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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

द्वितीयोंऽशः २९९

  • सरोजिनी *
    'श्रीचक्र' योगिनीरूप भी है ।
    १. स्थिति २. संहार नामक चक्रद्वय दो पद्म ३. दो अन्य वृत्त एवं ४. भूगृह
    आदि छः के योग से श्रीचक्र योगिनीरूप है ।
    'संहतिचक्र' = बिन्दु, त्रिकोण, वसुकोण ।
    'स्थितिचक्र' = दशारद्वय, चतुर्दशार ।
    'पद्मे'—वसुदल, षोडशदल । 'वृत्त' = वृत्त एक है—भूगृह एक है । आठ
    कोणों द्वारा बाह्यादियोगिनीरूपत्व स्थापित है । इसी प्रकार विद्या भी योगिनीरूपा
    है—
    'विद्यान्तर्भूतशक्त्याद्यैः शाक्तैः षड्भिस्तथाक्षरैः ।
    योगिनीत्वं च विद्याया राशित्वं चान्त्यवर्जितैः ।।'१
    विद्या में १५ अक्षर है उसके अन्तर्भूत शक्तियाँ हैं—३ हल्लेखाएँ हैं, ३
    लकार है । ६ शाक्त अक्षरों से युक्त होने के कारण योगिनीत्व स्वसिद्ध है ।
    योगिनियाँ डाकिनी आदि की संख्या छः है । इन सभी कोणों से योगिनीत्व स्वसिद्ध
    है—
    'विद्यायाः पंचदशाक्षर्या अन्तर्भूताः शक्तयो हल्लेखा स्तिस्रः । तदाद्याश्च
    लकारास्त्रयः, शाक्तैरैतैः षड्भिरक्षरैर्विद्याया योगिनीत्वम् । योगिन्यश्च डाकिन्याद्याः
    षट् ।'२
    'श्रीचक्र' का स्वरूप निम्नांकित है—
    १. अमृतानन्दनाथ—योगिनीहृदय 'दीपिका'

३०० वरिवस्यारहस्ये
बिन्दु-त्रिकोण-वसुकोण-दशारयुग्मम्,
मन्वस्र-नागदल-संयुत-षोडशारम् ।
वृत्त-त्रयं च धरणी-सदन-त्रयं च,
श्रीचक्रमेतदुदितं पर-देवतायाः ॥
पञ्चचतुःशक्त्यनला बिन्दुवृत्तं च भूबिम्बम् ।
एवं द्वादशसंख्यैर्घटनाच्चक्रस्य राशित्वम् ॥ ९५ ॥
(चक्र की राशिरूपता का प्रतिपादन)
पाँच शक्ति, चार अग्नि, (एक) बिन्दु, (एक) वृत्त एवं (एक) भूगृह—इस
प्रकार बारह संख्या के योग से चक्र की राशिरूपता (सिद्ध) होती है ॥ ९५ ॥

  • प्रकाश *
    स्वाभिमुखाग्रत्रिकोणानि शक्तय इत्युच्यन्ते । तानि पञ्च । पराङ्मुखाग्र-
    त्रिकोणान्यनलाः । तानि चत्वारि । तदुक्तम्—'पञ्चशक्तिचतुर्वह्निसंयोगाच्चक्रसंभवः'
    इति । वृत्तं पद्मद्वयगर्भितम् । ये तु नव त्रिकोणानि द्वे पद्मे भूगृहमेकमित्याहुस्तेषां बिन्दु-
    परित्यागो दोषः ॥ ९५ ॥
  • सरोजिनी *
    'चक्र राशिरूप है'—इसका ही यहाँ प्रतिपादन किया गया है। "प्राणपानौ
    समानश्चोदानव्यानौ तथा पुनः । नागः कूर्मोऽथ कृकरो देवदत्तो धनञ्जयः । जीवात्मा

द्वितीयोऽंशः ३०१
परमात्मा चेत्येतै राशिखरूपिणी ॥'—'योगिनीहृदय' के इस कथन द्वारा श्रीविद्या की
भी राशिरूपता सिद्ध होती है ।
'प्राणादिधनञ्जयान्ता दश वायवः, जीवात्मा उक्त लक्षणः पशुः, परमात्मा 'एष
त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः' इत्युपनिषदुक्तसर्वभूतान्तर्यामी । एतैर्द्वादशमी राशिस्व-
रूपिणी ।।'—कहकर योगी अमृतानन्दनाथ ने योगिनीरूपत्व की पुष्टि की है । “पंच
चतुः शक्त्यनला ।”
स्वाभिमुखाग्र त्रिकोण शक्तियाँ हैं । ये पाँच हैं । पराङ्मुखाग्रत्रिकोण ही
'अनल' हैं । ये चार हैं । इसीलिए कहा गया है— “पंचशक्ति चतुर्वह्निसंयोगाच्चक्र
संभवः” । 'वृत्त' = पद्मद्वयगर्भित वृत्त ।। जो ९ त्रिकोण हैं ।
१. ५ शक्तियाँ २. ४ अग्नि ३. १ बिन्दु ४. १ वृत्त ५. भूगृहादिक १२
के योग से 'श्रीचक्र' राशिरूप है ।
चक्रस्य विद्याक्षरजन्यत्वादप्यभेदस्य सिद्धत्वात्तेन हेतुना षड्रूपत्वं द्रढयति—
चक्रं विद्याक्षरैरेव जननात् तदभेदवत् ।
देव्या रूपान्तरत्वाच्च तेन युक्तोक्तरूपता ॥ ९६ ॥
(पंचदशीविद्या के वर्णों के साथ चक्रों की एवं चक्रों के साथ
देवी की अभिन्नता का प्रतिपादन)
पंचदशीविद्या के अक्षरों द्वारा उद्भूत होने के कारण चक्र (नौ चक्र) उनसे
अभिन्न हैं । (इन चक्रों का) देवी का रूपान्तर होने के कारण (देवी के इस)
कथित चक्रात्मक रूप की युक्ति-युक्तता है । या देवी के अन्य रूपों के साथ इस
रूप की सङ्गतता होने के कारण यह कथित रूपान्तर युक्ति सङ्गत है ॥ ९६ ॥

  • प्रकाश *
    यद्यपि मूलतन्त्रे चक्रे विद्याया अभेदस्तदक्षरजन्यत्वज्ञाप्यक एवोक्तो न पुनः
    षड्रूपत्वज्ञाप्यकः, तथापि 'एवं विश्वप्रथाकारा चक्ररूपा महेश्वरी' इत्युक्त्या षड्रूपता
    सूचितेति संप्रदायः ॥ ९६ ॥
  • सरोजिनी *
    प्रस्तुत श्लोक में निम्न दो अभिन्नताओं या एकरूपात्मकताओं का प्रतिपादन
    किया गया है—
    १. देवी एवं श्रीचक्र अभिन्न हैं । ┐ “एवं विश्वप्रकारा च चक्ररूपा
    २. पंचदशी विद्या एवं चक्र अभिन्न हैं । ┘ महेश्वरी”—योगिनीहृदय
    योगिनीहृदय में कहा भी गया है— “एवं विश्वप्रकारा च चक्ररूपा महेश्वरी (देव्या
    देहे यथा प्रोक्तो गुरुदेहे तथैव हि ।) ॥ ६७ ॥

