सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 401, कुल 530 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 401

द्वितीयोंऽशः २९९

  • सरोजिनी *
    'श्रीचक्र' योगिनीरूप भी है ।
    १. स्थिति २. संहार नामक चक्रद्वय दो पद्म ३. दो अन्य वृत्त एवं ४. भूगृह
    आदि छः के योग से श्रीचक्र योगिनीरूप है ।
    'संहतिचक्र' = बिन्दु, त्रिकोण, वसुकोण ।
    'स्थितिचक्र' = दशारद्वय, चतुर्दशार ।
    'पद्मे'—वसुदल, षोडशदल । 'वृत्त' = वृत्त एक है—भूगृह एक है । आठ
    कोणों द्वारा बाह्यादियोगिनीरूपत्व स्थापित है । इसी प्रकार विद्या भी योगिनीरूपा
    है—
    'विद्यान्तर्भूतशक्त्याद्यैः शाक्तैः षड्भिस्तथाक्षरैः ।
    योगिनीत्वं च विद्याया राशित्वं चान्त्यवर्जितैः ।।'१
    विद्या में १५ अक्षर है उसके अन्तर्भूत शक्तियाँ हैं—३ हल्लेखाएँ हैं, ३
    लकार है । ६ शाक्त अक्षरों से युक्त होने के कारण योगिनीत्व स्वसिद्ध है ।
    योगिनियाँ डाकिनी आदि की संख्या छः है । इन सभी कोणों से योगिनीत्व स्वसिद्ध
    है—
    'विद्यायाः पंचदशाक्षर्या अन्तर्भूताः शक्तयो हल्लेखा स्तिस्रः । तदाद्याश्च
    लकारास्त्रयः, शाक्तैरैतैः षड्भिरक्षरैर्विद्याया योगिनीत्वम् । योगिन्यश्च डाकिन्याद्याः
    षट् ।'२
    'श्रीचक्र' का स्वरूप निम्नांकित है—
    १. अमृतानन्दनाथ—योगिनीहृदय 'दीपिका'