वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोऽंशः ३०१
परमात्मा चेत्येतै राशिखरूपिणी ॥'—'योगिनीहृदय' के इस कथन द्वारा श्रीविद्या की
भी राशिरूपता सिद्ध होती है ।
'प्राणादिधनञ्जयान्ता दश वायवः, जीवात्मा उक्त लक्षणः पशुः, परमात्मा 'एष
त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः' इत्युपनिषदुक्तसर्वभूतान्तर्यामी । एतैर्द्वादशमी राशिस्व-
रूपिणी ।।'—कहकर योगी अमृतानन्दनाथ ने योगिनीरूपत्व की पुष्टि की है । “पंच
चतुः शक्त्यनला ।”
स्वाभिमुखाग्र त्रिकोण शक्तियाँ हैं । ये पाँच हैं । पराङ्मुखाग्रत्रिकोण ही
'अनल' हैं । ये चार हैं । इसीलिए कहा गया है— “पंचशक्ति चतुर्वह्निसंयोगाच्चक्र
संभवः” । 'वृत्त' = पद्मद्वयगर्भित वृत्त ।। जो ९ त्रिकोण हैं ।
१. ५ शक्तियाँ २. ४ अग्नि ३. १ बिन्दु ४. १ वृत्त ५. भूगृहादिक १२
के योग से 'श्रीचक्र' राशिरूप है ।
चक्रस्य विद्याक्षरजन्यत्वादप्यभेदस्य सिद्धत्वात्तेन हेतुना षड्रूपत्वं द्रढयति—
चक्रं विद्याक्षरैरेव जननात् तदभेदवत् ।
देव्या रूपान्तरत्वाच्च तेन युक्तोक्तरूपता ॥ ९६ ॥
(पंचदशीविद्या के वर्णों के साथ चक्रों की एवं चक्रों के साथ
देवी की अभिन्नता का प्रतिपादन)
पंचदशीविद्या के अक्षरों द्वारा उद्भूत होने के कारण चक्र (नौ चक्र) उनसे
अभिन्न हैं । (इन चक्रों का) देवी का रूपान्तर होने के कारण (देवी के इस)
कथित चक्रात्मक रूप की युक्ति-युक्तता है । या देवी के अन्य रूपों के साथ इस
रूप की सङ्गतता होने के कारण यह कथित रूपान्तर युक्ति सङ्गत है ॥ ९६ ॥
- प्रकाश *
यद्यपि मूलतन्त्रे चक्रे विद्याया अभेदस्तदक्षरजन्यत्वज्ञाप्यक एवोक्तो न पुनः
षड्रूपत्वज्ञाप्यकः, तथापि 'एवं विश्वप्रथाकारा चक्ररूपा महेश्वरी' इत्युक्त्या षड्रूपता
सूचितेति संप्रदायः ॥ ९६ ॥ - सरोजिनी *
प्रस्तुत श्लोक में निम्न दो अभिन्नताओं या एकरूपात्मकताओं का प्रतिपादन
किया गया है—
१. देवी एवं श्रीचक्र अभिन्न हैं । ┐ “एवं विश्वप्रकारा च चक्ररूपा
२. पंचदशी विद्या एवं चक्र अभिन्न हैं । ┘ महेश्वरी”—योगिनीहृदय
योगिनीहृदय में कहा भी गया है— “एवं विश्वप्रकारा च चक्ररूपा महेश्वरी (देव्या
देहे यथा प्रोक्तो गुरुदेहे तथैव हि ।) ॥ ६७ ॥