सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 411, कुल 530 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 411

An exact line-by-line transcription of the page into Unicode Devanagari:

द्वितीयोऽंशः ३०९
एवं 'ओड्याणपीठ' के रूप में परिणत हो गई—‘चतस्रः (अम्बिकाद्याः
शान्ताद्याश्चतस्रः) क्रमेण परस्परं सामरस्यमापन्नाः ‘का पू जा ओ'—इति क्रमाद्
आसन् ।। 'का'—कामरूपपीठम्, 'पू'—पूर्णगिरिपीठम्, जा—जालन्धरपीठम्, ‘ओ’—
ओड्याणपीठम् ।।''
'पीठ'—१ 'कामरूपपीठ' = भूतत्त्व । वृत्त = बिन्दुषट्क । भूमण्डल । २.
'पूर्णगिरिपीठ' = वृत्तरूप = षड्बिन्दुयुक्त । वायु तत्त्व । वायु मण्डल । वायुमण्डल
षडावर्तवद्वृत्तरूप है । ३. 'जालन्धर पीठ' = अर्धचन्द्र ही जालन्धर पीठ है ।
अर्धचन्द्र जलतत्त्वमय है । जलमण्डल भी अर्धचन्द्राकार है । ४. 'ओड्याणपीठ'—
त्रिकोण ही ओड्याणपीठ है । त्रिकोण तेजस्तत्वमय है । क्योंकि अग्निमण्डल
त्रिकोणरूप