वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽंशः ३९
'कार्य बिन्दु' ही 'पश्यन्ती' है, नाद ही 'मध्यमा' है एवं बीज ही वैखरी' है ।
तान्त्रिकों की 'प्रकृति' सांख्य की प्रकृति से भिन्न है क्योंकि यह चिद्रूप है । यह
निश्चल, परावाक्रूप, प्रणवात्मक कुण्डलिनी शक्ति है—'प्रकृतिः निश्चला परावाग्रूपिणी
पर प्रणवात्मिका कुण्डलिनी शक्तिः' ।।१
'परावाक्'—जो निःस्पन्द चित् शक्ति है वही पर शब्द या परावाक् है । एक
ही परावाक् गतिशील होने पर सामान्य स्पन्द के रूप में 'पश्यन्ती', विशेष स्पन्द
के रूप में 'मध्यमा' एवं स्पष्टतः उच्चरित होने के रूप में 'वैखरी' कहा जाता है ।
एक ही चित् (चैतन्यशक्ति) या परावाक् गतिशील होने पर 'शब्द' एवं 'अर्थ' के
रूप में रूपान्तरित हो उठता है । परावाक् आत्मस्फुरण की अवस्था है । वामकेश्वर
तन्त्र के मतानुसार 'प्रकाश' के निम्न चार अंश हैं—१. अम्बिका २. वामा ३.
ज्येष्ठा एवं ४. रौद्री । 'विमर्श' के निम्न चार अंश हैं—१. शान्ता २. इच्छा ३.
ज्ञान और ४. क्रिया । प्रकाशांश 'अम्बिका' एवं विमर्शांश 'शान्ता' की समरसावस्था
में शान्ताभावसमापन्न पराशक्ति ही 'परावाक्' कहलाती है—
'आत्मनः स्फुरणं पश्येद्यदा सा परमा कला ।
अम्बिका रूपमापन्ना परावाक् समुदीरिता ।।' (योगिनीहृदय)
आत्मस्फुरण की अवस्था में समग्र विश्व बीजात्मना (अस्फुट रूप में)
आत्मसत्ता में विद्यमान रहता है । तदनन्तर 'शान्ता' से इच्छा का उदय होने पर
वह अव्यक्त विश्वशक्ति के गर्भ से निःसृत होता है । उस समय इच्छा शक्ति वामा
शक्ति से तादात्म्य अधिगत करती है और 'पश्यन्ती' की आख्या प्राप्त करती है ।
तदनन्तर ज्ञानशक्ति का उन्मेष होता है । ज्ञानशक्ति 'ज्येष्ठा' से अभिन्न है और
'मध्यमा' कहलाती है । ज्ञानानन्तर क्रियाशक्ति 'रौद्री' के साथ एकीभूत होकर
'वैखरी' कहलाती है । विश्व वैखरी का ही विस्तार है । शान्ता एवं अम्बिका का
सामरस्य ही परावाक् है । यह वाक् चतुष्टय परस्पर मिलकर मूल त्रिकोण
(महायोनि) के रूप में रूपान्तरित हो जाता है । 'परावाक्' इस त्रिकोण का केन्द्र है
जो नित्यस्पन्दमय है । 'पश्यन्ती' इसकी वामरेखा, वैखरी इसकी दक्षिण रेखा एवं
मध्यमा अग्ररेखा है । मध्य में स्थित महाबिन्दु शिव-शक्ति का स्थान है ।
वैयाकरणों के मत में पश्यन्ती ही वाणी का परा रूप है । अक्षर, 'शब्दब्रह्म',
परब्रह्म या परावाक् इसके विभिन्न नाम हैं । वैयाकरणों की दृष्टि में शब्दब्रह्म एवं
परब्रह्म अभिन्न है । आगमों में 'शब्दब्रह्म' ही परावाक् के नाम से प्रसिद्ध है ।
अद्वैतवादी परावाक् को परमेश्वर की स्वाभाविक या माहेश्वरी शक्ति मानते हैं ।
'परावाक्' स्वाभाविक है—'परावाक् स्वरसोदिता' परावाक् के दो कार्य हैं—(१)
स्वरूपाच्छादन (२) विकल्पप्रकटीकरण (विक्षेपोद्भावन)
परावाक् ही शुद्ध ज्ञान में विकल्पानुगत होकर निर्विकल्पक शुद्ध ज्ञान को
सविकल्पक अशुद्ध ज्ञान के रूप में परिणत कर देती है । ज्ञानी लोग ज्ञान के इस
१. प्रपञ्चसार तन्त्र विवरण (पटल ३०)