३०२ वरिवस्यारहस्ये
देवी चक्ररूपा इसलिए है क्योंकि 'स्फुरता' के कारण जैसे ही देवी अपने को
देखने लगती है तभी चक्रों का जन्म हो जाता है—"यदा सा परमा शक्तिः
स्वेच्छया विश्वरूपिणी । स्फुरतामात्मनः पश्येत्तदा चक्रस्य संभवः ॥"१ भाव यह
कि—"सा देवी स्वेच्छया स्वनिष्ठां स्फुरतां यदा पश्यति तदा चक्रस्य विश्वाभिन्नस्य
त्रिकोणदिचक्रस्य संभव उत्पत्तिर्भवति ॥"२ अमृतानन्दनाथ भी भास्करराय की इसी
दृष्टि से सहमत है—'विश्वसर्जनमेव पराशक्तेः स्फुरत्ता, तस्याः सृष्टिरूपत्वात् । तदा
षट्त्रिंशत्तत्वात्मकविश्वसृष्टिकाले चक्रस्य विश्वमयस्य परदेवताचक्रस्य संभवः ।
"स्वेच्छयैव जगत्सर्वं निगिरत्युद्गिरत्यपि ॥'३ 'इच्छामात्रं प्रभो सृष्टिः' परमात्मा की
इच्छा ही सृष्टि है । परमात्मा की 'इच्छा' ही देवी (शक्ति, माता, जगन्माता) है
अतः सृष्टि एवं देवी एक है—'सृष्टिस्तु कुण्डली ख्याता' क्योंकि 'चक्र' देवी का
शरीर है—आसन है और समस्त सृष्टि का संक्षिप्त रूप है अतः चक्र भी देवीरूप
है एवं देवी भी चक्ररूपा है । 'एवमुक्तरीत्या योजितगणेशादिविश्वप्रकारा महेश्वरी
त्रिपुरसुन्दरी चक्ररूपा देवता ॥४ सारांश यह कि—'एवं चक्र-देवता-विद्यानामेक
धर्मावच्छिन्नत्वेनाभेदमुपसंहरन्"—चक्र-देवता-विद्या-इन तीनों में एकता है ।५
पंचदशीविद्या एवं श्रीचक्र भी अभिन्न है—श्रीचक्र का प्रत्येक त्रिकोण, वृत्त,
रेखादिक विद्या के किसी अक्षर एवं अक्षर एवं मंत्र की अधिष्ठात्री देवी से अधिष्ठित
है । देवी 'कामकला' एवं चक्र तो अभिन्न हैं ही—'इति कामकला विद्या देवी
चक्रात्मिका सेयम् । विदितायेन .स मुक्तो भवति महात्रिपुरसुन्दरीरूपा ॥'६ 'चक्रं
कामकला रूपं प्रसार परमार्थतः'७—इनके साथ ही साथ विद्या भी श्रीचक्र से अभिन्न
है । 'इत्थं मंत्रत्मकं चक्रं देवतायाः परं वपुः ॥'८ अर्थात् देवी का शरीर रूप चक्र
मंत्रात्मक हैं ।
श्रीचक्र के साथ देवी की एकता का प्रतिपादन करते हुए दीपिकाकर ने कहा
है—"चक्रं देवतायाः परम् अन्यद् वपुः । "ततः पद्मनिभां देवीम्' इत्यत्र देवतायाः
करचरणादि मद्वपुरुक्तम्, तदेव त्रिकोणादिभूगृहान्त श्रीचक्रपदनिवासावरणदेवतारूपेणा-
वयवशो विभज्य निवासिनी स्वसंविद्देवता श्रीचक्रा पर वपुषा स्थिता तदुक्तमत्रेव—
स्वेच्छाविश्वमयोल्लेख चित्त विश्वरूपकम् ।
चैतन्यमात्मनो रूपं निसर्गानन्दसुन्दरम् ॥
इच्छाशक्तिमयपाशांकुशज्ञानरूपिणीम् । क्रिया शक्तिमये बाण धनुषी
दधदुज्ज्वलम् । आश्रयाश्रयि भेदेन अष्टधा भिन्न हेतिमत् । अष्टारचक्रसंरूढ़ नव
चक्रासनस्थितम् । एवं रूपं परं तेजः श्रीचक्रवपुषा स्थितम् । तदीयशक्ति निकरस्फुर-
दर्भिसमावृतम् ॥'९ चक्रं देवता विद्या गुरुः साधकश्चेति पंचोनां मध्य (अभेदः)१०
१. योगिनीहृदय 'दीपिका' २. भास्करराय—'सेतुबन्ध'
३-४. योगिनीहृदय 'दीपिका' ५. भास्करराय—'सेतुबन्ध'
६. कामकलाविलास ७-९. योगिनीहृदय 'दीपिका'
१०. भास्करराय—'सेतुबन्ध'

द्वितीयोंऽशः ३०३
सारे देवता श्रीचक्र की अवयवभूता शक्तियों की इकाइयाँ है क्योंकि—
“एकादशोत्तरशत देवता त्रिकोणाग्रदक्षवामकोणेषु कामेश्वर्यादिकास्तिस्रस्तद बहिरष्ट-
कोणान्तराले त्रिकोण परितश्चतुर्दिक्षु अष्टौ कामेश्वर कामेश्वर्यायुधदेवता अष्टकोणे अष्टौ-
वशिन्याद्या, अष्टकोणान्तराले षडङ्गदेवताः, अन्तर्दशारे सर्वज्ञाद्या दश, द्वितीयदशारे
सर्वसिद्धि प्रदाद्य दश, चतुर्दशारे सर्वसंक्षोभिण्याद्याश्चतुर्दश, अष्टदले अनङ्ग-
कुसुमाद्याः, षोडशकमले कामाकर्षिण्याद्याः षोडश, अन्तश्चतुरस्रे मुद्रा देवता दश,
मध्ये चतुरस्रे ब्राह्मयाद्या अष्टौ, बाह्यचतुरस्रे अणिमाद्यादश । एवमेकादशोत्तर शत
देवतात्मतया तासामाधारभूता श्रीचक्ररूपिणी देवता इत्यर्थः । १’
श्रीचक्र एवं विद्या की मातृकाओं में ऐक्य—
शिवचक्र विद्या की मातृकायें
१. भूपुर = मुख = य र ल व ⎤ ह = (आकाश) = शून्य ।
२. तीन वृत्त = क आदि सभी व्यञ्जन ⎥ ल (पृथ्वी) = भूपुर ॥
३. षोडशदल पद्म = सोलह स्वर ⎥
४. अष्टदल पद्म = अष्ट वर्ग ⎦
श्रीविद्या के वर्णों का चक्रों से एवं श्रीचक्र से ऐक्य—
‘ल’—शिव वाच्य है । भूपुर का वाचक है ।
लकार = सहस्रार का वाचक—

श्री पंचदशी विद्याश्रीचक्र एवं पिण्डस्थ चक्र
१. ‘क’ = काम, शिव का वाचकशिव अष्टमूर्ति है अतः क अष्टार, का द्योतक है ।‘स्वाधिष्ठान चक्र’ स्वाधिष्ठान कामदेव का स्थान है अतः क = काम = स्वाधिष्ठान
२. ‘ए’ = विष्णुयोनि विष्णुरूप ॥ १० अवतारों का वाचकबहिर्दशारअनाहत चक्र = (विष्णु का स्थान होने के कारण)
३. ‘ई’ = माया । (१४ भुवनों की स्वामिनी ।)चतुर्दशारविशुद्ध चक्र (१० दल)
४. ‘ल’ = शिव । (भूमि वाच्य)भूपुर (भूमि वाच्य होने के कारण)शिववाच्य होने के कारण ‘सहस्रार’ का द्योतक ॥

१. योगिनीहृदय ‘दीपिका’

३०४ वरिवस्यारहस्ये

मंत्राक्षरश्रीचक्रपिण्डस्थ चक्र
'ह्रीं' = 'ह' = आकाश = शिव । ('परमव्योमन') व्योम = ब्रह्म । रुद्र अष्टमूर्ति ।।अष्टदल पद्मआज्ञा चक्र (शिवधिष्ठित)<br>शिव का प्रधान स्थान, वाराणसी
'र' = अग्नि । अग्नि के १० कोण या जिह्वायें हैअन्तर्दशारमणिपूर (अग्नि का स्थान होने से)
'ई' = मायाचतुर्दशारविशुद्ध चक्र
'स' (शक्ति एवं चन्द्र का द्योतक) चन्द्रवाच्य ।षोडशदल पद्मआज्ञाचक्र (शक्तिवाचक होने से) सदाख्य या अर्द्धनारीश्वर का स्थान । शक्तिमय शिव का स्थान
अर्धमात्रा ◡ त्रिकोण या योनि का वाचकत्रिकोणमूलाधार (मूलाधार—नाद का स्थान है । अतः यह नाद रूप है ।)
श्रीचक्र के ३ भाग है—<br>१. 'नाद' (आज्ञा से सहस्रार) भूपुर २. 'बिन्दु' = शिवचक्र, ३ वृत्त, १६, ८ दल पद्म ।<br>३. 'कला' = शक्ति चक्र- त्रिकोणी अष्टार दशारद्वय । चतुर्दशारश्रीचक्र<br>┌───┴───┐<br>नाद बिन्दु कला<br>└───┬───┘<br>श्रीचक्र
'बिन्दु'—शशि, सोम, शिव, कलानिधि, अमृताकर्षिणी शून्य, व्योम आदि के लिए प्रयुक्त होता है ।बैन्दवस्थानसहस्रार
७. पञ्चदशाक्षर मन्त्र का श्रीचक्र तथा अन्य के साथ ऐक्य -
'ल' = 'लकारः पृथिवी बीजं तेजो भू बिम्बमुच्यते ।
'स' = 'सकारश्चन्द्रमा भद्रे कलाषोडशात्मकः । तस्मात् षोडशपत्रं च ।'

