वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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देवी चक्ररूपा इसलिए है क्योंकि 'स्फुरता' के कारण जैसे ही देवी अपने को
देखने लगती है तभी चक्रों का जन्म हो जाता है—"यदा सा परमा शक्तिः
स्वेच्छया विश्वरूपिणी । स्फुरतामात्मनः पश्येत्तदा चक्रस्य संभवः ॥"१ भाव यह
कि—"सा देवी स्वेच्छया स्वनिष्ठां स्फुरतां यदा पश्यति तदा चक्रस्य विश्वाभिन्नस्य
त्रिकोणदिचक्रस्य संभव उत्पत्तिर्भवति ॥"२ अमृतानन्दनाथ भी भास्करराय की इसी
दृष्टि से सहमत है—'विश्वसर्जनमेव पराशक्तेः स्फुरत्ता, तस्याः सृष्टिरूपत्वात् । तदा
षट्त्रिंशत्तत्वात्मकविश्वसृष्टिकाले चक्रस्य विश्वमयस्य परदेवताचक्रस्य संभवः ।
"स्वेच्छयैव जगत्सर्वं निगिरत्युद्गिरत्यपि ॥'३ 'इच्छामात्रं प्रभो सृष्टिः' परमात्मा की
इच्छा ही सृष्टि है । परमात्मा की 'इच्छा' ही देवी (शक्ति, माता, जगन्माता) है
अतः सृष्टि एवं देवी एक है—'सृष्टिस्तु कुण्डली ख्याता' क्योंकि 'चक्र' देवी का
शरीर है—आसन है और समस्त सृष्टि का संक्षिप्त रूप है अतः चक्र भी देवीरूप
है एवं देवी भी चक्ररूपा है । 'एवमुक्तरीत्या योजितगणेशादिविश्वप्रकारा महेश्वरी
त्रिपुरसुन्दरी चक्ररूपा देवता ॥४ सारांश यह कि—'एवं चक्र-देवता-विद्यानामेक
धर्मावच्छिन्नत्वेनाभेदमुपसंहरन्"—चक्र-देवता-विद्या-इन तीनों में एकता है ।५
पंचदशीविद्या एवं श्रीचक्र भी अभिन्न है—श्रीचक्र का प्रत्येक त्रिकोण, वृत्त,
रेखादिक विद्या के किसी अक्षर एवं अक्षर एवं मंत्र की अधिष्ठात्री देवी से अधिष्ठित
है । देवी 'कामकला' एवं चक्र तो अभिन्न हैं ही—'इति कामकला विद्या देवी
चक्रात्मिका सेयम् । विदितायेन .स मुक्तो भवति महात्रिपुरसुन्दरीरूपा ॥'६ 'चक्रं
कामकला रूपं प्रसार परमार्थतः'७—इनके साथ ही साथ विद्या भी श्रीचक्र से अभिन्न
है । 'इत्थं मंत्रत्मकं चक्रं देवतायाः परं वपुः ॥'८ अर्थात् देवी का शरीर रूप चक्र
मंत्रात्मक हैं ।
श्रीचक्र के साथ देवी की एकता का प्रतिपादन करते हुए दीपिकाकर ने कहा
है—"चक्रं देवतायाः परम् अन्यद् वपुः । "ततः पद्मनिभां देवीम्' इत्यत्र देवतायाः
करचरणादि मद्वपुरुक्तम्, तदेव त्रिकोणादिभूगृहान्त श्रीचक्रपदनिवासावरणदेवतारूपेणा-
वयवशो विभज्य निवासिनी स्वसंविद्देवता श्रीचक्रा पर वपुषा स्थिता तदुक्तमत्रेव—
स्वेच्छाविश्वमयोल्लेख चित्त विश्वरूपकम् ।
चैतन्यमात्मनो रूपं निसर्गानन्दसुन्दरम् ॥
इच्छाशक्तिमयपाशांकुशज्ञानरूपिणीम् । क्रिया शक्तिमये बाण धनुषी
दधदुज्ज्वलम् । आश्रयाश्रयि भेदेन अष्टधा भिन्न हेतिमत् । अष्टारचक्रसंरूढ़ नव
चक्रासनस्थितम् । एवं रूपं परं तेजः श्रीचक्रवपुषा स्थितम् । तदीयशक्ति निकरस्फुर-
दर्भिसमावृतम् ॥'९ चक्रं देवता विद्या गुरुः साधकश्चेति पंचोनां मध्य (अभेदः)१०
१. योगिनीहृदय 'दीपिका' २. भास्करराय—'सेतुबन्ध'
३-४. योगिनीहृदय 'दीपिका' ५. भास्करराय—'सेतुबन्ध'
६. कामकलाविलास ७-९. योगिनीहृदय 'दीपिका'
१०. भास्करराय—'सेतुबन्ध'