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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 140, कुल 530 में से

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पृष्ठ 140

३८ वरिवस्यारहस्ये
शब्दमयी—परा-पश्यन्ती-मध्यमा-वैखरी रूपा । भास्करराय के मतानुसार—(१)
शब्दब्रह्मरूप बीज की उच्छूनतावस्था ही 'परावाक' है । (२) शब्दब्रह्मरूप इस बीज
की स्फुटितावस्था 'पश्यन्तीवाक्' है । (३) इस बीज की मुकुलित, अव्यक्त किन्तु
दलद्वयावस्था 'मध्यमा वाक्' है । (४) और इस बीज की सम्यक् विकसितावस्था
'वैखरीवाक्' है । “तत्र शब्दब्रह्मरूपस्य बीजस्योच्छूनतावस्था 'परा' स्फुटितावस्था
'पश्यन्ती', मुकुलिताव्यक्तं दलद्वयं 'मध्यमा' । सम्यग् विकासेन प्रसृतं मिथः
संसृष्टमूल दलद्वयं 'वैखरी' ।।”१
आचार्य शङ्कर कहते हैं कि विचिकीर्षु घनीभूता चित् शक्ति 'बिन्दु' बन जाती
है—'विचिकीर्षुर्घनीभूता सा चिदभ्येति बिन्दुताम् ।।२
बिन्दु—कारणबिन्दु→कार्यबिन्दु→नाद→बीज । (यही त्रिक क्रमशः 'पर'
'सूक्ष्म' एवं 'स्थूल' कहा जाता है । 'कारणबिन्दु' 'कर्मबिन्दु' 'नाद' एवं 'बीज' के
अधिदेवता अव्यक्त, ईश्वर, हिरण्यगर्भ एवं विराट, शान्ता, वामा, ज्येष्ठा, रौद्री,
अम्बिका, इच्छा, ज्ञान एवं क्रिया है । निम्न पीठ ही अधिभूत है—'कामरूप'
'पूर्णगिरि', 'जालन्धर' एवं उड्डयाण पीठ । 'कारणबिन्दु'—त्रिकोत्पत्ति द्वारा
भेदात्मकता का उदय→अव्यक्त शब्दब्रह्मात्मक 'ख'→'बिन्दोस्तस्माद भिद्यमानाद्-
व्यक्तात्मा रवोऽभवत् । स रवः श्रुतिसम्पन्नैः शब्दब्रह्मेति गीयते ।।'३ 'रव' =
'कारण-बिन्दु' । 'कारणबिन्दु' से तादात्म्यापन्न 'ख' मूलाधार में व्यक्त—'देहेऽपि
मूलाधारेऽस्मिन् समुदेति समीरणः । विवक्षोरिच्छयोत्थेन प्रयत्नेन सुसंस्कृतः । स
व्यञ्जयति तत्रैव शब्दब्रह्माणि सर्वगम् ।।'४ कारणबिन्दुरूप यह अभिव्यक्त शब्दब्रह्म
निस्पन्द रहता है और यही है 'परावाक्'—'कारण बिन्द्रात्मकमभिव्यक्तं शब्दब्रह्म
स्वप्रतिष्ठतया निस्पन्दं चदेव च परावागित्युच्यते ।।'५ 'बिन्दु' = पश्यन्ती । 'नाद' =
मध्यमा । 'बीज' = बैखरी । कारणात्मक बिन्दु—अव्यक्तात्मक 'ख' (शब्दब्रह्म) ।
कारणबिन्द्रात्मक यह शब्दब्रह्म निस्पन्द 'परावाक्' है ।
परतत्त्व → प्रकृति (परा प्रकृति) → घनीभूत ब्रह्म
घनीभाव के लिए जो व्यापार होता है वही है 'विचिकीर्षा' (इच्छा-ज्ञान क्रिया
रूप विचिकीर्षा) । प्रकृति की घनावस्था उच्छूनावस्था है जिसमें प्रकृति कर्मों की
अपूर्वावस्था को छोड़कर परिपक्व दशा में अविभक्त रूप से स्थित हो । पक्व कर्मों
से सम्बद्धरूपता ही घनीभाव है । कर्माभिन्नरूपं ही 'बिन्दु' है । कारण बिन्दु
(प्रकृति) का विभाजन→(१) पर (२) सूक्ष्म (३) स्थूल (बिन्दु । कार्यबिन्दु) नाद
एवं बीज—
कालेन भिद्यमानस्तु स बिन्दुर्भवति त्रिधा ।
स्थूल सूक्ष्म परत्वेन तस्य त्रैविध्यमिष्यते ।
स बिन्दु नाद बीजत्वभेदेन च निगद्यते ।।६
१. सौभाग्यभास्कर (पृ० ३३) २-४. प्रपञ्चसार तन्त्र (प्रथम पटल)
५. सौभाग्यभास्कर ६. प्रपञ्चसार तन्त्र