द्वितीयोंऽश: ३०५
‘ह’ = ‘हकारः शिव उच्यते, अष्टमूर्तिः सदाभद्रे, तस्माद्वसुदलं भवेत्’ ।
‘ई’ = ‘इकारस्तु सदा माया भुवनानि चतुर्दश ।
पालयन्ती परात्साच्छक्र कोणं भवेत् प्रिये’ ।।
‘ऐ’ = ‘शक्तिरेकादशस्थाने स्थित्वा सूते, जगत्त्रयम् ।
विष्णोर्योनिरितिख्याता । सा विष्णोर्दशरूपकम् ।।
एकारात् परमेशानी चक्रं व्याप्य व्यवस्थिता ।।
‘र’ = दशकोणकरं तस्मात् प्रकारो ज्योतिराख्यः ।
कला दशान्वितो वह्निर्दशकोणप्रवर्तकः ।।
‘क’ = ‘ककारान्मदनो देवि शिवं चाष्टस्वरूपकम् ।
योनिवश्यं तदाचक्रं वसुयोन्यङ्कितं भवेत्’ ।।
( ˘ ) = अर्धमात्रा गुणान् सूते नादरूपा यतः स्मृतः । त्रिकोणरूपा
योनिस्तु ।
( • ) = बिन्दुना बैन्दवं भवेत् । कामेश्वरस्वरूपं तद्विश्वारस्वरूपकम्’।
श्रीचक्रन्तुर्विय सम्भवमिति ।¹

‘ल’ = पृथ्वीतत्त्व = मूलाधार ।
‘क’ = जलतत्त्व—स्वाधिष्ठान
‘र’ = अग्नितत्त्व = मणिपुर ।
‘ई’ = चतुर्थ स्वर = हृदय = चौथा चक्र (अनाहत चक्र)
‘ऐ’ = वाणी = विशुद्ध । वाणी का स्थान वैखरी
‘स’ = अमृत = सहस्रार—अमृतस्थान
‘अर्द्धचन्द्र’ = अर्धेन्दु = चन्द्र = आज्ञा = चन्द्रमा का स्थान
‘ह’ = गगनमण्डल । शिव = सहस्रार, परमशिव का स्थान
‘ल’ = पृथ्वी = मूलाधार ।
‘क’ = प्रथमाक्षर = प्रथमावस्था = त्रिकोणों का प्रथम प्रसार = अष्टार
= स्वाधिष्ठान ।
‘र’ = अग्नि । अग्नि की १० जिह्वा = अन्तर्दशार । मणिपुर ।।
‘ई’ = विष्णुमाया = १० रूपा = १० अवतार = बहिर्दशार =
अनाहतचक्र ।

१. दुर्वासा—‘त्रिपुरामहिम्न’ के २८वें श्लोक की टीका । ‘ज्ञानार्णव’ ।
२० वरि.

३०६ वरिवस्यारहस्ये
'ऐ' = विश्वयोनि = १४ भुवन = चतुर्दशार = विशुद्ध ।
'अर्धचन्द्र' = अष्टदल पद्म ।
'स' = सोममण्डल = षोडशदल पद्म ।
'बैन्दवस्थान' = वृत्त = त्रिवृत्त = चन्द्रमण्डल ।
'ह' = शिवस्थान = चतुष्कोण = भूपूर = सहस्रार ।
पंचदशाक्षरी विद्या, नित्या, तत्त्व, खण्ड एवं यंत्रों में ऐक्य—

मंत्रतिथिवैदिक नामनित्यायेंतत्त्वखण्डयंत्र के भाग
क१दर्शाकामेश्वरीशिवअग्नित्रिकोण
ए२दृष्टाभगमालिनीशक्तिअग्निअष्टार
ई३दर्शतानित्यक्लिन्नामायाअग्निअन्तर्दशार
ल४विश्वरूपाभेरुण्डाशुद्धविद्याअग्नि
ह्रीं५सुदर्शनावह्निवासिनीजलसौरबहिर्दशार
ह६आप्यायमानामहावज्रेश्वरी या विघ्नेश्वरीतेजसौरबहिर्दशार
स७आप्यायमानाशिवदूती-रौद्रीवायुसौरचतुर्दशार
क८आप्यायात्वरितामनसौरचतुर्दशार
ह९सूनृताकुलसुन्दरीपृथ्वीसौर
ल१०इरानित्याआकाशसौर
ह्रीं११आपूर्यमानानीलपताकाविद्यासौर
स१२आपूर्यमानाविजयामहेश्वरचन्द्रशिव के चार चक्र
क१३पूर्यन्तीसर्वमङ्गलापरतत्त्वचन्द्रशिव के चार चक्र
ल१४पूर्णाज्वालामालिनीआत्मतत्त्वचन्द्रशिव के चार चक्र
ह्रीं१५पौर्णमासीचित्रा, चिद्रूपासदाशिवचन्द्रशिव के चार चक्र
श्रीं१६चिद्रूपा (अमावस्या)महात्रिपुरसुन्दरीसादाख्यचन्द्रकलानित्याकला

द्वितीयोंऽशः ३०७
(क) षोढा ऐक्य— (ख) चतुर्विध ऐक्य—
१. मंत्र एवं मातृकाओं का ऐक्य । १. मातृका एवं मंत्र का ऐक्य ।
२. मातृका एवं श्रीचक्र का ऐक्य । २. मंत्र एवं चक्र का ऐक्य ।
३. मंत्र एवं नित्याओं का ऐक्य । ३. चक्र एवं नित्याओं का ऐक्य ।
४. मातृका एवं नित्याओं का ऐक्य । ४. नित्याओं एवं तिथियों का ऐक्य ।
५. मंत्र एवं चक्र का ऐक्य ।
६. नित्याओं एवं चक्र का ऐक्य ।
मंत्र के भाग— श्रीचक्र के भाग—
१. ‘नाद’ = नाद से नादान्त तक १. ‘नाद’—आज्ञा चक्र से सहस्रार
(अर्धचन्द्र, रोधनी, नाद, नादान्त, तक तक । भूपुर
शक्ति, व्यापिका, समनी, उन्मनी)
२. ‘बिन्दु’—अनुस्वार २. ‘बिन्दु’—शिवचक्र । ३ वृत्त । १६
एवं ८ दल पद्म ।
३. ‘कला’—मंत्र के वर्ण एवं स्वर ३. ‘कला’—शक्तिचक्र, त्रिकोण अष्टार।
दशारद्वय । चतुर्दशार ॥
४. (मंत्र का चौथा खण्ड) = सादाख्य
= जो नाद बिन्दु कलातीत है ।
‘सुभगोदय स्तुति’ (गौडपादाचार्य)
एतेषां गणेशादीनां पञ्चानां मेलने पञ्चपञ्चाशत् संपद्यन्ते, गणेशस्यै-कविधत्वेनैव
गणनात्, रेखादलकोणेषु पञ्चसप्ततावपि ‘एको गणेशः’ इत्येव व्यवहारात् । पीठानि
यद्यपि कामरूपादिच्छायाच्छत्रान्तान्येकपञ्चाशत्’ तथापि ‘ओजापूकानाम्’ इति प्राधान्य-
वेषेण पुनर्गणनायां पञ्चपञ्चाशत् । तेनैतत्पञ्चकसमष्टित्वादेव पीठत्वं सिद्धमित्याशयेन
तन्त्रेषु न पुनः पृथक् पीठरूपतोक्तिरिति वा तन्त्राशय इति मन्वान आह—
यावन्मातृकमुदितान्येकसमेतानि पंचाशत् ।
पीठानि पुनर्गणितान्योजापूकानि चत्वारि ॥ ९७ ॥
गणपग्रहभादीनां शशिनिधितार्तुसूर्यसंख्यानाम् ।
मेलनतः पीठानि ज्ञेयान्येतेषु पञ्चपञ्चाशत् ॥ ९८ ॥
(वर्णमाला एवं पीठों में समानता)
जितनी (संख्या में) मातृकायें (वर्णमाला के अक्षर) हैं (उसी संख्या के
अनुरूप) इक्यावन पीठ हैं । ओडयाण जालंधर, पूर्णगिरि एवं कामरूप
(ओ-जा-पू-का) नामक चार (पीठ) उसमें और पणिणत किए गए हैं (जोड़े या
गिनाए गए हैं) ॥ ९७ ॥

