कहा गया है—'चित्प्रकाश से अभिन्न, नित्य उदित,
महामन्त्ररूप, पूर्ण अहं विमर्शात्मक जो यह 'परावाक् शक्ति' है, जिसके गर्भ में
'अ' से 'क्ष' पर्यन्त (वर्णात्मक) समग्र शक्तिचक्र विद्यमान रहता है, वही पश्यन्ती
और मध्यमा के क्रम से ग्राहकभूमिका को आभासित करती है ।' प्रत्यवमर्शात्मक,
अमायीय वर्णजनित, अन्तर शब्दन्स्वभाव चिति को नित्योदित 'परावाक्' कहते हैं ।
यही 'परावाक्' परमात्मा की शक्ति एवं मुख्य ऐश्वर्य है । पूर्ण होने के कारण इसे
'परा' तथा प्रत्यवमर्श द्वारा विश्व का अभिलाप करने से इसे 'वाक्' कहते हैं ।
चितिः प्रत्यवमर्शात्मा परावाक् स्वरसोदिता ।
स्वातन्त्र्यमेतन्मुख्यं तदैश्वर्यं परमात्मनः ।।२
'पूर्णत्वात् परा वक्ति विश्वं अभिलपति प्रत्यवमर्शेन इति च वाक् ।।'३
'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' के प्रणेता क्षेमराज का कथन है कि चित्प्रकाश से अव्यतिरिक्त,
नित्योदित, महामन्त्ररूप, पूर्णांहंविमर्शमयी वाक् ही 'परावाक् शक्ति' (चित्प्रकाशात्
अव्यतिरिक्ता नित्योदितमहामन्त्ररूपा पूर्णांहंविमर्शमयी या इयं परावाक् शक्तिः ॥) विभु
की माया शक्ति द्वारा भिन्न-भिन्न बाह्य और आभ्यन्तर वस्तुसमूह का विश्रान्तिस्थान,
वही प्रत्यवमर्शात्मक परावाक् रूप चिति, ज्ञान, सङ्कल्प, अध्यवसाय, स्मृति और
संशय के नाम से कही गई है—
'माया शक्ता विभोः सैव भिन्न संवेद्यगोचरा ।
कथिता ज्ञानसङ्कल्पाध्यवसायादिनामभिः ।।'
इस धरातल पर वाच्य एवं वाचक शब्दों का अस्तित्व नहीं रहता । इस भूमि
में वाच्य अर्थ की भी सत्ता नहीं रहती । यहाँ अतीत, अनागत एवं वर्तमान का
भेद नहीं रहता । यहाँ पर भेद अपनी आत्मा से अभिन्न या आत्मरूप होकर
भासमान होता है ।
महाज्ञान सर्वप्रथम 'अहंज्ञान' का रूप धारण करके परमशिव के अन्तर में
स्फुरित होता है । इस अवस्था में वाच्य-वाचक भाव एवं शब्द-अर्थ का पृथकत्व
विद्यमान नहीं रहता । वाच्य 'इदं' रूप में भासमान नहीं होता ।
'नाद' एवं परापश्यन्ती आदि वाक्चतुष्टय—आचार्य भास्करराय ने 'मातृका'
'पश्यन्ती' 'मध्यमा' की व्याख्या इस प्रकार की है—
(१) 'मातृका'—'माति तरति कायतीति च व्युत्पत्या मातृकेत्युच्यते । तस्यां
च निर्विकारायामप्यनादि सिद्धप्राण्यदृष्टवशात् स्वान्तःसंहतं विश्वसिसृक्षोत्पद्यते ।।' ततः
स्रष्टव्यपदार्थनालोचयति 'तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेय ।।' इति ।।४
१. भर्तृहरि—'स्वोपज्ञ' (ब्रह्मकाण्ड) । २. ई०प्र०का०
३. ई०प्र० विमर्शिनी ४. वरिवस्यारहस्यम्