वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
DevanagariHindipublished530 पृष्ठ
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३१४ वरिवस्यारहस्ये
इत्थं माता विद्या चक्रं स्वगुरुः स्वयं चेति ।
पञ्चानामपि भेदाभावो मन्त्रस्य कौलिकार्थोऽयम् ॥ १०२ ॥
('कौलिकार्थ' का स्वरूप)
इस प्रकार माता, विद्या, चक्र, स्वगुरु एवं स्वयं—इन पाँचों में भेद का
अभाव (अभेदापत्ति । तादात्म्यभाव) ही मंत्र का 'कौलिकार्थ' है ॥ १०२ ॥
- सरोजिनी *
'योगिनीहृदय' में 'कौलिकार्थ' का स्वरूप इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है—
‘कौलिकंकथयिष्यामि चक्रदेवतयोरपि । विद्यागुर्वात्मनामैक्यं तत्कारः प्रदर्श्यते ॥’१
'कौलिकार्थ' अर्थ है चक्र, देवता, गुरु, विद्या एवं साधक में ऐक्यानुसंधान—
‘कौलिकं कौलिकार्थं कथयिष्यामि चक्र-देवता-गुरु-विद्या-साधकानामैक्यानुसंधानं
कौलिकार्थ इत्यर्थ ॥’२ आचार्य भास्करराय भी इसी तथ्य को पुष्ट करते हैं—
‘‘श्रीचक्रं श्रीमाता श्रीविद्या श्रीगुरुरात्मा चेति पंचानामैक्यं कौलिकार्थ इत्युच्यते ॥३
१. मंत्र, चक्र, एवं देवता में ऐक्य की पुष्टि करते हुए कहा गया है कि—
‘इत्थं मंत्रात्मकं चक्रं देवतायाः परं वपुः ॥’४
२. विद्या-गुरु एवं साधक में ऐक्य के विषय में पुष्टि की गई है—'विद्या
गुर्वात्मनामैक्यं तत्प्रकारः प्रदर्श्यते ॥'५
३. भगवती ही विश्व एवं चक्र का दोनों का कारण हैं अतः उनसे ऐक्य
स्वतः सिद्ध है—
“यदा सा परमा शक्तिः स्वेच्छयाविश्व 'रूपिणी । स्फुरत्तामात्मनः पश्येत्तदा
चक्रस्य संभवः ॥”६
४. वाक्, विद्या एवं देवी में एकता—
आत्मनः स्फुरणं पश्येद्यदा सा परमाकला ।
अम्बिका रूपमापन्ना परावाक् समुदीरिता ॥ ३६ ॥'७
चूँकि समस्त मंत्रों का, समस्त वर्णों का एवं अशेष मातृकाओं का मूल मात्र
'परावाक्' है अतः यदि भगवती ही परावाक् बन जाती हैं तब विद्या, मंत्र, वाणी
एवं देवी में भी ऐक्य स्वतः प्रमाणित है ।
५. चक्र एवं देवी में भी अभिन्नता है क्योंकि कोई भी चक्र ऐसा नहीं है जो
कि चक्रेश्वरी से युक्त न हो—
“चक्रेश्वरी समायुक्तं नवचक्रं पुरोदितम्”८
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१-२. अमृतानन्दनाथ—योगिनीहृदय 'दीपिका'
३. भास्कराचार्य—'सेतुबन्ध' ४-८. योगिनीहृदय 'दीपिका'