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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 414, कुल 530 में से

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पृष्ठ 414

३१२ वरिवस्यारहस्ये
५. एकार —सर्वसौभाग्यदायक चक्र ॥
६. सकार —सर्वसंक्षोभण चक्र ॥
७. सकार —सर्वाशापरिपूरक चक्र ॥
८. लकार त्रय —चतुरस्र, त्रैलोक्यमोहन चक्र
'योगिनीहृदय' में ठीक ही कहा गया है कि—समस्त चक्र मंत्रात्मक हैं—'इत्थं
मंत्रात्मकं चक्रं देवतायाः परं वपुः ॥१' क्योंकि—"बीजमयं शिखरगत हृल्लेखात्रयावय-
वभूतैरक्षरैरहंकार रेफे काराख्यैर्बिन्दुत्रय संयुतैर्नवसंख्यात्मकैर्नवयोन्यात्मकं चक्रं जातम् ॥"
एतत्त्रितयाभिन्नः स्वगुरुस्तदभेदभावनादार्ढ्यात् ।
तेन गणेशादिमयस्तद्दयया च स्वयं तथारूपः ॥ १०१ ॥
('गुरु' की देवी, विद्या, एवं चक्र के साथ अभिन्नता एवं गणेश के साथ
अभेदात्मकता का प्रतिपादन)
अभेदात्मकता की भावना की दृढ़ता के कारण अपना गुरु उक्त तीनो (देवी,
विद्या एवं चक्र) से अभिन्न होता है अतः वह गणेश आदि देवों से समन्वित होता
है उसकी (गुरु की) करुणा से स्वयं (शिष्य भी) तद्रूप हो जाता है ॥ १०१ ॥

  • प्रकाश *
    एतेषां देवताविद्याचक्राणां त्रितयेनाभिन्नः । तेन गणेशादिषड्रूपः श्रीगुरुः ।
    तत्प्रसादेन स्वयं साधको ऽपि । तदुक्तम्—
    'देव्या देहो यथा प्रोक्तो गुरुदेहस्तथैव च ।
    तत्प्रसादाच्च शिष्योऽपि तद्रूपः सन् प्रकाशते ॥' इति ।
    देवीदेहे ये ये ऽवयवा यद्यद्रूपास्तत्तद्रूपावयवक एवैतयोर्देह इत्यर्थः ॥ १०१ ॥
  • सरोजिनी *
    इस श्लोक में गुरु की देवी, देवता, विद्या, शिष्य एवं चक्र—इन पाँच से
    अभेदात्मकता प्रदर्शित की गई है । कहा भी गया है—"देव्या देहो यथा प्रोक्तो
    गुरुदेहस्तथैव च । तत्प्रसादाच्च शिष्योऽपि तद्रूपः सन् प्रकाशते ॥" 'एतत्त्रितया-
    भिन्नः', 'गणेशादिमय', 'तथारूपः'—
    'त्रितय' = देवी, विद्या, चक्र । (गणेश आदि देवता एवं शिष्य) ॥ १. 'गुरु'
    समस्त देवताओं के स्वामी हैं—'गुरुः सर्वसुराधीशो ।'२
    "गुरुः परगुरुश्चैव परापरगुरुस्तथा । स्वगुरुः परमेशानि साक्षाद् ब्रह्म न
    १. अमृतानन्दनाथ—योगिनीहृदय 'दीपिका' (मन्त्रसंकेत ५६)
    २. शाक्तानन्द तरंगिणी