वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
पृष्ठ 405, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोंऽशः ३०३
सारे देवता श्रीचक्र की अवयवभूता शक्तियों की इकाइयाँ है क्योंकि—
“एकादशोत्तरशत देवता त्रिकोणाग्रदक्षवामकोणेषु कामेश्वर्यादिकास्तिस्रस्तद बहिरष्ट-
कोणान्तराले त्रिकोण परितश्चतुर्दिक्षु अष्टौ कामेश्वर कामेश्वर्यायुधदेवता अष्टकोणे अष्टौ-
वशिन्याद्या, अष्टकोणान्तराले षडङ्गदेवताः, अन्तर्दशारे सर्वज्ञाद्या दश, द्वितीयदशारे
सर्वसिद्धि प्रदाद्य दश, चतुर्दशारे सर्वसंक्षोभिण्याद्याश्चतुर्दश, अष्टदले अनङ्ग-
कुसुमाद्याः, षोडशकमले कामाकर्षिण्याद्याः षोडश, अन्तश्चतुरस्रे मुद्रा देवता दश,
मध्ये चतुरस्रे ब्राह्मयाद्या अष्टौ, बाह्यचतुरस्रे अणिमाद्यादश । एवमेकादशोत्तर शत
देवतात्मतया तासामाधारभूता श्रीचक्ररूपिणी देवता इत्यर्थः । १’
श्रीचक्र एवं विद्या की मातृकाओं में ऐक्य—
शिवचक्र विद्या की मातृकायें
१. भूपुर = मुख = य र ल व ⎤ ह = (आकाश) = शून्य ।
२. तीन वृत्त = क आदि सभी व्यञ्जन ⎥ ल (पृथ्वी) = भूपुर ॥
३. षोडशदल पद्म = सोलह स्वर ⎥
४. अष्टदल पद्म = अष्ट वर्ग ⎦
श्रीविद्या के वर्णों का चक्रों से एवं श्रीचक्र से ऐक्य—
‘ल’—शिव वाच्य है । भूपुर का वाचक है ।
लकार = सहस्रार का वाचक—
| श्री पंचदशी विद्या | श्रीचक्र एवं पिण्डस्थ चक्र | |
|---|---|---|
| १. ‘क’ = काम, शिव का वाचक | शिव अष्टमूर्ति है अतः क अष्टार, का द्योतक है । | ‘स्वाधिष्ठान चक्र’ स्वाधिष्ठान कामदेव का स्थान है अतः क = काम = स्वाधिष्ठान |
| २. ‘ए’ = विष्णुयोनि विष्णुरूप ॥ १० अवतारों का वाचक | बहिर्दशार | अनाहत चक्र = (विष्णु का स्थान होने के कारण) |
| ३. ‘ई’ = माया । (१४ भुवनों की स्वामिनी ।) | चतुर्दशार | विशुद्ध चक्र (१० दल) |
| ४. ‘ल’ = शिव । (भूमि वाच्य) | भूपुर (भूमि वाच्य होने के कारण) | शिववाच्य होने के कारण ‘सहस्रार’ का द्योतक ॥ |
१. योगिनीहृदय ‘दीपिका’