३०८ वरिवस्यारहस्ये
(गणप, ग्रह, भ आदि के साथ पचपन पीठों की एकात्मता)
गणप, ग्रह, भ आदि जिनकी संख्या क्रमशः चन्द्रमा (एक) निधि (नौ), तारा
(सत्ताईस), ऋतु (छः) एवं सूर्य (बारह) है—से विरचित, कुल मिलाकर पचपन
पीठ, इनमें (स्थित) जानना चाहिए ॥ ९८ ॥
* प्रकाश *
यावन्मातृकमित्यव्ययीभावः । यावन्तो मातृकास्तावन्ति पीठानीत्यर्थः । ओ,
ओड्याणपीठम्; जा, जालंधरपीठम्; पू, पूर्णगिरिपीठम्; का, कामरूपपीठम् ।
नामैकदेशे नामग्रहणम्, तथैव संप्रदायात् । भादीनां नक्षत्रयोगिनीराशीनाम् । शशी
एकः । निधयो नव । ताराः सप्तविंशतिः । सारेति पाठे ऽपि सकारः सप्तसंख्यायां
साङ्केतिकः; रेफस्तु द्विसंख्यायाम् 'अङ्कानां वामतो गतिः' इत्युक्तेरुक्तैव संख्या
सिध्यति । तदुक्तं वररुचिपरिभाषायाम्—
'पादयः पञ्च याद्यष्ट कादयष्टादयो नव ।
एतद्विभिन्नाक्षरं बिन्दुः संख्या तन्मेलनोध्भवा ॥'
इति । ऋतवः षट् । सूर्या द्वादश ॥ ९७-९८ ॥
* सरोजिनी *
'यावन' = जितनी, 'मातृका' = वर्णमाला के मूल अक्षर ॥
"पीठ"—पीठ शक्ति के रूपान्तर हैं । ये शक्ति के जाग्रत केन्द्र हैं । पीठ
चारो शक्तियों की परिणतियाँ हैं । अभिनवगुप्त पादाचार्य ने 'तन्त्रालोक' में इनकी
उपयोगिता को रेखांकित किया है—'क्षेत्रपीठो पपीठेपु प्रवेशो विघ्नशान्तये । मंत्राद्या-
राधकस्यार्थ तल्लाभायोपदिश्यते ॥'' लाभ निम्न है—१. विघ्नशांति २. मंत्रसिद्धि
में लाभ
'पीठानि पंचाशत्'—पचास पीठ । 'एक समेतानिपंचाशत' = इक्यावन'
प्रमुख पीठ निम्न हैं—१. कामरूपपीठ २. पूर्णगिरिपीठ ३. जालन्धरपीठ ४.
ओड्याणपीठ ॥ चारों शक्तियाँ कामरूप-पूर्णगिरि-जालन्धर एवं उड्डीयान पीठ के रूप
में परिणत हो गई है—"प्रकाशविमर्शात्मतया समरसीभूताः पूर्वोक्ताश्चतस्रः शक्तयः
कामरूप-पूर्णगिरि-जालन्ध्रौड्याणपीठ रूपेण परिणता इत्यर्थः ॥''१ 'पीठ' चार हैं—
'पीठाश्चत्वारः पिण्ड-पद-रूप-रूपातीत शब्देन तत्तत्स्थानान्याधारहृदय-भ्रूमध्य-ब्रह्म-
रन्ध्राणिलक्ष्यन्ते । पिण्डं कुण्डलिनी शक्तिः पदं हंसः प्रकीर्तितः । रूपं बिन्दुरितिख्यातं
रूपातीतं तु चिन्मयम् ।२ 'पदं नाम हंसः, रूपं नाम बिन्दुः, रूपातीतं नाम निरञ्जन
तत्त्वम् ॥'३
पीठ—अमृतानन्दनाथ कहते हैं कि—'अम्बिका' 'शान्ता' आदि समस्त चार
शक्तियाँ क्रमानुसार परस्पर सामरस्यभावापन्न होकर 'कामरूप' 'पूर्णगिरि' 'जालन्धर'
१. अमृतानन्दनाथ—योगिनीहृदय 'दीपिका' २. स्वच्छन्दसंग्रह
३. अमृतानन्दनाथ—योगिनीहृदय 'दीपिका'

An exact line-by-line transcription of the page into Unicode Devanagari:

द्वितीयोऽंशः ३०९
एवं 'ओड्याणपीठ' के रूप में परिणत हो गई—‘चतस्रः (अम्बिकाद्याः
शान्ताद्याश्चतस्रः) क्रमेण परस्परं सामरस्यमापन्नाः ‘का पू जा ओ'—इति क्रमाद्
आसन् ।। 'का'—कामरूपपीठम्, 'पू'—पूर्णगिरिपीठम्, जा—जालन्धरपीठम्, ‘ओ’—
ओड्याणपीठम् ।।''
'पीठ'—१ 'कामरूपपीठ' = भूतत्त्व । वृत्त = बिन्दुषट्क । भूमण्डल । २.
'पूर्णगिरिपीठ' = वृत्तरूप = षड्बिन्दुयुक्त । वायु तत्त्व । वायु मण्डल । वायुमण्डल
षडावर्तवद्वृत्तरूप है । ३. 'जालन्धर पीठ' = अर्धचन्द्र ही जालन्धर पीठ है ।
अर्धचन्द्र जलतत्त्वमय है । जलमण्डल भी अर्धचन्द्राकार है । ४. 'ओड्याणपीठ'—
त्रिकोण ही ओड्याणपीठ है । त्रिकोण तेजस्तत्वमय है । क्योंकि अग्निमण्डल
त्रिकोणरूप

३१० वरिवस्यारहस्ये
२. कादितान्ताक्षरोपेतं, बाणलिङ्गं त्रिकोणकम् ।
कदम्बगोलकाकारं थादि शान्ताक्षरा वृतम् ॥ ४६ ॥
३. सूक्ष्मरूपं समस्तार्णवृतं परमलिङ्गकम् ।
बिन्दुरूपं परानन्दकन्दं नित्यपदोदितम् ॥ ४७ ॥
अन्यपीठ भी हैं यथा—"पीठानि विन्यसेद्देविमातृकास्थान के पुनः । तेषां
नामानि वक्ष्यन्ते शृणुष्वावहिता प्रिये ॥ ३६ ॥ कामरूपं वाराणसी नेपालं पौण्ड्र-
वर्धनम् । चर स्थिरं कान्यकुब्जं पूर्णशैलं तथाबुर्दम् ॥ ३७ ॥ आम्रातकेश्वरै काम्रंचि-
स्रोतः कामकोरकम् । कैलासं भृगुनगरं केदारपूर्णचन्द्रके । श्रीपीठ ओड्डारपीठ जालध्रं
मालवोत्कले । कुलान्तं देविकोटं च गोकर्ण मास्तेश्वरम् । अट्टहासं च विरजं राजगेहं
महापथमू । कोलापुर मेलापुरं ओङ्कारस्तु जयन्तिका । उज्जायिन्यपि चित्रा च क्षीरकं
हस्तिनापुरम् । ओड्डीशं च प्रयागाख्यं षष्ठं मायापुरं तथा । जलेशं मलयं शैलं मेरुं
गिरिवरं तथा । महेन्द्रं वामनं चैव हिरण्यपुरमेव च ॥ महालक्ष्मीपुरोऽज्याणं छाया
छत्रमतः परम् । एते पीठाः समुद्दिष्टा मातृकारूपकाः स्थिताः ॥"१
मातृका के वर्णों की संख्या ५१ है । मुख्य पीठ भी ५१ है । गणप, ग्रह,
भ आदि जो संख्या की दृष्टि से १, ९, २७, ६, एवं १२ हैं—सब मिलाकर
५५ हैं । उनकी यह ५५ की संख्या ५५ पीठों का प्रतीक है ।
इस श्लोक में जो प्रतीकाक्षर प्रयुक्त किए गए हैं उनका अर्थ निम्नांकित है—
शशि (१), निधि (९), तारा (२७), ऋतु (६), सूर्य (१२) है ।
वररुचि कहते हैं—"पादपः पञ्च यादृष्ट कादयष्टादयो नव । एतद्वित्राक्षरं
बिन्दुः संख्या तन्मेलनोध्भवा ॥"
अथ चक्रराजस्य विद्याक्षरजन्यत्वमुपपादयति द्वाभ्यां श्लोकाभ्याम्—
कत्रितयादीकाराद् बिन्दुर्जातस्तदग्रिमे चक्रे ।
हल्लेखाभिस्तत्परचक्रत्रितयं हकाराभ्याम् ॥ ९९ ॥
एकारेण च तत्परचक्रे जाते सकाराभ्याम् ।
चतुरश्राणि लकारैरेवं विद्याक्षरेण चक्रजनिः ॥ १०० ॥
(विद्याक्षरों द्वारा चक्रोत्पत्ति-प्रक्रिया)
क एवं तीन ईकारों से 'बिन्दु' का प्रादुर्भाव हुआ । उसके अगले चक्र द्वय
(सर्वसिद्धि एवं सर्वरोगहर चक्र) हल्लेखाओं से, उससे अगले तीन चक्र
(सर्वरक्षाकर, सर्वार्थसाधक एवं सर्वसौभाग्यदायक चक्र) दो हकारों एवं एक एकार
से, अगले दो चक्र (सर्वसंक्षोभण एवं सर्वाशापरिपूरक चक्र) दो सकारों से तथा
चतुरस्र (त्रैलोक्यमोहन) लकारों से—इस प्रकार विद्या के अक्षरों द्वारा चक्र उत्पन्न
हुए ॥ ९९-१०० ॥
१. अमृतानन्दनाथ—योगिनीहृदय 'दीपिका'

