वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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(गणप, ग्रह, भ आदि के साथ पचपन पीठों की एकात्मता)
गणप, ग्रह, भ आदि जिनकी संख्या क्रमशः चन्द्रमा (एक) निधि (नौ), तारा
(सत्ताईस), ऋतु (छः) एवं सूर्य (बारह) है—से विरचित, कुल मिलाकर पचपन
पीठ, इनमें (स्थित) जानना चाहिए ॥ ९८ ॥
* प्रकाश *
यावन्मातृकमित्यव्ययीभावः । यावन्तो मातृकास्तावन्ति पीठानीत्यर्थः । ओ,
ओड्याणपीठम्; जा, जालंधरपीठम्; पू, पूर्णगिरिपीठम्; का, कामरूपपीठम् ।
नामैकदेशे नामग्रहणम्, तथैव संप्रदायात् । भादीनां नक्षत्रयोगिनीराशीनाम् । शशी
एकः । निधयो नव । ताराः सप्तविंशतिः । सारेति पाठे ऽपि सकारः सप्तसंख्यायां
साङ्केतिकः; रेफस्तु द्विसंख्यायाम् 'अङ्कानां वामतो गतिः' इत्युक्तेरुक्तैव संख्या
सिध्यति । तदुक्तं वररुचिपरिभाषायाम्—
'पादयः पञ्च याद्यष्ट कादयष्टादयो नव ।
एतद्विभिन्नाक्षरं बिन्दुः संख्या तन्मेलनोध्भवा ॥'
इति । ऋतवः षट् । सूर्या द्वादश ॥ ९७-९८ ॥
* सरोजिनी *
'यावन' = जितनी, 'मातृका' = वर्णमाला के मूल अक्षर ॥
"पीठ"—पीठ शक्ति के रूपान्तर हैं । ये शक्ति के जाग्रत केन्द्र हैं । पीठ
चारो शक्तियों की परिणतियाँ हैं । अभिनवगुप्त पादाचार्य ने 'तन्त्रालोक' में इनकी
उपयोगिता को रेखांकित किया है—'क्षेत्रपीठो पपीठेपु प्रवेशो विघ्नशान्तये । मंत्राद्या-
राधकस्यार्थ तल्लाभायोपदिश्यते ॥'' लाभ निम्न है—१. विघ्नशांति २. मंत्रसिद्धि
में लाभ
'पीठानि पंचाशत्'—पचास पीठ । 'एक समेतानिपंचाशत' = इक्यावन'
प्रमुख पीठ निम्न हैं—१. कामरूपपीठ २. पूर्णगिरिपीठ ३. जालन्धरपीठ ४.
ओड्याणपीठ ॥ चारों शक्तियाँ कामरूप-पूर्णगिरि-जालन्धर एवं उड्डीयान पीठ के रूप
में परिणत हो गई है—"प्रकाशविमर्शात्मतया समरसीभूताः पूर्वोक्ताश्चतस्रः शक्तयः
कामरूप-पूर्णगिरि-जालन्ध्रौड्याणपीठ रूपेण परिणता इत्यर्थः ॥''१ 'पीठ' चार हैं—
'पीठाश्चत्वारः पिण्ड-पद-रूप-रूपातीत शब्देन तत्तत्स्थानान्याधारहृदय-भ्रूमध्य-ब्रह्म-
रन्ध्राणिलक्ष्यन्ते । पिण्डं कुण्डलिनी शक्तिः पदं हंसः प्रकीर्तितः । रूपं बिन्दुरितिख्यातं
रूपातीतं तु चिन्मयम् ।२ 'पदं नाम हंसः, रूपं नाम बिन्दुः, रूपातीतं नाम निरञ्जन
तत्त्वम् ॥'३
पीठ—अमृतानन्दनाथ कहते हैं कि—'अम्बिका' 'शान्ता' आदि समस्त चार
शक्तियाँ क्रमानुसार परस्पर सामरस्यभावापन्न होकर 'कामरूप' 'पूर्णगिरि' 'जालन्धर'
१. अमृतानन्दनाथ—योगिनीहृदय 'दीपिका' २. स्वच्छन्दसंग्रह
३. अमृतानन्दनाथ—योगिनीहृदय 'दीपिका'