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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 418, कुल 530 में से

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पृष्ठ 418

३१६ वरिवस्यारहस्ये
मननत्राण धर्मित्वात्तेन मंत्रा इति स्मृताः ॥
१. ‘मंत्र’ अमित तेजशाली होते हैं—एवमाद्याः स्मृताः मंत्राः सर्वे ह्यमित
तेजसः ॥
२. ‘मंत्र’ जापक को अधिकार प्रदान करते हैं— अधिकारं प्रकुर्वन्ति सर्वस्य
जगतः प्रिये ॥
३. ‘मंत्र’ भगवान शिव से उत्पन्न हुए हैं । समस्त मांत्री सृष्टि के वे ही मूल
केन्द्र हैं—‘मंत्रसृष्टिर्भवेदेषा शिवस्य परमात्मनः ॥ ७० ॥
४. मंत्रों की मूल योनि ज्ञानशक्ति है—
ज्ञानशक्तिः परासूक्ष्मा मातृकां तो विदुर्बुधाः ।
सा योनिः सर्वमंत्राणां सर्वत्रारणिवत्स्थिताः ॥
५. मंत्र शिवशक्त्यात्मक एवं नित्य अनुग्रहशाली हैं—
शिवशक्त्यात्मकरूपास्तु नित्यानुग्रहशालिनः ॥
अथ क्रमप्राप्तं सर्वरहस्यार्थमाह—
द्वादशषोडशदशभिस्तपनशशिदहनकलाभिराकीर्णैः ।
पञ्चाशद्भिर्वर्णैरभिन्नदेहा कुलीनकुण्डलिनी ॥ १०३ ॥
बिसतन्वी तडिदाभा मूलाधारथपद्मश्रृङ्गाटात् ।
भित्त्वा मूलहृदाज्ञागतवह्निरवीन्दुमण्डलत्रितयम् ॥ १०४ ॥
व्योमनि चिच्छशिमण्डलमध्ये त्वकुलेन सङ्गम्य ।
उभयाङ्गसङ्गजन्यं प्रवाहयन्ती सुधापूरम् ॥ १०५ ॥
स्वयमपि तत्पानवशान्मत्ता भूत्वा पुनश्च तेनैव ।
मार्गेण परावृत्य स्वस्मिन् स्थाने सुखं स्वपिति ॥ १०६ ॥
(कुलकुण्डलिनी का स्वरूप एवं मूलस्थान)
भगवान् सूर्य की (तपिनी आदि) बारह, विधु की (अमृता आदि) सोलह एवं
अग्निदेव की (धूम्रार्चिरादि) दस कलाओं से उपहित, पचास वर्णों से अभिन्न
शरीरवाली, पृथ्वीतत्त्व में लीन, मृणालतन्तु के सदृश सूक्ष्माकारा, शम्पा की भाँति
उद्दीप्त, मूलाधार पङ्कज की कर्णिका में स्थित त्रिकोण के ऊपर से, मूलाधार चक्र
के ‘वह्निमण्डल’ अनाहत चक्र के ‘सूर्यमण्डल’ एवं आज्ञाचक्र के ‘इन्दुमण्डल’ का
भेदन करके आकाशस्थित चेतन ‘चन्द्रमण्डल’ के केन्द्र में ‘अकुल’ से मिलकर
दोनों के अङ्ग-सङ्ग से उत्पन्न पीयूष को प्रवाहित करती हुई (एवं डाकिन्यादि
मण्डलों को आप्लावित करती हुई) एवं स्वयं भी उस पीयूष को पीने से उन्मत्त
होकर फिर उसी (सुषुम्णा) मार्ग से प्रत्यावर्तित होकर अपने स्थान (मूलाधार चक्र)
में सुखपूर्वक सोती है ॥ १०३-१०६ ॥