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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 409, कुल 530 में से

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पृष्ठ 409

द्वितीयोंऽशः ३०७
(क) षोढा ऐक्य— (ख) चतुर्विध ऐक्य—
१. मंत्र एवं मातृकाओं का ऐक्य । १. मातृका एवं मंत्र का ऐक्य ।
२. मातृका एवं श्रीचक्र का ऐक्य । २. मंत्र एवं चक्र का ऐक्य ।
३. मंत्र एवं नित्याओं का ऐक्य । ३. चक्र एवं नित्याओं का ऐक्य ।
४. मातृका एवं नित्याओं का ऐक्य । ४. नित्याओं एवं तिथियों का ऐक्य ।
५. मंत्र एवं चक्र का ऐक्य ।
६. नित्याओं एवं चक्र का ऐक्य ।
मंत्र के भाग— श्रीचक्र के भाग—
१. ‘नाद’ = नाद से नादान्त तक १. ‘नाद’—आज्ञा चक्र से सहस्रार
(अर्धचन्द्र, रोधनी, नाद, नादान्त, तक तक । भूपुर
शक्ति, व्यापिका, समनी, उन्मनी)
२. ‘बिन्दु’—अनुस्वार २. ‘बिन्दु’—शिवचक्र । ३ वृत्त । १६
एवं ८ दल पद्म ।
३. ‘कला’—मंत्र के वर्ण एवं स्वर ३. ‘कला’—शक्तिचक्र, त्रिकोण अष्टार।
दशारद्वय । चतुर्दशार ॥
४. (मंत्र का चौथा खण्ड) = सादाख्य
= जो नाद बिन्दु कलातीत है ।
‘सुभगोदय स्तुति’ (गौडपादाचार्य)
एतेषां गणेशादीनां पञ्चानां मेलने पञ्चपञ्चाशत् संपद्यन्ते, गणेशस्यै-कविधत्वेनैव
गणनात्, रेखादलकोणेषु पञ्चसप्ततावपि ‘एको गणेशः’ इत्येव व्यवहारात् । पीठानि
यद्यपि कामरूपादिच्छायाच्छत्रान्तान्येकपञ्चाशत्’ तथापि ‘ओजापूकानाम्’ इति प्राधान्य-
वेषेण पुनर्गणनायां पञ्चपञ्चाशत् । तेनैतत्पञ्चकसमष्टित्वादेव पीठत्वं सिद्धमित्याशयेन
तन्त्रेषु न पुनः पृथक् पीठरूपतोक्तिरिति वा तन्त्राशय इति मन्वान आह—
यावन्मातृकमुदितान्येकसमेतानि पंचाशत् ।
पीठानि पुनर्गणितान्योजापूकानि चत्वारि ॥ ९७ ॥
गणपग्रहभादीनां शशिनिधितार्तुसूर्यसंख्यानाम् ।
मेलनतः पीठानि ज्ञेयान्येतेषु पञ्चपञ्चाशत् ॥ ९८ ॥
(वर्णमाला एवं पीठों में समानता)
जितनी (संख्या में) मातृकायें (वर्णमाला के अक्षर) हैं (उसी संख्या के
अनुरूप) इक्यावन पीठ हैं । ओडयाण जालंधर, पूर्णगिरि एवं कामरूप
(ओ-जा-पू-का) नामक चार (पीठ) उसमें और पणिणत किए गए हैं (जोड़े या
गिनाए गए हैं) ॥ ९७ ॥