वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
पृष्ठ 142, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ें४० वरिवस्यारहस्ये
विकल्पांश की अपसारणा करके विशुद्ध निर्विकल्पक ज्ञान में अवस्थित हुआ करते
हैं । यह निर्विकल्पक शुद्ध ज्ञान परावाक् से भी अतीत है अतः परावाक् का
अतिक्रमण करने के पूर्व निर्विकल्प अवस्था प्राप्त करना संभव नहीं है । अद्वैतवादी
‘परावाक्’ को परमात्मा की माहेश्वरी शक्ति (स्वाभाविक शक्ति) मानते हैं । इसलिए
कहा गया है—‘परावाक् स्वरसोदिता’ । यह आगुन्तक शक्ति नहीं प्रत्युत् परमात्मा
का विमर्श भाव है । परमात्मा से परावाक् कभी पृथक् नहीं होती । जब परमेश्वर
विश्व-लीला करना चाहते हैं तब अपनी अनुत्तरा ‘स्वातन्त्र्यशक्ति’ द्वारा अपने को
परिच्छिन्न करके ‘आणव मल’ ग्रहण करते हैं और परिणामस्वरूप ग्राह्यग्राहक भाव
प्रकट हो उठता है । जो पूर्णस्थिति है वह परप्रमातृरूप है और वहाँ ग्राह्यग्राहक
भाव का अभाव है अतः वहाँ प्रमाता-प्रमेय-प्रमाण का भेद नहीं है किन्तु परमेश्वर
अपनी ‘स्वातंत्र्य’ नाम्नी शक्ति द्वारा अद्वैतस्थिति में द्वैतभाव आविर्भूत करके
ग्राह्यग्राहक ग्रहण भाव की त्रिपुरी को प्रकट करते हैं । चित्तरूपी ग्राहक के समक्ष
विकल्प रूप अर्थ ही विषय के रूप में प्रस्तुत होते हैं । इस आविर्भाव क्रम का
कारण भी परमेश्वर की पराशक्ति परावाक् ही है ।
रसात्मक स्वरस में आविर्भूत शक्ति का नामान्तर ही परावाक् है—‘परावाक्
स्वरसोदिता’ ।। प्रपञ्च का स्वरस वैखरी है क्योंकि प्रपञ्च में वैखरी का ही स्वरस
प्रवाहित हो रहा है । वैखरी में मध्यमा का, मध्यमा में पश्यन्ती का एवं पश्यन्ती
में परावाक् का स्वरस तरंगित हो रहा है किन्तु परावाक् में किसी का भी नहीं
प्रत्युत् अपना ही रस (स्वरस) तरंगित हो रहा है इसीलिए तो शास्त्रकारों ने कहा
है कि—‘परावाक् स्वरसोदिता’ । यदि यह कहा जाय कि परावाक् में परमेश्वर का
स्वरस प्रवाहित हो रहा है तो अनुचित होगा क्योंकि यद्यपि परावाक् परमेश्वर की
अपनी शक्ति है किन्तु ‘शक्ति’ शक्तिमान से भिन्न नहीं है । इस प्रकार भी तो कहा
जा सकता है कि परमेश्वर परावाक्रूपी रसात्मक ‘स्व’ के कारण ही शक्तिमान एवं
परम ईश्वर है ।
प्रत्यभिज्ञा में भी कहा गया है कि—‘प्रत्यवमर्शात्मा चिति ही सरस परावाक्
है। परमात्मा का यह स्वातंत्र्य ही उनका मुख्य ऐश्वर्य है । वह सर्वदेश काल में
स्फुरण करती हुई महासत्ता सबका अधिष्ठान है और परमेश्वर का हृदय है।’
उसका रूप है अंतः सङ्कल्प । उसमें शब्द एवं अर्थ दोनों एक साथ स्फुरित होते
हैं अतः दोनों में अभेद है । जिस प्रकार निजात्मा संवित् से सम्पूर्ण जगत्
अनुविद्ध है तद्वत संवित् से सम्पूर्ण वाणी अनुविद्ध है । योगिनाथ ने ठीक ही
कहा है कि परतत्व में किसी भी वस्तु की सिद्धि के लिए वाणी को स्वीकार करना
पड़ता है । वह शक्ति शब्द का रूप धारण करके अर्थ को प्रकट करती है ।
संवित्रसूत वाणी के बिना किसी भी अर्थ का अवधारण नहीं हो सकता ।
सर्वप्रकारक संवित्स्वरूप की प्रभा के समान प्रकाशन शक्ति अंतस्सङ्कल्पतारूपा वाणी
बनकर फिर वर्ण, पद, वाक्य को जीवन-दान करती है और पदार्थ के रूप में
बाहर दिखती है ।