द्वितीयोऽंशः ३११

  • प्रकाश *
    'इच्छाज्ञानाक्रियारूपमादनत्रयसंयुतम् ।
    सदाशिवासनं देवि महाबिन्दुमयं परम् ॥
    इत्यस्य इच्छादयस्तिस्रः शक्तयो रूप्यन्ते जन्यन्ते यस्मादीकारात् स च मादनानां
    ककाराणां त्रयं चेत्येताभ्यां संयुक्तं जनितं महाबिन्दुमयं सदाशिवासनम्, ब्रह्मविष्णु-
    रुद्रेश्वराः पादाः, फलकं सदाशिवममयम्, तादृशं सर्वानन्दमयं चक्रमित्यर्थः । अथ वा,
    इच्छाज्ञानाक्रियारूपाश्च ते मादनाश्च त्रयं चेति द्वन्द्वः । त्रयशब्देन बिन्दुत्रयात्मकत्वाद्दी-
    कारो ग्राह्यः । शेषं पूर्ववत् । तदेतदाह—कत्रितयादित्यादिना । सर्वसिद्धिप्रदसर्वरोग-
    हराख्यचक्रद्वयमपि मिलित्वा नवयोन्यात्मकम्; तच्च तिसृभिर्हृल्लेखाभिर्जातम्,
    'हृल्लेखात्रयसंभूतैस्तिथिसंख्यैस्तथाक्षरैः ।
    बिन्दुत्रययुतैर्जातं नवयोन्यात्मकं प्रिये ॥'
    इति वचनादित्याह—तदग्रिम इत्यादिना । सर्वरक्षाकरसर्वार्थसाधकसर्वसौभाग्य-
    दायकाख्यं स्थितिचक्रत्रितयं तिसृभिः शक्तिभिस्त्रिभिरनलैश्च रचितं हकारद्वयेनैकादश-
    स्वरेण च समुत्पन्नम् । तदुक्तम्—
    'मण्डलत्रययुक्तं तु चक्रं शक्त्यनलात्मकम् ।
    व्योमबीजत्रयेणैव...........................॥'
    इति । दशारद्वयं मन्वश्रं चेति मण्डलत्रयम् । व्योमबीजे च त्रयं चेति विग्रहः ।
    त्रयपदेन कोणत्रयात्मकत्वादेकारः । व्योमनी च बीजं चेति विगृह्य व्योमबीजान्येव
    त्रयमिति वा विग्रहः, बीजपदेनैकारः, तस्य ब्रह्माण्डादिकटाहान्तं प्रति बीजभूतत्वात्,
    'यदेकादशमाधारं बीजं कोणत्रयात्मकम्' इति प्रयोगाच्च । हादिपक्षे तु न को ऽप्यत्र
    क्लेशः । तदेतदाह—तत्परेत्यादिनैकारेण चेत्यन्तेन । तत्परचक्रे इति । सर्वसंक्षोभण-
    सर्वआशापरिपूरके इत्यर्थः । उक्तं च—'सरोरुहद्वयं शाक्तैः' इति । शाक्तैः सकराभ्याम् ।
    'अक्षीणि मे—' इतिवद्बहुवचनम् । जन्यजनकयोः समसंख्याकत्वस्य सति संभवे
    युक्तत्वाच्च । अत एव हि हृल्लेखात्रयेत्युक्तश्लोके बिन्दुत्रययुतैरिति विशेषणस्य
    सार्थक्यम्, पञ्चदशस्वक्षरेषु बिन्दुनादत्रयस्येकारैः सह मेलने प्रतिहृल्लेखं हकारो रेफ
    ईकारश्चेति त्रयमेवेति तत्रिकोणेन नवाक्षरसमूहेन नवयोन्यात्मकस्य चक्रद्वयस्य
    जननसंभवात्, बिन्दुशब्दस्य बिन्द्वाद्युन्मन्यन्तसमूहपरत्वात् । स्वरूपकीर्तनमात्रपरत्वेन
    व्याख्यायां तु तद्वैयर्थ्यं स्पष्टम् । चतुरश्राणि त्रैलोक्यमोहनचक्रम् । उभयत्र बहुवचनं
    त्रित्वे ॥ ९९-१०० ॥
  • सरोजिनी *
    १. क+ई+ई+ई—(क एवं तीन ई) —'बिन्दु' (सर्वानन्दमयचक्र)
    २. हृल्लेखा —सर्वसिद्धिप्रदचक्र, सर्वरोगहर चक्र ।।
    ३. हकार —सर्वरक्षाकर चक्र ।।
    ४. हकार —सर्वार्थसाधक चक्र ।।

३१२ वरिवस्यारहस्ये
५. एकार —सर्वसौभाग्यदायक चक्र ॥
६. सकार —सर्वसंक्षोभण चक्र ॥
७. सकार —सर्वाशापरिपूरक चक्र ॥
८. लकार त्रय —चतुरस्र, त्रैलोक्यमोहन चक्र
'योगिनीहृदय' में ठीक ही कहा गया है कि—समस्त चक्र मंत्रात्मक हैं—'इत्थं
मंत्रात्मकं चक्रं देवतायाः परं वपुः ॥१' क्योंकि—"बीजमयं शिखरगत हृल्लेखात्रयावय-
वभूतैरक्षरैरहंकार रेफे काराख्यैर्बिन्दुत्रय संयुतैर्नवसंख्यात्मकैर्नवयोन्यात्मकं चक्रं जातम् ॥"
एतत्त्रितयाभिन्नः स्वगुरुस्तदभेदभावनादार्ढ्यात् ।
तेन गणेशादिमयस्तद्दयया च स्वयं तथारूपः ॥ १०१ ॥
('गुरु' की देवी, विद्या, एवं चक्र के साथ अभिन्नता एवं गणेश के साथ
अभेदात्मकता का प्रतिपादन)
अभेदात्मकता की भावना की दृढ़ता के कारण अपना गुरु उक्त तीनो (देवी,
विद्या एवं चक्र) से अभिन्न होता है अतः वह गणेश आदि देवों से समन्वित होता
है उसकी (गुरु की) करुणा से स्वयं (शिष्य भी) तद्रूप हो जाता है ॥ १०१ ॥

  • प्रकाश *
    एतेषां देवताविद्याचक्राणां त्रितयेनाभिन्नः । तेन गणेशादिषड्रूपः श्रीगुरुः ।
    तत्प्रसादेन स्वयं साधको ऽपि । तदुक्तम्—
    'देव्या देहो यथा प्रोक्तो गुरुदेहस्तथैव च ।
    तत्प्रसादाच्च शिष्योऽपि तद्रूपः सन् प्रकाशते ॥' इति ।
    देवीदेहे ये ये ऽवयवा यद्यद्रूपास्तत्तद्रूपावयवक एवैतयोर्देह इत्यर्थः ॥ १०१ ॥
  • सरोजिनी *
    इस श्लोक में गुरु की देवी, देवता, विद्या, शिष्य एवं चक्र—इन पाँच से
    अभेदात्मकता प्रदर्शित की गई है । कहा भी गया है—"देव्या देहो यथा प्रोक्तो
    गुरुदेहस्तथैव च । तत्प्रसादाच्च शिष्योऽपि तद्रूपः सन् प्रकाशते ॥" 'एतत्त्रितया-
    भिन्नः', 'गणेशादिमय', 'तथारूपः'—
    'त्रितय' = देवी, विद्या, चक्र । (गणेश आदि देवता एवं शिष्य) ॥ १. 'गुरु'
    समस्त देवताओं के स्वामी हैं—'गुरुः सर्वसुराधीशो ।'२
    "गुरुः परगुरुश्चैव परापरगुरुस्तथा । स्वगुरुः परमेशानि साक्षाद् ब्रह्म न
    १. अमृतानन्दनाथ—योगिनीहृदय 'दीपिका' (मन्त्रसंकेत ५६)
    २. शाक्तानन्द तरंगिणी

