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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 417, कुल 530 में से

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पृष्ठ 417

द्वितीयोऽंशः ३१५
६. मंत्रराज शिवशक्ति से अभिन्न है क्योंकि यह उन्हीं से उत्पन्न हुआ है—
'शिवशक्ति समायोगाज्जनितो मंत्रराजकः ॥'१
'सैव महाविद्यात्मा माता चतुरन्वयैकविश्रान्तिः ॥'
देवी मातृकामयी है । मंत्ररूपिणी है—'ज्ञातृज्ञानमयाकार मननान्मंत्ररूपिणी ।
तेषां समष्टिरूपेण पराशक्तिस्तु मातृका ॥'२ तेषां समष्टिरूपेण पराशक्तिं तु
मातृकाम् ॥३ 'विद्या' देवीमयी ही है—'तन्मयी मूलविद्या च तदद्य कथयामि ते ॥४
७. गुरु, शिव एवं साधक में भी अभिन्नता स्थित है—'शिवगुर्वात्मना-
मैक्यानुसंधानात्तदात्मकम्' ।५
८. गुरु, मंत्र तथा देवता में अभेद है—अतो मंत्रे गुरौ देवे न भेदश्च
प्रजायते ॥'६
९. देवी और विद्या में अभिन्नता है—'मातृकाभेदतंत्र' में कहा गया है कि
गुरुरूपा महाविद्या ही एक परा देवी हैं । महाविद्या ही श्रीमत्त्रिपुरीसुन्दरी देवी हैं ।
एक ही महाविद्या है जो कि नाम मात्र के लिए पृथक् है—
'गुप्तरूपा महाविद्या शैवी सैकजटा परा । तस्माल्लक्ष्मी वैष्णवी या त्रिवर्ग
फलदायिनी । गुप्तरूपा महाविद्या श्रीमत्त्रिपुरसुन्दरी । शांभवी परमा या सा त्रिपुरा
मोक्षदायिनी । एकैव हि महाविद्या नाम मात्रं पृथक्-पृथक् । तथैव पुरुषश्चैव नाममात्र-
विभेदतः ॥७
'मंत्रस्य'—मंत्र का (पंचदशाक्षरी, कूटत्रयात्मक, श्रीविद्या के मंत्र का) वर्णों
की चिन्मयता ही वर्णों को 'मंत्र' बना देती है इसीलिए कहा गया है—
“मंत्राश्चिन्मरीचयः” । 'नेत्रतंत्र' में मंत्र-विज्ञान की विशद व्याख्या की गई है । 'मंत्र'
देवता का वर्णाकार रूप है । 'मंत्र'—देवता की ध्वन्यात्मक (नादात्मक) अभिव्यक्ति
है । 'मंत्र'—देवता की नादात्मक परिणति है । 'मंत्र' देवता का सूक्ष्म शरीर है ।
'मंत्र' करोड़ों की संख्या में या असंख्य हैं तथा ये सभी सर्वाधिकारी हैं, शिव-शक्ति
के प्रभाव के कारण ये सर्वशक्ति समन्वित हैं तथा योगमोक्षप्रद एवं अनन्त शक्ति
सम्पन्न हैं—'मंत्राकोट्यो ह्यसंख्याताः सर्वाः सर्वाधिकारिकाः । शिवशक्ति प्रभावाच्च
सर्वशक्तिसमन्विताः । भोगमोक्षप्रदाः सर्वस्वशक्ति बलसमन्विताः ॥ 'मंत्र' क्या है?
'नेत्रतंत्र' के २१वें अधिकार के ७१ से ७६ श्लोकों में 'मंत्र' तत्व की व्याख्या की
गई है । चूँकि 'मंत्र'—१. प्राणियों को संसार-सागर से मुक्त करते हैं, २. जीवात्मा
को परशिव से योजित करते हैं—जोड़ते हैं एवं ३. मनन करने से (मनन करने
वालों का) प्राणियों का आपदाओं (दैहिक, भौतिक, अधिभौतिक, आधिदैविक आदि
आपदाओं) से त्राण करते हैं इसीलिए इन्हें 'मंत्र' कहा जाता है—
'मोचयन्ति च संसाराद्योजयन्ति परे शिवे ।
१-५. अमृतानन्दनाथ—योगिनीहृदय 'दीपिका' ६. गुरुगीता
७. मातृकाभेद तन्त्र