द्वितीयोंऽशः ३१३
संशयः ।।'' 'गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः । अतएव महेशानि साक्षाद् ब्रह्ममयो
गुरुः ।।''१
'देवतापूजनार्थं च यद्वा पुष्पादिकंप्रिये । तत्सर्वं गुरुवेदत्वा पूजयेन्नगनन्दिनि ।'२
गुरुदेवो हरः साक्षात्तत्पत्नी हर वल्लभा ।'३ गुरुरेफः शिवः प्रोक्तोसोऽहं देवि न संशयः
(गुरुगीता)
२. गुरु एवं विद्या (मंत्र) में अभेद—रुद्रयामल में कहा गया है कि—गुरु की
क्रिया तो पूजा का मूल है एवं महापद है । गुरु का वाक्य ही मूलमंत्र है और गुरु
स्वयं ब्रह्म है—'गुरोः क्रिया महेशानि पूजामूलं महत् पदम् । गुरोर्वाक्यं मूलमंत्रं परं
ब्रह्म स्वयं गुरुः ।।४
समस्त विद्याएँ देहस्थ हैं, समस्त देवता देहस्थ हैं, समस्त तीर्थ देहस्थ हैं
किन्तु ये सभी मात्र गुरुवाक्य से ही प्राप्त हो सकते हैं ।५ गुरु ही मंत्र भी है अतः
गुरु एवं विद्या (मंत्र) में अभेद है—'मंत्रोऽपि गुरुरुच्यते ।।'६ 'अतो मंत्रे गुरो देवे न
भेदश्च प्रजायते ।।७
'नीलतंत्र' में गुरु को मंत्र (विद्या) का मूल कहा गया है—'धर्ममूलं गुरोर्मूर्तिः
पूजा मूलं गुरोः कृपा । मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं तस्मादादौ गुरुं यजेत् ।।''
गुरुमूर्ति = धर्म का मूल । 'गुरुकृपा' = पूजामूल । 'गुरुवाक्य' = मंत्र का
मूल ।।८
ननु गणेशाद्यात्मकत्वज्ञाप्यकः पञ्चाभेदः कथमुपपद्यते, गणपदस्य समुदायार्थ-
कस्य समुदायिसापेक्षत्वेन समुदायिनां देवताक्षररेखाणां भेदे तद्भेदस्यावश्यकत्वात्,
नक्षत्रत्वादेरपि संख्यामात्रस्यानुगमकत्वे ऽपि संख्यावतां विरुद्धधर्माधिकरणत्वेन भेदस्य
संख्यावतां संमतत्वेन भिन्नभिन्नत्वात्; तेन च नैकस्यापि धर्मस्याभेदव्यापकतेति कथं
तज्ज्ञाप्यकाभेदः साध्यत इति चेत्; मैवम्; वचनबलादेव समुदायिनां संख्यावतां
चाभेदस्य सिद्धत्वात्, उपक्रमादिभिर्निर्णीततात्पर्यकस्य शब्दस्य प्रत्यक्षादिनिखिल-
माणेभ्योऽपि बलवत्तायाश्चन्द्रप्रादेशिकत्वभ्रमादावन्यत्र चौपनिषदैर्बहुतरं साधितत्वात् ।
किं च, स्वाश्रयसमानजातीयाश्रितस्वातिरिक्तस्वव्यापकसंख्याविरहसहकृतस्वस्वरूप-
संख्यामात्रत्वमप्यभेदसाधकमेव, बाधकाभावात् । स्वपदानि नवादिसंख्यारूपाणि । तेन
विद्या देवतास्वरूपादभिन्ना नवसंख्यामात्राश्रयत्वाद्देवतास्वरूपवदित्यादयः पृथक् पृथक्
प्रयोगाः । अत एवैकत्वसंख्यामात्राश्रयत्वादाकाशकालदिगीश्वराणामभेदो दीधितिकृतः
संमतः । इदं चानुमानमागमसहितमेव प्रमाणं विषयप्रमात्वदार्ढ्यसंपादनाय । तेन न
घटत्वपटत्वादेरभेदापत्तिः । तदेतत् सर्वमभिसंधायोपसंहरति-
१-२. महिषमर्दिनी तन्त्र ३. रुद्रयामल
४. रुद्रयामल ।। शिव ही जगत् के प्रथम आदि गुरु, जगद्गुरु हैं—कैलास
शिखरासीनं देवदेवं जगद्गुरुम् । (ज्ञानसंकलिनी तन्त्र)
५. ज्ञानसंकलिनी तन्त्र ६-७. गुरुगीता
८. नीलतन्त्र

३१४ वरिवस्यारहस्ये
इत्थं माता विद्या चक्रं स्वगुरुः स्वयं चेति ।
पञ्चानामपि भेदाभावो मन्त्रस्य कौलिकार्थोऽयम् ॥ १०२ ॥
('कौलिकार्थ' का स्वरूप)
इस प्रकार माता, विद्या, चक्र, स्वगुरु एवं स्वयं—इन पाँचों में भेद का
अभाव (अभेदापत्ति । तादात्म्यभाव) ही मंत्र का 'कौलिकार्थ' है ॥ १०२ ॥

  • सरोजिनी *
    'योगिनीहृदय' में 'कौलिकार्थ' का स्वरूप इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है—
    ‘कौलिकंकथयिष्यामि चक्रदेवतयोरपि । विद्यागुर्वात्मनामैक्यं तत्कारः प्रदर्श्यते ॥’१
    'कौलिकार्थ' अर्थ है चक्र, देवता, गुरु, विद्या एवं साधक में ऐक्यानुसंधान—
    ‘कौलिकं कौलिकार्थं कथयिष्यामि चक्र-देवता-गुरु-विद्या-साधकानामैक्यानुसंधानं
    कौलिकार्थ इत्यर्थ ॥’२ आचार्य भास्करराय भी इसी तथ्य को पुष्ट करते हैं—
    ‘‘श्रीचक्रं श्रीमाता श्रीविद्या श्रीगुरुरात्मा चेति पंचानामैक्यं कौलिकार्थ इत्युच्यते ॥३
    १. मंत्र, चक्र, एवं देवता में ऐक्य की पुष्टि करते हुए कहा गया है कि—
    ‘इत्थं मंत्रात्मकं चक्रं देवतायाः परं वपुः ॥’४
    २. विद्या-गुरु एवं साधक में ऐक्य के विषय में पुष्टि की गई है—'विद्या
    गुर्वात्मनामैक्यं तत्प्रकारः प्रदर्श्यते ॥'५
    ३. भगवती ही विश्व एवं चक्र का दोनों का कारण हैं अतः उनसे ऐक्य
    स्वतः सिद्ध है—
    “यदा सा परमा शक्तिः स्वेच्छयाविश्व 'रूपिणी । स्फुरत्तामात्मनः पश्येत्तदा
    चक्रस्य संभवः ॥”६
    ४. वाक्, विद्या एवं देवी में एकता—
    आत्मनः स्फुरणं पश्येद्यदा सा परमाकला ।
    अम्बिका रूपमापन्ना परावाक् समुदीरिता ॥ ३६ ॥'७
    चूँकि समस्त मंत्रों का, समस्त वर्णों का एवं अशेष मातृकाओं का मूल मात्र
    'परावाक्' है अतः यदि भगवती ही परावाक् बन जाती हैं तब विद्या, मंत्र, वाणी
    एवं देवी में भी ऐक्य स्वतः प्रमाणित है ।
    ५. चक्र एवं देवी में भी अभिन्नता है क्योंकि कोई भी चक्र ऐसा नहीं है जो
    कि चक्रेश्वरी से युक्त न हो—
    “चक्रेश्वरी समायुक्तं नवचक्रं पुरोदितम्”८
    ─────────────────────────────────────────────
    १-२. अमृतानन्दनाथ—योगिनीहृदय 'दीपिका'
    ३. भास्कराचार्य—'सेतुबन्ध' ४-८. योगिनीहृदय 'दीपिका'

द्वितीयोऽंशः ३१५
६. मंत्रराज शिवशक्ति से अभिन्न है क्योंकि यह उन्हीं से उत्पन्न हुआ है—
'शिवशक्ति समायोगाज्जनितो मंत्रराजकः ॥'१
'सैव महाविद्यात्मा माता चतुरन्वयैकविश्रान्तिः ॥'
देवी मातृकामयी है । मंत्ररूपिणी है—'ज्ञातृज्ञानमयाकार मननान्मंत्ररूपिणी ।
तेषां समष्टिरूपेण पराशक्तिस्तु मातृका ॥'२ तेषां समष्टिरूपेण पराशक्तिं तु
मातृकाम् ॥३ 'विद्या' देवीमयी ही है—'तन्मयी मूलविद्या च तदद्य कथयामि ते ॥४
७. गुरु, शिव एवं साधक में भी अभिन्नता स्थित है—'शिवगुर्वात्मना-
मैक्यानुसंधानात्तदात्मकम्' ।५
८. गुरु, मंत्र तथा देवता में अभेद है—अतो मंत्रे गुरौ देवे न भेदश्च
प्रजायते ॥'६
९. देवी और विद्या में अभिन्नता है—'मातृकाभेदतंत्र' में कहा गया है कि
गुरुरूपा महाविद्या ही एक परा देवी हैं । महाविद्या ही श्रीमत्त्रिपुरीसुन्दरी देवी हैं ।
एक ही महाविद्या है जो कि नाम मात्र के लिए पृथक् है—
'गुप्तरूपा महाविद्या शैवी सैकजटा परा । तस्माल्लक्ष्मी वैष्णवी या त्रिवर्ग
फलदायिनी । गुप्तरूपा महाविद्या श्रीमत्त्रिपुरसुन्दरी । शांभवी परमा या सा त्रिपुरा
मोक्षदायिनी । एकैव हि महाविद्या नाम मात्रं पृथक्-पृथक् । तथैव पुरुषश्चैव नाममात्र-
विभेदतः ॥७
'मंत्रस्य'—मंत्र का (पंचदशाक्षरी, कूटत्रयात्मक, श्रीविद्या के मंत्र का) वर्णों
की चिन्मयता ही वर्णों को 'मंत्र' बना देती है इसीलिए कहा गया है—
“मंत्राश्चिन्मरीचयः” । 'नेत्रतंत्र' में मंत्र-विज्ञान की विशद व्याख्या की गई है । 'मंत्र'
देवता का वर्णाकार रूप है । 'मंत्र'—देवता की ध्वन्यात्मक (नादात्मक) अभिव्यक्ति
है । 'मंत्र'—देवता की नादात्मक परिणति है । 'मंत्र' देवता का सूक्ष्म शरीर है ।
'मंत्र' करोड़ों की संख्या में या असंख्य हैं तथा ये सभी सर्वाधिकारी हैं, शिव-शक्ति
के प्रभाव के कारण ये सर्वशक्ति समन्वित हैं तथा योगमोक्षप्रद एवं अनन्त शक्ति
सम्पन्न हैं—'मंत्राकोट्यो ह्यसंख्याताः सर्वाः सर्वाधिकारिकाः । शिवशक्ति प्रभावाच्च
सर्वशक्तिसमन्विताः । भोगमोक्षप्रदाः सर्वस्वशक्ति बलसमन्विताः ॥ 'मंत्र' क्या है?
'नेत्रतंत्र' के २१वें अधिकार के ७१ से ७६ श्लोकों में 'मंत्र' तत्व की व्याख्या की
गई है । चूँकि 'मंत्र'—१. प्राणियों को संसार-सागर से मुक्त करते हैं, २. जीवात्मा
को परशिव से योजित करते हैं—जोड़ते हैं एवं ३. मनन करने से (मनन करने
वालों का) प्राणियों का आपदाओं (दैहिक, भौतिक, अधिभौतिक, आधिदैविक आदि
आपदाओं) से त्राण करते हैं इसीलिए इन्हें 'मंत्र' कहा जाता है—
'मोचयन्ति च संसाराद्योजयन्ति परे शिवे ।
१-५. अमृतानन्दनाथ—योगिनीहृदय 'दीपिका' ६. गुरुगीता
७. मातृकाभेद तन्त्र

३१६ वरिवस्यारहस्ये
मननत्राण धर्मित्वात्तेन मंत्रा इति स्मृताः ॥
१. ‘मंत्र’ अमित तेजशाली होते हैं—एवमाद्याः स्मृताः मंत्राः सर्वे ह्यमित
तेजसः ॥
२. ‘मंत्र’ जापक को अधिकार प्रदान करते हैं— अधिकारं प्रकुर्वन्ति सर्वस्य
जगतः प्रिये ॥
३. ‘मंत्र’ भगवान शिव से उत्पन्न हुए हैं । समस्त मांत्री सृष्टि के वे ही मूल
केन्द्र हैं—‘मंत्रसृष्टिर्भवेदेषा शिवस्य परमात्मनः ॥ ७० ॥
४. मंत्रों की मूल योनि ज्ञानशक्ति है—
ज्ञानशक्तिः परासूक्ष्मा मातृकां तो विदुर्बुधाः ।
सा योनिः सर्वमंत्राणां सर्वत्रारणिवत्स्थिताः ॥
५. मंत्र शिवशक्त्यात्मक एवं नित्य अनुग्रहशाली हैं—
शिवशक्त्यात्मकरूपास्तु नित्यानुग्रहशालिनः ॥
अथ क्रमप्राप्तं सर्वरहस्यार्थमाह—
द्वादशषोडशदशभिस्तपनशशिदहनकलाभिराकीर्णैः ।
पञ्चाशद्भिर्वर्णैरभिन्नदेहा कुलीनकुण्डलिनी ॥ १०३ ॥
बिसतन्वी तडिदाभा मूलाधारथपद्मश्रृङ्गाटात् ।
भित्त्वा मूलहृदाज्ञागतवह्निरवीन्दुमण्डलत्रितयम् ॥ १०४ ॥
व्योमनि चिच्छशिमण्डलमध्ये त्वकुलेन सङ्गम्य ।
उभयाङ्गसङ्गजन्यं प्रवाहयन्ती सुधापूरम् ॥ १०५ ॥
स्वयमपि तत्पानवशान्मत्ता भूत्वा पुनश्च तेनैव ।
मार्गेण परावृत्य स्वस्मिन् स्थाने सुखं स्वपिति ॥ १०६ ॥
(कुलकुण्डलिनी का स्वरूप एवं मूलस्थान)
भगवान् सूर्य की (तपिनी आदि) बारह, विधु की (अमृता आदि) सोलह एवं
अग्निदेव की (धूम्रार्चिरादि) दस कलाओं से उपहित, पचास वर्णों से अभिन्न
शरीरवाली, पृथ्वीतत्त्व में लीन, मृणालतन्तु के सदृश सूक्ष्माकारा, शम्पा की भाँति
उद्दीप्त, मूलाधार पङ्कज की कर्णिका में स्थित त्रिकोण के ऊपर से, मूलाधार चक्र
के ‘वह्निमण्डल’ अनाहत चक्र के ‘सूर्यमण्डल’ एवं आज्ञाचक्र के ‘इन्दुमण्डल’ का
भेदन करके आकाशस्थित चेतन ‘चन्द्रमण्डल’ के केन्द्र में ‘अकुल’ से मिलकर
दोनों के अङ्ग-सङ्ग से उत्पन्न पीयूष को प्रवाहित करती हुई (एवं डाकिन्यादि
मण्डलों को आप्लावित करती हुई) एवं स्वयं भी उस पीयूष को पीने से उन्मत्त
होकर फिर उसी (सुषुम्णा) मार्ग से प्रत्यावर्तित होकर अपने स्थान (मूलाधार चक्र)
में सुखपूर्वक सोती है ॥ १०३-१०६ ॥

द्वितीयोंऽशः ३१७

  • प्रकाश *
    सूर्यस्य कलास्तपिन्यादयो द्वादश ककारादिभिर्द्वादशभिरानुलोम्येन भकारादिभिः
    प्रातिलोम्येन द्वादशभिश्च युक्ताः । चन्द्रस्य कलाः षोडशामृतादयः षोडशभिः
    स्वरैर्युक्ताः । अग्नेः कला दश धूम्रार्चिरादयो यकारादिभिर्दशभिर्वर्णैर्युक्ताः । एवं
    पञ्चाशद्भरक्षरैरभिन्ना कुलकुण्डलिनी बिसतन्तुतनीयसी तडित्कोटिप्रख्या । मूलाधार-
    स्थपद्मशृङ्गाटात् मूलाधारस्य कर्णिकायां विद्यमानाच्छृङ्गाटात् त्रिकोणादुपरि सार्धत्रि-
    वलयाकारेणाधोमुखी समुपविष्टा योगमर्यादया योगिभिरूर्ध्वमुखतयोत्थाप्यते । सा मूला-
    धारानाहताज्ञाचक्रेषु विद्यमानानि वह्निसूर्यसोममण्डलानि भिनत्ति । १०३-१०४ ॥
    ‘द्वादशान्तं ललाटोर्ध्वं कपालोर्ध्ववसानकम् ।
    द्व्यङ्गुलोर्ध्वं शिरोदेशं परं व्योम प्रकीर्तितम् ॥
    इत्युक्तलक्षणे व्योमनि विद्यमानस्य चिच्छशिमण्डलस्याधोमुखसहस्रारकर्णिका-
    रूपस्य मध्ये स्थितया अकुलकुण्डलिन्या सङ्गम्य ततोऽमृतपूरं स्रावयित्वा डाकिन्यादि-
    मण्डलान्याप्लावयन्ती स्वयमपि तत्पानेन मत्ता भूत्वा पुनस्तेनैव सुषुम्नामार्गेण परावृत्य
    स्वस्थाने सुखं स्वपिति । सर्वमेतद्योगिनामनुभवगम्यम् । योगशास्त्रमर्यादाज्ञानमात्रवतां तु
    परोक्षज्ञानगोचरो गुरुमुखादेव विविच्य बोद्धव्यमिति नेह विविच्यते ॥ १०५-१०६ ॥
  • सरोजिनी *
    कुण्डलिनी वर्णात्मिका है अतः अकारादि-क्षकारान्त समस्त वर्ण कुण्डलिनी ही
    हैं—‘अकारादिक्षकारान्त स्वयं परमकुण्डली ।’ ‘वर्णरूपमयी देवी कुण्डली
    परदेवता ।’१ जिस प्रकार समस्त पर्वतालंकृत वनभूमि का आश्रय शेषनाग हैं उसी
    प्रकार समस्त योग-तंत्रों का आधार कुण्डली है—‘‘सशैलवनधात्रीणां यथाऽधारोऽहि-
    नायकः । सर्वेषां योग-तन्त्राणां तथाऽधारोहि कुण्डली ॥’’२
    कुण्डलिनी पृथ्वी मण्डलस्थ मूलाधार में स्थित है और वह साढ़े तीन वलयों
    से वलयित है । वह करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाशवाली एवं करोड़ों चन्द्रों के
    समान सुशीतल, स्वयंभूलिङ्ग वेष्टित । निराकार, परब्रह्ममयी, ज्ञानानन्द मुदितमानसा,
    महायोगस्वरूपा, पद्मवनसमुद्भवा, प्रणवाकारा, शब्दविभागमयी एवं तत्त्वस्वरूपा ।
    परावाक्रूपा अचिन्त्य शक्ति है ।
    ‘‘पृथ्वीमण्डलात् सार्द्धत्रिवलयान्वितां रवि कोटिसमप्रभां, चन्द्रकोटिसुशीलतां
    स्वयंभूलिङ्गवेष्टितां निराकारस्वरूपां परब्रह्ममयी' कुण्डलिनीं ज्ञानानन्दमुदितमानसां,
    महायोगस्वरूपां पुरतः स्वयंभूकनक वर्णशीर्षतः पद्मवनसमुद्भवां बहुतरप्रणवानामेक-
    कृतशब्दविभागमयीं तत्त्वस्वरूपाम्’’३—‘त्रिपुरासमुच्चय’ में इसका स्वरूप इस प्रकार
    प्रस्तुत किया गया है—‘‘शक्तिः कुण्डलिनीति या निगदिता आईमसंज्ञा । जगन्निर्माणे
    सततोद्यता प्रविलसत्सौदामिनीसन्निभा । शङ्खावर्तनिभां प्रसुप्तभुजगाकारां जगन्मोहिनीम् ।
    १. कामधेनु तन्त्र २. हठयोगप्रदीपिका
    ३. तारारहस्य—ब्रह्मानन्दगिरि

३१८ वरिवस्यारहस्ये
तन्मध्ये परिभावयेद्विषलतान्तूपमेया कृतिम् ॥'१'
जब कुण्डलिनी जागती है तब समस्त चक्रों एवं ग्रंथियाँ भेदन हो जाता है—
'सुप्ता गुरुप्रसादेन यदा जागर्ति कुण्डली ।
तदा सर्वाणि पद्मानि भिद्यन्ते ग्रंथयोऽपि च ॥'२
आधारशक्तिरूपा कुण्डलिनी के ऋज्वीभूता होने पर इड़ा एवं पिङ्गला की मृत्यु
हो जाती है क्योंकि कुण्डली के जागृत होने पर सुषुम्ना नाड़ी में प्राण प्रवेश कर
जाता है—'ऋज्वीभूता तथा शक्तिः कुण्डलीसहसा भवेत् । तदा सा मरणावस्था
जायते द्विपुराश्रया ॥'३ मूलबंध लगाने से अधोगामी अपान ऊर्ध्वगामी होकर
अग्निमण्डल में पहुँच जाता है, (नाभि के अधोभाग में स्थित त्रिकोण जठराग्नि में
प्रविष्ट होने पर), अपानवायु से ताड़ित जठराग्नि शिखा दीर्घ हो जाती है और
अग्नि एवं अपान अग्नि की दीर्घशिखा से ऊष्ण होकर ऊर्ध्वगति प्राण में प्रवेश कर
जाते हैं । अपान की ऊर्ध्वगति से दीप्त अग्नि और प्रदीप्त हो उठती है । उसके
ताप से कुण्डलिनी प्रतप्त होने से जाग उठती है और ब्रह्मनाड़ी में प्रवेश कर जाती
है—'तेन कुण्डलिनी सुप्ता सन्तप्ता सम्प्रबुध्यते । दण्डाहता भुजङ्गीतन्निश्चस्य ऋजुतां
व्रजेत् । बिलं प्रविष्टेव ततो ब्रह्मनाड्यन्तरं व्रजेत् ॥'४
जिस प्रकार कुञ्जी से किवाड़ खुलता है उसी प्रकार कुण्डली के उद्बोधन
रूप चाभी से मोक्षद्वार का कपाट भी खुल जाता है—'उद्घाटयेत् कपाटं तु यथा
कुंचिकया हठात् । कुण्डलिन्या तथा योगी मोक्षद्वारं विभेदयेत् ॥'५ जिस मार्ग के
द्वारा प्राणी ब्रह्मस्थान में प्रवेश करता है उस ब्रह्मद्वार को कुण्डलिनी अपने मुख से
ढके हुए हैं ।६ कन्द के ऊर्ध्व भाग में स्थित कुण्डलिनी जीवों को बंधन में डालने
के लिए सोई पड़ी रहती है किन्तु वही योगियों को मोक्ष दिलाने हेतु जाग उठती
है—'कन्दोर्ध्वं कुण्डलीशक्तिः सुप्ता मोक्षाय योगिनाम् ॥७ इसको चलाने पर यह
जाग उठती है और योगी मुक्त हो जाता है—'कुण्डली कुटिलाकारा
सर्पवत्परिकीर्तिता । सा शक्तिश्चालिता येन स मुक्तो नात्र संशयः ॥'८ चूँकि यह
ब्रह्मद्वार को मुख से ढके है—'येन मार्गेण गन्तव्यं ब्रह्मस्थानं निरामयम् ।
मुखेनाच्छाद्य तद्द्वारं प्रसुप्ता परमेश्वरी'—अतः उसे जगाना आवश्यक है जिससे कि
वह ब्रह्मद्वार पर सोना छोड़कर ब्रह्मद्वार के मार्ग ब्रह्मनाड़ी में प्रवेश कर जाय । इस
सर्पिणी को जगाने हेतु इसकी पूँछ पकड़कर इसे जगाना चाहिए—'पुच्छे प्रगृह्य
भुजङ्गी सुप्तामुद्बोधयेच्चताम् ।'९ निद्रां विहाय सा शक्तिरूर्ध्वमुत्तिष्ठते हठात् ॥'
इसको जगाने के लिए योगी को चाहिए कि वज्रासन लगाकर एवं शक्तिचालनी मुद्रा
साधकर फिर भस्त्रिका प्राणायाम करे । नाभिदेश में स्थित सूर्य का आकुंचन करे
(नाभि के आकुंचन द्वारा) फिर सूर्य के आकुंचन से कुण्डली शक्ति का चालन
करे । दो मुहूर्त (चार घड़ी) तक निर्भय रहकर चालन करने से सुषुम्णागत यह
कुण्डलिनी थोड़ा बहुत जाग जाती है । और परिणामस्वरूप वह सुषुम्णा-मुख का
१. त्रिपुरासार समुच्चय २-९. हठयोगप्रदीपिका